चीन में बुर्जुआ जनतंत्र जैसा कुछ संभव नहीं, पूँजीवादी पथगामियों के विरुद्ध समाजवादी क्रांति ही एकमात्र विकल्प

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चीन के शिंजियांग में 25 नवंबर को एक बिल्डिंग में आग लगने से 10 लोगों की मौत हो गयी, लोगों का कहना है कि लॉकडाउन की वजह से राहत समय पर नहीं पहुंच पाने की वजह से ये मौतें हुई। सरकार की सख़्त व तानाशाही पूर्ण लॉकडाउन नीति के ख़िलाफ़ लम्बे समय से पनपा हुआ आक्रोश इस घटना से सड़कों पर फूट पड़ा।

देखते ही देखते जनता का यह आक्रोश देश के कई शहरों में जन प्रदर्शनों के रूप में फैल गया। अब निशाने पर केवल लॉकडाउन नहीं रहा बल्कि प्रदर्शनकारियों ने कहा- हमें फ्रीडम ऑफ प्रेस, फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन, फ्रीडम ऑफ मूवमेंट चाहिए। हमें हमारी आजादी दो। लोग राष्ट्रपति शी जिनपिंग से इस्तीफे की मांग भी कर रहे हैं।

प्रदर्शनों का यह सिलसिला राजधानी बीजिंग से शुरू हुआ और लॉन्चो, शियान, चोंगकिंग, वुहान, झेंगझोऊ, कोरला, होटन, ल्हासा, उरुमकी, शंघाई, नानजिंग, शिजियाझुआंग समेत कुल 13 शहरों में पहुंच गया। यहां पिछले तीन दिनों से लोग सरकार के खिलाफ नारेबाजी कर रहे हैं। पुलिस इन्हें रोकने के लिए लाठीचार्ज से लेकर लोगों को गिरफ्तार तक कर रही है, लेकिन लोगों का गुस्सा खत्म नहीं हो रहा है। दिन ही नहीं रातभर भी लोग सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं।

चीन में मीडिया का गला किस तरह से घोंटा है इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इतने विशाल जन प्रदर्शनों के फूट पड़ने के बावजूद चीनी मीडिया इस विरोध प्रदर्शन को लेकर चुप है। वहां विरोध से जुड़ी कोई खबरें नहीं दिखाई जा रही हैं। उल्टा चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स में एक आर्टिकल पब्लिश हुआ है, जिसमें ये कहा गया है कि वेस्टर्न मीडिया जीरो कोविड पॉलिसी से जुड़े इस मामले को हवा दे रहा है। वह अभी भी सरकारी नीति को इसके लिये ज़िम्मेदार नहीं मानता है।

चीन की तानाशाह राजसत्ता न केवल कोविड के ख़िलाफ़ जीरो टॉलरेंस पॉलिसी अपनायी हुई है बल्कि कई दशकों से जनविरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ बोलने, प्रेस की आज़ादी, विरोध प्रदर्शन करने, यूनियन बनाने के अधिकार आदि के ख़िलाफ़ भी उसकी जीरो टॉलरेंस पॉलिसी सख़्ती से लागू रही है।

इन प्रदर्शनों के शुरू होते ही यूनिवर्सिटी के छात्रों, फैक्ट्री मजदूरों से लेकर आम नागरिक तक इन विरोध प्रदर्शनों में शामिल हो गये हैं। हालांकि इस तरह के विरोध प्रदर्शन के दृश्य चीन में आम नहीं हैं। यहां पर सरकार और राष्ट्रपति की आलोचना करना मतलब अपने आप को जोखिम में डालना होता है। लेकिन इस ख़तरे के बावजूद लोगों का बढ़ता विरोध प्रदर्शन दिखा रहा है कि अब लोग अपनी जान की बाज़ी लगाकर तानाशाही के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रहे हैं।

ग़ौरतलब है कि यह वही चीन है जहाँ के लोगों ने कई विदेशी सत्ताओं व अपने देश के क्रूर सामन्ती सत्ता के ख़िलाफ़ दशकों तक शानदार संघर्ष कर अपने देश को न केवल उन देशी-विदेशी लुटेरों के चंगुल से मुक्त किया बल्कि वहाँ पर नवजनवादी सत्ता स्थापित की। उसे समाजवाद की मंज़िल तक ले गये, महान सर्वहारा क्रांति के माध्यम से जन-जन को पूँजीवादी संस्कृति, पूँजीवादी राजनीति, पूँजीवादी मूल्यों व पूँजीवादी पथगामियों के ख़िलाफ़ तैयार करने का अद्भुत प्रयोग किया। इस क्रान्ति के बदौलत चीन से बेरोज़गारी, अशिक्षा, वेश्यावर्ती, भ्रष्टाचार जैसी बीमारियाँ ख़त्म कर दी गयी थी। सभी उपक्रमों, संसाधनों पर जनता का मालिकाना क़ायम हो गया था, इंसान द्वारा इंसान का शोषण किये जाने को प्रतिबंधित कर दिया गया। इन क्रान्तिकारी बदलावों के परिणामस्वरूप अफ़ीमचियों का देश कहा जाने वाला चीन दो दशकों में ही एक महान देश के रूप में उभरने लगा।

लेकिन अंततः पूँजीवादी पथगामियों ने जनता से ग़द्दारी कर, समाजवाद को सुदृढ़ करने के नाम पर, 1976 में वहाँ पूँजीवादी सत्ता पुनर्स्थापित कर दी। इसके साथ ही जनता की आवाज को दबाने के लिये दमन व तानाशाही का इस्तेमाल किया। धीरे-धीरे जनता के सारे अधिकार छीन लिये गये, पूँजीपतियों को लूटने की खुली छूट दे दी।

चीन की क्रान्तिकारी जनता संघर्षों के अपने गौरवशाली इतिहास से प्रेरणा लेकर नयी सदी के महान जन आन्दोलन फिर से खड़ी करेगी। शी जिन पिंग व उसकी सत्ता कितना भी इन संघर्षों का दमन करने की कोशिश करे पर ये संघर्ष नये-नये रूप में उठते रहेंगे। अंततः चीनी जनता लाल झण्डे के आड़ में छुपे इन पूँजीवादियों को फिर से इतिहास के गर्त में धकेल देगी, एक सच्चा समाजवादी समाज फिर से स्थापित करेगी। आज के इन विरोध प्रदर्शनों में भविष्य की क्रान्ति छुपी हुई है।
मुझे लगता है कि चीन में आज जो स्थिति है उसमें अगर पूँजीवादी लोकतंत्र स्थापित करने की माँग भी बनती है तो भी वह एक प्रगतिशील कदम होगा।
आज चीन में मेहनतकश आवाम के पास उतने अधिकार व आज़ादी भी नहीं है जितने भारत के मेहमतकशों के पास है।
प्रतिपक्ष
जनवादी अधिकारों की मांग निश्चय ही समर्थन करने योग्य है। पर बुर्जुआ जनतंत्र जैसा कुछ क्या मुमकिन है? वास्तविकता यही है कि जो भी बुर्जुआ विकल्प होगा, वह और अधिक दक्षिणपंथी व अधिनायकवादी ही होगा।

—धर्मेन्द्र आज़ाद

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