जाति का बीजनाश और जोसेफ स्टालिन का रास्ता

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भारत में जाति-व्यवस्था से सर्वाधिक पीड़ित तो आम मेहनतकश दलित आबादी है लेकिन जातीय शोषण-उत्पीड़न के विरुद्ध सर्वाधिक मुखर दलित बुर्जुआ नहीं वरन इस देश के माओवादी हैं। पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (चीनी जनवादी गणराज्य) में मज़दूर वर्ग की पार्टी यानि कि कम्युनिस्ट पार्टी की अगुवाई में दीर्घकालिक युद्ध के उपरांत पुराने शासक-वर्गों को उखाड़कर नई जनतांत्रिक सरकार बनी। जनतांत्रिक सरकार बनाने की अगुवाई चूँकि पूँजीपति वर्ग की बजाय मज़दूर वर्ग की पार्टी ने की थी, इसीलिए वहाँ हुई क्रांति को नव जनवादी क्रांति कहा गया। जैसा कि नाम से ही ध्वनित होता है चीन ने कभी स्वयं को समाजवादी देश घोषित ही नहीं किया। क्रांति के उपरांत वहाँ सत्ता पर राष्ट्रीय पूँजीपति वर्ग ही नहीं, देशभक्त सामंतों का भी एक हिस्सा काबिज हुआ। बहु-प्रशंसित सांस्कृतिक क्रांति भी तो उसी देश में की जा रही थी, जहाँ पर निजी मालिकाने की भी व्यवस्था कायम थी। सोवियत संघ के समाज को अपने से विपरीत में बदलने में ज्यादा समय लगा जबकि निजी मालिकाने की व्यवस्था वाले चीन में यह गति कहीं अधिक तेज है।
अब आइए, मूल प्रश्न यानि कि भारत में जातिगत शोषण-उत्पीड़न के खात्मे की परियोजना की ओर रुख करते हैं और पता लगाते हैं कि क्या माओ की लाइन पर चलकर सचमुच इसका खात्मा किया जा सकता है।इतिहास गवाह है कि अकेले फ्रांस में ही सामंतों की मुंडी काटकर पूँजीपति वर्ग सत्ता पर काबिज हुआ, शेष विश्व के सभी हिस्सों में पूँजीवाद चोर दरवाजे से यानि कि बिना सीधे टकराव के सत्ता पर काबिज हुआ। पूँजीवादी-जनवादी क्रांति अपने क्लासिकल रूप में सिर्फ फ्रांस में संपन्न हुई, शेष सभी जगहों पर पुराने भूस्वामियों-सामंतों ने खुद का पूँजीवादी रूपांतरण किया। माने पुराने शासक वर्गों के लोग बुर्जुआ राजनीति में आए, कारखानेदार बने, पूँजीवादी भूस्वामी यानि कि फार्मर बने।
असमान विकास माल उत्पादन पर आधारित पूँजीवादी उत्पादन पद्धति की अभिलाक्षणिक विशिष्टता होती है। ऐसे में जाहिर है कि जिन क्षेत्रों के पूँजीपति ज्यादा ताकतवर होंगे वे अपने से कमजोर राष्ट्रीयताओं को दबाएंगे ही। प्रत्यक्ष रूप से उपनिवेश बनाने की परिघटना को इस नुक्ते से समझा जा सकता है। हर देश में बुर्जुआ जनवादी क्रांति हो ही नहीं सकती, भारत अगर अंग्रेजों का गुलाम नहीं बनता तो पुर्तागलियों का बनता, स्पेन का बनता मगर बनता जरूर।
हर तरह के शोषण-उत्पीड़न की व्यवस्था की बुनियाद है उत्पादन के साधनों पर निजी मालिकाना। इतिहास वर्ग संघर्ष से आगे बढ़ता है, इस सर्वमान्य उक्ति में यह बात भी जोड़ दी जानी चाहिए कि निजी संपत्ति बढ़ाते जाने की अभिलाषा भी इतिहास को गति देती आई है। उदाहरण के लिए जब गुलाम मालिकों को लगा कि अगर गुलामों को जमीन दे दी जाए और लगान की एवज में उन्हें स्वतंत्र रूप से काम करने की छूट दे दी जाए तो पैदावार बढ़ेगी क्योंकि तब गुलामों के पास अधिक मेहनत करने, रचनात्मक बनने की प्रेरणा होगी। इतिहास आगे बढ़ा, गुलाम युग के बाद सामंती युग आया। निश्चित रूप से इसमें गुलामों के विद्रोहों का केंद्रीय योगदान रहा लेकिन धनसंचय की अभिलाषा ने भी युग-परिवर्तन में अहम भूमिका निभाई।
शोषकों-उत्पीड़कों की संस्कृति अपने परिवर्तित रूप में हर अगली व्यवस्था में कायम रही। शोषण-उत्पीड़न का तरीका तो बदला लेकिन सारतत्व वही बना रहा। आज मज़दूर पीस रेट पर काम करता है। रंगाई-पुताई, ईंट की जोड़ाई, टाइल्स की लगवाई, गड्ढे की खुदाई जैसे हजारों काम एक अकेला मज़दूर भी ठेके पर करने लगा है। लेकिन क्या आपको लगता है कि इससे उसकी मज़दूरी में इजाफा होता है, जी बिल्कुल नहीं। इससे उसकी श्रमशक्ति के दोहन में सिर्फ तीव्रता ही आती है, हाँ बलिष्ठ मज़दूर को सापेक्षिक लाभ जरूर मिल जाता है।
हम वापस अपनी पुरानी बात पर आते हैं कि क्या मालिकाने का स्वरूप बदलने से शोषण-उत्पीड़न से मुक्ति मिल जाएगी और गुज़रे जमाने की जाति-प्रथा जैसी मानवद्रोही संस्थाएं विलुप्त हो जाएंगी?
निगमनात्मक तर्क तो यही कहता है कि जिस बुराई की जड़ उत्पादन के साधनों पर निजी मालिकाने की व्यवस्था है, उसका खात्मा भी केवल और केवल तभी होगा जब उत्पादन के समस्त साधनों पर समूचे समाज का मालिकाना हो। नतीजा यह निकला कि इस देश के माओवादी जातिवाद के समूल नाश की चाहे जितनी वकालत करें लेकिन अगर वे चीन की तर्ज पर भारत में नवजनवाद लाने यानि कि पूँजीवाद लाने के लिए संघर्ष करते रहेंगे तो संस्थाबद्ध शोषण-उत्पीड़न की जड़ें नहीं खोद पाएंगे।
इसके बरअक्स, उन कम्युनिस्ट धड़ों का संघर्ष जाति-विहीन समाज की स्थापना करने में अधिक मददगार होगा जो निजी संपत्ति और मुनाफे की व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष को अपने एजेंडे में रखे हुए हैं। भारत के कम्युनिस्टों को भी यूनियन ऑफ सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक्स (यूएसएसआर) अर्थात सोवियत समाजवादी गणतंत्रों के संघ की तर्ज पर पूँजीवाद और उसकी तमाम संस्थाओं के विरुद्ध आर-पार की लड़ाई में उतरना होगा, तब जाकर हो पाएगी जाति-विहीन समाज की स्थापना। कहना न होगा कि हमारा आदर्श चीन नहीं वरन सोवियत संघ है। विश्व इतिहास में समाजवादी नव-निर्माण का सबसे लंबा कालखंड स्टालिन युग रहा है। अंकल जो का पूरा जोर उत्पादक शक्तियों को विकसित करते जाने और उत्पादों की प्रचुरता की स्थिति लाने पर रहा है ताकि समाजवाद से साम्यवाद की ओर छलांग लगाई जा सके।
बस प्रसंगवश, विश्वव्यापी फासीवादी उभार की जड़ें भी इस चीज में तलाशी जा सकती हैं कि विश्व की आधे से अधिक आबादी ने सामंती मूल्यों से आगे के मूल्य कभी देखे ही नहीं, अर्थात अधिरचना के धरातल पर वह सामंती ही बनी रही। फासीवाद अतीत-गमन यानि कि पश्चगमन का प्रयास करता है और जनमानस में सामंती मूल्यों की प्रधानता उसके इस काम को सुगम बना रही है तो इस लिहाज से भी हमारा आदर्श सोवियत संघ होना चाहिए न कि चीनी लोक गणराज्य।
कामता प्रसाद 

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