कोलंबो के प्रदर्शन में एक बैनरः जनता ही सार्वभौम सत्ता है

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‘सोवरेंटी इज इन पीपुल’ – जनता ही सार्वभौम सत्ता है

(कोलंबो के प्रदर्शन में एक बैनर)

कोलंबो के राष्ट्रपति भवन में नहाते, खाते, सोते, उछलते, अपने बच्चों-बुजुर्गों को वहां की सैर कराते, खुश पर साथ ही गोटबाया के सत्ता छोडने तक वहीं जमे रहने की जोशो-जिद वाले आम लोगों के हुजूम को कुछ तथाकथित जनवादी-अहिंसावादी-नैतिकतावादी गुंडागर्दी बता रहे हैं।
पर मुझे ये दृश्य अत्यंत खूबसूरत और मनमोहक लगते हैं। असल में राष्ट्रपति भवन पर काबिज ये लोग अपने उस बैनर की सच्चाई को ही स्थापित कर रहे हैं और इतने बड़े हुजूम के उमड़ने पर जितनी अव्यवस्था स्वाभाविक है उसके इतर इन्होंने अपने को इस सब सार्वजनिक संपत्ति का वास्तविक सर्वोच्च सामूहिक मालिक समझते हुए अत्यंत जिम्मेदारी का मुजाहिरा किया है, इसके तमाम उदाहरण इसके वर्णन की खबरों में मौजूद हैं। अपने में सिकुडे सिमटे सामाजिक जीवन की जिम्मेदारी से अलग रहने वाले खुदगर्ज ही इसे देख पाने में असमर्थ हैं। वही ऐसा सोच सकते हैं कि सामाजिक संपत्ति पर शासक वर्ग के परजीवी लोगों का विशेषाधिकार है और आम लोगों का उसमें घुस आना गुंडागर्दी है। जो कोई भी किसी शुद्ध, पवित्र, सभ्य, लखनवी नफासत भरे जनसंघर्ष की बात करता है वह असल में ऐसे किसी भी अन्याय उत्पीड़न विरोधी संघर्ष का जाने अनजाने में विरोधी होता है।
दूसरे, जनता का यह विशाल हुजूम उमड़ पड़ना ही अमन चैन व अहिंसा की गारंटी कर रहा है अन्यथा श्रीलंकाई शासक वर्ग ने पिछले पांच दशक में अपना बेहद नृशंस व घिनौना कातिल चरित्र पूरी दुनिया को अच्छी तरह दिखा दिया है। अगर लोग इससे कम होते तो यह शासक वर्ग खून की नदियां बहा देता और इसकी तैयारी की खबरें बडे पैमाने पर तब से आ रही हैं जबसे यह अरगलया शुरू हुआ है। 8 जुलाई की रात को भी ऐसी तैयारी थी पर जब कोलंबो ही नहीं चारों ओर से बडी तादाद में जनता के हर मुमकिन साधन, पैदल और साइकिलों सहित, कोलंबो की ओर कूच की खबरें आने लगीं तभी शासक और उनकी फौज को अपने कदम पीछे खींचने पडे, यहां तक कि कातिल फील्डमार्शल सरत फोंसेका भी अमन की बातें करने लगा। विक्रमसिंघे के घर में जहां आग लगी वहां असल में विरोध प्रदर्शन था ही नहीं और सभी विरोधी इस घटनाक्रम को शक की निगाहों से देख रहे हैं।
तीसरी बात यह है कि जनता से छिपे रहने वाले शासक वर्ग के इन ठिकानों को अच्छी तरह देखने की जनता की उत्सुकता भी एक राजनीतिक कार्य है। वे देखना चाहते हैं कि जिस देश में बच्चों को भूखे सुलाना पड रहा है, लाइनों में खडे लोग मर जा रहे हैं और बिजली यातायात कागज के अभाव में स्कूल बंद हैं, वहां शासक वर्ग किस विलासिता का जीवन बिता रहा था। अतः यह उनके लिए राजनीतिक शिक्षण का टूर बन गया है जो मौजूदा निजाम में उनके रहे सहे भ्रमों को चकनाचूर कर रहा है और कहा जाये तो भविष्य में एक सच्चे जनवाद की बुनियाद रखने में एक मजबूत नींव की ईंट का काम करेगा।
चौथे, और एक तरह के लोग हैं जो कहते हैं कि यही लोग तो इतने सालों से बहुसंख्यक सिंहल अंधराष्ट्रवाद के समर्थक थे। अब ये अपनी तकलीफों पर विरोध कर रहे हैं तो यह अनैतिक है और इससे कोई परिवर्तन नहीं होगा। ये ‘तर्क’ बहुत जनवादी और अन्याय विरोधी प्रतीत होता है, पर गहराई से पडताल करने पर ये असल में बहुसंख्यकवाद, अंधराष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता व फासीवाद के लिए शासक पूंजीपति वर्ग की सुनियोजित साजिश वाली संगठित राजनीतिक मुहिम के बजाय इसके शिकार आम लोगों को ही जिम्मेदार बता कर शासक व्यवस्था का बचाव करता है। वास्तविकता है कि किसी भी समाज में ये सब इसीलिए स्वीकृत होता है क्योंकि स्वयं मेहनतकश उत्पीडित जनता शासक वर्ग के विचारों के असर में होती है। अगर ऐसा न होता तो शोषण की व्यवस्था चलती ही कैसे? चुनांचे यह सही है कि अभी विरोध करने वालों में से बहुतेरे उपरोक्त विचारों के प्रभाव में ही थे। बल्कि जब भी समाज में शोषण तंत्र के खिलाफ कोई भी विद्रोह होगा तो उसमें ऐसे ही उत्पीडित जनों की बडी तादाद शामिल होगी जो पहले उस शोषक तंत्र की समर्थक रही थी। अतः ऐसी जनता के विरोध में शामिल होने के आधार पर विरोध को अनैतिक ठहराना किसी भी विरोध की संभावना को समाप्त कर शोषक तंत्र की हिफाजत करने का कुतर्क है।
आखिरी बात, ठीक है जरूरी नहीं कि हालिया घटनाएं क्रांति ही हों, जरूरी नहीं कि इसका नतीजा तुरंत एक शोषण मुक्त समाज ही हो, पर ऐसे रोष प्रदर्शन, विद्रोह से गुजरे बगैर भी क्रांतियां संभव नहीं। यह संघर्ष जनता की सबसे बडी राजनीतिक शिक्षा हैं जो दशकों के राजनीतिक प्रचार से भी बडी है। दशकों के मरघट जैसे सन्नाटे को तोडने वाले ये संघर्ष स्वतः स्फूर्त भी हों तब भी ऐसी जीवंतता ही समाज में क्रांति के बीज बोती है, थोथी बंजर-नपुंसक अहिंसक नैतिकता वाली बुजदिली नहीं।
मुकेश त्यागी

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