साहित्य जगत

घर वापसी पर केंद्रित कविताएँ, संकलन- नीरज कुमार मिश्र

कोरोना पूरे विश्व में कहर बरपा रहा है।इस भयावह समय में सभी को ये सुझाव मिला है कि जो जहाँ है वहीं रहे।सामाजिक दूरी...

प्रलेस के श्याम सुंदर और सुनील की कविताएं

छिपकली प्रकाश की लालच लिए आते हैं कीड़े समझ अपनी जिंदगी की सुबह हो जाते हैं उतारु मर - मिटने को नहीं लेते सबक देखकर अपने अतीत को नहीं देख पाते...

गोर्की ने किया था गोदी मज़दूर, रसोइया, अर्दली, कुली, माली, सड़क कूटने वाले मज़दूर तक का काम

एक सच्चा सर्वहारा लेखक - मक्सिम गोर्की दुनिया में ऐसे लेखकों की कमी नहीं, जिन्हें पढ़ाई-लिखाई का मौक़ा मिला, पुस्तकालय मिला, शान्त वातावरण मिला,...

जैसे आंधी से उठी धूल हो … विष्णु नागर की कविता

जैसे आंधी से उठी धूल हो लोग शहर से गाँव चले जा रहे हैं जैसे 1947 फिर आ गया हो लोग चले जा रहे हैं भूख चली जा...

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बड़े जोतदार जनता के मित्र नहीं हैं तो भूमि-प्रश्न अनसुलझा कैसे रह सकता है?

संपादकीय टिप्पणीः घुटे हुए और घाघ कॉमरेड्स मुझे करेक्ट करेंगे इस उम्मीद के साथ सकारात्मक ढंग से अपनी बातों को...

श्रमिकों बाजार का माल तुम्हारा है, दैत्याकार कारखाने तुम्हारे हैं

#काले धन की नयी खेप! धन कभी सफेद नहीं होता है धन श्रम शक्ति के लाल रक्त और रंगहीन पसीने से पैदा...

सत्ता के संरक्षण में विद्यार्थी परिषद के गुंडों ने स्टूडेंट्स के सिर फोड़े

भगतसिंह छात्र मोर्चा सत्ताधारी ABVP के गुंडों द्वारा CASR के कार्यकर्ताओं पर किए गए हमले की निंदा करता है...

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