कोयला खदानों की नीलामी प्रक्रिया को रद्द करने को लेकर आदिवासी अधिकार मंच ने राष्ट्रपति को भेजा पत्र

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विशद कुमार    

18 जून को केंद्र सरकार ने कमर्शियल खनन के लिए 41 कोयला ब्लॉकों, जिसमें झारखंड के 20 ब्लॉक शामिल हैं, की नीलामी की प्रक्रिया शुरू कर दी है, जो फिर से केंद्र सरकार की घोर पूंजीवादी प्रवृत्ति को साबित करता है। विडंबना यह है कि मोदी सरकार द्वारा इस कदम को आत्मनिर्भरता का जामा पहना कर पेश किया रहा है, जबकि यह ज़मीन मालिकों और ग्राम सभाओं के सभी ज़मीन के मालिकाना अधिकारों को छीन ही नहीं लेता, बल्कि और भी अधिक कॉर्पोरेट लूट के लिए प्राकृतिक संसाधनों को खोलता है। इस कॉर्पोरेट लूट के लिए लायी गई इस कोयला खदानों की नीलामी प्रक्रिया को लेकर जब झारखंड के सामाजिक संगठनोें, बुद्धिजीवियों में ही नहीं आम लोगों में भी विरोध का स्वर फूट रहा है। वहीं झारखंड की हेमंत सरकार ने केन्द्र सरकार द्वारा कोयला खदानों की नीलामी प्रक्रिया शुरू करने के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

बता दें कि राज्य सरकार ने 19 जून को शीर्ष अदालत में एक रिट याचिका दायर की है।
इस याचिका में कहा गया है कि ‘जिन कोयला ब्लॉक की नीलामी होनी है उनमें से कुछ झारखंड में हैं। केन्द्र सरकार के कोयला खदानों की नीलामी के इस फैसले से कोरोना काल में राज्य को कोई लाभ नहीं मिलेगा। इससे राज्य को नुकसान होगा, क्योंकि बाजार मूल्य नहीं मिलेगा।’
बता दें कि नीलामी से पहले राज्य की इस विशाल जनजातीय आबादी, पर्यावरण और जंगलों पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव पर कोई मूल्यांकन नहीं किया गया है।
उल्लेखनीय है कि 18 जून को प्रधानमंत्री ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से नीलामी प्रक्रिया का उद्घाटन किया था। अवसर पर वेदांता समूह के चेयरमैन अनिल अग्रवाल और टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन भी इस कार्यक्रम में शामिल हुए थे।
अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कहा था कि ‘हमने साल 2030 तक, मतलब आने वाले दशक में करीब 10 करोड़ टन कोयले को गैस में बदलने का लक्ष्य रखा है। मुझे बताया गया है कि इसके लिए 4 परियोजनाओं की पहचान हो चुकी है और इन पर करीब-करीब 20 हज़ार करोड़ रुपये का निवेश किया जाएगा।’


बता दें कि इस नीलामी प्रक्रिया में देश के साथ-साथ विदेशी कंपनियां भी भाग ले सकेंगी। कोयला ब्लॉक खरीदने के लिए सरकार ने 100 फीसदी विदेशी निवेश की छूट भी दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 18 जून को कहा था कि अगर भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा कोयला उत्पादक देश है तो हम कोयला का सबसे बड़ा निर्यातक क्यों नहीं बन सकते हैं।
बता दें कि दुनिया में कोयला भंडार के मामले में भारत चौथा सबसे बड़ा देश है। वहीं कोयला उत्पादन और आयात के मामले में दूसरे नंबर पर आता है। केन्द्र सरकार ने आत्मनिर्भर भारत की श्रृंखला में कमर्शियल कोल माइनिंग की घोषणा की थी। इससे निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है, जो अधिक उत्पादन और प्रतिस्पर्धा को बढ़ाएगा। कहना ना होगा कि केंद्र सरकार की यह प्रक्रिया कोल ब्लॉक के निजीकरण की प्रक्रिया है जिसके दुष्प्रभाव की संभावना ज्यादा है।
इस निर्णय का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यह ज़मीन के मालिक के जीवन, आस-पास रहने वाले लोग और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को अनदेखा करता है।
बताना जरूरी होगा कि झारखंडियों का एक बड़ा हिस्सा, विशेष रूप से आदिवासी, कृषि और वन-आधारित आजीविका पर निर्भर हैं। झारखंड सबसे अमीर खनिज राज्यों में से एक है। बड़े पैमाने पर खनन से केवल कॉर्पोरेट जगत का हित होगा, आम लोगों की भलाई कतई नहीं होगी। कहने की जरूरत नहीं है कि यह खनन, घरेलू और विदेशी कॉर्पोरेट खनन संस्थाओं के लिए एक बड़े लाभ का जरिया होगा वहीं  राज्य की आम जनता की आजीविका और पर्यावरण को और नष्ट कर देगा। क्योंकि खनन वैज्ञानिक तकनीक आधारित होगा, जिसमें मानव श्रम की गुंजाइश नहीं के बराबर होगी, तो जाहिर है रोजगार की कोई संभावना नहीं होगी।
दूसरी तरफ यह निर्णय कई विधानों और संवैधानिक प्रावधानों का भी उल्लंघन करता है, जिनका उद्देश्य गरीबों, हाशिए पर रहने वाले लोगों और आदिवासियों को स्वशासन (आत्मनिर्भर) का अधिकार देता है। पेसा और पांचवी अनुसूची के प्रावधान स्पष्ट रूप से ग्राम सभा को गांव सम्बंधित निर्णय लेने का प्राथमिक निकाय परिभाषित करता है। समता के फैसले ने स्पष्ट रूप से आदिवासियों को अपनी भूमि में खनन करने का अधिकार दिया है, यदि वे ऐसा चाहते हैं तब। इसके अलावा 2013 के अपने ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट की लोढ़ा पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा था कि खनिजों का मालिकाना अधिकार ज़मीन के मालिकों का होना चाहिए। इसके अलावा, वन अधिकार अधिनियम स्पष्ट रूप से वन को ग्राम सभा की सामुदायिक संपत्ति के रूप में परिभाषित करता है। केंद्र सरकार ने प्रासंगिक ग्राम सभाओं के साथ कमर्शियल कोयला खनन की नीलामी की योजना पर चर्चा करना भी ज़रूरी नहीं समझा। व्यावसायिक लूट के लिए कोयला खदानों को खोलना कोयला श्रमिकों के अधिकारों को और भी कमजोर करेगा।

इस बावत आदिवासी अधिकार मंच ने 1 जुलाई को राष्ट्रपति भारत सरकार, नई दिल्ली को राज्यपाल झारखण्ड के माध्यम से एक पत्र भेजा है। जिसमें निजी वाणिज्यिक खनन के खानों की नीलामी को वापस लिये जाने का आग्रह किया गया है।
पत्र में कहा गया है कि ‘हम झारखंड निवासी और आदिवासी अधिकार मंच के लोग आज दिनांक 1 जुलाई 2020 को निजी वाणिज्यिक खनन का विरोध दिवस का अनुपालन करते हुये, आपसे  निवदेन करते हैं कि इस निजी वाणिज्यिक खनन से हम ग्रामीणों का जल, जंगल, जमीन और प्राकृतिक संसाधनों को भारी नुकसान पहुंचेगा। हमारी जमीन पर वगैर हमारी सहमति के अधिग्रहण नहीं की जानी चाहिए। निजी खनन से विशाल जनजातीय जनता और अन्य निवासियों पर इसके विनाशकारी प्रभाव का कोई पूर्व सामाजिक – आर्थिक आकलन नहीं किया गया है और यह कि इन कोल ब्लाकों का विशाल वन कबरेज के कारण पर्यावरण पर विनाशकारी प्रभाव पडेगा।’
आदिवासी अधिकार मंच के प्रफुल्ल लिण्डा ने कहा है कि ‘अतः महोदय से निवदेन है कि केंद्र सरकार द्वारा की जा रही वर्तमान नीलामी प्रक्रिया को रद्द करने की कृपा की जाये।’

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