ठंड और अँधेरे को चीर देने के संकल्प के साथ

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कड़ाके की ठंड में अलाव
धीरे धीरे सुलग रहा था
अलाव को घेरकर बैठे लोगों के चेहरे
आंच के आइने में हिल रहे थे
लोगों के ठीक पीछे
ठंड भी बैठी थी, अलाव को घेरकर
अचानक किसी ने अलाव के मलबे को धीरे से कुरेदा
आग भड़क उट्ठी
लोगों के साथ ठंड भी दो कदम पीछे हट गयी
लेकिन तुरंत ही अलाव फिर दम तोड़ने लगी
अलाव पर राख की परत चड़ने लगी
लोग अलाव के नजदीक खिसकने लगे
उन्हें पार करती हुई ठंड
अगली पंक्ति में विराज गयी
तभी किसी ने मरते हुए अलाव पर कुछ लकड़ियाँ रख दी
लोगों की आंखे मिचमिचाने लगी
धुएं का साम्राज्य छाने लगा
देख पाना कठिन होने लगा
तभी किसी ने अपने फेफड़े में वही ठंडी हवा भरी
और लकड़ियों के नीचे अलाव पर निशाना साध कर जोर की फूंक मारी
राख और धुएं का साम्राज्य और घना होने लगा
लोग और पीछे हटने लगे
तभी कोई पहले को खिसकाते आगे बढ़ा
फेफड़े में वही ठंडी हवा भरी
उसने भी जोर की फूंक मारी
यह सिलसिला चलता रहा
राख के कण लोगों के सरों और कपड़ों पर अपना डेरा बनाने लगे
कुछ लोग निराश होकर घर लौटने लगे
तभी अचानक राख में चिंगारियां चमकने लगी
कुछ चिंगारियां हवा में तैरने लगी
कुछ उड़कर लोगों के कपड़ों पर भी पड़ने लगी
कहीं कहीं उनमे छेद भी करने लगी
और अचानक
राख की परतों को हटाता
राख के गर्भ से
आग की लपटें लपलपाती उपर उठने लगी
लोगों में हलचल शुरू हो गयी
तेज़ ऊष्मा के बावजूद
लोग लपटों को घेर कर खड़े हो गये
अब अलाव सुलग नहीं रहा था
वह धरती पर उगे एक मशाल की तरह
लपलपा रहा था
ठंड और अँधेरे को चीर देने के संकल्प के साथ…………..

मनीष आजाद

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