ब्राह्मणवादी-सामंती संस्कृति के रक्षक कौनः जातिवाद के समूल नाश की पूर्व शर्त है पूँजीवाद का खात्मा

0
546

रंगभेद तथा ब्राह्मणवादी- सामंती संस्कृति के रक्षक कौन?
अमेरिका में रंगभेद के खिलाफ जारी संघर्ष अमेरिकी साम्राज्यवाद तथा वित्त पूंजी द्वारा पोषित संस्कृति तथा राजनीति के खिलाफ है. भारत का ब्राह्मणवाद तथा सामंती संस्कृति, जो हर तरह के जातीय उत्पीड़न,अलगाव और उपेक्षा के द्वारा मेहनतकश समाज का शोषण तथा उत्पीड़न करता है, वित्त पूंजी के सहयोग से फल-फूल रही पूंजी द्वारा ही पोषित है. पूरी दुनिया में साम्राज्यवाद तथा पूंजीवाद तमाम तरह की प्रतिक्रियावादी विचारों, परंपराओं, मानसिकता को बढ़ावा दे रहा है, जो व्यापक मेहनतकश आबादी को प्रताड़ित व कुंठित करने में, उनके मनोबल को तोड़ने में सहयोगी होता है.
दो वर्ष पहले अफ्रीकी मूल के नागरिक की पुलिस द्वारा हत्या के खिलाफ अमेरिका में उठा तूफान वित्त पूंजी तथा साम्राज्यवाद की ऐसी ही साजिशों के खिलाफ एक ऐतिहासिक संघर्ष था. वह संघर्ष, अमेरिकी कुलीन वर्गों के द्वारा वित्त पूंजी के बेशुमार मुनाफे के नशे में चूर हो जिस संस्कृति को पाला गया, उसके खिलाफ विद्रोह था. इन पूंजी के मालिक कुलीनों की संस्कृति की ऐतिहासिक जड़ें दक्षिण के अतीत के गुलाम मालिकों से जुड़ी हैं. गुलामों के मालिकों का गुलामों के शरीर पर सीधे अधिकार नहीं रहा, लेकिन पूंजी के मालिक के रूप में गुलाम से मजदूर बने इन अफ्रीकी अमेरिकन के श्रम पर तो उनका अधिकार है ही. ये जो गोरे पुलिस अधिकारी काले मजदूरों या जन साधारण का गला दबा रहे हैं, वे वित्त पूंजी के द्वारा इन अफ्रीकी अमेरिकी मजदूरों की श्रम -शक्ति या मेहनत के दूसरे तरीकों से पैदा किए धन पर ही पलते हैं. इस लड़ाई की विशेषता थी कि इसमें काले लोगों के साथ गोरे लोग भी बराबर के भागीदार बनें. यह गोरी आबादी सिर्फ न्याय की भावना से ही सड़क पर नहीं थी, यह मेहनतकश आबादी यह समझने लगी है कि यह हमला मेहनत करके जीने वाले आम अमेरिकी नागरिकों के ऊपर है. यह व्यापक एकता यूं ही नहीं बनी थी. यह एकता पिछले दशकों में वित्त पूंजी के मानव द्रोही चरित्र के नंगा होने का परिणाम है. अमेरिका से आगे यूरोप के आम लोग भी सड़कों पर आते रहे हैं. सामाजिक तथा राजनीतिक अंतर्विरोध यूरोप में भी अमेरिका की ही तरह तीव्र हो रहा है. पूंजीवादी देशों के आमलोग पूंजी के विश्वव्यापी मानव द्रोही करतूतों के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं. पूरी दुनिया के आम लोग धीरे-धीरे ही सही, वित्त पूंजी के करतूतों को समझने लगे हैं. वर्तमान में जारी युद्ध राष्ट्रवाद की आड़ में साधे जा रहे पूंजी के हितों को जल्द ही नंगा कर देगा। वे मुट्ठी भर कुलीन आबादी की आर्थिक सामाजिक तथा सांस्कृतिक जीवन शैली के खिलाफ उठ खड़े होंगे. यह लड़ाई अलग-अलग स्वरूपों में, अलग-अलग दिशाओं में, अलग-अलग देशों में, अलग-अलग वर्गों व समुदायों के द्वारा शुरू हो रही है. ये एक दूसरे से मिलेंगे, एक दूसरे से सीखेंगे, एक दूसरे की ताकत बनेंगे. ऐसे में हमें इसका स्पष्ट संज्ञान होना चाहिए कि हमारी सारी लड़ाइयां वित्त पूंजी द्वारा पोषित विश्वव्यापी जो अर्थव्यवस्था है, जो इसकी संस्थाएं हैं उसकी तरफ मुखातिब होनी चाहिये. इन्हें ढाहे बगैर कोई भी देश या वर्ग नया समाज नहीं बना पाएगा. जब तक यह मौजूद है, तब तक यह नई संस्कृति, नए मानव मूल्य, नई परंपराओं का निर्माण नहीं होने देगी.
भारत में मौजूद ब्राह्मणवादी- सामंती संस्कृति को पूंजी के मालिकों के द्वारा और मजबूती के द्वारा पाला पोसा जा रहा है. अब इसका विस्तार कल के प्रताड़ित दलित तथा पिछड़ी जातियों के धनिकों के बीच भी हो रहा है. ये ब्राह्मणवादियों से मान्यता प्राप्त करने के लिए उनका हमराही बनकर गरीब मेहनतकशों की उपेक्षा करते हैं. वे ब्राह्मणवादी ताकतों को गला लगाने के लिए लालायित रहते हैं .
अब तक वित्त पूंजी के ट्रिकल डाउन थ्योरी के तहत जो बूंदें टपक रही थीं (या टपक रही है), उससे यहां की ऊंची जातियों की गरीब आबादी भी मध्यवर्गीय जीवन जीने का स्वप्न देखने लगी थी. उसके जीवन में कुछ तरक्की भी हुई है. इसके कारण उसमें भी ब्राह्मणवादी संस्कृति मजबूत हो रही है, लेकिन कोरोना और मोदी सरकार के द्वारा छोटे उत्पादकों को तबाह कर अर्थव्यवस्था में जो भूचाल लाया गया उसने सबों को एक ही घाट पर लाकर खड़ा कर दिया है. यह उनके अंदर अपने प्रतिक्रियावादी विचारों के खिलाफ सोचने के लिए अनुकूल अवसर प्रदान करेगा.
इस प्रतिक्रियावादी दमघोटू संस्कृति से निकलने के लिए हमें, शुरुआत चाहे कहीं से भी हो, वित्त पूंजी द्वारा पोषित पूंजीवाद को लक्ष्य करना होगा. कोरोना संकट तथा यूरोप में जारी साम्राज्यवादी युद्ध ने हमें सच को नजदीक से देखने का मौका दिया है. हमें वित्त पूंजी के आर्थिक तथा राजनीतिक क्षेत्र के कुकृत्यों के साथ-साथ सांस्कृतिक क्षेत्र की साजिशों का भी पर्दाफाश करना होगा, तभी हम ब्राह्मणवाद तथा इस दमघोंटू वातावरण से देश तथा समाज को मुक्त कर पाएंगे और स्वच्छ हवा में सांस लेने के लिए नए समाज में बराबरी और अपनापन की संस्कृति को विकसित कर मानव मूल्यों को स्थापित कर पाएंगे.
नरेंद्र कुमार

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here