सरकार और उसके विश्वविद्यालयी नुमाइंदे नहीं चाहते कि इस मुल्क का युवा पढ़े-लिखे – भगत सिंह छात्र मोर्चा 

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वाराणसी  : 26 नवम्बर को बीएचयू के मुख्य द्वार पर भारत सरकार द्वारा लाये गये आत्महंता कानूनों- तीन किसान कानून, मजदूर कानून एवं विश्वविद्यालय को अनिश्चित कालीन बंद रखने के विरोध में भगत सिंह छात्र मोर्चा के आह्वान पर एक विरोध सभा का आयोजन किया गया एवं विरोध मार्च निकाला गया। यहाँ पर लोग मुख्य रूप से हरियाणा एवं पंजाब के किसान आंदोलन के साथ बीएचयू की एकजुटता दिखाने के मक़सद से इकट्ठा हुए।  सनद रहे कि 26 नवम्बर को ही संविधान दिवस भी मनाया जाता है। वक्ताओं ने अपने संबोधन में पूरे देश के संसाधनों का तेजी से कुछेक घरानों के हाथों में सौंपे जाने के विरोध में अपनी एकजुटता एवं लंबी लड़ाई का संकल्प दुहराया।
 
भगत सिंह छात्र मोर्चा के नीतीश ने संचालन करते हुए आलू, प्याज, दाल जैसी आवश्यक वस्तुओं के कालाबाजारी को क़ानूनी मान्यता देने के सरकारी कानून की निंदा किया। उन्होंने विश्वविद्यालय को लगातार बंद रखे जाने के पीछे का कारण बताया कि सरकार और उसके विश्वविद्यालयी नुमाइंदे नहीं चाहते कि इस मुल्क का युवा पढ़े-लिखे। इसके लिए नई शिक्षा नीति सहित अनिश्चित काल के लिए बिना किसी ठोस कारण के लाइब्रेरी एवं विश्व्विद्यालय को बंद कर दिया है। परिवर्तन कामी विद्यार्थी मोर्चा के प्रवीण नाथ यादव ने अपने गहरे तर्कों एवं तीखे तेवर के साथ बताया कि अम्बानी-अडानी के इशारे एवं कृपा से नरेंद्र मोदी की सरकार इस भारत के किसानों, मजूरों एवं इन परिवारों से आने वाले विद्यार्थियों की सांस्थानिक रूप से मानसिक हत्या करके मुल्क़ में अपना एकक्षत्र राज चलाना चाहती है।
कौन बनाया हिंदुस्तान-भारत के मजदूर किसान, अडानी अम्बानी की ये सरकार-नहीं चलेगी चलेगी, किसान मजदूर छात्र विरोधी ये सरकार-नहीं चलेगी नहीं चलेगी, देश विरोधी ये सरकार-नहीं चलेगी नहीं चलेगी, किसान विरोधी बिल-वापस लो, मजदूर विरोधी बिल-वापस लो, विश्वविद्यालय खोलो, जो ज़मीन को जोते बोवे- वो ज़मीन का मालिक होवे, जमीन हमारी आपकी-नहीं किसी के बाप की, न धर्म का न साइंस का- मोदी है रिलायंस का आदि स्लोगन लिखे पोस्टर लेकर प्रदर्शन किया। विरोध सभा को चन्दन सागर, शुभम अहाके आदि ने भी संबोधित किया। विरोध सभा एवं प्रतिरोध मार्च में अनुपम, बेबी, बन्दना भगत, शुभम, रत्नेश, अर्जुन, आशुतोष, अजीत, ईश्वर सिंह, विनय आदि विश्वविद्यालय एवं नागरिक समाज के लोगों ने अपनी सहभागिता सुनिश्चित किया।

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