बजटीय प्रस्ताव देश की जनता की घरेलू बचत को विदेशी पूंजी के हांथ में सौंपने का कार्य करेगा

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भारत सरकार के नाम पत्र
विषय :-शेयर मार्केट मे  LIC की सूचीबद्धता ( LIC के IPO ) और बीमा क्षेत्र में 74% FDI के प्रस्तावों के विरोध में
भारत सरकार की वित्तमंत्री द्वारा 2021-22 का आम बजट प्रस्तुत करते हुए भारतीय बीमा बाज़ार से संबंधित दो प्रमुख घोषणाएं की गई हैं, जो निश्चित तौर पर आत्मनिर्भर भारत और देश के विकास और पालिसी धारकों के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव डालेंगी |
इस आम बजट में यह दो प्रस्ताव हैं-
LIC का IPO लाकर इसकी पूंजी के एक हिस्से को शेयर मार्केट से सम्बद्ध करना |
बीमा क्षेत्र में FDI की सीमा को वर्तमान 49% से बढ़ाकर 74% करना और मालिकाना हक पर 74% वाले विदेशी पूंजी वाले संस्थान का अधिकार |
निश्चित तौर पर यह दोनों प्रस्ताव भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले हैं |
सरकार द्वारा LIC के IPO को जारी करने का निर्णय 42 करोड़ पालिसी धारकों के हितों के ऊपर मात्र 2.78 करोड़ लोग जो शेयर मार्केट में invest करते हैं, उनके अधिकारों या लाभ को प्राथमिकता देने का अवसर देगा और अनुमानित 01 लाख करोड़ की पूंजी के लिए उस संस्थान के स्वरूप के साथ छेड़छाड़ होगा जो आज तक भारत सरकार को उसकी पंचवर्षीय योजनाओं के लिए 50 लाख करोड़ रुपए से अधिक का सहयोग कर चुका है और इसके अतिरिक्त 05 करोड़ की आरंभिक पूंजी पर आजतक भारत सरकार को लगभग 28,000 करोड़ रुपए लाभांश के रूप में दे चुका है | भारत सरकार के ऋणों का 25% से अधिक का हिस्सा LIC के द्वारा ही वहन किया जाता है । विडंबना यह है कि भारत सरकार के निर्देश पर भी भारत के शेयर बाज़ार को संभालने के लिए हमेशा LIC आगे आती है और आजतक 30 लाख करोड़ से अधिक का शेयर मार्केट में निवेश करने वाले संस्थान LIC को शेयर मार्केट में लाने का प्रयास किया जा रहा है जो उसके सार्वजनिक उद्योग के स्वरूप व देशहित व राष्ट्र की अर्थव्यवस्था के विपरीत है और यह राष्ट्रनिर्माण व आधारभूत ढांचे में इसके योगदान को भी दुष्प्रभावित करेगा और यह उस कहावत को सत्य करने वाला होगा कि “ज्यादा लाभ के लिए सोने के अंडे देने वाली मुर्गी को हलाल करना” ।
LIC की स्थापना संसद के एक कानून के द्वारा 1956 में हुई थी और यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक ऐसा कदम जो पालिसीधारकों और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव डालेगा, उस पर सरकार बिना किसी व्यापक व समग्र चर्चा के आगे बढ़ रही है । आप स्वयं LIC की स्थापना से ही, तथा वर्तमान में भी, देश के  औद्योगिकीकरण, और राष्ट्र निर्माण गतिविधियों में LIC के योगदान से परिचित हैं । हम यह भी उल्लेख करना चाहते हैं कि LIC की उन्नति,  इसका विस्तार और पालिसीधारकों की संख्या और दावा भुगतान के मामले में दुनिया की सबसे बड़ी बीमा कम्पनी के रूप में उभरना , यह सब LIC ने अपने आंतरिक संसाधनों के बल पर किया है ।
1956 में  LIC के गठन के मुख्य उद्देध्य थे कि 1. जनता के पैसे की रक्षा करो एवम 2. उस पैसे को जनता के हित में लगाओ । इन दोनों ही उद्देश्यों को LIC ने अपनी 65 वर्ष की यात्रा में शानदार तरह से निभाया है और अपने लाभांश का 95% धन पालिसी धारकों को देने के बाद 32 लाख करोड़ रुपए की संपदा वाले सार्वजनिक उद्योग के रूप में इसकी विकास यात्रा किसी स्वप्न से कम नहीं है और यह संपदा विश्व के 75 देशों की GDP से ज्यादा है । LIC के IPO के माध्यम से सरकार पारदर्शिता की बात कर रही है, जबकि LIC हर महीने IRDA को रिपोर्ट सौंपती है, हर तिमाही अपने कार्य की रिपोर्ट देती है और हर वर्ष संसद में अपना लेखा-जोखा प्रस्तुत करती है, इससे ज्यादा पारदर्शिता क्या हो सकती है । इसके अतिरिक्त LIC के पास पूंजी की कोई भी कमी नहीं है, जो इसके विस्तार में बाधक हो । इन नतीजों और इन तथ्यों को देखते हुए LIC के IPO का निर्णय  अदूरदर्शी व राष्ट्र की आर्थिक प्रगति और संप्रभुता के प्रतिकूल है, अतः इस प्रस्ताव को वापस लिए जाने हेतु हम आपके सहयोग की अपेक्षा करते हैं ।
बीमा क्षेत्र में FDI की सीमा को 49% से बढ़ाकर 74% किये जाने और 74% हिस्से के मालिक विदेशी साझीदार को मालिकाना हक सौंपने के अधिकार का बजटीय प्रस्ताव देश की जनता की घरेलू बचत को विदेशी पूंजी के हांथ में सौंपने का कार्य करेगा । बीमा क्षेत्र के विस्तार व insurance Penetration के लिए FDI की सीमा को 74% किये जाने का तर्क बेमानी है, क्योंकि भारत में औसत वार्षिक प्रति व्यक्ति आय 2100$ है जो फ्रांस की 53000$ की वार्षिक प्रति व्यक्ति औसत आय के मुकाबले कुछ भी नहीं है, अतः ऐसे देशों से बीमा की पहुंच की तुलना करना बेमानी है । भारत में कुल बीमा लेने योग्य जनसंख्या एक अनुमान के मुताबिक 60 करोड़ के आस-पास है और इसमें से अकेले सार्वजनिक क्षेत्र की LIC 42 करोड़ जीवनों (समूह बीमा सहित) को जीवन बीमा की सुरक्षा देती है । छोटी बचतों को एकत्र कर उसे आधारभूत ढाँचे में दीर्घकाल निवेश के लिए पूँजी मे परिवर्तित करना तथा साथ साथ बेहतर रिटर्न के साथ पालिसीधारकों को पूर्ण सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से ही 245 निजी बीमा कंपनियों को मिलाकर राष्ट्रीयकृत जीवन बीमा उद्योग की स्थापना की गई थी और आज 74% FDI और मालिकाना हक के उपरोक्त प्रस्ताव के देश की जनता की बचत को विदेशी हांथों में सौंपने और उनके देशों में इस बचत का उपयोग   करने का रास्ता खुल जायेगा, जो राष्ट्रवाद की भावना और राष्ट्र के विकास की भावना के प्रतिकूल होगा । यह एक व्यापक एवं स्वीकार्य तथ्य है कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं में घरेलू बचतें महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं और विदेशी पूँजी घरेलू बचतों का क्षीण विकल्प  है ।  जब देश को विकास के लिए भारी संसाधनों की जरूरत है,  यह आवश्यक है कि आंतरिक, विशेषकर घरेलू बचतों पर सरकार नियंत्रण रखे ।
अतः  सरकारी पूँजी का एक हिस्सा बेचने ( LIC- IPO) का हमारा विरोध और बीमा क्षेत्र में FDI की सीमा बढ़ाकर मालिकाना हक विदेशी हांथों में दिए जाने के प्रस्तावों का विरोध किसी अन्यत्र स्वार्थ से प्रेरित न होकर देश की अर्थव्यवस्था व राष्ट्रहित व आत्मनिर्भर भारत के सिद्धांतों पर आधारित है  ।
धन्यवाद!
भवदीय
आर डी आनंद
मंडल अध्यक्ष
बीमा कर्मचारी संघ फैज़ाबाद डिवीजन
अयोध्या

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