बांग्लादेश मुक्ति युद्ध में कम्युनिस्ट गुरिल्लाओं की भूमिका

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यह समय मुक्ति के लिए लड़ने का है, यह समय स्वंत्रतता के लिए लड़ने का है! क्रांतिकारी जनता हमला करो! पूर्वी बंगाल की भूमि मुक्ति के लिए लहू मांगती है!!
-ईस्ट बंगाल को-आरडीनेशन कमेटी फॉर कम्युनिस्ट रिवोलुशनरी
जिस तरह भारत में नक्सलबारी आन्दोलन शुरू हुआ था, ठीक उसी तरह पूर्वी बंगाल में भी वहां का ‘नक्सलबारी’ आन्दोलन शुरू हो चुका था. फिलहाल विभिन्न कम्युनिस्ट ग्रुप वहां भी भारत की तरह ही ‘को-आरडीनेशन कमेटी फॉर कम्युनिस्ट रिवोलुशनरी’ के तहत संगठित थे और पाकिस्तान के तानाशाह याहिया खान और स्थानीय सामंती रजाकारो के खिलाफ शानदार सशस्त्र संघर्ष चला रहे थे और अपने लहू से पूर्वी बंगाल की जमीन को सींच रहे थे. यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि इनका यह संघर्ष उस मुक्ति वाहिनी के संघर्ष से एकदम स्वतंत्र था, जिन्हें भारत सरकार अपने स्वार्थ में भरपूर मदद कर रही थी, उन्हें सैन्य प्रशिक्षण दे रही थी. दूसरी ओर कम्युनिस्ट गुरिल्लाओं को कोई मदद नहीं मिल रही थी, उन्हें सिर्फ भारत के नक्सलियों से नैतिक समर्थन ही मिल रहा था. हालाँकि अनेक मौकों पर भारत के नक्सली विशेषकर चारू मजुमदार और उनके साथियों ने उनकी अन्य तरीकों से भी महत्त्वपूर्ण मदद की. भारत के नक्सलियों से मिलने या वहां के दमन से बचने के लिए जब पूर्वी बंगला के कम्युनिस्ट गुरिल्ला सीमा पार कर भारत आते थे तो कई बार वे भारतीय सेना के हाथो मारे भी जाते थे.
चारू मजुमदार बांग्लादेश के इस मुक्तियुद्ध को दूसरी तरह से भी देख रहे थे. वे भारत और पूर्वी बांग्लादेश के गुरिल्ला युद्ध के विस्तार में दोनों बंगाल का एकीकरण भी देख रहे थे. और सिर्फ स्वतंत्रता से आगे जाकर एक नवजनवादी-समाजवादी समाज का भी सपना देख रहे थे, जो दोनों तरफ के कम्युनिस्ट गुरिल्लाओं का साझा सपना था.
यह बात अब भुला दिए गए इतिहास का हिस्सा बन चुका है कि पूर्वी बांगला के इन कम्युनिस्ट गुरिल्लाओं ने मुक्तियुद्ध के दौरान बारीसाल, ढाका, नोआखली, सिलहट आदि कई क्षेत्रों में आधार क्षेत्र भी बना लिए थे. और यह भी एक कटु सच है की इनमे से ज्यादातर आधार क्षेत्रों को भारतीय सेना ने या उनके समर्थन से मुक्ति वाहिनी ने बाद में नष्ट कर दिया. कुछ ग्रुप को छोड़कर ज्यादातर कम्युनिस्ट गुरिल्लाओं ने शेख मुजीबुर्रहमान के लोकतांत्रिक-समाजवादी राज्य बनाने के आश्वासन पर हथियार डाल दिए, इस ‘मासूमियत’ का खमियाजा उन्हें और पूर्वी बंगाल को उसी तरह चुकाना पड़ा जैसे इंडोनेशिया और भारत जैसे देशों को चुकाना पड़ा है.
ग़ालिब के शताब्दी समारोह में एक बार कार्यक्रम पर ही तंज करते हुए साहिर लुधियानवी ने एक नज़्म पढ़ी थी, जिसकी एक पंक्ति थे- ‘उर्दू पे सितम, ग़ालिब पे करम, क्यों ? बांग्ला मुक्तियुद्ध में भारत की भूमिका पर यह टिप्पणी एकदम सही बैठती है.
जिस वक़्त भारत सरकार बांग्ला मुक्तियुद्ध में मुक्ति वाहिनी की मदद कर रही थी, ठीक उसी वक़्त भारत भारत के अंदर चल रहे मुक्ति युद्ध का बर्बर दमन कर रही थी. सिर्फ कोलकाता में रात के अँधेरे में मुहल्लों को घेर लेना, सभी निकलने के रास्तों को बंद कर देना. घरों से खींच खींच कर नौजवानों को निकालना, उन्हें तत्काल गोली मारना और फिर वाहनों में लादकर ले जाना. सुबह उन नौजवानों के पिताओं को थाने बुलाना और उन्हें लाश की शिनाख्त करने को कहना.
जी हां यह बहुत दूर का इतिहास नहीं है. लेकिन यदि हमे ‘दूर-दृष्टि दोष’ हो तो नजदीक का इतिहास भी कैसा दिख सकता है. इस सन्दर्भ में सवाल बहुत पुराना है, लेकिन आज भी जायज है की जिस सरकार की घरेलू नीति प्रतिक्रियावादी हो उसकी विदेश नीति प्रगतिशील कैसे हो सकती है. जो सरकार अपने देश में मुक्तियोद्धाओं के रक्त से नहा रही हो, वो दूसरे देश के मुक्तियोद्धाओं की मददगार कैसे हो सकती है.
सच तो यह है कि यह उस वक़्त की अंतरराष्ट्रीय सेटिंग थी, जहाँ बांग्लादेश की आज़ादी का सवाल सोवियत रूस-अमेरिका-भारत के स्वार्थ से जा मिला और वह ‘आज़ाद’ हो गया, वर्ना दूसरे मुक्तियुद्धों की तरह उसे भी लम्बा इन्तेजार करना पड़ता. ऐसी आज़ादी के कारण ही वह महज चार साल बाद शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या के साथ ही एक दूसरे पाकिस्तान में बदल गया.
1971 में अमेरिका और सोवियत रूस दोनों ही चीन के खिलाफ थे. क्योंकि वही उस वक़्त सच्चा समाजवादी देश था और साम्राज्यवाद विरोधी मुक्तियुद्धों का सक्रिय समर्थन कर रहा था, जिससे अमेरिका और सोवियत रूस दोनों ही अपनी आपसी प्रतियोगिता [कोल्ड वार] के बावजूद परेशान थे. भारत चीन से 1962 में लड़ चुका था और बुरी तरह पराजित हो चुका था. पाकिस्तान से भारत की पटीदारी तो सब जानते है. भारत को बैलेंस करने के लिए चीन पाकिस्तान का समर्थन कर रहा था. पाकिस्तान को तोड़कर चीन के प्रभाव को कम किया जा सकता था.
यानी अमेरिका को बांग्लादेश की आज़ादी से दिक्कत नहीं थी, उसे दिक्कत शेख मुजीबुर्रहमान से थी जिनका झुकाव सोवियत रूस की तरफ था. 1975 में शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या में ‘सीआईए’ का हाथ अब साफ़ हो चुका है. यदि अमेरिका को बांग्लादेश की आज़ादी से दिक्कत होती तो वह बांग्लादेश बनने के महज साल भर बाद ही उसे मान्यता न देता. चीन को मान्यता देने में तो उसने 22 साल लगा दिए. इसलिए बांग्लादेश मुक्ति युद्ध में अमेरिकी बनाम रूसी जहाजी बेड़े की कहानी महज प्रतीकात्मक है.
इतिहास में आधा सच जानना प्रायः झूट के साथ खड़े होने की वजह बन जाता है. शायद इसी सन्दर्भ में मिलान कुंदेरा ने कहा था-‘सत्ता के खिलाफ मनुष्य का संघर्ष भूल जाने के खिलाफ याद करने का संघर्ष है.’
#मनीष आज़ाद

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