हमें शासन-तंत्र को जीतने और बिलकिस बानो को हारने नहीं देना है!!!

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3 मार्च 2002 का दिन था, जब 5 महीने की गर्भवती बिलकिस बानो के घर पर गुजरात सरकार द्वारा प्रायोजित हिंदुत्व के मज़हबी नशे में मदहोश, हिन्दू कट्टरपंथी दरिंदों ने हमला बोला था. उनके सामने उनके परिवार के 15 सदस्यों को बेरहमी से काट डाला. उनके जिगर के टुकड़े, 3 वर्ष की मासूम बच्ची को वहशी दरिंदों ने ज़मीन पर पटक कर मार डाला. उन्हें, लेकिन, मौत से भी भयानक सज़ा दी गई. जाने कितने लम्पटों ने उनके शरीर को नोचा, रौंदा. उसके बाद भी वे अगले ही दिन रिपोर्ट लिखाने थाने पहुँचीं. कुछ ‘मर्द’ महिलाओं को कमज़ोर बताते हैं!!! जैसा कि शासन का हुक्म था, थानेदार ने अनमने ढंग से रिपोर्ट लिखी. उनके साथ सामूहिक बलात्कार हुआ, ये पुलिस ने माना ही नहीं, लेकिन घर में लाशें पड़ी थीं इसलिए 15 नहीं, सिर्फ़ 7 लोगों के क़त्ल की रिपोर्ट लिखनी पड़ी. मुक़दमा चला और फैसला अभूतपूर्व रूप से जल्दी, मतलब जनवरी 2003 में ही आ गया. अदालत ने ‘न्याय’ करते हुए सभी हत्यारों-बलात्कारियों को बा-इज्ज़त बरी कर दिया. समाज में उस वक़्त तक मौजूद इंसाफ पसंद लोगों से सहन नहीं हुआ और वे अनेक लोग व संगठन तथा साथ ही राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग जो उस वक़्त जिंदा था, बहादुर बिलकिस बानो के साथ आए और सुप्रीम कोर्ट पहुंचे. उस वक़्त तक सुप्रीम कोर्ट का भी ‘राष्ट्रवादिकरण’ नहीं हुआ था. मामला सुनवाई तक पहुंचा और अदालत ने देखा कि गुजरात में हिन्दुत्ववादी दरिन्दे, पुलिस और अदालतें सभी मिले हुए हैं. इसलिए ना सिर्फ़ उस मामले को खोला गया और सुनवाई मुंबई में होने का हुक्म सुनाया, बल्कि उस जैसी दरिंदगी के अनेकों मामलों को वहाँ ट्रान्सफर किया. उस सुनवाई के दौरान भी गुजरात पुलिस उन पर लगातार दमन करती रही. रात में 12 बजे भी बगैर किसी इत्तेला के उन्हें जगाया जाता था और बोला जाता था कि ‘आपके साथ हुए बलात्कार को ‘रि-कृएट’ किया जाना है, आप उसी जगह चलिए, और उसी तरह लेट जाइये और बताइए आपके साथ बलात्कारियों ने क्या-क्या और कैसे-कैसे किया.’ वे गईं और बार-बार बताया. कुछ ‘मर्द’ औरतों को कमजोर बताते हैं. अपराधियों को आजीवन कारावास की सज़ा हुई, लेकिन उस वक़्त गुजरात की फ़िज़ा ज़हरीली हो चुकी थी, जैसे इस वक़्त पूरे देश की हो चुकी है. उन नृशंस हत्यारों को मिलने वाली पेरोल की दास्ताँ को पढेंगे तो पता चलेगा, कि उन्हें साल में कई-कई बार, किसी ना किसी बहाने से पेरोल पर छोड़ा गया, और हर बार उन्होंने बिलकिस बानो और उनके परिवार को अंजाम भुगतने की चेतावनी दी, लेकिन वे अपने रास्ते से नहीं डिगीं, लड़ती गईं, लेकिन आखिर में शासन तंत्र जीत गया और बिलकिस बानो हार गईं.

बिलकिस बानो की हार के लिए हम सब ज़िम्मेदार हैं. गुजरात में हुए मुस्लिम नरसंहार और उनके ऊपर हुई बे-इन्तेहा हैवानियत पर क्या हम कभी फेसबुक पर निंदा करने से आगे बढे, सडकों पर उतरे? नहीं उतरे. क्या आज उतर रहे हैं? नहीं उतर रहे. एक बात जान लीजिए, आज के सत्ताधीश चाहते हैं, कि कोई भी मसला हो, कितना भी संगीन हो, करोड़ों के जीवन-मरण का क्यों ना हो; लोग उसे सुप्रीम कोर्ट के ऊपर छोड़ दें और भूल जाएँ. सर्वोच्च अदालत अपने आप सर्वोच्च न्याय कर देगी!! सुप्रीम कोर्ट में भी लड़ना पड़ेगा, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के बाहर उससे भी ताक़त से लड़ना पड़ेगा. बाहर सडकों पर लड़ने से चूक गए तो एक-एक कर हम सब बिलकिस बानो की तरह हारते जाएँगे और फासिस्ट जीतते जाएँगे. ‘राष्ट्रीय’ फासिस्ट, सुप्रीम कोर्ट को बंद नहीं करने वाले, वे उसे अपना ‘अभिन्न’ अंग बनाने की प्रक्रिया मुकम्मल करने वाले हैं.
बहादुर बिलकिस बानो के संघर्षों को सलाम.
सत्यवीर सिंह

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