छेदी मुसहर के किचन गार्डेन में 250 किग्रा ललकवा कोंहड़ा हुआ

0
992


आजीविका द्वारा वंचित मुसहरो को संबल

मंता बनवासी एकल महिला है । जिनके तीन बच्चे बेटी सुंदरी व बेटा कौशल, सूरज नाबालिक है | परिवार का खर्चा न चल पाने के कारण मंता अपनी बड़ी बेटी निशा व दमाद राजा बनवासी को अपने ही घर रखी है कि सब मिलकर मेहनत मजदूरी कर बच्चों का भरण पोषण करेंगें । मंता बनवासी का छोटा सहन दरवाजा है जो सहन अगल बगल जंगली बबूल से घिरा हुआ जिसकें निचे कूड़ा-करकट से भरा-पटा था । अनेई गांव में संस्था द्वारा पूर्व से किचन गार्डन की खेती करने कि प्रक्रिया चलाया जा रहा था लेकिन मंता को अपने कौशल पर पूरा विश्वास नहीं था कि झाड़ियों से घिरे सहन दरवाजे पर भी किचन गार्डन बन सकता है । संस्था के कार्यकर्ता द्वारा मंता के उपरोक्त सहन दरवाजे के नीचे मंता बनवासी, व बेटी निशा व दमाद राजा बनवासी से जंगली बबूल से घिरा जिसके निचे धरातल पर कूड़ा-करकट को साफ सुथरा करा कर किचन गार्डन बनाने की प्रक्रिया चलाया गया । जिस पर मंता द्वारा कहा गया कि भैया हमारे यहाँ इस जमीन में किचन गार्डन तो बन जायेगा लेकिन कोई किचन नहीं हो पाएगा सब परिश्रम खराब हो जाएगा अगल-बगल गाँव से से पालतू जानवर गाय, भैस भी आते जाते हैं तो बचेगा नहीं हम मजदूरी का काम करने चले गाँव के अन्य बस्तियों में चले जाते हैं घर पर कोई नहीं रहता है | किचन गार्डेन के सुरक्षा को लेकर मंता को मानसिक रूप से तैयार कर उपरोक्त जंगली बबूल की झाड़ी का सुरक्षा गार्ड बनाकर कद्दू, कुम्हड़ी (सीता फल), नेनुआ, करैली का बीज देने का योजना बनाया गया | जिसपर मंता बनवासी ने कद्दू का बीज लगाने से यह कहते हुये इनकार कर दिया कि कद्दू हमारे घर नही सहता है न तो कोई इसको हमारे घर खायेगा | जिसके बाद मंता बनवासी को कुम्हड़ी (सीता फल), नेनुआ, करैली का बीज देकर किचन गार्डेन में लगवाया गया | कुम्हड़ी (सीता फल), नेनुआ, करैली के बीज का पौधा निकाला जिसका सुरक्षा व देख-रेख परिवार के सभी सदस्य अपने बच्चे की तरह करने लगे |

किचन गार्डन का पौधा विकास करने लगा तो संस्था के कार्यकर्त्ता के सलाह अनुसार उपरोक्त पौधों को मंता बनवासी द्वारा उपरोक्त जंगली बबूल की झाड़ियों पर चढ़ा दिया गया और किचन गार्डन का पौधा धीरे-धीरे विकास कर उपरोक्त जंगली बबूल पर चढ़ कर फैलता गया पौधे का विकास देख परिवार के सदस्यों को किचन गार्डेन के पौधा से फल देने का आस लगने लगा | जिसके कुछ दिनों बाद कुम्हड़ी (सीता फल), नेनुआ, करैली एक-एक कर फल देने लगा तो नेनुआ, करैली के फल को किचन गार्डेन में छोड़ती गयी कि 5-7 फल हो जायेगा तो बनाकर खायेंगे वही कुम्हड़ी (सीता फल) का एक फल तीन से चार दिनों में 2 से 2 ½ किग्रा का हो गया | मंता बनवासी के परिवार के सभी सदस्यों के थाली में पहली बार भरपूर मात्रा में पोषणयुक्त घर की अपने किचन गार्डेन से सब्जी खाने के लियें मिला | जिसके बाद मंता बनवासी के किचन गार्डेन से भरपूर मात्रा में कुम्हड़ी (सीता फल), नेनुआ, करैली का सब्जी निकलने लगा | मंता बनवासी के परिवार के सभी सदस्यों के थाली में खाने के लियें भरपूर मात्रा में पोषणयुक्त ताजी हरी सब्जियां मिलने लगा | मंता बनवासी का किचन गार्डेन इतना अधिक कुम्हड़ी (सीता फल) देने लगा कि मंताने अपने किचन गार्डेन को ही दुकान बना बनाकर अधिक फल दे रहें कुम्हड़ी (सीता फल) का अनुमानित वजन अनुसार रु०20-30 प्रति कुम्हड़ी (सीता फल) विक्रय करने लगी धीरे-धीरे मंताके किचन गार्डेन की कुम्हड़ी (सीता फल) आस-पास के गाँव में प्रसिद्ध हो गया कि मंता बनवासी के घर कुम्हड़ी (सीता फल) ताजा कम मूल्यों पर पर आसानी से मिलता है | मंता बनवासी के परिवार के सभी सदस्यों के थाली में खाने के लियें तीन माह से भरपूर मात्रा में पोषणयुक्त ताजी हरी सब्जियां मिल रहा हैं वही लगभग 25 किग्रा नेनुआ, 12 किग्रा करैली, 2 ½ से 3 कुंतल कुम्हड़ी (सीता फल) का उत्पादन किया गया जिसमें से 50-60 कुम्हड़ी (सीता फल) का अनुमानित वजन अनुसार रु०20-30 प्रति कुम्हड़ी (सीता फल) का विक्रय किया वही मुसहर बस्ती में जिसके पास रु० नही था उसको मंताने मुफ्त में सब्जी खिलाया | उपरोक्त विक्रय किया हुआ रु० का परिवार में खाद्य पदार्थ – नमक, तेल, मसाला अन्य धरेलू सामग्री में उपयोग किया गया |

ब्लाक- बड़ागांव, ग्राम- बराई, टोला- मुसहर बस्ती में 21 परिवार मुसहर एक ही बस्ती में निवास करते हैं | उपरोक्त गाँव के सभी मुसहर परिवार अधिकतर बराई व ताड़ी डीह गाँव में सवर्ण जाति के बस्ती में मागने-खाने व बटाई की खेती के साथ मजदूरी कर अपना जीवन बसर करते है | संस्था जनमित्र न्यास / मानवाधिकार जननिगरानी समिति द्वारा उपरोक्त मुसहर बस्ती का अद्ययन करने के बाद समुदाय को किचन गार्डेन बनाने का सुझाव दिया गया जिसमें 09 परिवार अपना किचन गार्डेन बनाकर संस्था द्वारा कद्दू, कोहड़ी ( सीता फल) का बीज लेकर अपने अपने किचन गार्डेन में लगाये जिसका देख-रेख सहित किचन गार्डेन का सुरक्षा कियें सभी परिवारों का मिलाकर 450 किग्रा कोहड़ी ( सीता फल)113 किग्रा कद्दू का उत्पादन हुआ |

छेदी मुसहर के किचन गार्डेन में 250 किग्रा कोहड़ी ( सीता फल)का हुआ उत्पादन

छेदी मुसहर संस्था के कार्यकर्ता की सलाह पर पहली बार अपना किचन गार्डेन बनाये छेदी को अपने कौशल पर पूरा विश्वास नहीं था किचन गार्डेन के नाम पर छेदी का कहना था कि हमारे बस्ती में अनेको पालतू आवारा पशु आते-जाते है सब किचन गार्डेन नुकसान कर देंगे | जिसपर संस्था के कार्यकर्त्ता द्वारा छेदी सहित समुदाय के सभी लोगो के मनो-बल को उत्साहित किया गया, तो उपरोक्त 09 परिवारो में छेदी भी अपना किचन गार्डेन बनाकर कद्दू, कोहड़ी ( सीता फल) का बीज लगायें कार्यकर्ता के सलाह अनुसार अपने किचन गार्डेन का देख-भाल करने लगे अपने कोहड़ी के पौधा के तना को अपने मुख्यमंत्री आवास के छत व सीमेंटेड सेड पर लकड़ी व रस्सी के सहारे चढ़ा कर किचन के जड़ की सुरक्षा हेतू लकड़ी का घेरा बना दियें जिसपर पौधा के जड़ के पास निराई-गुड़ाई कर समय-समय पर पानी देते गये | जिसके बाद छेदी के कोहड़ी (सीता फल) का पौधा तैयार होकर फल देने लगा तो प्रतिदिन लगभग 5-6 कोहड़ी (सीता फल) का फल देता था जो लगभग 10-12 किग्रा होता था | पहले छेदी बनवासी प्रति दिन सुबह-शाम दोनों समय अपने किचन गार्डेन में उत्पादन किया हुआ कद्दू, कोहड़ी ( सीता फल) को पुरे परिवार से भरपूर बनाकर खायें जिसके बाद अपने पास-पड़ोसी को खूब खिलायें तथा बराई टोला- मुसहर बस्ती मजदूरो का गाँव हैं जहाँ आस-पास के सवर्ण जाति के किसान बस्ती में अपने मजदूरों को अपने घर कार्य करने के लियें बुलाने आते थे तो छेदी मुसहर का फल दिया हुआ कद्दू, कोहड़ी ( सीता फल) देख कर मांग कर लेजाकर बनाकर खाते थे जिनका देखी-देखा महेंद्र दूबे, ललित दूबे, निवासी ताड़ीडीह एक-एक कर 10 दिनों तक 20 कोहड़ी ( सीता फल) लेकर गये आशीष दूबे, शेरा सिंह निवासी बराई एक-एक कर 10 दिनों तक 20 कोहड़ी ( सीता फल) लेकर गये उपरोक्त गाँव के कुछ मुसहर परिवार मजदूरी करने पंजाब जाने लगे तो 20 कोहड़ी ( सीता फल) लेकर गये छेदी मुसहर के दूर के रिश्तेदार जौनपुर ईटायें 15 कोहड़ी ( सीता फल) लेकर गये तथा छेदी मुसहर के दूर के रिश्तेदार विन्ध्याचल 20 कोहड़ी ( सीता फल) लेकर गये | छेदी मुसहर की पत्नी शकुन्तला अपने जजमानी क्षेत्र बराई, ताड़ीडीह में जाती थी तो सब लोग शकुन्तला से पूछते थे कि कद्दू, कोहड़ी ( सीता फल) का बीज कहा से मिला ? किसने दिया ? बहुत फल देता है | शकुन्तला के कद्दू, कोहड़ी ( सीता फल) का चर्चा उनके पुरे जजमानी क्षेत्र सहित चारो तरफ फ़ैल गया | छेदी मुसहर को विश्वास नहीं था की उनका किचन गार्डेन में लगाया हुआ मौसमी सब्जी इतना फल देगा |

इंटरनेशनल रिहैबिलिटेशन कौंसिल फॉर टार्चर विक्टिम्स (IRCT),  संयुक्त राष्ट्र संघ के टार्चर फण्ड के सहयोग से जनमित्र न्यास ने वाराणसी , सोनभद्र, बदायु के 2261 परिवार (2117 अनुसूचित जाति,72 पिछड़ी जाति व 72 अनुसूचित जनजाति) ने 36536 किलोग्राम के सब्जी का उत्पादन किया है. वही अनेइ गाँव के २७ मुसहर महिलावो को ब्लैक बंगाल नस्ल की बकरी दी गयी है. यह एक उत्कृष्ट भारत और बेहतर दुनिया के निर्माण के लिए एक कदम हैं.

लेनिन रघुवंशी, संयोजक, मानवाधिकार जन निगरानी समिति

 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here