पुस्तक समीक्षाः लालगढ़ एंड दि लीजेंड ऑफ किशनजी

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“LALGARH AND THE LEGEND OF KISHANJI” By Snigdhendu Bhattacharya

यह किताब पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों में 2009 में चल रही जनताना सरकार तथा लालगढ़ की जनता के संघर्षों पर आधारित विस्तृत रपोर्ट है।
किताब लेखक के ज़ीरो ग्राउंड रिपोर्टिंग पर आधारित है।
किताब पढ़कर Pulishi Santrash Birodhi janasadharoner Committee (PCAPA) जो कि 8 नवंबर 2008 में बना था और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) का मॉस ऑर्गनॉइजेशन था उसके सदस्यों जिनकी प्रतिदिन की आय 5रु से भी कम थी (जनताना सरकार के प्रभाव से पहले) उनके संघर्ष और शहादत के बारे में पता चलता है।
किताब पढ़कर समझ बनती है कि –
आर्थिक रूप से जंगलमहल बंगाल के सबसे पिछडों हिस्सों में से एक था। बेरोजगारी, गरीबी ,अशिक्षा और भूखमरी बड़े पैमाने पर हो रही थी तथा अधिकांश परिवारों में प्रतिदिन की आय 5 – 10 रु. थी।
खेती,बटाईदारी,बबुई घास के साथ रस्सियाँ बनाना,तेंदू पत्तियों को इक्कट्ठा करना और बीड़ी बनाना आय के प्रमुख स्रोत थे।
नक्सलबाड़ी आंदोलन के बाद बंगाल में हुए भूमि सुधार के कारण आधे से अधिक लोगों के पास अपनी जमीन थी लेकिन मिट्टी की कम पानी की अवधारण क्षमता और उचित सिंचाई प्रणाली के अभाव का मतलब था कि यहाँ पर खेती केवल एक बार मानसून के दौरान ही की जा सकती थी और शेष वर्ष किसानों को कहीं और काम के लिए भटकना पड़ता था।
पंचायतों ने शायद ही इन इलाकों में कभी काम किया था,क्योंकि सीपीएम और उसके प्रमुख प्रतिद्वंद्वी, झारखंड की विभिन्न पार्टियां भ्रष्टाचार में समान रूप से संलिप्त थीं और इस वक़्त इन इलाकों में “जनताना सरकार” का उदय हो रहा था।

भारतीय राज्यसत्ता माओवादियों को विकास विरोधी का तमगा देती है लेकिन 2008 से 2009 के बीच जनताना सरकार द्वारा किये जा रहे विकास कार्यों के लिए अधिकांश श्रम स्वैच्छिक था, ग्रामीणों द्वारा धन या तो दान किया गया था या ” भ्रष्ट पर कर लगाने” के माध्यम से लेवी लिया गया था और स्थानीय ठेकेदारों से उगाही करके विकास कार्यों के लिए उपकरण और सामग्री प्राप्त की गई थी। जून 2009 से सितंबर 2009 के बीच लालगढ़,बेलापरी, सलबोनी तथा कई अन्य स्थानों पर 50 से अधिक नलकूप गाड़े गए थे तथा कई बांधों की मरम्मत की गई थी और जनताना सरकार द्वारा बनवाये जा रहे नहरों से प्रत्येक खेत में सिंचाई के लिए पानी पहुंचने की व्यवस्था की गई थी।
लालगढ़ में “जनताना सरकार” आने के बाद तीन महीनों के भीतर ही जंगलों के रास्ते से 100 किलोमीटर से अधिक कच्ची सड़कों का निर्माण किया गया था।पश्चिम बंगाल के 4 जिलों पुरुलिया,बांकुरा,पश्चिम मेदिनीपुर तथा पुर्वी मेदिनीपुर में माओवादियों के प्रभाव वाले इलाकों में जनताना सरकार द्वारा 18 स्वास्थ्य केंद्रों की स्थापना की गई थी।
लालगढ़ दो कारणों से बेहद उल्लेखनीय था:
1 – गुरिल्ला लड़ाकों का दिन- रात इलाके में घूमकर समस्या का जायजा लेना
2 – जनताना सरकार द्वारा स्थापित स्वास्थ्य केंद्रों पर प्रतिष्ठित डॉक्टरों को बुलवाकर बीमार हुए ग्रामीणों की जाँच करवाना तथा मुफ्त में दवाई वितरित करना।

केंद्र में कांग्रेस की सरकार तथा बंगाल में सीपीएम के दलाल शासक वर्गों के सरकारों ने जनताना सरकार के स्वास्थ्य केंद्रों को अस्वीकार कर दिया, लेकिन इसे बंद नहीं कर सके क्योंकि जनताना सरकार का स्वास्थ्य मॉडल लाखों स्थानीय लोगों में लोकप्रिय हो गया था।
कोलकाता,मेदनीपुर टाऊन, बर्दवान जिले के आसनसोल शहर, हावड़ा जिले के बेलूर श्रमजीवी अस्पताल और राज्य के अन्य शहरी क्षेत्रों के डॉक्टरों ने जनताना सरकार के स्वास्थ्य केंद्रों का दौरा किया था।
कोलकाता के कई छात्र,प्रोफेसर,वैज्ञानिक और बुद्धिजीवी इसे चलाने में मदद कर रहे थे।
लेखक किताब में लिखते हैं कि कोलकाता के एक डॉक्टर ने मुझसे कहा “मुझे यहां प्रेरणा मिलती है इस विद्रोह ने मुझे बेहद प्रभावित किया है हम सब समाज से ही सीखते हैं और अब हमें समाज में मदद करने की जरूरत है और यह वही है जो मैं यहाँ कर रहा हूँ”
तो फिर यह स्पष्ट हो जाता है कि राजसत्ता को माओवादियों के जनताना सरकार के मॉडल का भूत सता रहा है इसलिए दलाल शासक वर्गों और कॉरपोरेट हाउसेस की मेन स्ट्रीम मीडिया ने कभी भी लालगढ़ के जनताना सरकार के मॉडल को प्रचारित नहीं होने दिया तथा हमेशा से मीडिया ने माओवादियों को विकास विरोधी होने का तमगा दिया है।
शहीद कॉमरेड किशनजी एक ऐसा क्रांतिकारी जिसके बारे में किताब के रिव्यु में लिखना बहुत मुश्किल है जिनको दुश्मन वर्ग के नुमाइन्दे भी बेहद पसंद करते थे 2009 में किशनजी के साथ किताब के लेखक को साक्षात्कार करने का मौका मिला था लेखक ने किशन जी से सवाल किया कि “देश के कुल क्षेत्रफल में भाकपा माओवादी की उपस्थिति 20 प्रतिशत से भी कम है। भारतीय राज्य से सैन्य लड़ाई कैसे संभव है?”
किशनजी का जवाब था “वियतनाम जैसे एक छोटे से देश ने अमेरिका को युद्ध में अब तक की सबसे बुरी पराजय में से एक दिया ।” उन्होंने भविष्यवाणी की, अमेरिका को अफगानिस्तान से भी अपनी सेना को वापस लेने के लिए मजबूर किया जाएगा।

किताब पढ़कर यह स्पष्ट होता है कि भारत की तथाकथित कम्युनिस्ट पार्टी जो कि संसदीय लोकतंत्र में भरोसा रखती है भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) किस तरह से अपने हथियार बंद गिरोह ” Harmad vahini” के द्वारा पश्चिम बंगाल के माओवादियों के प्रभाव वाले इलाकों में 200 से ऊपर निर्दोष जनता की हत्या की।सीपीएम ने माओवादी प्रभाव वाले इलाकों में 5000 जॉइंट फोर्सेज की टीम भेजी तथा इलाके के स्कूलों में “harmad camp” तथा “joint forces Camp” की स्थापना की और स्कूलों को अनिश्चित काल के लिए बंद कर दिया जिसको लेकर छात्र – छात्राओं ने इलाके में एक बड़ा आंदोलन किया जिसमें कई छात्र – छात्राएं गम्भीर रूप से घायल हो गए तब जनताना सरकार ने उनके लिए रिलीफ कैम्पों की स्थापना किया और छात्र – छात्राओं के इलाज के बाद उनकी पढ़ाई सुचारू रूप से चलती रहे इसके लिए पर टेंट लगवाकर क्लासरूम की व्यवस्था की।
किताब में सीपीएम के बारे में पढ़कर कॉमरेड चारु मजूमदार द्वारा लिखे गए दस्तावेज में चारु की संशोधनवाद पर की गई टिप्पणी याद आती है “संशोधनवादी हमारे आस्तीन के साँप हैं” सीपीएम ने लालगढ़ के इलाके में यह चरितार्थ कर दिया।

2009 में लालगढ़ की जनता ने भाकपा (माओवादी) के नेतृत्व में लालगढ़ को भारत का पहला स्वतंत्र गुरिल्ला इलाका घोषित किया। लालगढ़ आंदोलन को इसी से समझा जा सकता है की उस समय चुनाव में लालगढ़ के इलाके की 100 प्रतिशत जनता ने चुनाव का बायकॉट किया था।
लालगढ़ आंदोलन के नींव पाश्चिम बंगाल के सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन के समय ही पड़ी थी और लालगढ़ के इलाके में 2009 से 2010 के बीच जनता के हाथों में सत्ता थी लेकिन आंदोलन के कुछ कमजोरियों के वजह से आंदोलन में 2010 में ढेरों परेशानियां आयीं और 24 नवंबर 2011 को किशनजी के शहादत के बाद उन इलाकों से जनताना सरकार पूरी तरह से उखड़ गई।

लालगढ़ आंदोलन की प्रमुख दिक्कतें
लालगढ़ आंदोलन में माओवादी पार्टी ने कैडरों में अत्यधिक इजाफा किया परंतु इलाके के हर स्तर की कमिटी के कैडर सैद्धान्तिक रूप से वंचित रहे तथा वो नवजनवादी क्रांति के दिशा को लेकर आगे नहीं बढ़ पाए और तृणमूल कांग्रेस का प्रभाव बढ़ने के बाद वो कैडर तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए।
लोकल कमेटी ने यह तय किया कि इस बार पार्टी चुनाव का बायकॉट नहीं करेगी और सीपीएम का पूर्ण रूप से विरोध करेगी जिससे माओवादी चुनाव में तृणमूल पार्टी के लिए ढाल बन गए और माओवादी प्रभाव वाले इलाकों में तृणमूल ने समर्थन हासिल कर लिया।
तृणमूल कांग्रेस पर अत्यधिक भरोसा ही पश्चिम बंगाल में भाकपा (मोआवादी) को अत्यंत कमजोर कर दिया।

किताब पढ़कर मुख्यतः यह बात प्रतीत होती है कि माओवादी पार्टी हर जगह है जहां लोग अपने अधिकारों, न्याय और सम्मान के लिए लड़ रहे हैं तथा यह न केवल राजसत्ता और माओवादियों के बीच युद्ध की कहानी है, बल्कि यह एक क्रूर राजव्यवस्था
तथा निर्दोष नागरिकों के बीच की भी कहानी है ।
यह पुस्तक 2009 तथा 2015 के बीच के लालगढ़ आंदोलन को समझने का प्रयत्न करती है।
हालांकि यह आंदोलन किशनजी की शहादत के साथ अचानक खत्म हो गया, लेकिन लालगढ़ एक मॉडल है, जिसकी समीक्षा की जानी चाहिए और जहां भी जरूरी हो उसे लागू किया जाना चाहिए ।

शशांक, एमए, समाजशास्त्र, काशी हिंदू विश्वविद्यालय 

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