भाषा और भारत

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समर्थन है कि हिंदी भारतीयता का पर्यायवाची नहीं हो सकती! सीआईएसएफ ने बाकायदा ऐसी टिप्पणी को ख़ारिज कर पीड़िता(?) से खेद भी जताया और मामले की जांच के आदेश दे दिए।लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती; सवाल धन जिज्ञासाएं  और भी हैं, जो मेरे जैसे सामान्य सरल और सीधे व्यक्ति के मन में अनायास ही उठ सकती हैं। क्या मोहतरमा कनिमोझी को सीआईएसएफ के एक छोटे से अफसर की इस टिप्पणी को वाकई इतना बड़ा इशू बनाने की ज़रूरत थी? वह एक राजनेता होने के साथ-साथ एक संवेदनशील लेखिका भी हैं। अंग्रेजी जानने वाले बताते हैं कि उन्होंने अंग्रेजी में कुछ महत्वपूर्ण किताबें भी लिखी हैं। वह एक गंभीर अध्येता भी मानी जाती हैं। तब निश्चित रूप से उन्हें भारतीय भाषाओं के भारतीयता के साथ अंतः संबंधों की न केवल जानकारी होगी, बल्कि उनसे एक स्वाभाविक लगाव या आकर्षण भी होगा। आखिर एक लेखिका और अध्येता से ज्यादा भाषाओं के प्रति आत्मीयता और आदर किसके दिल में हो सकता है? उन्हें हिंदी के सार्वदैशिक प्रसार के साथ साथ यह भी जानकारी होगी कि कैसे हिन्दी ने भिन्न भिन्न भाषायी क्षेत्रों  के बीच सदियों तलक सेतु का काम करके भारतीयता को रूपाकार देने में केन्द्रीय भूमिका निभाई।
जो भाषा कमोवेश तमाम मुल्क में बोली और समझी जाती हो उसे अगर एक सामान्य धारणा रखने वाले व्यक्ति ने भारतीयता से जोड़कर देख लिया तो भले ही यह पूर्णत सही न भी हो; इतना जघन्य अपराध भी तो नहीं है, जिसके लिए आसमान सिर पर उठा लिया जाए और यह राष्ट्रीय समाचार बना दिया जाए। कम से कम मोहतरमा के तकरीबन 6 माह के जेल-प्रवास की तुलना में उस बेचारे का अपराध मुंह दिखाने लायक भी नहीं है।
गले तक भ्रष्टाचार के कीचड़ में डूबा व्यक्ति जब संस्कृति और सभ्यता के मसले पर मर्माहत होता है और उसे मुद्दा बनाता है तो बस नन्हीं लाल चुन्नी की नानी का फोटो ही याद आता है।
भाषाई आधार पर फैले पागलपन को गए आधी सदी से ज्यादा वक्त बीत गया है, लेकिन सियासतदान हैं कि गड़े मुर्दे उखाड़ने से बाज नहीं आते। ऐसे में धूमिल बार-बार याद आएं तो कोई अचरज नहीं-
”चंद चालाक लोगों ने
भूख की जगह भाषा को रख दिया है!
वो जानते हैं कि
भूख से भागा हुआ आदमी
भाषा की ओर जाएगा!
उन्होंने समझ लिया है-
एक भुक्खड़ जब गुस्सा करेगा
अपनी ही उंगलियां चबाएगा!”
और अंत में ये  कि वह कैसा सांस्कृतिक विवेक है जो तमिल सहित तमाम भारतीय भाषाओं की सदियों की सहचरी हिंदी का नाम सुनते ही बौखला उठता है; मगर अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ियत सर झुका कर भरी-पूरी मुस्कान के साथ तस्लीम कर लेता है?
मुझे तो लगता है यहां पर आकर विवेक और अविवेक की बीच की सीमा रेखा ही धुँधला उठती है!
                                                                                                     
                                                                                                         ©️राहुल मिश्रा,
                                                                                      विकास कॉलोनी, चिरगाँव (झाँसी)

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