ईश्वर में विश्वास करने वाला हर व्यक्ति मूलतः भाग्यवादी होता है

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भगत सिंह जब “मैं नास्तिक क्यों हूँ“ लिख रहे थे, उस समय वे युवा थे और सामाजिक मनोविज्ञान के बहुत सारे पहलुओं से अनभिज्ञ होते हुए भी सच के क़रीब थे.

दरअसल, मैं इस विषय पर बहुत दिनों से लिखना चाह रहा था, लेकिन, आज अरविंद केजरीवाल के साक्षात्कार में कही गई बातों ने catalyst का काम कर गया.

निष्पक्ष हो कर सोचा जाए तो भारत की मौजूदा राजनीतिक स्थिति और सोच, मोदी और केजरीवाल जैसे घटिया नेता ही तैयार कर सकते हैं.

क्या कारण है कि एक entire political science में कथित परास्नातक और एक IITian एक ही बौद्धिक धरातल पर नज़र आते हैं?

क्या यह महज़ संयोग है या चुनावी राजनीति की मजबूरी या सिर्फ़ सत्ता का ख़ालिस लोभ ?

कहीं ऐसा तो नहीं कि “जो दिखता है वो बिकता है“ की तर्ज़ पर राजनीतिक परिदृश्य सिर्फ़ एक तमाशे में बदल गया है जिसमें holier than thou दिखाने की एक अस्वस्थ प्रतियोगिता चल रही है?

मुद्दे मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, धार्मिक स्थलों और धार्मिक अनुष्ठानों से इर्द-गिर्द घूमती नज़र आती है.

एक धर्मनिरपेक्ष देश के नागरिकों के साथ इतना बड़ा धोखा और प्रपंच शायद इतिहास में पहली बार हो रहा है और जनता असहाय सी तमाशबीन बनी हुई है!

दरअसल, इस बीमारी की जड़ में पहुँचने के लिए आपको भारतीय अशिक्षित और ग़ैर ज़िम्मेदार समाज के उन पहलुओं पर ग़ौर करना होगा जो इसके लिए मूलतः ज़िम्मेदार हैं.

यहाँ पर भगत सिंह को दुबारा पढ़ना और समझना ज़रूरी है.

ईश्वर में विश्वास करने वाला हर व्यक्ति मूलतः भाग्यवादी होता है और चमत्कार को कर्म के उपर प्रधानता देता है.

वैज्ञानिक दृष्टिकोण की बलि, सिर्फ़ घर की चारदीवारी के अंदर नहीं ली जाती है, बल्कि डॉक्टर के oath लेते समय भी ली जाती है, जब ये कहा जाता है कि “I treat, He cures!”

इस एक वाक्य में, जो कि Hippocrates Oath का मूल वाक्य है, दुनिया की समस्त बौद्धिक संपदा को अज्ञान और अंधविश्वास के पैरों के नीचे रौंदने की बेशर्म कोशिश है.

धर्म सिर्फ़ अफ़ीम ही नहीं है, जैसा कि मार्क्स कहते थे;

धर्म सिर्फ़ दुखियों के कष्टों को भुलाने का निमित्त मात्र ही नहीं, जैसा कि मार्क्स समझते थे;

धर्म आँखों पर बंधी हुई वो पट्टी है जो हमें सच्चाई को देखने नहीं देता है!

धर्म दुनिया के हरेक कुसंस्कार और अंधविश्वास के मूल में है और हरेक प्रकार के शोषण के मूल में भी यही है.

धर्म यथास्थितिवादी है और ईश्वर की परिकल्पना ही ख्रीस्त राजा बनाता है और राम कृष्ण को भी राजा बनाता है.

Sheep और प्रजा एक ही हैं और diaspora और क़ौम भी एक ही हैं.

पदार्थों में एक ही पदार्थ को अलग-अलग नामों से पुकारने पर उनके मूल स्वभाव में कोई अंतर नहीं आता है.

आप पारे के mercury के नाम से जानने पर उसका मूल चरित्र नहीं बदल जाता.

ठीक इसी तरह से दक्षिण पंथी राजनीति को भाजपा, कॉंग्रेस, लोजपा, आप, रिपब्लिकन, डेमोक्रेटिक, लेबर पार्टी इत्यादि अलग अलग नामों से पुकारने पर उनके मूल चरित्र में कोई अंतर नहीं आ जाता है.

शातिर दक्षिण पंथी राजनीति यह अच्छी तरह से जानती है कि ईश्वर, धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्रियता, क़ौम इत्यादि गधत्व पूर्ण धारणाओं में विश्वास रखने वालों को, देश और समाज के असल मुद्दों से कैसे भटकाया जा सकता है, क्योंकि वे पहले से ही भटके हुए हैं!

यही कारण है कि ऋषि सुनक के भारतीय मूल पर बहस होती है, और उसके टैक्स चोर होने पर नहीं.

यही कारण है कि केजरीवाल नोट पर गणेश लक्ष्मी के फ़ोटो पर बात करते हैं और देश में बढ़ती आर्थिक असमानता की नहीं!

यही कारण है कि मोदी अयोध्या में दीए जलाने का रिकॉर्ड बनाते हैं लेकिन 80 करोड़ जनता को भुखमरी के सिवा कुछ नहीं दे पाते हैं!

यही कारण है कि राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा कर सकते हैं और करोड़ों ग़रीबों की आवाज़ बन कर क्रांति का बीज नहीं बो सकते!

Predilection एक medical term है, जिसका मतलब है किसी शरीर में किसी ख़ास रोग की संभावनाएँ…ज़्यादातर क्षेत्रों में यह आनुवंशिक होता है.

सामाजिक स्तर पर इसका मतलब हमारी आनुवंशिक आस्थाओं, विचारों और समझ से है.

धार्मिक और ईश्वरवादी कुसंस्कारों से आच्छादित मन और मस्तिष्क कभी भी वस्तुगत सत्य की न तलाश कर सकता है और ही उसे स्वीकार कर सकता है.

जब जब “स्वैच्छिक ग़ुलाम” शब्द का ज़िक्र कहीं होता तब उसका अर्थ ऐसे ही दिलोदिमाग़ से होता है.

आज के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में जब अशिक्षा, कुशिक्षा, और वीभत्स रस का बोलबाला है, तो इसके पीछे सबसे बड़ा कारण भारतीय लोगों की धार्मिक चेतना है. जड़ बुद्धि और अहमक लोगों की बहुतायत है और ये मोदी, केजरीवाल या राहुल जैसों को ही चुनेंगे….

रोग के आनुवंशिक कारणों को समझने के लिये भगत सिंह को फिर से पढ़िए, वर्ना आप भी भगत सिंह की तस्वीर को दीवार पर टाँग कर हाथ जोड़े, किसी देवता के सामने खड़े मिलेंगे…

 

— Subroto Chatterje

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