क्यों हेमंत सोरेन को वनोपज की अधिसूचना में बदलाव का निर्देश देना पड़ा?

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क्या कैबिनेट मंत्री सचिवों की तैयार अधिसूचना को पढ़ते नहीं?

विशद कुमार

उल्लेखनीय है कि पिछले 17 जून 2020 को झारखंड सरकार द्वारा कैबिनेट की बैठक में एक महती फैसला लिया गया, जिसमें भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा-41, 42 एवं 76 द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए झारखंड राज्य में वनोपज के अभिवहन को विनियमित करने के लिए अधिसूचित झारखंड काष्ठ एवं वन उत्पाद (अभिवहन का विनियमन) नियमावली, 2004 को निरस्त करके वनोपज के अभिवहन के विनियमन करने के लिए झारखण्ड वनोपज (अभिवहन का विनियमन) नियमावली, 2020 की स्वीकृति दी गई। जिसके तहत आदिवासियों को जंगलों से जलावन समेत अन्य वनोपज लाने पर टैक्स देना पड़ेगा। इसकी अधिसूचना 29 जून 2020 को झारखंड सरकार के प्रधान सचिव, अमरेंद्र प्रताप सिंह ने जारी की। इस अधिसूचना के बाद हेमंत सरकार की आलोचना शुरू हो गई कि ”यह अधिसूचना हेमंत सरकार द्वारा

आदिवासियों को जंगल से बेदखल करने की अधिसूचना है।”

जहां एक तरफ चाटूकार मीडिया ने सरकार की इस अधिसूचना की तारीफ के पुल बांधा, वहीं कइयों ने सरकार की जमकर खींचाई की और खुलकर लिखा कि जंगल के मालिक आदिवासियों से टैक्स लेना उन्हें जंगल से बेदखल करने का पहला कदम है। कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसे वन अधिकार अधिनियम 2006 की अवमानना बताया। इसे लेकर राज्य सरकार पर कई सवाल खड़े किये गये।

इसके बाद 10 जुलाई को अमरेन्द्र प्रताप सिंह प्रधान सचिव, वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ने एक प्रेस कान्फ्रेंस कर बताया कि झारखण्ड वनोपज नियमावली 2020 में संशय दूर करने का मुख्यमंत्री से मिले निर्देश के बाद राज्य सरकार झारखण्ड वनोपज नियमावली 2020 में कुछ बदलाव करेगी तथा ग्रामीणों को जलावन लकड़ी अथवा अन्य निजी कार्य हेतु उपयोग की गई लकड़ी पर कोई अनुज्ञा पत्र नहीं देना होगा और न ही किसी तरह का शुल्क लगेगा।

सूचना एवं जनसंपर्क निदेशालय रांची, द्वारा दिनांक- 10.07.2020 को जारी विज्ञप्ति संख्या- 366/2020 में कहा गया है कि ”झारखण्ड वनोपज नियमावली 2020 में संशय दूर करने का मुख्यमंत्री से मिला निर्देश, राज्य सरकार झारखण्ड वनोपज नियमावली 2020 में करेगी कुछ बदलाव

ग्रामीणों को जलावन लकड़ी अथवा अन्य निजी कार्य हेतु उपयोग की गई लकड़ी पर कोई अनुज्ञा पत्र नहीं और न ही किसी तरह का शुल्क”

जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया कि ”श्री ए0पी0 सिंह प्रधान सचिव, वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ने कहा कि राज्य सरकार जून में अधिसूचित की गई झारखण्ड वनोपज नियमावली 2020 में जल्द ही कुछ परिवर्तन करेगी। जिसमें ग्रामीणों द्वारा जलावन अथवा अन्य निजी कार्यों के लिये उपयोग की जाने वाली लकड़ी पर बने संशय को दूर किया जायेगा। माननीय मुख्यमंत्री द्वारा इस संदर्भ में निर्देश प्राप्त हुआ है। वे आज प्रोजेक्ट भवन में आयोजित प्रेस कान्फ्रेंस में बोल रहे थे।

श्री ए0पी0 सिंह ने कहा कि वन,पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ने जून माह में ट्रांजिट रुल लाया था, जिसके तहत झारखण्ड वनोपज नियमावली 2020 अधिसूचित की गई थी। जिसमें जलावन लकड़ी के लिये 25रु/ घनमीटर की दर तथा अन्य वनोत्पाद को लेकर भी संशय हो रहा था। राज्य सरकार झारखण्ड वनोपज नियमावली 2020 में जल्द ही कुछ परिवर्तन करेगी जिसमें जलावन लकड़ी के लिये 25रु/ घनमीटर की दर को भी विलोपित कर दिया जायेगा।

उन्होंने कहा कि इस नियमावली में यह बात स्पष्ट है कि ग्रामीण अपनी ग्राम सीमा के अंदर जलावन या अन्य निजी कार्यों के लिये लकड़ी का उपयोग करते हैं तो उन्हें किसी तरह का शुल्क नहीं देना होगा और न ही अनुज्ञा पत्र (लाईसेंस) लेना होगा। परंतु इसे बेचने की अनुमति नहीं होगी। वहीं यदि लकड़ी का उपयोग व्यवासायिक हेतु करते हैं तो शुल्क देना होगा।”

प्रेस विज्ञप्ति में आगे कहा गया कि ”श्री पी0के0 वर्मा, प्रधान मुख्य वन संरक्षक, झारखण्ड ने कहा कि ग्राम सीमा के अंदर लकड़ी का उपयोग जलावन या निजी कार्यो हेतु अनुमान्य है न कि बेचने के लिये। पंरतु यदि वन क्षेत्र में सड़क निर्माण या अन्य कार्यों हेतु जंगल की कटाई से प्राप्त लकड़ी का उपयोग व्यवासायिक हेतु करते हैं तो अनुमति लेनी होगी।”

अब इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि झारखंड सरकार द्वारा कैबिनेट की बैठक में जब पिछले 17 जून को हेमंत सरकार ने झारखण्ड वनोपज (अभिवहन का विनियमन) नियमावली- 2020 को मंजूरी दी। जिसके तहत भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा 41, 42 और 76 के अधीन राज्य सरकार में निहित शक्तियों का हवाला देते हुए सरकार द्वारा आदिवासियों पर टैक्स का बोझ लाद दिया गया।

तो क्या कैबिनेट में आए इस प्रस्ताव पर कोई बहस नहीं हुई? अगर बहस नहीं हुई, तो क्यों नहीं हुई? क्या सरकार या कैबिनेट के मंत्री आंखें बंद करके संबंधित अफसरों पर भरोसा करते हैं? क्योंकि कोई भी अधिसूचना संबंधित विभाग के अफसर ही तैयार करते हैं। अगर ऐसा नहीं है तो फिर क्यों मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अमरेन्द्र प्रताप सिंह प्रधान सचिव को निर्देश दिया कि इस वनोपज नियमावली 2020 में बदलाव किये जाएं। उसके बाद आनन—फानन में 10 जुलाई को अमरेन्द्र प्रताप सिंह ने एक प्रेस कान्फ्रेंस कर बताया कि झारखण्ड वनोपज नियमावली 2020 में संशय दूर करने का मुख्यमंत्री से मिला निर्देश के बाद राज्य सरकार झारखण्ड वनोपज नियमावली 2020 में कुछ बदलाव करेगी तथा ग्रामीणों को जलावन लकड़ी अथवा अन्य निजी कार्य हेतु उपयोग की गई लकड़ी पर कोई अनुज्ञा पत्र नहीं देना होगा और न ही किसी तरह का शुल्क लगेगा।

जाहिर है राज्य में विधायिका अफसरशाही पर आंख बंद करके भरोसा कर रही है, जो शायद लोकतंत्र के लिए काफी खतरनाक है।

भाकपा माले के विधायक और प्रत्यायुक्त विधान समिति के सभापति बिनोद सिंह कहते हैं कि ”कोई भी नियमावली पारित करने के लिए कैबिनेट के बाद विधानसभा में भी रखा जाता है जो इस मामले में नहीं हुआ है।”

वे बताते हैं कि ”जब मुझे मामले की जानकारी हुई तो ‘प्रत्यायुक्त विधान समिति’ के सभापति के नाते मैंने 17 जून को हुए कैबिनेट के फैसलों में ‘झारखण्ड वनोपज (अभिवहन का विनियमन) नियमावली, 2020’ की स्वीकृति अधिसूचना और सूचना एवं जनसंपर्क निदेशालय रांची, द्वारा दिनांक- 10.07.2020 को जारी विज्ञप्ति संख्या- 366/2020 की प्रतिलिपि की मांग की है, उसे देखने के बाद ही मैं इस पर कुछ कह सकूंगा।”

बताना जरूरी होगा कि कोई भी अध्यादेश लाकर किसी अधिनियम (कानून) को नहीं बदला जा है, जब तक केंद्र सरकार के दोनों सदनों में उसे कानून नहीं बना दिया जाय। कहना ना होगा कि आदिवासियों को जल, जंगल व जमीन से बेदखल करने की हमेशा से कोशिश होती रही है।

 स्वतंत्र पत्रकार रूपेश कुमार सिंह कहते हैं कि ”वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के प्रधान सचिव एपी सिंह ने झारखंड वनोपज नियमावली 2020 में परिवर्तन करने की बात कही है। उनका कहना है कि ग्रामीण अपने ग्राम सीमा के अंदर अपने निजी उपयोग के लिए मुफ्त में लकड़ी ले सकते हैं लेकिन व्यवसाय के लिए नहीं। जबकि यह बात सभी जानते हैं कि झारखंड के घने जंगलों के अंदर रहनेवाले मूलवासी-आदिवासी जंगल पर ही आश्रित हैं। वे जंगल से दातुन के लिए लकड़ियां काटते हैं और सूखी लकड़ी भी काटते हैं और उन्हें बाजार में बेचकर उससे मिले पैसे से अपनी जिंदगी चलाते हैं। इसलिए झारखंड वनोपज नियमावली के तहत व्यवसाय की कैटेगरी भी निर्धारित करनी चाहिए, ताकि जंगलों पर आश्रित आदिवासी-मूलवासी जनता की रोजी-रोटी पर कोई फर्क नहीं पड़े।”

वे आगे कहते हैं कि ”मेरा मानना स्पष्ट है कि झारखंड सरकार को ग्राम सभा को जंगलों पर पूर्ण अधिकार सौंप देना चाहिए, क्योंकि वास्तविक में जंगलों के  मालिक आदिवासी-मूलवासी जनता ही हैं।”

वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के प्रधान सचिव एपी सिंह ने झारखंड वनोपज नियमावली 2020 में परिवर्तन करने की बात कही है। एक तरफ उनका कहना है कि ग्रामीण अपने ग्राम सीमा के अंदर अपने निजी उपयोग के लिए मुफ्त में लकड़ी ले सकते हैं लेकिन व्यवसाय के लिए नहीं। वहीं दूसरी तरफ इस अधिसूचना पर भी कई सवाल खड़े होते हैं। इन सवालोंं में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जहां झारखंड के घने जंगलों में रहने वाले मूलवासी-आदिवासी जंगल पर ही आश्रित हैं, वे जंगल से दातुन, जलावन की सूखी लकड़ियां, फल, कंद—मूल, जड़ी—बूटी, पत्तल बनाने के पत्ते वगैरह तोड़कर लाते हैं और उन्हें बाजार में बेचकर उससे मिले पैसों  से अपनी जिंदगी की अन्य जरूरतें पूरी करते हैं। ऐसे में यह तय कैसे होगा कि वे अपने निजी जरूरतों के लिए जंगल से वनोपज ले जा रहे हैं कि बेचने के लिए? इसे किसे श्रेणी में रखा जाएगा? यह निजी जरूरत कहलाएगा या व्यवसाय?

बता दें कि वन अधिकार अधिनियम 2006 के भाग 2(झ) के अनुसार लघु वनोपज के ‘अंतर्गत पादप मूल के सभी गैर—इमारती वनोत्पाद हैं, जिनमें, बांस, झाड़ झंखाड़, ठूंठ,बैंत, तुसार, कोया, केंद, पियार (चिरउनजी), शहद, मोम, लाह, तेंदू या केंदू पत्ते, औषधीय पौधे और जड़ी बूटियां, मूल-कन्द और किसी प्रकार के उत्पाद सम्मिलित हैं।

यह नियमावली प्रमंडल वन पदाधिकारी को परिवहन अनुज्ञा पत्र जारी करने का प्राधिकार प्रदान करता है। इस व्यवस्थावादी अथवा सत्तावादी प्रक्रिया में कहीं ना कहीं वन में निवास कर रहे आदिवासी एवं अन्य परंपरागत वन निवासी वन पर अपने अधिकारों से दूर होते जा रहे हैं। इसी संदर्भ में वनोपज के परिवहन पर जो शुल्क निर्धारित किया गया है वह चिंताजनक है, क्योंकि इस निर्धारण की पूरी प्रक्रिया में कहीं भी आदिवासियों या ग्राम सभाओं को सम्मिलित नहीं किया गया। जबकि ग्राम सभा को यह अधिकार है कि वह जंगल में कौन कौन से पौधें लगाए या न लगाए। उदाहरण के तौर पर, इस नियमावली में जलावन की लकड़ी के परिवहन पर ₹ 25 प्रति घन मीटर का शुल्क लगाया गया है, परंतु  इस शुल्क का ग्राम सभा के इजाजत या उसके फैसले से कोई सरोकार नहीं है। जबकि इसका फैसला ग्राम सभा को तय करना है।

इस बावत राज्य समन्वय, डीएएए—एनसीडीएचआर, झारखंड के मिथिलेश कुमार बताते हैं कि ”वन अधिकार अधिनियम 2006 में, जब भारत के राष्ट्रपति डॉक्टर ए. पी. जे. अब्दुल कलाम ने अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, जो आम भाषा में वन अधिकार कानून के नाम से जाना जाता है, को सहमति दी, इससे एक ऐसी प्रक्रिया की शुरुआत हुई जिसका उद्देश्य सामाजिक हित में विकेंद्रीकरण एवं जटिल अफसरशाही व्यवस्था को आसान बनाना था। इस कानून के बनने से पहले वन में निवास कर रहे परिवारों एवं समुदायों को अतिक्रमण कर्ता के तौर पर देखा जाता था, जो अक्सर वन पदाधिकारियों के साये में अपना जीवन व्यतीत करते थे। वन अधिकार कानून आने के बाद वन निवासी (जिसमें अधिकांश आदिवासी हैं) अब न केवल व्यक्तिगत एवं सामुदायिक वन पट्टे के लिए दावे कर पाएंगे, बल्कि अब उन्हें  मौका है अफसरशाही व्यवस्था से निजात पाने का। मगर वन अधिनियम का हवाला देकर आदिवासी व अन्य परंरागत समुदाय से वनोत्पाद पर शुल्क लेने का आदेश और पुन: यह कहना व्यक्तिगत वनोजत्पाद के उपयोग पर शुल्क नहीं लगेगा, पुनः आदिवासी व अन्य परंपरागत समुदाय के साथ अन्याय है। साथ ही इससे आदिवासी समुदाय के उपर वन विभाग के अधिकारियों व कर्मचारियों के मनमाने अत्याचार करने और अवैध वसूली करने का बढ़ावा मिलेगा, क्योंकि अगर कोई भी वन विभाग के कर्मचारी किसी को पकड़ता है तो यह साबित करना मुश्किल होगा कि यह व्यक्तिगत उपयोग के लिए है या बेचने के लिए? जबकि वन अधिकार में आदिवासी समुदाय को वनों के संर्वधन, संरक्षण, प्रबंधन और विपणन तथा उपयोग का अधिकार है। मगर झारखंड सरकार व वन विभाग तरह-तरह से वन कानून में संशोधन लाकर आदिवासी व अन्य परंपरागत समुदायों का जंगल पर से अधिकार छिनना चाहती है। अगर झारखंड सरकार झारखंड के आदिवासियों की हितैषी है, तो सबसे पहले वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत आदिवासी समुदाय को अधिकार दे। अगर ऐसा नहीं होता है, आदिवासी समुदाय के साथ पुन: यह ऐतिहासिक अन्याय होगा।”

कहना ना होगा कि औपनिवेशिक काल के दौरान तथा स्वतंत्र भारत में राज्य वनों को समेकित करते समय उनकी पैतृक भूमि पर वन अधिकारों और उनके निवास को पर्याप्त रूप से मान्यता नहीं दी गई थी, जिसके परिणामस्वरूप वन में निवास करने वाली उन अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों के प्रति ऐतिहासिक अन्याय हुआ है, जो वन पारिस्थितिकी प्रणाली को बचाने और बनाए रखने के लिए अभिन्न अंग हैं।

अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 (29 दिसंबर 2006) के आलोक में वन में निवास करने वाली ऐसी अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों के, जो ऐसे वनों में पीढ़ियों से निवास कर रहे हैं, किंतु उनके अधिकारों को अभिलिखित नहीं किया जा सका है, वन अधिकारों और वन भूमि में अधिभोग मान्यता देने और निहित करने, वन भूमि में इस प्रकार निहित वन अधिकारों को अभिलिखित करने के लिए संरचना का और वन भूमि के संबंध में अधिकारों को ऐसी मान्यता देने और निहित करने के लिए अपेक्षित साक्ष्य की प्रकृति का उपबंध करने के लिए अधिनियम वन में निवास करने वाली अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों के, मान्यता प्राप्त अधिकारों में, दीर्घकालीन उपयोग के लिए जिम्मेदारी और प्राधिकार, जैव विविधता का संरक्षण और पारिस्थितिकी संतुलन को बनाए रखना और वन में निवास करने वाली अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों की जीविका तथा खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करते समय वनों की संरक्षण व्यवस्था को सुदृढ़ करना भी सम्मिलित है।

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