गौतम बुद्ध पर केंद्रित कविताएं संकलनः नीरज कुमार मिश्र

0
3185

भगवान बुद्ध का जन्म वैशाख मास की पूर्णिमा को हुआ था। इस पूर्णिमा को बुद्ध पूर्णिमा कहा जाता है। देश भर में आज बुद्ध पूर्णिमा का पर्व मनाया जा रहा है।बुद्ध पूर्णिमा बौद्ध अनुयायियों के साथ-साथ हिंदुओं के लिये भी खास पर्व है। हिन्‍दू धर्म में गौतम बुद्ध को भगवान श्री विष्णु का नौवां अवतार माना जाता है। इतिहासकारों के अनुसार बुद्ध के जीवनकाल को 563-483 ई.पू. के मध्य माना गया है।अधिकांश लोग नेपाल के लुम्बिनी नामक स्थान को बुद्ध का जन्म स्थान मानते हैं।गौतम बुद्ध की मृत्यु, उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में 80 वर्ष की आयु में हुई थी।कुछ कवियों ने बुद्ध और उनके दर्शन पर कविताएँ लिखीं।कुछ कविताओं को लेकर तैयार ये कविता संग्रह गौतम बुद्ध को समर्पित है।आप सबको बुद्ध पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं??

(१). सखि, वे मुझसे कहकर जाते -मैथिलीशरण गुप्त
“सखि, वे मुझसे कहकर जाते,
कह, तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते?
मुझको बहुत उन्होंने माना
फिर भी क्या पूरा पहचाना?
मैंने मुख्य उसी को जाना
जो वे मन में लाते।
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।
स्वयं सुसज्जित करके क्षण में,
प्रियतम को, प्राणों के पण में,
हमीं भेज देती हैं रण में –
क्षात्र-धर्म के नाते
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।
हु‌आ न यह भी भाग्य अभागा,
किसपर विफल गर्व अब जागा?
जिसने अपनाया था, त्यागा;
रहे स्मरण ही आते!
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।
नयन उन्हें हैं निष्ठुर कहते,
पर इनसे जो आँसू बहते,
सदय हृदय वे कैसे सहते ?
गये तरस ही खाते!
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।
जायें, सिद्धि पावें वे सुख से,
दुखी न हों इस जन के दुख से,
उपालम्भ दूँ मैं किस मुख से ?
आज अधिक वे भाते!
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।
गये, लौट भी वे आवेंगे,
कुछ अपूर्व-अनुपम लावेंगे,
रोते प्राण उन्हें पावेंगे,
पर क्या गाते-गाते ?
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।”

(२). बुद्ध और नाचघर – हरिवंशराय बच्चन

“बुद्धं शरणं गच्छामि,
ध्मंबुद् शरणं गच्छाेमि,
संघं शरणं गच्छामि।”
बुद्ध भगवान,
जहाँ था धन, वैभव, ऐश्वर्य का भंडार,
जहाँ था, पल-पल पर सुख,
जहाँ था पग-पग पर श्रृंगार,
जहाँ रूप, रस, यौवन की थी सदा बहार,
वहाँ पर लेकर जन्म ,
वहाँ पर पल, बढ़, पाकर विकास,
कहाँ से तुममें जाग उठा
अपने चारों ओर के संसार पर
संदेह, अविश्वास?
और अचानक एक दिन
तुमने उठा ही तो लिया
उस कनक-घट का ढक्कन,
पाया उसे विष-रस भरा।
दुल्हन की जिसे पहनाई गई थी पोशाक,
वह तो थी सड़ी-गली लाश।
तुम रहे अवाक्,
हुए हैरान,
क्यों अपने को धोखे में रक्खे है इंसान,
क्यों वे पी रहे है विष के घूँट,
जो निकलता है फूट-फूट?
क्या यही है सुख-साज
कि मनुष्य खुजला रहा है अपनी खाज?
निकल गए तुम दूर देश,
वनों-पर्वतों की ओर,
खोजने उस रोग का कारण,
उस रोग का निदान।
बड़े-बड़े पंडितों को तुमने लिया थाह,
मोटे-मोटे ग्रंथों को लिया अवगाह,
सुखाया जंगलों में तन,
साधा साधना से मन,
सफल हुया श्रम,
सफल हुआ तप,
आया प्रकाश का क्षण,
पाया तुमने ज्ञान शुद्ध,
हो गए प्रबुद्ध।
देने लगे जगह-जगह उपदेश,
जगह-जगह व्याख्यान,
देखकर तुम्हारा दिव्य वेश,
घेरने लगे तुम्हें लोग,
सुनने को नई बात
हमेशा रहता है तैयार इंसान,
कहनेवाला भले ही हो शैतान,
तुम तो थे भगवान।
जीवन है एक चुभा हुआ तीर,
छटपटाता मन, तड़फड़ाता शरीर।
सच्चाई है- सिद्ध करने की जररूरत है?
पीर, पीर, पीर।
तीर को दो पहले निकाल,
किसने किया शर का संधान?-
क्यों किया शर का संधान?
किस किस्मा का है बाण?
ये हैं बाद के सवाल।
तीर को पहले दो निकाल।
जगत है चलायमान,
बहती नदी के समान,
पार कर जाओ इसे तैरकर,
इस पर बना नहीं सकते घर।
जो कुछ है हमारे भीतर-बाहर,
दीखता-सा दुखकर-सुखकर,
वह है हमारे कर्मों का फल।
कर्म है अटल।
चलो मेरे मार्ग पर अगर,
उससे अलग रहना है भी नहीं कठिन,
उसे वश में करना है सरल।
अंत में, सबका है यह सार-
जीवन दुख ही दुख का है विस्तायर,
दुख की इच्छा है आधार,
अगर इच्छा् को लो जीत,
पा सकते हो दुखों से निस्ताीर,
पा सकते हो निर्वाण पुनीत।
ध्वनित-प्रतिध्वनित
तुम्हारी वाणी से हुई आधी ज़मीन-
भारत, बर्मा, लंका, स्या म,
तिब्बात, मंगोलिया जापान, चीन-
उठ पड़े मठ, पैगोडा, विहार,
जिनमें भिक्षुणी, भिक्षुओं की क़तार
मुँड़ाकर सिर, पीला चीवर धार
करने लगी प्रवेश
करती इस मंत्र का उच्चाार :
“बुद्धं शरणं गच्छाीमि,
ध्मंधं श शरणं गच्छािमि,
संघं शरणं गच्छाछमि।”
कुछ दिन चलता है तेज़
हर नया प्रवाह,
मनुष्य उठा चौंक, हो गया आगाह।
वाह री मानवता,
तू भी करती है कमाल,
आया करें पीर, पैगम्बमर, आचार्य,
महंत, महात्माछ हज़ार,
लाया करें अहदनामे इलहाम,
छाँटा करें अक्ल बघारा करें ज्ञान,
दिया करें प्रवचन, वाज़,
तू एक कान से सुनती,
दूसरे सी देती निकाल,
चलती है अपनी समय-सिद्ध चाल।
जहाँ हैं तेरी बस्तियाँ, तेरे बाज़ार,
तेरे लेन-देन, तेरे कमाई-खर्च के स्था,न,
वहाँ कहाँ हैं
राम, कृष्णँ, बुद्ध, मुहम्मयद, ईसा के
कोई निशान।
इनकी भी अच्छी चलाई बात,
इनकी क्याच बिसात,
इनमें से कोई अवतार,
कोई स्वेर्ग का पूत,
कोई स्वेर्ग का दूत,
ईश्वसर को भी इनसे नहीं रखने दिया हाथ।
इसने समझ लिया था पहले ही
ख़दा साबित होंगे ख़तरनाक,
अल्लाह, वबालेजान, फज़ीहत,
अगर वे रहेंगे मौजूद
हर जगह, हर वक्त।
झूठ-फरेब, छल-कपट, चोरी,
जारी, दग़ाबाजी, छीना-छोरी, सीनाज़ोरी
कहाँ फिर लेंगी पनाह;
ग़रज़, कि बंद हो जाएगा दुनिया का सब काम,
सोचो, कि अगर अपनी प्रेयसी से करते हो तुम प्रेमालाप
और पहुँच जाएँ तुम्हारे अब्बा जान,
तब क्याच होगा तुम्हाीरा हाल।
तबीयत पड़ जाएगी ढीली,
नशा सब हो जाएगा काफ़ूर,
एक दूसरे से हटकर दूर
देखोगे न एक दूसरे का मुँह?
मानवता का बुरा होता हाल
अगर ईश्वार डटा रहता सब जगह, सब काल।
इसने बनवाकर मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर
ख़ुदा को कर दिया है बंद;
ये हैं ख़ुदा के जेल,
जिन्हेंख यह-देखो तो इसका व्यंाग्यल-
कहती है श्रद्धा-पूजा के स्थाइन।
कहती है उनसे,
“आप यहीं करें आराम,
दुनिया जपती है आपका नाम,
मैं मिल जाऊँगी सुबह-शाम,
दिन-रात बहुत रहता है काम।”
अल्लाि पर लगा है ताला,
बंदे करें मनमानी, रँगरेल।
वाह री दुनिया,
तूने ख़ुदा का बनाया है खूब मज़ाक,
खूब खेल।
जहाँ ख़ुदा की नहीं गली दाल,
वहाँ बुद्ध की क्या चलती चाल,
वे थे मूर्ति के खिलाफ,
इसने उन्हीं की बनाई मूर्ति,
वे थे पूजा के विरुद्ध,
इसने उन्हीं को दिया पूज,
उन्हें ईश्वर में था अविश्वाास,
इसने उन्हीं को कह दिया भगवान,
वे आए थे फैलाने को वैराग्य,
मिटाने को सिंगार-पटार,
इसने उन्हीं को बना दिया श्रृंगार।
बनाया उनका सुंदर आकार;
उनका बेलमुँड था शीश,
इसने लगाए बाल घूंघरदार;
और मिट्टी,लकड़ी, पत्थंर, लोहा,
ताँबा, पीतल, चाँदी, सोना,
मूँगा, नीलम, पन्ना, हाथी दाँत-
सबके अंदर उन्हें डाल, तराश, खराद, निकाल
बना दिया उन्हें बाज़ार में बिकने का सामान।
पेकिंग से शिकागो तक
कोई नहीं क्यूारियों की दूकान
जहाँ, भले ही और न हो कुछ,
बुद्ध की मूर्ति न मिले जो माँगो।
बुद्ध भगवान,
अमीरों के ड्राइंगरूम,
रईसों के मकान
तुम्हारे चित्र, तुम्हारी मूर्ति से शोभायमान।
पर वे हैं तुम्हारे दर्शन से अनभिज्ञ,
तुम्हारे विचारों से अनजान,
सपने में भी उन्हें इसका नहीं आता ध्यान।
शेर की खाल, हिरन की सींग,
कला-कारीगरी के नमूनों के साथ
तुम भी हो आसीन,
लोगों की सौंदर्य-प्रियता को
देते हुए तसकीन,
इसीलिए तुमने एक की थी
आसमान-ज़मीन?
और आज
देखा है मैंने,
एक ओर है तुम्हारी प्रतिमा
दूसरी ओर है डांसिंग हाल,
हे पशुओं पर दया के प्रचारक,
अहिंसा के अवतार,
परम विरक्त,
संयम साकार,
मची है तुम्हाारे रूप-यौवन के ठेल-पेल,
इच्छाै और वासना खुलकर रही हैं खेल,
गाय-सुअर के गोश्त का उड़ रहा है कबाब
गिलास पर गिलास
पी जा रही है शराब-
पिया जा रहा है पाइप, सिगरेट, सिगार,
धुआँधार,
लोग हो रहे हैं नशे में लाल।
युवकों ने युवतियों को खींच
लिया है बाहों में भींच,
छाती और सीने आ गए हैं पास,
होंठों-अधरों के बीच
शुरू हो गई है बात,
शुरू हो गया है नाच,
आर्केर्स्ट्रा के साज़-
ट्रंपेट, क्लैसरिनेट, कारनेट-पर साथ
बज उठा है जाज़,
निकालती है आवाज़ :
“मद्यं शरणं गच्छामि,
मांसं शरणं गच्छामि,
डांसं शरणं गच्छामि।”

(३). ओ मेरे दिल!-2 – अज्ञेय

” धक्-धक् धक्-धक् ओ मेरे दिल!
तुझ में सामथ्र्य रहे जब तक तू ऐसे सदा तड़पता चल!
बोधी तरु की छाया नीचे जिज्ञासु बने-आँखें मीचे-
थे नेत्र खुल गये गौतम के जब प्रज्ञा के तारे चमके;
सिद्धार्थ हुआ, जब बुद्ध बना, जगती ने यह सन्देश सुना-
“तू संघबद्ध हो जा मानव! अब शरण धर्म की आ, मानव!”
जिस आत्मदान से तड़प रही गोपा ने थी वह बात कही-
जिस साहस से निज द्वार खड़े उस ने प्रियतम की भीख सही-
“तू अन्धकार में मेरा था, आलोक देख कर चला गया;
वह साधन तेरे गौरव का गौरव द्वारा ही छला गया-
पर मैं अबला हूँ, इसीलिए कहती हूँ, प्रणत प्रणाम किये,
मैं तो उस मोह-निशा में भी ओ मेरे राजा! तेरी थी;
अब तुझ से पा कर ज्ञान नया यह एकनिष्ठ मन जान गया
मैं महाश्रमण की चेरी हूँ-ओ मेरे भिक्षुक! तेरी हूँ!”
वह मर्माहत, वह चिर-कातर, पर आत्मदान को चिर-तत्पर,
युग-युग से सदा पुकार रहा औदार्य-भरा नारी का उर!
तुझ में सामथ्र्य रहे जब तक तू ऐसे सदा तड़पता चल-
धक्-धक्, धक्-धक् ओ मेरे दिल! ”

(४). बुद्ध – गिरिजा कुमार माथुर

“आज लौटती जाती है पदचाप युगों की,
सदियों पहले का शिव-सुन्दर मूर्तिमान हो
चलता जाता है बोझीले इतिहासों पर
श्वेत हिमालय की लकीर-सा ।
प्रतिमाओं-से धुँधले बीते वर्ष आ रहे,
जिन में डूबी दिखती
ध्यान-मग्न तसवीर, बोधि-तरु के नीचे की ।
जिसे समय का हिम न प्रलय तक गला सकेगा
देश-देश से अन्तहीन वह छाया लौटी-
और लौटते आते हैं वे मठ, विहार सब,
कपिलवस्तु के भवनों की वह कांचन माला
जब सागर, वन की सीमाएं लाँघ गये थे
कुटियों के सन्देश प्यार के ।
महलों का जब स्वप्न अधूरा
पूर्ण हुआ था शीतल, मिट्टी के स्तूपों की छाया में।
वैभव की वे शिलालेख-सी यादें आतीं,
एक चाँदनी-भरी रात उस राजनगर की,
रनिवासों की नंगी बांहों-सी रंगीनी
वह रेशमी मिठास मिलन के प्रथम दिनों की।”

(५). माफीनामा – मदन कश्यप

” मेरी धमनियों में उन राजन्यों का रक्त है
जो कभी छत्री रहे तो कभी बाम्हन
जिन्होंने बनाया था दुनिया का पहला ‘गणतंत्र’
मगर तुम्हें नहीं दिया था चुनने का अधिकार
उसके सातों कुल उनके ही थे
सातों नदियों पर उनका ही अधिकार था
उनके ही कब्जे में थीं सातों लोको की कथाएँ
इतिहास में कहीं दर्ज नहीं है
कि तुम कहाँ थे और कैसे थे
बींसवी सदी में तुमने जिसे बहुत-बहुत याद किया
उस गौतम बुद्ध ने भी तुम्हें कितना अपनाया था
कुछ ठीक-ठीक पता नहीं
तुम्हारे पुरखे क्या करते थे
कैसे जीते थे
तन को छुए बिना
मन को कैसे छूते थे
क्या घृणा करनेवालों से वे भी घृणा करते थे
क्या वे अपने घरों में भी बहुत कम बोलते थे
मैं एक ‘भरोसा महरा’ को जानता हूँ
जो हमारे खेतों में हल चलाते थे
जग-परोजन में शहनाई भी बजाते थे
बातें कम करते थे
कम खा कर कम पहन कर जिन्दा रहते थे
दूर से उस ईश्वर को प्रणाम करते थे
जिसके मंदिर में जाने की इजाजत उन्हें नहीं थी
धर्म की उन कथाओं को सिर झुका सुनते थे
जिनमें उनके पुरखों को नीच-पातकी बताया जाता था
उन्हें लांछनों से ज्यादा पेट की चिंता थी
एक दिन चले गए दुनिया से चुपचाप
घी में तली पूरियाँ और आलूगोभी की रसदार तरकारी
खाने की अपनी पुरानी इच्छा को अनाथ छोड़ कर
उनके बेटे तो पहले ही जा चुके थे झरिया-अंडाल
ठीक है कि उनकी झोपड़ी नहीं जलाई गई
उन्हें कभी लाठियों से पीटा नहीं गया
गांव से खदेरा नहीं गया
मगर जुल्म उन्होंने भी कम नहीं सहे
ऐसे जुल्म जिन्हें परिभाषित करना भी उनके बस में नहीं था
प्रतिकार की तो बात ही दूर रहे
मैं शर्मिंदा हूँ अपने पितरों के किए पर
उन्होंने मुझे सिखाया
भरोसा को छूने से अपवित्र हो जाएगी बाभन देह
और मैं दूर रह कर ही सुनता रहा शहनाई।”

(६). बेचैन समय – स्वप्निल श्रीवास्तव

मैं श्रावस्थी का अनाथपिंडक हूँ
मैं हूँ सारनाथ का भिक्षु
मैं आखिरी आदमी हूँ जिसने बुद्ध का
महापरिनिर्वाण देखा था
उस महाशोक में मैं आनन्द के साथ
शामिल था
फाह्यान ने अपने यात्रा विवरणों में
जिस जिज्ञासु का जिक्र किया था
वह मैं हूँ
मैं आम्रपाली के आम्रमंजरी का
पहला बौर हूँ
मैं उस पागल कोयल की आवाज हूँ
जो रात्रि-प्रहरों में बौद्धों को सुनाई
पड़ती है
मैं अंगुलिमाल के गले की 99वें आदमी की
निरपराध उंगुली हूँ
मैं धम्मपद और जातक कथाओं का
पवित्र शब्द हूँ
मैं बुद्ध के जन्म और महापरिनिर्वाण
के बीच का बेचैन समय हूँ।”

(७).अप्प दीपो भव -तथागत बुद्ध 12 – कुमार रवींद्र

” जहाँ-जहाँ
गये बुद्ध
वहीं-वहीं खुले द्वार
कुटिया से महलों तक
करुणा की नदी बही
मानुष औ’ मानुष के बीच की
नकली दीवार ढही
हो गई
निरर्थक सब
युद्धों की जीत-हार
प्राणों से प्राणों तक
सेतु बँधे नेह के
‘बुद्धं शरणं गच्छामि’
ताप मिटे देह के
सुक्ख-दुक्ख
दोनों के
मिट गये सभी विकार
श्रेष्ठि-नृपति-वारवधू
सभी हुए शरणागत
व्याप गई घर-घर में
बुद्ध की कथा शाश्वत
आज भी
गुणीजन मिल
करते उस पर विचार।”

(८). बामियान में बुद्ध – राजेन्द्र राजन

“निश्चिन्त होकर वे जा चुके थे उस सुनसान जगह से
अपनी बंदूकों , तोपों , बचे हुए विस्फोटकों
और अट्टहासों के साथ
अपनी समझ और हुकूमत के बीच
कि उनके मुल्क की ज़मीन पर
उसके इतिहास में
अब कहीं नहीं हैं बुद्ध
जहाँ वे खड़े थे सबसे ज्यादा मज़बूती से
वहां से भी मिटा दिए गए उनके नामोनिशान
अब कोई नहीं था उस सुनसान जगह में
जहां पत्थर भी कुछ कहते जान पड़ते थे
वहां हर शब्द था डरा हुआ
हर चीज़ खा़मोश थी दहशत से दबी हुई
बस हवा में एक सामूहिक अट्टहास था बेखौ़फ़
जो बामियान के पहाड़ों को रह-रह कर सुनाई देता था
तप रही थी ज़मीन तप रहा था आसमान
पहाड़ के टूटने की आवाज़
धरती की दरारों में समा गयी थी
हवा में भर गयी बारूद की गंध
सब दिशाओं में फैल गयी थी
तीन दिन बाद जब वहां कोई नहीं था
हर तरफ़ डरावना सन्नाटा था वहां नमूदार हुआ
लंबी नाक और चौड़ी टोड़ी वाला एक पठान
वह तपती ज़मीन पर नंगे पांव बढ़ा उस तरफ़
तीन दिन पहले जहां पर्वताकार बुद्ध थे
और अब एक बड़ा-सा शून्य था
उस ख़ाली अंधेरी जगह के पास जाकर वह रुक गया
कुछ पल खामोश रह कर उसने सिर झुका कर कहा-
क्षमा करें भगवन् ! हमें क्षमा करें !
बुद्ध ने आवाज़ पहचानी
यह ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ां होंगे
फिर वे अपनी कोमल संयत गंभीर आवाज़ में बोले-
आप अवश्य आएंगे , मैं जानता था भंते !
कृपया इधर चले आएं इधर छाया में
आपके पांव जल रहे होंगे
सकुचाए लज्जित-से ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ां
बुद्ध के और निकट गए
फिर सुना
किसी क्षमा करने का अधिकारी मैं नहीं
जो क्षमा कर सकते थे अब नहीं हैं
वे विलुप्त पथिक अक्षय शांति के खोजी
जिनकी खोज और साधना के स्मारक नष्ट किए गए
ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ां की आवाज़ अब भी नम थी यहां जो हुआ उससे पीड़ा हुई होगी भगवन !
पीड़ा नहीं
दुख हुआ है भंते
जब कोई सृजन विध्वंस के उन्माद का शिकार होता है
दुख होता है
पर पीड़ा का प्रश्न नहीं
जब मैं शरीर में था एक दिन अंगुलिमाल गरजा था :
रुक जाओ भिक्षुक
वहीं रुक जाओ
पर मैं रुका नहीं
जैसे कुछ हुआ न हो मेरे कदम आगे बढ़े निष्कंप
जो कंप सकता था वह मेरे भीतर से विदा हो चुका था
अब तो वह शरीर भी नहीं
ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ां थोड़ा सहज हुए
बुद्ध ने उनकी आंखों में झांका :
यह क्या, आपकी आंखें गीली क्यों हैं भंते ?
मुल्क की हालत ठीक नहीं है भगवन्
बरसों से हर तरफ़
ख़ून से सने हाथ दिखाई देते हैं
मारकाट जैसे रोज़ का धन्धा है
सब किसी न किसी नशे में डूबे हैं
होश का एक क़तरा भी खोजना मुश्किल है
डर का ऐसा पहरा है कि कि कोई कुछ बोलता नहीं
कोई कुछ सुनता नहीं
जो बोलते हैं मारे जाते हैं
अभी तीन रोज़ पहले यहां जो हुआ उससे
इत्तिफ़ाक़ न रखने वाले चार युवक पकड़ लिए गए
सुना है उन्हें सरेआम फांसी पर लटकाया जाएगा
कुछ पल के लिए एक स्तब्ध मौन मे डूब गए बुद्ध
जैसे ढाई हजार साल बाद
नए सिरे से हो रहा हो दुख से सामना
फिर सोच में डूबा उनका प्रश्न उभरा –
और , स्त्रियों की क्या दशा है भंते
उनका हाल बयान नहीं किया जा सकता भगवन्
वे पशुओं से भी बदतर हालत में जीती हैं
डर और गुलामी और सज़ा की नकेल से बंधी हैं वे
बुद्ध असमंजस में डूबे रहे कुछ पल
कि आगे कुछ पूछें या न पूछें
फिर उन्होंने पूछा :
और किसान किस हालत में हैं भंते
ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ां की अनुभव पकी आंखों में
गांवों के रोजमर्रा चित्र तैर गए :
फसलें सूख रही हैं भगवन्
किसानों की कोई नहीं सुनता
फ़ाक़ाकशी की छाया लोटती है मेहनतकश घरों में
हुक्मरान हथियार खरीदने के अलावा और कुछ नहीं करते
बुद्ध और ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ा के बीच एक सन्नाटा
खिंच गया
बुद्ध को चिंतित देख शर्म की ज़मीन पर खड़े बूढ़े पठान ने कहा :
भारत आपके लिए ठीक जगह है भगवन्
नहीं भंते
हथियारों के पीछे पागल हैं वहां के शासक भी
बहुत छद्म और पाखंड है वहां
मानवता के संहार का उपाय कर
वे कहते हैं : मैं मुस्करा रहा हूं
इसके बाद ख़ामोश रहे दो दुख
सहसा ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ां का ध्यान हटा
उन्होंने सूखे आसमान की तरफ़ नज़र फ़िराई
लगा जैसे किसी बाज के फड़फड़ाने की आवाज़ आई हो
मगर चुँधियाती धूप में कुछ दिखाई नहीं पड़ा
फिर उनका ध्यान लौटा उस जगह
जो तीन दिन पहले हमेशा के लिए ख़ाली हो गई थी
वहां न बुद्ध के होने का स्वप्न था न उनके शब्दों का अर्थ
ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ां खड़े थे अकेले
बामियान के पथरीले सन्नाटे में ।”

(९). बुद्ध की चाह में – बाबुषा कोहली

“मैं एक प्याला हूँ चाह से भरा
छलकती है चाह
फ़र्श पर चिपचिपाती है
भिन-भिन करते हैं मक्खियों जैसे दुःख
आते हैं पीछे बुद्ध
मारते हैं पोंछा
कितने तो गहरे धब्बे कि छूटते नहीं।”

(१०). बुद्ध-चरित / कविता भटट

“लेखनी उठी बुद्धचरित लिखने
मौन और विदीर्ण लगी दिखने।
अब बुद्ध पूर्णिमा अवसान पर है,
लेखनी की दृष्टि युग-ध्यान पर है।
वह अब पीड़ा लिखने को आतुर,
देख रही मरते बुद्ध मानव-भीतर।
मोह में रमा हुआ सिद्धार्थ- आज
देखता मात्र अपने ही सुख-साज।
दुःख न दे सिद्धार्थ को वृद्ध पीड़ा,
विचलन नहीं, मृत्यु लगती क्रीड़ा।
जो दूजे की पीड़ा से विचलित था,
सुख में हो भी दुःखी-उद्वेलित था।
दूर की कौड़ी है, आत्म-विश्लेषण,
तिल-तिल मरता बुद्ध, हुआ क्षरण।
यह युग अब आत्म-प्रवंचन का,
विरक्ति नहीं, भौतिक मंचन का।
सिद्धार्थ भाव छोड़ बुद्ध उभरेगा,
क्या प्रपंची मानव स्व-रूप धरेगा।”

(११). बुद्ध – -प्रेमशंकर शुक्ल

उदात्त बैठकी
महामौन : समाए हुए अपने में सारा कहा -बोला
निर्भय का,
जीवन की जय का
संकल्प अथाह
चीवर की लहरिल-वलय
निहारने में अलंकृत करती हुई हमारा मन
महाशान्ति की औचक मुस्कान निहार
उल्टे पाँव लौटती है अशान्ति
मनुष्यता को महाकरुणा में बसाए हुए बुद्ध
निहारते हैं
और सबको अपना कर लेते हैं ! ”

(१२). तथागत तुम क्यों मुस्कराए ? – असंगघोष

” ओ! गांधारकला की मूर्तियो
तुम्हारे वजूद पर
सब तरफ
अब हमले होने लगे हैं
बामियान का बुद्ध
आग के गोलों की मार से
खण्ड-खण्ड हो
बिखर गया है
यह देख
मेरा लहू खौलता है
तथागत!
जिसे देखकर भी
तुम चुप हो?
तुम्हारी अहिंसा
करुणा फिर दाँव पर है
और तुम हो
कि मुस्करा रहे हो
भंते!
गांधार के बाद मथुरा
मथुरा के बाद अमरावती
और अमरावती के बाद?
पोखरण!
पोखरण के काँपते ही
तुम्हारी मुस्कराहट के साथ
खत्म होती जाएँगी
तुम्हारी शिक्षाएँ ओ’ सभ्यता?
मेरी मानो
भंते!
तुम अब बार-बार
मुस्कराना छोड़ दो
तुम्हारे पीछे
एक अकेला मैं ही नहीं
पूरा समुदाय है
वादा करो
अब इस तरह नहीं मुस्कराओगे।”

(१३). तथागत – जगदीश पंकज

मित्रो चलो ! वहाँ चल बैठें
जहाँ तथागत
बोल रहे हैं
दिग्दिगंत में फ़ैल रही जो
अनुपमेय करुणा की वाणी
जिसके शब्द-शब्द में अंकित
सम्यक् चिंतन की कल्याणी
जहाँ व्यक्ति का नहीं विभाजन
सत्य सनातन
खोल रहे हैं
जहाँ पंछियों के कलरव में
शील और प्रज्ञा के स्वर हैं
और हवाओं की परतों में
सत्य अहिंसा के अक्षर हैं
शान्ति कपोतों की बोली में
बुद्ध प्रेम रस
घोल रहे हैं
समता की सम्बोधि,जहाँ पर
और धम्म के कीर्ति गान हैं
शरण संघ की पा जाने पर
दुक्ख-मुक्ति के नव निदान हैं
जो विपश्यना के प्रकाश में
अपने मन को
तोल रहे हैं ।”

(१४). अब बुद्ध ही बतायें – कात्यायनी

हमने भी एक दिन देखा
एक बूढ़ा, एक बीमार और एक मुर्दा आदमी
और हमारे जीने की तलब बढ़ गयी।
हमने भी एक दिन देखा
एक बूढ़ा, एक बीमार और एक मुर्दा आदमी
और सोचा नये सिरे से
ज़िन्दगी की ख़ूबसूरती के बारे में
और इसे ख़ूब-ख़ूब प्यार करने के बारे में।
हमने भी एक दिन देखा
एक बूढ़ा, एक बीमार और एक मुर्दा आदमी
और ज़िन्दगी की सार्थकता और बेहतरी के लिए
लड़ने की हमारी ज़िद
और मज़बूत हो गयी।
हमने भी एक दिन देखा
एक बूढ़ा, एक बीमार और एक मुर्दा आदमी
और फिर हमने सोचा कि ज़िन्दगी की
ख़ूबसूरती सबके हिस्से आये
इसके लिए अभी कितना लड़ना है
कितनी बार और आग का दरिया पार करना है!”

(१५). बुद्ध फिर मुस्कुराए – मुसाफिर बैठा

“अपने जीवनकाल में किसी सामाजिक प्रसंग पर
कभी मुस्कुराए भी थे बुद्ध
यह आमद प्रश्न इतिहास सच के करीब कम
कल्पना सृजित ज्यादा है
यदि कभी मुस्कुराए होंगे बुद्ध
तो इस बात पर भी जरूर
कि धन वैभव राग विलास जैसा भंगुर सुख भी
हमारी जरा मृत्यु की अनिवार गति को
नहीं सकता लांघ
और इसी निकष पर पहुंच
इस महामानव ने किया होगा
इतिहास प्रसिद्ध महाभिनिष्क्रमण
बुद्ध फिर मुस्कुराए-
अव्वल तो यह कथन ही मिथ्या लगता है
बुद्ध की हेठी करता दिखता है यह
अबके समय में
मनुष्य जन्म की बारंबारता को
इंगित करता है यह कथन
जबकि एक ही नश्वर जीवन के
यकीनी थे बुद्ध
अहिंसक अईश्वरीय जीवन के
पुरजोर हिमायती थे वे
अगर होते तो
अपने विचारों के प्रति
जग के नकार भाव पर ही
सबसे पहले मुस्कुराते बुद्ध
पोखरन के परमाणु विस्फोट पर
बुद्ध के मुस्कुराने का
बिम्ब गढ़नेवालों की सयानी राजबुद्धि पर भी
कम नहीं मुस्कुराते बुद्ध
बामियान की बुद्धमूर्ति श्ाृंखला को
हत आहत करनेवाली शासकबुद्धि की
शुतुरमुर्ग भयातुरता पर भी जरूर
मुस्कुराए बिना नहीं रह पाते बुद्ध
और तो और
होते अगर अभी बुद्ध
तो देखने वाली बात यह होती
कि अपने नाम पर पलने वाले
तमाम अबौद्ध विचार धर्म को देख ही कदाचित
सबसे अधिक मुस्कुरा रहे होते बुद्ध ।”

(१६). बुद्धत्व – अनुराधा सिंह

“शब्द लिखे जाने से अहम था
मनुष्य बने रहना
कठिन था
क्योंकि मुझे शब्दों से पहचाना जाए
या मनुष्यत्व से
यह तय करने का अधिकार नहीं था मेरे पास
शब्द बहुत थे मेरे
चटख चपल कुशल कोमल
मनुष्यत्व मेरा रूखा सूखा विरल
उन्होंने वही चुना जिसका मुझे डर था
चिरयौवन चुना शब्दों का
और चुनी वाक्पटुता
वे उत्सव के साथ थे
मेरा मनुष्य अकेला रह गया
बुढ़ाता समय के साथ
पकता, पाता वही बुद्धत्व
जो उनके किसी काम का नहीं।”

(१७). तथागत – सुशीला पुरी

“जानती हूँ तथागत !
महायान,बज्रयान की बंदिशों से परे
जानती हूँ प्रेम का महासूत्र
जानती हूँ तुम्हारी कामनाओं को
तुम्हारी आकुलता का आंकलन है मुझे
दाहिनी करवट लेटे सो रहे हो जब से
लिख रही हूँ तब से तुम्हारी पीठ पर नाम अपना
मैं यशोधरा, तुम्हारी गहरी नींद की उदासी में
बुन रही हूँ स्वप्न तुम्हारे लौटने का !
तिब्बती धातुचक्रों को घुमाते हुए
मैंने जाना कि स्पर्शों की भी स्मृतियाँ होती हैं
तुम्हारी अनुपस्थिति की सघन उदासी में
पढ़ती हूँ उन्हीं स्पर्शों की स्मृतियाँ
और पूछती हूँ तुमसे ही कि
अभ्यर्थना के अर्थ तुम्हारे नाम में क्यों खुलते हैं?
जानती हूँ मैत्रेय !
कभी भी तुम उठकर चल दोगे बिना बताए
और पृथ्वी के इस छोर से उस छोर तक
खोजती रहूंगी मैं आकुल
खोजती रहूंगी तुम्हारी आँखों का समंदर
तुम्हारी दूर होती पदचाप
बोलो ! क्या लौट पाओगे कभी ?
पता है मुझे पृथ्वी के दुखों से
बहुत छोटा है मेरा दुःख
प्रार्थना के नीले आसमान तले
बहुत सहेज कर रखा है तुम्हें
तुम्हारे नाम के आलोक में
बुदबुदाती हूँ तुम्हारा मौन
और उसी मौन में देखती हूँ अपना होना
बोधि वृक्ष सा हमारा प्रेम
रचता है तुम्हारे होने में मेरा होना
उगी हैं उस वृक्ष में हरी पत्तियाँ
उनके हरेपन में गूंजता है हमारा प्यार
जैसे मेरी हरी नींद की छाँव हो में
तुम्हारे स्पर्श का बरगद फैला है बांहे फैलाये
जहाँ गिलहरियों की तरह फुदकती
मेरी साँसों की लय पर
बहती है हमारे भरोसे की हवा
बस, उस भरोसे पर ही टिकी है ये दुनियां। ”

(१८). कितनी आश्वस्ति थी तुम्हारे होने ही से बुद्ध -अशोक कुमार पांडेय

” दुःखों की कब कमी रही इस कुशीनारा में
अविराम यात्राओं से थककर जब रुके तुम यहाँ
दुखों से हारकर ही तो नहीं सो गये चिरनिद्रा में?
कितना कम होता है एक जीवन दुख की दूरी नापने के लिये
और बस सरसों के पीलेपन जितनी होती है सुख की उम्र…
आख़िरी नहीं थी दुःख से मुक्ति के लिए तुम्हारी भटकन
हज़ार वर्षों से भटकते रहे हम देश-देशान्तरों में
कोसती रहीं कितनी ही यशोधरायें कलकतिया रेल को
पटरियाँ निहार-निहार गलते रहे हमारे शुद्धोधन
उस विशाल अर्द्धगोलीय मंदिर में लेटे हुए तुम
हमारे इतिहास से वर्तमान तक फैले हुए आक्षितिज
देखते रहे यह सब अपने अर्धमीलित नेत्रों से
और आते-जाते रहे कितने ही मौसम…
गेरुआ काशेय में लिपटे तुम्हारे सुकोमल शिष्य
अबूझ भाषाओं में लिखे तुम्हारे स्तुति गान
कितने दूर थे ये सब हमसे और फिर भी कितने समीप
उस मंदिर के चतुर्दिक फैली हरियाली में शामिल था हमारा रंग
उन भिक्षुओं के पैरों में लिपटी धूल में गंध थी हमारी
घूमते धर्मचक्रों और घंटों में हमारी भी आवाज़ गूंजती थी
और हमारे घरों की मद्धम रौशनियों में घुला हुआ था तुम्हारे अस्तित्व का उजाला
हमारे लिये तो बस तुम्हारा होना ही आश्वस्ति थी एक…
कब सोचा था कि एक दिन तुम्हारे कदमों से चलकर आयेगा दुःख
एक दिन तुम्हारे नाम पर ही नाप लिए जायेंगे ढाई कदमों से हमारे तीनों काल
यह कौन सी मैत्रेयी है बुद्ध जिसे सुख के लिये सारा संसार चाहिये?
और वे कौन से परिव्राजक तुम्हारी स्मृति के लिए चाहिए जिन्हें इतनी भव्यता?
तुम तो छोड़ आये थे न राज प्रासाद
फिर…
कौन है ये जो तुम्हें फिर से क़ैद कर देना चाहते है?
कौन हैं जो चाहते हैं चार सौ गाँवों की जागीर तुम्हारे लिए
यह कैसा स्मारक है बहुजन हिताय का जिसके कंगूरों पर खड़े इतराते हैं अभिजन?
कहो न बुद्ध
हमारा तो दुःख का रिश्ता था तुमसे
जो तुम ही जोड़ गए थे एक दिन
फिर कौन हैं ये लोग जिनसे सुख का रिश्ता है तुम्हारा?
कहाँ चले जाएँ हम दुखों की अपनी रामगठरिया लिए
किसके द्वारे फैलाएं अपनी झोली इस अंधे-बहरे समय में
जब किसी आर्त पुकार में नहीं दरवाजों के उस पार तक की यात्रा की शक्ति
कौन सा ज्ञान दिलाएगा हमें इस वंचना से मुक्ति
आसान नहीं अपने ही द्वारों के द्वारपाल हो जाने भर का संतोष
कहाँ से लाये वह असीम धैर्य जिसके नशे में डूब जाता है दर्द का एहसास
वह दृष्टि कि निर्विकार देख सकें सरसों के पौधों पर उगते पत्थरों के जंगल
निर्वासन का अर्थ निर्वाण तो नहीं होता न हर बार
और ऐसे में तो कोई स्वप्न भी अधम्म होगा न बुद्ध
कहो न बुद्ध दुःख ही क्यों हो सदा हमारे हिस्से में?
बामियान हो कि कुशीनगर हम ही क्यों हों बेदखल हर बार?
मुक्ति के तुम्हारे मन्त्र लिए हम ही क्यों हों हविष्य हर यज्ञ के ?
कहो न बुद्ध
क्या करें हम उस अट्टालिका में गूंजते
‘बुद्धं शरणम गच्छामि’ के आह्वान का।”

(१९). राष्ट्रीय संग्रहालय – संजीव कौशल

” अलग-अलग मुद्राओं में बैठे
बुद्ध
चुप हैं
मग्न हैं
ध्यान में
म्यूजियम की मजबूत दीवारों ने
बाँध रखी है
निर्विघ्न ध्यान के लिए जरूरी
शांति यहाँ
अब मुश्किल है इनके लिए
पत्थरों में बँधी मुद्राओं को तोड़ना।”

(२०). पूर्ण विराम- यतीश कुमार

” दीखता है
बुद्ध के घुंघराले बालों जैसा
अंधेरे को केंद्र में दबोचे
झाँकता सूरज पीछे से
चाँदना की लालिमा
आतुर है मुस्कान लिए
खिलखिलाने -फैल जाने को
पहाड़ की ओट से आभा धीरे-धीरे
फैल रही है धान के बीचरे पर
भीतर कोलाहल है, दृश्य का
कंचे की तरह उछलते कूदते बुलबुले
निरंतर ध्वस्त हो रहे हैं
परिदृश्य की ख़ामोशी को तोड़ता हुआ
दृश्य बोल रहा है
बीचरे रौंदे जा रहे हैं
पानी अंदर ही अंदर
धँसता जा रहा है
कीचड़ के भीतर-बाहर
परत दर परत
मिट्टी सूखी-सूखी
पानी
पत्थर और शब्द
सब ग़ायब
बुद्ध की लटों में
सैकड़ों लहरें हैं
और वह बस मुस्काता है।”

(२१). बुद्ध तुम उठो! -आनंद गुप्ता

“बुद्ध तुम उठो!
कि घायल है बोधिवृक्ष
काँप रहे हैं मठों के दरों-दीवार
लहूलुहान प्रार्थनास्थल
लगातार गहरा रहे अंधकार में
आदमी के चेहरे को नहीं सूझ रहा
आदमी का चेहरा
बदहवास आदमी
बुदबुदा रहा है तुम्हारा नाम
टकटकी लगाए तुम्हारी ओर।
बुद्ध तुम उठो!
कि आदमी की स्मृतियों के घेरे से
बाहर हो रहे हैं तुम्हारे संदेश
अब शांति और अहिंसा जैसे शब्द
एक मुहावरा बन कर रह गया है मात्र
जो आजकल राष्ट्राध्यक्षों के जुबान की
शोभा बढ़ाने के आते है काम।
बुद्ध तुम उठो!
कि तुम्हारी आँखों के खुलने से
हो एक नया उजियारा
दूर हो अनंत अंधकार
रक्त-रंजित धरती
हरहरा जाए फिर एकबार
आदमी का पहाड़ सा दर्द थोड़ा कम हो।
बुद्ध तुम उठो!
इस धरती का संताप थोड़ा हर लो
क्योंकि देवताओं ने छेड़ रखी है लड़ाइयाँ
देवताओं के खिलाफ।”

(२२). बुद्धत्व – रंजीता सिंह ‘फ़लक’

“अपने एकांत को
उत्सव बना लेना
क्या यही बुद्धत्व नहीं?
अपनी आकुलता को
परम संतोष बना लेना
क्या यही बुद्धत्व नहीं?
मिलन बिछोह से परे
एकात्म हो लेना
क्या यही बुद्धत्व नहीं?
दुःख तुम्हें सिर्फ़
दिगम्बर करता है
तुम क्यों डरते हो..
अपनी इस अलौकिक नग्नता से,
क्या तुम्हारी पीड़ाएँ
वैदिक ऋचाओं सी
उच्चारित नहीं होतीं?
फिर क्यों क्लान्त हो?
जलकर राख हुए स्वप्न
क्या भभूत सी
शांति नहीं देते?
संबंध मात्र अरण्य है
और एकांत अंतिम पाथेय
जो तुम्हें बुद्धत्व देता है।
दरअस्ल
आसक्ति का परम ही
हमें अनासक्त करता है।
तृप्ति -अतृप्ति ,मोह -विराग
घृणा -प्रेम ,सुख -दुख
के मध्य
निर्विकार हो लेना हीं
बुद्धत्व है | ”

(२३). बुद्ध – संध्या सिंह

“तुम फिर आ जाते एक बार
कहते हैं
किसी बूढ़े बरगद के तने से लिपट कर
कलेजा फाड़ कर चिल्लाओ
तो
वह सारा दर्द अपने अन्दर खींच लेता है
और बदले में
दर्द का लेखा जोखा भी नहीं माँगता
बुद्ध चले गये
पर बरगद खड़ा है
प्रतीक्षा में
कि
कोई उसके “कलेजे” से लगे
तो
वह बताए
कि
बरगद आदमी में नहीं मिलते।”

(२४) . पूर्णत्व की पहचान हो तुम बुद्ध :- वंदना गुप्ता

यधोधरा
तुम सोचोगी
क्यो नहीं तुम्हें
बता कर गया
क्यो नहीं तुम्हें
अपने निर्णय से
अवगत कराया
शायद तुम न
मुझे रोकतीं तब
अश्रुओं की दुहाई भी
न देतीं तब
जानता हूँ
बहुत सहनशीलता है तुममें
मगर शायद
मुझ्में ही
वो साहस न था
शायद मैं ही
कहीं कमजोर पडा था
शायद मैं ही तुम्हारे
दृढ निश्चय के आगे
टिक नहीं पाता
तुम्हारी आँखो में
देख नहीं पाता
वो सच
कि देखो
स्त्री हूँ
सहधर्मिणी हूँ
मगर पथबाधा नहीं
और उस दम्भ से
आलोकित तुम्हारी मुखाकृति
मेरा पथ प्रशस्त तो करती
मगर कहीं दिल मे वो
शूल सी चुभती रहती
क्योंकि
अगर मैं तुम्हारी जगह होता
तो शायद ऐसा ना कर पाता
यशोधरा
तुम्हे मैं जाने से रोक लेता
मगर तुम्हारा सा साहस न कहीं पाता
धन्य हो तुम देवी
जो तुमने ऐसे अप्रतिम
साहस का परिचय दिया
और मुझमें बुद्धत्व जगा दिया
मेरी जीवत्व से बुद्धत्व तक की राह में
तुम्हारा बलिदान अतुलनीय है
गर तुम मुझे खोजते पीछे आ गयी होतीं
तो यूँ न जन कल्याण होता
न ही धर्म उत्थान होता
हे देवी ! मेरे बुद्धत्व की राह का
तुम वो लौह स्तम्भ हो
जिस पर जीवों का कल्याण हुआ
और मुझसे पहले पूर्णत्व तो तुमने पा लिया
क्योंकि बुद्ध होने से पहले पूर्ण होना जरूरी होता है
और तुम्हारे बुद्धत्व में पूर्णत्व को पाता सच
या पूर्णत्व में समाहित तेजोमय ओजस्वी बुद्धत्व
तुम्हारी मुखाकृति पर झलकता
सौम्य शांत तेजपूर्ण ओज ही तुम्हारी
वो पहचान है जिसे गर मैं
तुम्हारी जगह होता
तो कभी न पा सकता था
क्योंकि
बुद्ध न तब तक बुद्ध हुआ
जब तक न तुम्हारे त्याग समर्पण की हवि में
अपने अहम को आहूत किया
हाँ …… स्वीकार्य है मुझे
तुम्हारे ओज के आगे
तुम्हारे दर्प के आगे
तुम्हारे नारीत्व के आगे
नतमस्तक होना
अपने अवांछित पौरुषत्व से उतरकर
तुम तक पहुँचने का यही है
सबसे सुगम मार्ग
यही तो है वास्तव में बुद्ध होना
यही तो है वास्तव में सिद्ध करना अपने नाम को
स्त्री के धैर्य त्याग और तपस्या पर ही पाया है मैने पूर्णविराम
हाँ ……… यशोधरा तुम तक पहुँचना कहूँ या बुद्ध होना एक ही है
यशोधरा ! नमन है तुम्हें देवी
धैर्य और संयम की बेमिसाल मिसाल हो तुम
स्त्री पुरुष के फर्क की पहचान हो तुम
वास्तव में तो मेरे बुद्धत्व का ओजपूर्ण गौरव हो तुम
नारी शक्ति का प्रतिमान हो तुम
बुद्ध की असली पहचान हो तुम ……..सिर्फ तुम !!!”

(२५). मैं बुद्ध होना चाहती हूँ — सत्या शर्मा ‘ कीर्ति ‘

पाती हूँ अकसर
लेते है बुद्ध जन्म
मेरे भी अंदर
और फिर उठते हैं कई सवाल
मन की कंदराओं में
जानना चाहती हूँ
सत्य , अहिंसा , शील , ज्ञान
की असीमित सी बातें
जन्म- मृत्यु के रहस्यों की
ज्ञानमयी बातें ।
जरा – मरण के चक्र से परे की अनगिनत बातें जानना चाहती हूँ
बचपन ,यौवन , बुढापे के
चक्र को समझना चाहती हूँ ।
मैं बुद्ध नहीं हूँ
पर बुद्ध होना चाहती हूँ…
पर ज्ञानेन्द्रियों , कर्मेन्द्रियों के
पकड़ से छूटता मेरा मन
मोह – माया के जंजीरे तोड़
नहीं पाता
और अकसर बुद्ध को सुला
सांसारिक सुख की मृगतृष्णा में
” स्व” की पहचान ढूंढने लगती हूँ..
पर पुनः किसी रात की नीरवता में
जाग जाते हैं फिर नन्हे बुद्ध
करते हैं सवाल
जीवन के सत्य और माया से
जुड़े अनेकों प्रश्न….
तब जागती है अंतश्चेतना
और तब मोक्ष द्वार पर खड़े हो
भिक्षा पात्र में ‘ स्व ‘ को पाना
चाहती हूँ ।
मैं बुद्ध नहीं हूँ
पर बुद्ध होना चाहती हूँ ….”

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here