रंग-बिरंगी चूड़ियाँ बनाने वालों की बेरंग ज़िंदगी

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आधुनिक पूँजीवादी युग में मंडियाँ, दुकानें व हमारे चारों ओर का वातावरण तरह-तरह की उपभोग की वस्तुओं से भरा पड़ा है, हमारा सारा जीवन इन उपभोग की वस्तुओं पर टिका हुआ है, हमारे खाने-पीने से लेकर हमारे पहनने तक, हमारा हार-श्रृंगार तथा कई कि़स्म की ज़रूरतों को पूरा करने वाली वस्तुएँ। लेकिन क्या हमने अपनी ‘व्यस्तताओं भरी’ ज़िंदगी में से वक़्त निकालकर सोचा है कि जिन चीज़ों के बिना हमारी ज़िंदगी अधूरी है, वे कैसे, कहाँ तथा किन हाथों से गुज़र कर बनती हैं? क्या हममें कभी इनका सृजन करने वाले मज़दूरों की ज़िंदगी की कल्पना करने के बारे में सोचा है? क्या हमने कभी ज़िंदगी के इस पहलू के बारे में सोचा है कि इन वस्तुओं के सृजन की सारी यात्रा अन्य लोगों की ज़िंदगी की असुरक्षा व बलिदानों में से होकर गुज़रती है?
भारतीय समाज में औरतों के हार-श्रृंगार का एक हिस्सा यानी रंग-बिरंगी चूड़ियाँ बेहद कठिन व भयानक स्थितियों में काम करते मज़दूरों के हाथों में से गुज़र कर बाज़ार की रौनक बनती हैं। भारत में राजस्थान का जयपुर व उत्तर प्रदेश का फ़िरोज़ाबाद शहर चुड़ियाँ बनाने के लिए प्रसिद्ध है तथा साथ ही प्रसिद्ध हैं – बाल मज़दूरी, बच्चों की तस्करी व काम के दौरान होने वाले हादसों की कहानियों के लिए।
जयपुर में अधिकतर लाख की चूड़ियाँ ही बनती हैं तथा यहाँ बड़े स्तर पर चूड़ियाँ बनाने का सारा काम छोटे-छोटे बाल मज़दूर करते हैं व अधिकतर बच्चे जयपुर के ना होकर अन्य राज्यों से दो वक़्त की रोटी की तलाश में व अपने परिवार की ज़िंदगी को सुधारने के चक्कर में यहाँ ‘रंग-बिरंगी’ चूड़ियाँ बनाने वाली फ़ैक्टरियों में आकर क़ैदी बनकर रह जाते हैं। इन बच्चों को तस्करों द्वारा उनके माँ-बाप की मजबूरी का फ़ायदा उठाते हुए फ़ैक्टरियों में काम करने के बदले महीने के वेतन और साथ ही बच्चों की पढ़ाई का झाँसा देकर फ़ैक्टरियों के मालिकों तक पहुँचाया जाता है, जिसके बदले में तस्करों को पैसे मिल जाते हैं तथा फ़ैक्टरी मालिक इन बच्चों का मालिक बन जाता है, जिसे अब पूरा अधिकार होता है – इन बच्चों को इंसानों की तरह नहीं बल्कि ग़ुलामों की तरह इस्तेमाल करने का। जयपुर में तस्करी का शिकार हुए अधिकतर बच्चे बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश व पश्चिम बंगाल के हैं। वे राज्य जहाँ के लोग भयंकर ग़रीबी व भूखमरी का शिकार हैं, अकसर ही तस्करों के धोखे का शिकार हो जाते हैं।
चूड़ियाँ बनाने वाली इन फ़ैक्टरियों में बच्चों से दिन में 14 से 18 घंटे काम लिया जाता है। तस्करी का शिकार बच्चे तो बँधुआ मज़दूर ही होते हैं, जिन्हें प्रतिदिन दिया जाने वाला काम पूरा ना होने की स्थिति में मारा-पीटा भी जाता है तथा अपने माँ-बाप से संपर्क करने की इजाज़त भी नहीं होती, फ़ैक्टरी का कमरा ही उनकी समूची दुनिया बनकर रह जाता है। यहाँ काम करते बच्चों को थोड़े से वक़्त के बाद ही स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ होने लगती हैं, जैसे सांस की समस्या, नज़र कमज़ोर होना व कुपोषण का शिकार होना आदि। चूड़ियाँ बनाने वाले इन उद्योगों या दस्तकारियों में बाल मज़दूरी इसलिए भी आम है, क्योंकि चूड़ियों पर होने वाला काम बहुत महीन कि़स्म का होता है और बच्चों के छोटे हाथ व उँगलियाँ इस महीन काम के लिए बेहद उपयुक्त होते हैं।
तस्करी का शिकार हुए बिहार के 15 वर्षीय मुकेश, जिसने 7 महीने जयपुर के चुड़ियाँ बनाने वाले उद्योग में काम किया, ने बताया कि, “पिता को टी.बी. हो जाने के चलते काम करने से असमर्थ देखकर मैंने जयपुर जाकर काम करने का फ़ैसला लिया। वहाँ मुझे 7 बजे से लेकर रात 12 बजे तक काम करना पड़ता था, खाने के नाम पर दिन में दो बार खिचड़ी मिलती थी और साथ ही बहुत सारी गालियाँ, महीने का 2500 रुपए देने का वायदा किया था, लेकिन एक रुपया तक नहीं मिला, आज के बाद मैं कभी भी ऐसे काम नहीं करूँगा।”
उत्तर प्रदेश के फ़िरोज़ाबाद में काँच की चुड़ियाँ बनाने का काम भी बहुत ही ख़तरों भरा है। काँच की चुड़ियाँ बनाने के लिए काँच का चूर्ण बनाकर उन्हें भट्ठियों में पिघलाने से लेकर गर्म-गर्म काँच को आग की भट्ठियों में से निकालकर उससे चूड़ियाँ बनाने का सारा काम बेहद ज़ोखिम भरा है। यह सारा असुरक्षित काम करते वक़्त मज़दूरों को बचाव के लिए किसी भी कि़स्म का साजो-समान नहीं दिया जाता। काम करने वाली जगह का तापमान बहुत ही अधिक होता है। ये सारे काँच संबंधी काम करने के दौरान किसी मज़दूर का हाथ कट जाए तो उसके लिए भी फ़ैक्टरी में कोई व्यवस्था नहीं है। एक मज़दूर के अनुसार, “यदि हाथ कट जाए तो सूतली बाँध लो, आपका ख़ून बहना बंद हो जाएगा, बस… इससे अधिक कोई प्रबंध नहीं है।” औरत मज़दूरों से भट्ठी के आस-पास गिरे पिघले हुए काँच को साफ़ कराने का काम लिया जाता है और उन्हें भी सुरक्षा के लिए कोई दस्ताने वग़ैरह नहीं दिए जाते। इस सबके साथ ही, जो उत्पादन के हर क्षेत्र में लगे मज़दूरों का भाग्य है – काम के अधिक घंटे व बहुत कम वेतन, यह नियम यहाँ भी वैसे ही लागू होता है।
जयपुर की तरह ही फ़िरोज़ाबाद में भी बड़े स्तर पर उद्योगों में बाल मज़दूर काम करते हैं। बचपन में तैयार चूड़ियों को पैक करने का काम करते हैं, और जैसे-जैसे उनकी उम्र बढ़ती है वैसे-वैसे काम के क्षेत्र ज़्यादा ख़तरनाक होते जाते हैं, कई मज़दूर ऐसे भी हैं जिन्हें काँच की चूड़ियाँ बनाने वाली फ़ैक्टरियों में काम करते हुए इतने साल बीत गए हैं कि उन्हें याद भी नहीं, कौन-सी उम्र में उन्होंने यह काम करना शुरू किया था।
हम अकसर ही अपने आस-पास के कई लोगों के मुँह से ये दावे सुनते हैं कि मज़दूरी की ओर धकेल दिए गए इन बच्चों के पास दूसरों की तरह पढ़ाई करने के अवसर होते हैं (क्योंकि सरकारी स्कूलों में तो पढ़ाई मुफ़्त है) लेकिन फिर भी पता नहीं क्यों, इनके माँ-बाप इन्हें पढ़ाई के लिए नहीं भेजते, उनके कहने का सीधा-सा अर्थ होता है कि ये लालची व बेरहम हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि लालच नहीं बल्कि ग़रीबी, अनपढ़ता व दो वक़्त की रोटी उपलब्ध कराने से महदूद माँ-बाप की बेबसी इन बच्चों को मज़दूरी की दलदल में धकेल देती है।
प्रशासन द्वारा वक़्त-वक़्त पर उद्योगों में काम करते बाल मज़दूरों को “रेस्क्यू” (बचाव) किया जाता है, पाखंड किया जाता है कि फलाँ-फलाँ संख्या में बच्चों को मज़दूरी से बचाया गया, उनकी पढ़ाई-लिखाई की व्यवस्था की गई आदि। लेकिन क्या उन कारणों को ख़त्म करने की कोशिश की जाती है, जिन्होंने इन बच्चों को मज़दूरी की ओर धकेला? क्या ग़रीबी, अनपढ़ता, बेरोज़गारी जैसे बुराइयों को ख़त्म करने के बारे में सोचा भी जाता है? ऐसे प्रयास करने के बारे में ना तो वे कभी सोचते ही हैं और ना ही कुछ ऐसा कर सकते हैं। क्योंकि इन ग़रीब व अनपढ़ मज़दूरों को कुचल कर, इन्हें अपनी उन्नति के लिए सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करते हुए चंद धनपशू उन्नति के शिखर पर पहुँचते हैं।
बच्चों के बाल मज़दूर बनने में जहाँ माँ-बाप की ग़रीबी व अनपढ़ता एक बड़ा कारण है, वहीं पूँजीपतियों व उद्योग मालिकों का लालच व मुकाबले में आगे रहने की ज़िद्द तो और भी बड़ा कारण है। जिसमें पूँजीपति सस्ते से सस्ता माल बनाने के लिए आतुर रहता है और माल की लागत कम करने के लिए सबसे आसान हथियार है – मज़दूर को अपनी ज़िंदगी जीने के लिए कम से कम मज़दूरी देना और उससे भी आसान है – बालिग मज़दूरों की जगह बच्चों से मज़दूरी कराना, जिन्हें बालिग मज़दूरों से भी कम मज़दूरी देनी पड़ती है तथा इस तरह अपने लाभ के लिए ये बच्चों के माँ-बाप की मजबूरी का फ़ायदा उठाते हैं।
इसलिए यह माँ-बाप का लालच व स्वार्थ नहीं, बल्कि उल्टा पूँजीपतियों का लालच व स्वार्थ है जो छोटे-छोटे बच्चों को उनके पढ़ने-लिखने व खेलने की उम्र में, अपने परिवेश व क़ुदरत को समझने-प्यार करने की उम्र में उद्योगों में हर वक़्त मौत की छाँव तले जीने के लिए बाँध देता है।
बाल मज़दूरी को ख़त्म करने की कोशिशें को जितनी देर तक उन स्थितियों को ख़त्म करने से नहीं जोड़ा जाता, जिन स्थितियों में एक इंसान ख़ुद को बेचने तक के लिए राज़ी हो जाता है और दूसरा अपने लालच के कारण उसे ख़रीदने के लिए, तब तक ये कोशिशें अख़बारों की सुर्ख़ियाँ बनकर पढ़ने वालों की आँखों में चमक तो ला सकती हैं, लेकिन ये ना तो बाल मज़दूरों की ज़िंदगी में कोई बुनियादी बदलाव ला सकती हैं और ना ही दुनिया में और बाल मज़दूरों को पैदा करने से रोक सकती हैं।
– शिवानी
मुक्ति संग्राम – ऑनलाइन प्रकाशित

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