बड़ी पूँजी के हितैषी थे गाँधी-अंबेडकर जबकि भगत सिंह थे मेहनतकशों के हमदर्द

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मुक्तिबोध की कविता की पंक्ति है “पूंजी से जुड़ा हृदय बदल नहीं सकता”। गांधी जयंती के अवसर पर यह प्रश्न किया जाना चाहिए कि क्या मुक्तिबोध की यह पंक्ति सही है? क्या पूंजी से जुड़े हुए हृदय को बदला जा सकता है जैसा कि गांधी सोचा करते थे, जैसा कि पूंजीवादी लोकतंत्र से अंबेडकर जाति की समाप्ति की उम्मीद करना बैठे थे?और क्या पूंजी से जुड़े हृदय के वास्तविक चरित्र को भगत सिंह समझ चुके थे?
गांधी और अंबेडकर भाववादी दृष्टिकोण से पूंजीवाद को मानवीय बनाने का स्वप्न पेश करते हैं। वे मुक्तिबोध कि इन पंक्तियों को मानने के लिए तैयार नहीं थे कि पूंजी से जुड़ा हृदय बदल नहीं सकता।
आज जातीय उत्पीड़न,जातिवाद, साम्प्रदायिकता, नस्लवाद सभी को पूंजीवाद का न सिर्फ संरक्षण प्राप्त है, बल्कि उसे और पाला पोसा जा रहा है। पूरी दुनिया में जो युद्ध चल रहा है, उसके पीछे भी पूंजी से जुड़ा यही हृदय होता है। मनुष्य की आवश्यकता को नकार कर, उसे भूखे रखकर, पर्यावरण को जो नष्ट किया जा रहा है और युद्ध की जो खेती की जा रही है, उसके पीछे भी पूंजी से जुड़ा हृदय ही है।
भगतसिंह इतिहास और विज्ञान के अध्ययन के आधार पर समझ चुके थे कि पूंजी से जुड़ा हृदय बदल नहीं सकता है। इसीलिए उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के साथ-साथ तमाम भारतीय पूंजीपतियों व सामंतो के खिलाफ संघर्ष का आवाह्न किया। गांधी जहां ब्रिटिश साम्राज्यवाद से सत्ता चाहते थे और भारतीय पूंजीपतियों को भारतीय उद्योग व संपदा का कस्टोडियन बनाना चाहते थे, वही अंबेडकर यह विश्वास रखते थे कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद के प्रयास तथा पूंजीवाद के विकास के साथ पूंजीवादी लोकतंत्र भारतीय समाज से सामंत जातीय उत्पीड़न को खत्म करेगा। अंबेडकर या नहीं देख रहे थे कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद जहां शहरों में पढ़े-लिखे दलितों को अवसर दे रहा था, वही उसकी पूरी नौकरशाही मैं ब्राह्मण वादियों का बोलबाला था। हालांकि कि सरकार में शामिल होने के बाद भारतके पूंजीवाद से उनका मोहभंग होने लगा था। लेकिन रूसी समाजवादी क्रांति की उपलब्धियों तथा पश्चिम के पूंजीवादी लोकतंत्र के द्वारा विश्व युद्ध तथा उपनिवेश ओं के निर्मम शोषण के बावजूद वे पूंजीवादी लोकतंत्र के समर्थक बने रहे।
ब्रिटिश व सभी साम्राज्यवाद का हित व रुचि भारत व दुनिया भर में कुरीतियों को खत्म करने में वहीं तक थी, जहां तक वे पूंजीवाद के विकास में बाधक बनती थी। शोषण के खिलाफ जन आंदोलन और राष्ट्रव्यापी आंदोलन नहीं हो, इसलिए आवश्यक था कि भारतीय जनता जाति तथा धर्म के नाम पर विभाजित रहे ।
उसके सबसे भरोसेमंद सामाजिक आधार भारतीय जमींदार तथा ब्राह्मणवादी थे। गांधी व अंबेडकर इस तथ्य को क्यों नजरंदाज कर रहे थे? गांधी कभी भी भारतीय जमींदारों तथा ब्राह्मणवाद के खिलाफ आर्थिक व सांस्कृतिक संघर्ष का आवाहन नहीं किया। चंपारण का किसान आंदोलन गोरे नील मालिकों के खिलाफ था। उन्होंने गुजरात के बारदोली किसान आंदोलन पर प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्ष: पानी डालने का ही काम किया। उन्होंने महज सुधारों के द्वारा हरिजन उद्धार का सुधारवादी आंदोलन चलाया।
गांधी शोषक पूंजीपति और ज़मीदारों के हृदय के परिवर्तन की बात करते थे । यह कुछ ऐसी ही बात थी जैसे मांसाहारी पशु हिंसा न करें। पूंजीपतियों तथा सामंतों की समृद्धि मजदूरों तथा किसानों के निर्मम शोषण पर निर्भर करता था। पूंजीवाद में पूंजीपतियों की आपसी प्रतियोगिता और पूंजी को बढ़ाते रहने की मजबूरी उन्हें और हिंसक बनाते जाता है। गांधी इस बात को मानने और समझने के लिए तैयार नहीं थे।
भगत सिंह इस बात को बहुत स्पष्ट तरीके से समझते थे। इसलिए शोषण के उन तमाम साधनों तथा प्रणालियों के स्वरूप को ही बदलने का आवाहन किया। दुनिया भर के ऐसे संघर्षों और क्रांति का समर्थन किया ।आज संसदीय वामपंथी पार्टियां गांधी और अंबेडकर के के विचारों की आलोचना से बच रहे हैं। वे भावनात्मक तरीके से उन्हें स्थापित करने में लगे हैं।
सच यही है कि पूंजीवाद में सरकार चलाने वाले पूंजी की सेवा करने और पूंजीवादी व्यवस्था को बचाने के लिए ही काम करेंगे।यूं कहिए कि वे फासीवादी नहीं होगे, संवेदनशील होंगे,तब भी शोषण के पक्ष में दमनकारी नीतियों को लाने को बाध्य होंगे। तो मतभेदों के बावजूद इस रूप में उनके बीच एकता बन ही जाती है। जर्मनी में जब रोजा के पूर्व के साथी पूंजीवादी संसद को स्वीकार किया तो रोजा और नियुक्ति हत्या करने से भी पीछे नहीं हटे। भारत में भी पूंजीवादी सरकार चलाने वाले बामपंथियों ने बहुतेरे मजदूरों किसानों के लिए काम करने वाले मार्क्सवादी कार्यकर्ताओं की हत्या की है।
जब कभी भी मजदूर आंदोलन मजबूत होगा,उसके दमन के लिए ये सभी एकजुट हो जाएंगे। खुद वामपंथी सरकारें भी अब यह कह रही हैं कि “मिलिटेंट अर्थवाद” को आगे नहीं बढ़ाया जाए, नहीं तो निवेश नहीं आयेगा। मतलब लाल झंडे के बैनर में भी अगर पूंजी की सेवा करने की बात की जा रही है, तो समझ लीजिए वे भगत सिंह की परंपरा से रास्ता बदलकर गांधी और अंबेडकर के रास्ते पर ही जाएंगे।
ऐसा क्यों, क्योंकि विपक्ष के साथ सरकार बनाने वाले बामपंथी पहले से ही जानते हैं कि पूंजी से जुड़ा हुआ हृदय बदल नहीं सकता!
नरेंद्र कुमार

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