पुस्तक समीक्षाः बजरंग बिहारी तिवारी की किताब ‘केरल में सामाजिक आंदोलन और दलित साहित्य’

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बजरंग बिहारी तिवारी की किताब ‘केरल में सामाजिक आंदोलन और दलित साहित्य’ केरल की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियाँ जातियों के मामले में और ज़्यादा जकड़बन्द हैं। वहां देखने से भी छूत लगती थी। नायर और नम्बूदरी ब्राह्मण बुरी तरह से कट्टरपंथी रहे हैं।
‘इसकी विचित्रता असमीपता, अदृश्यता और अस्पृश्यता में व्यक्त होती थी। स्पर्श से तो छूत लगती ही थी, यहां देखने भर से छूत लग जाती थी। दो भिन्न जातियों के लोग कितनी दूरी बनाकर रहेंगे। यह दूरी कदमों से नापी जाती थी।जाति पिरामिड के कंगूरे पर बैठे ब्राह्मण से ईषव को 36 कदम की दूरी बना कर रखना पड़ता था जबकि एक पुलय को ईषव जाति के व्यक्ति 48 कदम की दूरी बनाए रखनी पड़ती थी।ईषव अति पिछड़ी जाति थी तथा पुलय दलित जाति। दो दलित जातियों के मध्य छुआछूत का प्रावधान था तो दो ब्राह्मण जातियां भी दूरी बनाकर रहती थीं। यह पूरी तरह कठोर जाति मर्यादाओं से बंधा हुआ समाज था।’
किताब में अनेक महत्वपूर्ण लेख हैं। कई निष्कर्षों से असहमति हो सकती है लेकिन यह शोधपरक किताब है। जातिगत क्रूरता की जितनी जानकारी हमें महाराष्ट्र और उत्तर भारतीय समाज की है, उस तरह मुख्य रूप से केरल की तरफ की जकड़बन्दियों और आंदोलनों की जानकारी कम है। इस अर्थ में हिंदी में यह पहली किताब ही होगी शायद।
आज भी हम जाति और वर्ग के अन्तर्सम्बन्धों को समझने में पीछे हैं जबकि पूंजीवाद ने धीरे धीरे स्थितियों को एकदम स्पष्ट कर दिया है। आम्बेडकर ने अपने उत्तरवर्ती लेखन में यह देख लिया था कि विशुद्ध जातिगत अस्मिता से ज़मीनी दलित जन को कोई राह नहीं मिलेगी। यह समझना महत्वपूर्ण है कि केरल जैसे जातिगत क्रूर समाज में कम्युनिस्ट आंदोलन ने क्या लाइन ली। उत्तर भारतीय समाज मे कम्युनिस्ट पार्टियों और संगठनों ने जाति की जटिलता में प्रवेश के रास्ते वर्ग तक पहुंचने में भारी विफलता हासिल की है और संसदीय अलायन करते हुए अनेक उलझनों में इन्टरसेक्ट कर गए; वहीं केरल के शुरुआती कम्युनिस्ट संगठनों ने स्पष्टतः जाति की जटिलता को लेते हुए उसमे प्रवेश किया। रणनीति के तौर पर कांग्रेस तक का साथ दिया लेकिन समाज मे समग्रतः समानता के लिए उन्होंने वर्ग-चेतना पर हमेशा फोकस बनाए रखा।
कम्युनिस्ट विचारधारा और दलित समुदाय के अंतर्संबंध पर समझ बनाने में कुछ वामपंथी समूहों की यांत्रिक समझ और कुछ विचारकों के पूर्वाग्रहों और आंबेडकर परिनिर्वाण के बाद उभरे दलित अस्मितावाद दोनों ने नई स्थिति को जन्म दिया।महाराष्ट्र आंबेडकरी आंदोलन के महत्वपूर्ण विचारक रावसाहेब कसबे ने उत्तर आंबेडकर युगीन परिवेश पर टिप्पणी करते हुए लिखा है- ‘उस समय कम्युनिस्टों के प्रति सहानुभूति रखना अंबेडकर द्रोह की श्रेणी में आता था।’
‘यह विचार हमारे दिल और दिमाग पर हावी था कि कम्युनिस्ट और उनकी विचारधारा ‘मार्क्सवाद’ हमारे देश के दुश्मन हैं इसलिए हमारी बहसें कम्युनिस्ट विरोध बनाम मार्क्सवाद विरोध पर टिकी होती थीं। कम्युनिस्ट विरोध हमारे लिए अंतिम सत्य था।’
जातिगत पेशों और जकड़बन्द संरचना को तोड़ने और लिबरलाइज़ करने में निश्चित रूप से पूंजीवाद ने भूमिका अदा की है। इस ऐतिहासिक भूमिका को कोई भी मार्क्सवादी नहीं नकारता। सामंतवाद और पूंजीवाद के रिश्तों पर जितनी निर्णायक प्रखरता से मार्क्सवादी विचारधारा समझ रखती है; उस तरह अस्मितावादी चिंतक भी कम रखते हैं। अलग बात है कि मार्क्सवादी विश्लेषण पद्धति द्वंद्वात्मक/ऐतिहासिक भौतिकवादी समझ की क्या प्रैक्टिस हमारे पास है। अक्सर तो प्रतिक्रियावादियों की तरह ही अस्मितावादी चिंतक अपनी पुरानी प्रथाओं और आदिम संस्कृति को ग्लैमराइज करते हुए इतिहास को पीछे ले जाते हैं जो सम्भव ही नहीं या विराट पूंजीवाद में ही अपना असल विकास देख लेते हैं।
नम्बूदरीपाद लिखते हैं-‘ नई पूंजीवादी विकास में सबसे ज्यादा अनुसूचित जातियों को दुष्प्रभावित किया है। वह पहले से सामाजिक सोपान क्रम में निम्नतम थे। पूंजीवाद ने भी उन्हें ज्यादातर नजरअंदाज किया।इस जाति समूह में भूस्वामी पूंजीपति का होना, अकल्पनीय है। पेशेवर और उद्यमी और सरकारी नौकरी भी नगण्य संख्या में है। ऊंची जाति से उनकी तुलना क्या की जाए जबकि यह पिछड़ी जातियों से भी बहुत पीछे हैं।’
केरल के अनेक आंदोलनों के ब्यौरेवार वर्णन से गुज़रती यह किताब बताती है कि मलयाली किस अवस्था जातिगत ढांचे में प्रवेश करके कांग्रेस और सोशलिज़्म का रास्ता पार करते हुए कम्युनिज़्म तक पहुंचे। एक ऐसा समाज जो पदानुक्रम में सबसे निचली अवस्था मे बर्बर व्यवस्था में जीने को मजबूर था उसके लिए राष्ट्रवाद और वर्ग संघर्ष कोई मायने नहीं रखता था अतः यहां कम्युनिस्टों ने इन दोनों अवस्थाओं को पीछे रखकर ख़ुद को जाति शोषण के ख़िलाफ़ लामबंद किया।
इसी किताब के हवाले से रॉबिन जेफ्री एक निबन्ध में लिखते हैं-
‘केरल में मार्क्सवाद को सफलता मिलने की एक बड़ी वजह जाति-व्यवस्था के मूल्यों को तोड़ने में उसकी भूमिका की है।’
राष्ट्रीय स्तर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी गांधीवाद के ज़्यादा नज़दीक थी लेकिन केरल ने उसका मुख मार्क्सवाद की ओर रखा।फिर भी एक स्थिति के बाद केरल कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी ने गांधीवादी कांग्रेस पार्टी की तल्ख़ आलोचना रखी।
‘गर्मी सर्दी बारिश में दिन-रात कमर तोड़ मेहनत करने वाले किसान और कारखानों में आग और धुएं के बीच जूझते श्रमिक असली जन हैं।इन किसानों और मजदूरों का अधिकार वंचित दलित जनों का राज कायम करना हमारा मकसद है। आर्थिक स्वतंत्रता को नजरअंदाज करने वाली राजनीतिक आजादी अस्वीकार्य है। राजनीतिक आजादी का आधार आर्थिक स्वतंत्रता ही हो सकती है।’यह 1935 के समय की बात है जब कांग्रेस के साथ रहना एक व्यावहारिक राह थी जिसमे ज़ाहिर तौर पर अलगाव कर लिया गया।
आगे चलकर स्थिति और स्पष्ट होती गयी।शुरू में बदलाव के लिए मंदिर प्रवेश आदि का आधार लेते हुए वाम आंदोलन ने ‘नायरशाही हो बर्बाद’ और ‘ब्राह्मणशाही हो बर्बाद’ जैसे नारे ‘पूंजीवाद मुर्दाबाद’ में बदल गए। यह स्पष्ट होता गया कि ब्राह्मणवाद दरअसल अब किसकी गोद में पालित/पोषित हो रहा है। ग़रीब पिछड़े ईषव जाति सम्पन्न ईषव जातियों की अपेक्षा वर्ग-चेतस ज़्यादा थे। वे ही सर्वाधिक संख्या में वाम की ओर आए।
इस तरह केरल में वामपंथ ने पहले सोपान में जाति संरचना को तोड़ने में सामाजिक सुधार के रास्ते आया। आगे चलकर लगातार संवाद, संघर्ष और भौतिक परिस्थितियों ने उच्च और दलित जातियों के बीच साझा एका वाम ने निर्मित की। युवा मार्क्सवादी के पी गोपालन तिया जाति के थे। उन्होंने रात्रिकालीन स्कूल चलाने से लेकर, मज़दूर यूनियन और टाइल मज़दूरों की बड़ी हड़तालों में मुख्य भूमिका निभाई।के दामोदरन आदि ने सफाई कामगारों, बीड़ी बनाने वालों, जुलाहों, छाता बनाने वालों और बिजली मज़दूरों की बड़ी हड़तालें कर काम को आगे बढ़ाया।
ज़मीन पर काम करने से कार्यकर्ताओं को असल परिस्थिति को निकट से देखने का मौका मिला। उम्मीद बनी तो घोर निराशाएं भी आईं। खेतिहर मजदूर और किसानों के बीच काम करते हुए कम्युनिस्ट आंदोलनकारियों के बीच जाति के अनेक बारीक ढांचे टूटे। उच्च वर्गीय कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं के साथ दलित समुदाय को जुड़ने में अनेक दिक्कतें और हिचक हुई लेकिन धरातल पर काम और संवाद ने यह दूरी बहुत कम कर दी।
इस बीच साहित्य और कला के रूपांतरण ने भी अपना काम किया।तोप्पील भासी के नाटक में एक संवाद आता है-
‘तुमने मुझे कम्युनिस्ट बनाया!
मैथ्यू जवाब देता है-‘हमने नहीं, तुम्हारे अनुभवों ने तुम्हे कम्युनिस्ट बनाया है।’
तत्कलीन कांग्रेस सरकार के दबाव में इस नाटक को प्रतिबंधित कर दिया गया।’गटर से’ और ‘पट्टा बाकी'(लगान बाकी) जैसे नाटक भी लिखे गए।

किताब में बहुत से तथ्य रखे गए हैं जिससे जाति और वर्ग की जटिलता को समझने में मदद मिलती है। केरल की पहली कम्युनिस्ट सरकार के काम के तरीकों से वहां की सवर्ण नायर जनता इतनी क्रुद्ध हुई कि सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए तिहरा गठबंधन यानी ट्रिपल अलायंस बना जिसे ‘हरिजन विरोधी मंच’ कहा गया।

डॉ. वंदना चौबे

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