बजरंगबिहारी तिवारी द्वारा समीक्षा : ‘टूटे पंखों से परवाज़ तक’

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समीक्षा : ‘टूटे पंखों से परवाज़ तक’

अवमानना की परतें

बजरंगबिहारी तिवारी

हिंदी में पहली दलित स्त्री आत्मकथा 1999 में छपी थी| ‘दोहरा अभिशाप’ नामक इस आत्मकथा की लेखिका कौशल्या बैसंत्री स्वयं अहिंदीभाषी प्रदेश (महाराष्ट्र) की थीं| ऐतिहासिक महत्त्व वाली इस आत्मकथा का जैसा स्वागत होना चाहिए था, नहीं हुआ| आत्मचेतस विवेकसंपन्न व्यक्ति के रूप में दलित स्त्री की निर्मिति सवर्ण मानस को भला क्यों सुहाती लेकिन बिडंबना देखिए कि कतिपय अस्मितावादी दलित लेखकों ने भी इस पहल का विरोध किया| एक दलित आलोचक ने ‘दोहरा अभिशाप’ की लेखिका को धिक्कारते हुए उन्हें ‘डायन’ और ‘सुअर’ जैसे अपशब्दों से नवाज़ा| धिक्कार की वजह यह बताई गई कि कौशल्या बैसंत्री ने मर्यादा का ध्यान नहीं रखा है और अपने पति को बराबरी के स्तर पर संबोधित किया है| हम जानते हैं कि सवर्ण पुरुष मर्यादा के चाबुक से स्त्रियों को हांकते रहे हैं| इस प्रसंग में दलित पुरुष भी इसी तरकीब का इस्तेमाल करते नज़र आए| कौशल्या बैसंत्री पर इस हमले अपेक्षित विरोध नहीं हुआ| तमाम दलित-ग़ैरदलित लेखक-कार्यकर्ता इस मसले पर चुप्पी साध गए| दलित स्त्री का लेखन शायद सबको असुविधाजनक लग रहा था| एक दलित स्त्री की ऐसी घेराबंदी ने असर दिखाया| अगले 11 वर्षों तक कोई दलित स्त्री आत्मकथा नहीं छपी| सुशीला टाकभौरे ने 2011 में इस ठहराव को ‘शिकंजे का दर्द’ आत्मकथा लिखकर तोड़ा| उसके बाद तो इस विधा में गति आई और एक-एककर तीन दलित स्त्री आत्मकथाएं प्रकाशित हुईं| इस वर्ष (2021 में) दो और आत्मकथाएं प्रकाशित हुईं जिनमें सुमित्रा महरोल की आत्मकथा ‘टूटे पंखों से परवाज़ तक’ (द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन, पांडव नगर, दिल्ली) कई कारणों से महत्त्वपूर्ण है|

जैसा शीर्षक से स्पष्ट है, आत्मकथा में लेखिका का दृढ़ व्यक्तित्व उभरकर सामने आता है| दलित स्त्री विमर्श को ऐसे मजबूत व्यक्तित्वों की बहुत जरूरत है| यह अस्मिता अभी निर्माण के आरंभिक दौर में है और उसे साहित्य तथा व्यापक समाज में अपनी सुदृढ़ पहचान स्थापित करनी है| टूटे पंखों से परवाज़ (उड़ान भरना) बड़े दिल-गुर्दे का काम होता है| हिंदी में अब तक जिन दलित स्त्रियों की आत्मकथाएं प्रकाशित हुई हैं उनसे यह आत्मकथा इस अर्थ में भिन्न है कि यहाँ त्रास और हाशियाकरण की ज्यादा परतें हैं| एक पुरुषवादी समाज में महिला होना, एक जातिवादी समाज में दलित होना और एक निष्ठुर समाज में विकलांग होना ये हाशियाकरण के तीन मुख्य आधार हैं जिनसे जूझती हुई लेखिका आगे बढ़ी है| पहली ‘निर्योग्यता’ दूसरी को और दूसरी तीसरी को मजबूती देती हुई उसका आगे बढ़ना दुश्वार करती रही है| विषाद के छोटे-बड़े अंतरालों के बावजूद सुमित्रा ने निरंतर संघर्ष किया, कभी हार नहीं मानी और कभी इनसे उपजी तिक्तता या उदासी को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया| एक कथित निर्योग्यता के भीतर दूसरी निर्योग्यता की उपस्थिति आत्मकथा पढ़ते हुए महसूस होती रहती है| शब्दों को खरचने में किफ़ायत बरतने वाली लेखिका बस संकेत करते हुए आगे बढ़ जाती है| आत्मकथा के पहले अनुच्छेद में यह वाक्य आया है- “समाज में सबसे हीन समझी जाने वाली जाति में मेरा जन्म हुआ था|” इसे प्रचलित भाषा में ‘दलितों में दलित होना’ कहते हैं| इस वाक्य के अतिरिक्त लेखिका ने पूरी आत्मकथा में इस सामाजिक अवस्थिति से प्राप्त अनुभवों पर कुछ नहीं लिखा है| उसे पता है कि विषमता में रस लेने वाले जातिग्रस्त लोग बात का बतंगड़ बना देंगे| आंतरिक जातिवाद का संदर्भ जातिवादी हिंसा के औचित्य निरूपण में इस्तेमाल किया जाएगा|

सुमित्रा साल भर की भी नहीं हुई थीं जब उनके पाँव पोलियोग्रस्त हुए| पिता बिजली विभाग में क्लर्क थे और मां घर संभालती थीं| दो बड़े और एक छोटे भाइयों के बीच स्नेह व उपेक्षा के विषम अनुपात में सुमित्रा पली-बढ़ीं| कई ऐसी चोटें हैं, टीसें हैं जो बचपन में सुमित्रा को मिलीं और याद रह गईं| छोटे भाई को माता-पिता फिल्म दिखाने ले गए और लंगड़ाते-घिसटते पीछे लगी बिलखती बच्ची को सड़क पर छोड़ दिया| एक सामूहिक बाल-नृत्य में शरीक किए जाने पर आशंका मिश्रित खुशी से भरी बालिका जब स्टेज पर पहुँची तो यह घटित हुआ- “तभी मेरी निगाह सामने दर्शकों में खड़े मेरे भाई पर पड़ी| मुझे काटो तो खून नहीं| जमाने भर की हिकारत, उपेक्षा और अवमानना की आग आँखों में लिए मेरा भाई मेरी ओर देख गुस्से से दांत पीस रहा था| अपंग हो नाचने का दुस्साहस जो किया था मैंने! आखिर मैंने इस असाध्य कामना को अपने हृदय में आने ही क्यों दिया? नाचने की सारी खुशी, सारा उत्साह, सारी तरंग पैरों के रास्ते जमीन में धंस गई… उन आँखों में बसी नफरत को यादकर आज भी मैं सिहर उठती हूँ|” (पृ. 21)

कुछ इसी तरह के अनुभव स्कूल में भी हुए और कॉलेज में भी| परिस्थितियों से तालमेल बिठाती, ग्लानि और गुस्से को भरसक जज्ब करती सुमित्रा एम.ए. करने विश्वविद्यालय पहुँचीं| विकलांगता के कड़वे अनुभव जातिजनित भेदभाव पर भारी रहे| दो घटनाएं उल्लेखनीय रहीं| सात बरस की उम्र में अपने दम पर स्थानीय पार्षद के दफ्तर जाकर दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी के सदस्यता फॉर्म पर दस्तख़त करवाए और 11 की उम्र में स्कूल आने-जाने के लिए डीटीसी बस लेना शुरू किया| पुस्तकालय की सदस्यता ने किताबों की दुनिया में प्रवेश कराया और बस की सवारी ने स्कूल और घर के बीच की तकलीफ़देह पैदल यात्रा से छुट्टी दिलायी| माँ-पिता ने अगर सुमित्रा के लिए सुविधाएं नहीं जुटाईं तो उन्होंने कोई बाधा भी नहीं खड़ी की| भाई लोग अलबत्ता कभी-कभार परेशानियां पैदा करते रहे| मसलन, किराए पर ली गई किताबें, “मेरे भाई इन किताबों में मुझे डूबा पाकर मेरे हाथ से इन्हें छीनकर फाड़ डालते थे| तब बड़ी मुश्किल से अपने जेबखर्च को जोड़-जोड़कर मैं इन किताबों की पूरी कीमत अदा कर पाती|” (पृ. 33)

सुमित्रा ने एम.ए. के बाद एम.फिल. किया| आर्थिक स्वावलंबन के लिए बैंक में कैशियर-सह-क्लर्क की नौकरी कर ली| नौकरी करते-करते पीएच.डी. पूरी की| अप्रत्याशित व्यवहार वाले अध्यापक विश्वनाथ त्रिपाठी (डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी, हिंदी के चर्चित आलोचक) के निर्देशन में यह कार्य हुआ| इसके बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक महाविद्यालय में नियुक्ति हुई| जीवन जैसे स्थिर हुआ| बैंक में नौकरी करते-करते फाइबर से बना जयपुर का ‘केलिपर’ (पैर सहायक) बनवा लिया| इससे चलने-फिरने में थोड़ी सहूलियत हो गई| अब मसला विवाह का था| उम्र सत्ताइस की हो चली थी और परिवार की कोशिशों का कोई असर दिख नहीं रहा था| ऐसे में लेखिका ने स्वयं पहल की| अखबार में विज्ञापन दिए और कई खट्टे-मीठे अनुभवों के बाद उपयुक्त जीवनसाथी का चयन कर सकीं| यह रिश्ता तय करते-करते एक आशंका भी खदबदा रहे थी- एक सर्वांग युवक विकलांग युवती से विवाह करने को क्योंकर राज़ी हुआ! सुमित्रा ने यह प्रश्न युवक के सामने रखा| होने वाले जीवनसाथी का बेहतरीन उत्तर मिला- “तमाम तरह की मानसिक विकलांगताओं को झेलने के बजाय शारीरिक विकलांगता को अनदेखा करना ज्यादा न्यायोचित है|”

बैंक में नौकरी करना सुमित्रा का उद्देश्य नहीं था| वे पीएच.डी. कर चुकी थीं| दिल्ली विश्वविद्यालय से सम्बद्ध कॉलेजों में आवेदन करना और इंटरव्यू देना आरंभ किया| जल्दी ही सफलता भी मिली| एक महाविद्यालय में उनकी नियुक्ति हो गई| तब तक उन्होंने बैंक से क़र्ज़ लेकर अपना मकान खरीद दिया था| दिल्ली में अपना मकान होना बड़ी उपलब्धि मानी जाती है| अब संतान की चाहत का नंबर था| तीन मिसकैरेज हो चुके थे| अच्छे डॉक्टर की तलाश थी| तलाश सफल हुई| ऑपरेशन हुआ और लेखिका मां बनीं| दो वर्षों के अंतराल में दो बेटों की मां| इस बीच पढ़ाई शिथिल हो गई थी| सब सेटेल हो जाने के बाद अध्ययन और लेखन पर ध्यान गया| कहानी, कविता और लेख छपने लगे| राजेन्द्र यादव, रमणिका गुप्ता, सुधा अरोड़ा, सुशीला टाकभौरे, मन्नू भंडारी आदि रचनाकारों, संपादकों से सुमित्रा महरोल को प्रेरणा और प्रोत्साहन मिला| साहित्यिक कार्यक्रमों, विचार-गोष्ठियों में आना-जाना होने लगा|

यह आत्मकथा दिल्ली जैसे महानगर में जातिभेद की बहुस्तरीय मौजूदगी का दस्तावेज़ है| लेखिका बारह वर्ष की उम्र, कक्षा 6 से जातिदंश के अनुभवों को दर्ज करना आरंभ करती है| उसके क्लास की सवर्ण (इस सवर्णता की जातिगत पहचान नहीं की गई है|) सहपाठी सुशीला सहायता तो भरपूर लेती थी लेकिन “मेरे दलित होने के कारण सामाजिक उत्सवों में मुझसे दूरी साध लेती थी|” (पृ.38) इससे पहले अबोधावस्था में भी जाति आधारित भेदभाव के अनुभव हुए जैसे मंदिर में घंटी बजाने को लेकर या सवर्ण पड़ोसी के यहाँ कंजक खिलाने में बहिष्कार को लेकर| पिता के दफ्तर का एक सवर्ण कर्मचारी भी जातिवादी मानसिकता वाला था| वह भीतर ही कुढ़ता रहता किंतु उनकी पूरी मदद लेता रहता| उसके पाखंड को मां समझती थीं लेकिन पिता नहीं| सुमित्रा ने बड़े क्षोभ भरे शब्दों में लिखा है कि जब उनके भाई के विवाह के अवसर पर सभी परिचितों व संबंधियों के घर पॉलिथीन बैग में भरकर फल-मिठाई का डिब्बा भिजवाया गया तो उसमें पिता का वह सहकर्मी भी शामिल था| उसी दिन मां बाज़ार गई थीं| मां ने बाज़ार में गली की सफाई कर्मचारी को देखा| उसके हाथ में वही पारदर्शी बैग था- “बैग में से मिठाई का वही डिब्बा और वही बड़े-बड़े सेब-संतरे झांकते हुए उन्हें मुंह चिढ़ा रहे थे| स्नेह और आदर से भिजवाई गई भेंट का ऐसा निरादर! अपमान को सहना मुश्किल हो रहा था|” (पृ. 61) इसी तरह उस पड़ोसिन का व्यवहार था जो प्यासी होने के बावजूद सुमित्रा के घर का पानी नहीं पी रही थी “पर बाज़ार से आई कैम्पा पीने में उसे कोई आपत्ति न थी|” (पृ. 62) एक अन्य पड़ोसी के घर में आई नई-नवेली बहू ने सुमित्रा की मां से शगुन का लिफाफा तो ले लिया लेकिन उन्हें छोड़कर वहाँ उपस्थित सभी महिलाओं के पाँव छुए| “बगैर किसी अपराध के सामाजिक अवमानना और बहिष्कार के नुकीले दंश हमें क्यों सहने पड़ते हैं? ऐसा क्या करें जिसके करने से हमें इन सब से मुक्ति मिल जाए…” (पृ. 62)

सामाजिक अवमानना का सिलसिला बाद में भी जारी रहा| “दलित और विकलांगता के दोहरे अभिशाप को झेलती मैं जितना लोगों के निकट जाने की कोशिश करती, लोग उतना ही औपचारिकता का चाबुक मारते हुए दूर होते जाते|” (पृ. 39) बैंक में काम करते हुए और फिर कॉलेज में अध्यापन करते हुए सुमित्रा को दंश मिलते रहे| पड़ोसियों ने बहिष्कार किया| सहकर्मियों ने अपमानजनक बेरुखी से लहूलुहान किया| उत्पीड़न का दर्द पूरा रहा लेकिन उसका स्वरूप सूक्ष्म और अमूर्त रहा- “शहरी परिवेश में दलित उत्पीड़न का स्वरूप बाह्य न होकर आंतरिक है| प्रत्यक्षतः दिखाई नहीं पड़ता| शहर के तथाकथित शिक्षित सवर्ण जानते हैं कि जातिगत आक्षेप उन्हें मुसीबत में डाल सकते हैं क्योंकि कानूनन जातिगत भेदभाव अपराध है सो प्रकटतः कुछ भी करने से बचते हैं पर दलितों के लिए उनकी सोच अभी भी पूर्ववत है|” (पृ. 96) दिल्ली के महाविद्यालयों में जातिगत भेदभाव किस तरह काम करता है, आत्मकथा का परवर्ती हिस्सा इस पर फोकस करता है| लेखिका ने स्टाफरूम से लेकर प्राचार्य कार्यालय तक और क्लास रूम से लेकर वार्षिक उत्सव तक हर जगह जातिवाद से दूषित वातावरण को झेला| वरिष्ठ सहकर्मी शिक्षक मनोबल तोड़ने वाला व्यवहार करते हैं और हमउम्र सहकर्मी उपेक्षा भरा बर्ताव| संस्थान के समारोहों में उन्हें ताली बजाने की भूमिका तक सीमित रखा जाता है और रूटीन बैठकों में भरसक नज़रंदाज़ किया जाता है| संस्थान के मुखिया का हाल लेखिका के ही शब्दों में- “सवर्ण टीचरों के आने पर प्राचार्य उनका बड़ी गर्मजोशी से स्वागत करते, उनका हालचाल पूछते पर मेरे कक्ष में प्रवेश करते ही कनखियों से मुझे देख टेबल पर रखे कागजों में व्यस्त हो जाते| मेरे अभिवादन का भी बड़ा ठंडा जवाब मिलता मुझे| शुरू में उनके ऐसे व्यवहार को देख मैंने सोचा शायद महत्त्वपूर्ण कार्य में व्यस्त होंगे पर जब बार-बार उन्होंने ऐसा किया तो मेरा माथा ठनका … हमेशा उनके द्वारा अनदेखा किया जाना मुझे बहुत खलता था|” (पृ. 128)

निकटस्थ व्यक्तियों के चरित्रांकन में सुमित्रा ग़ज़ब का संतुलन बनाती हैं| मां, पिता और जीवनसाथी के बारे में लिखते हुए न उन्होंने उनके दुर्बल पक्षों को ढंका है और न उनके व्यक्तित्व के सकारात्मक पहलुओं को ओझल होने दिया है| दुर्बलता को पूरी बेमुरव्वती से रेखांकित करने के बाद वे उसका स्रोत परिस्थितियों और परंपराओं में तलाशती हैं और इस तरह उस व्यक्ति को बहुत हद तक दोषमुक्त कर देती हैं| उन्होंने मां के बारे में लिखा- “कभी-कभी झुंझला कर मां मुझे खूब मारती|” इसी तरह पिता की वात्सल्यहीनता पर टिप्पणी की- “पिता को बच्चों को दुलारने-पुचकारने या संभालने से कोई सरोकार न था| …बच्चों को गोद-वोद लेने से उनके पुरुषोचित अहं को ठेस लगती थी|” (पृ. 10) इसी तरह “मेरे परिवार के किसी भी सदस्य में इतनी समझ व संवेदना नहीं थी कि मुझे या (या दूसरे बच्चों से नितांत अलग) मेरी स्थिति को समझ पाएं|” (पृ. 11) अब इसकी वजह देखिए| पहली वजह यह परंपरा है “कि पिता अपने बच्चों को गोद में उठाकर प्यार-दुलार नहीं करेगा| …परंपरा का आग्रह इतना प्रबल था कि अपने अबोध बच्चे का करुण क्रंदन भी उन्हें पिघला नहीं पाता था|” (पृ. 10) दूसरा कारण घर की परिस्थिति थी- “परिवार के हालात भी ऐसे नहीं थे कि एक बच्चे पर इतना ध्यान दिया जाता|” (पृ. 11) मां-पिता के लिए लेखिका ने पर्याप्त ‘एक्सक्यूज’ जुटाए हैं लेकिन भाइयों के लिए नहीं| अपने पति सतीश के बारे में, उनके गुणावगुण पर सुमित्रा ने सर्वाधिक लिखा है| एक जगह उन्हें ‘अब्सेंट माइंड’ (पृ. 150) कहा है तो अन्यत्र लिखा है, “सिर्फ़ खुद की सुविधा और आराम सर्वोपरि है इनके लिए|” (पृ. 151) जीवनसाथी के बारे सबसे कड़ी टीप है, “मन के घावों पर स्नेहलेप लगाना सतीश के वश में न था| घर में उनकी उपस्थिति बस एक रोबोट के समान थी|” (पृ. 157) अब सिक्के का दूसरा पहलू, “सतीश के व्यक्तित्व का बहुत ही उज्ज्वल पक्ष ये है कि वह बिलकुल भी पुरुषवादी और अहमवादी नहीं हैं| स्त्री के लिए सम्मान और समानता के भाव हैं उनमें| बिलकुल भी इगोइस्ट नहीं हैं वे|” (पृ. 145)

‘टूटे पंखों से परवाज़ तक’ की भाषा सादगीपूर्ण है, अकृत्रिम है| पढ़ते हुए कहीं ऐसा नहीं लगता कि कुछ छुपाया जा रहा है| प्रायः आत्मकथाओं में ‘आत्म’ या स्व का गोपन होता है| आत्म को छोड़कर शेष जगत दीप्त हुआ करता है| बहुत हुआ तो उस स्व पर नीमरोशनी डाल दी जाती है| सुमित्रा ने ऐसा नहीं किया है| उनकी आत्मकथा को इसीलिए पारदर्शी और अकुंठ कहा जाना चाहिए| व्यक्तित्व की पारदर्शिता भाषा में उतर आयी है| व्याकरणिक दिक्कतें एकाध जगहों पर देखी जा सकती हैं| ऐसे वाक्यों को कुछ और सुघड़ बनाया जा सकता था- “पुष्प विहार आते ही अच्छी बात यह हुई कि मेरी पीएच.डी. का वायवा यहाँ आते ही हो गया|” (पृ. 87) एक ‘आते ही’ को कम किया जा सकता था| एक अटपटा प्रयोग इस वाक्य में भी दिखाई देता है- “उस समय प्रेम और मनुहार से कोई मुझे उपहारस्वरूप कुछ देता तो संबंधों की प्रगाढ़ता में एक गहरी कील ठुक जाती, बहुत अच्छा लगता मुझे, …|” (पृ. 82) ‘कील ठुंकना’ नकारात्मक अर्थ देता है जबकि यहाँ उसे अच्छे अर्थ में रखा गया है| विराम चिह्नों के प्रयोग में थोड़ी और सावधानी अपेक्षित थी|

बर्ट्रेंड रसेल ने अपनी ‘ऑटोबायोग्राफी’ (1967) के आरंभ में लिखा है कि उनकी जिंदगी को तीन आवेग संचालित करते रहे हैं- प्रेम की चाहत, ज्ञान की तलाश और पीड़ित मानवता के लिए असह्य करुणा| प्राथमिकता का यही क्रम सुमित्रा की आत्मकथा में भी देखा जा सकता है| पहला आवेग इतना प्रबल है कि वह पूरी किताब में बार-बार प्रकट होता रहता है| लेखिका चाहतीं तो इस पर झीना आवरण डाल सकती थीं लेकिन वे ऐसा करने से बची हैं| उनके व्यक्तित्व को इसीलिए अकुंठ और लेखन को पारदर्शी कहा गया है|

किसी मनभावन का स्नेहभाजन बनना अपने होने की सार्थकता का अनुभव करना है| किसी की आँखों में अपने लिए प्रेम देखना स्वाशय पाना है, आत्मगौरव अर्जित करना है| प्रेम और मैत्री दोनों ही व्यक्ति को पूर्णतर बनाते हैं, अपनी मूल्यवत्ता का अहसास कराते हैं| बी.ए. करते हुए “किसी के आत्मीय अनुराग के लिए जैसे आत्मा तरसने लगती|” (पृ. 43) सुजाता मैम का स्नेह इस तरस को परितृप्त करने लगा था कि मैम ही दृश्य से ओझल हो गयीं| विश्वविद्यालय के दक्षिणी परिसर से एम.ए. करते हुए प्रेमी युगलों की जैसी चहलकदमी देखी उससे प्रेमपात्र बनने-बनाने की कामना और प्रबल हुई किंतु “अनन्य मित्रता यहाँ भी नहीं हो पाई, बस औपचारिक बातचीत थी सबसे| …इस माहौल में शामिल होकर भी जैसे इस सबसे बहुत दूर थी|” (पृ. 48) विवाह का अवसर आया तो यह अकेलापन जैसे अवसाद की ओर बढ़ चला- “विवाह रूपी बाजार में मैं तो शुरू से ही रिजेक्टेड पीस थी|” (पृ. 55) प्रेम और मैत्री में कभी दूसरे की पहल पर प्रतिक्रिया देनी होती है और कभी स्वयं पहल करनी पड़ती है| यह सब अनायास होता है या होते हुए लगता है| दोनों ही आयामों पर लेखिका को रिक्ति मिली| (पृ. 72) विवाह इस रिक्ति को भर सकता था| आखिर एक-दूसरे को पसंद करके दोनों परिणय-सूत्र में बंधे थे| लेकिन, हृदय का वह कोना वीरान ही रहा- “मेरे लिए न नेत्रों से छलछलाता प्यार ही था इनके पास, न रस में पगे मन की वीणा को झंकृत कर देने वाले मधुर शब्द –(जिन्हें सुनने के लिए मेरा मन और आत्मा बरसों से प्रतीक्षारत थे|) …न स्फुरित कर देने वाले प्रेमाकुल स्पर्श|” (पृ. 83)

प्रेम और अंतरंग मैत्री से अलग सामाजिक संबंधों का तानाबाना होता है जो उस खालीपन को अपने ढंग से भरता है| यहाँ उसका भी अभाव था| सुमित्रा सामाजिक अस्वीकृति के दो कारण बताती हैं- पहली विकलांगता और दूसरी दलित जाति से सम्बद्धता| “इन वजहों से सब मुझसे बस औपचारिक संबंध ही रखते हैं| घनिष्ठ आत्मीय संबंध किसी से कभी बन ही नहीं पाए… क्या कहूं इसे! सामाजिक रिश्तों की दौलत के मामले में कितनी निर्धन हूँ मैं| कोई एक भी तो घनिष्ठ मित्र नहीं है मेरा|” (पृ. 97) अपना सुख-दुख साझा करने के लिए कोई तो चाहिए| लेखिका ने उपाय ढूंढा, “कालांतर में किसी से अपना मन बांट पाने की छटपटाहट मुझमें इतनी बढ़ी कि किसी और को न पा अपनी कामवाली बाई से ही मैंने बातचीत करना शुरू कर दिया|” (पृ. 138) अक्सर कामवाली बाइयां अनाम होती हैं| लेखिका ने उन्हें नाम के साथ प्रस्तुत किया है| अलग-अलग समय पर जिन बाइयों से उनका संवाद हुआ है, उनके नाम हैं- अंगूरी, बीना, मालती और जुलेखा| समय-समय पर लेखिका ने इन्हें घरेलू कामों में सहायता के लिए रखा था| अपेक्षित आदर के साथ बाइयों का उल्लेख करते हुए भी लेखिका का वर्गबोध झलक गया है, “कामवाली बाई से प्रेमपूर्वक आत्मीय व्यवहार तो उचित है और सबको ऐसा करना ही चाहिए, पर उससे पारिवारिक या अन्य बातें करना आज के युग में सही नहीं|” (पृ. 138) “मानवीय संवेदना जहाँ से मिले उसे ग्रहण कर लेना चाहिए सो उचित-अनुचित की परवाह छोड़ इन मददगार स्त्रियों से मैं खूब बतियाती हूँ|” (पृ. 140) बाइयों से संवाद कायम करके लेखिका ने खालीपन को भरने की कोशिश की फिर भी एक टीसभरी रिक्ति बनी हुई है| सुमित्रा उसे छिपाने का प्रयास नहीं करतीं, “आज भी मेरा मन दूसरों से स्नेह पाने का अभिलाषी है|” (पृ. 143) रिक्ति से उपजी वेदना की सांद्रतम अभिव्यक्ति आत्मकथा के समापन अंश में यों है- “कोई एक भी ऐसा नहीं जिसकी आँखों से मेरे लिए दुख या खुशी के आंसू बहें|” (पृ. 155) लेखिका ने इस खालीपन को ठीक से पहचानकर उसे दो तरह से भरा| सौंदर्य से जुड़ने और सराहने की चाहत प्रकृति से पूरी की और मन की उलझनों को समझने व सुलझाने में इंटरनेट पर उपलब्ध ब्रह्मकुमारियों के व्याख्यानों ने सहायता की| कुदरत की ख़ूबसूरती में रमकर निराश करने वाले भावों से परे धकेलने के कुछ प्रसंग आत्मकथा में आए हैं| ऐसा एक प्रसंग है- “…निराशा भरे भावों को मन के किसी कोने में धकेल मैं जितना उपलब्ध है, उसे जीने की चेष्टा करती हूँ| चारों ओर फ़ैली हुई हरीतिमा, सघन देवदार और चीड़ के पेड़ों से घिरे खूबसूरत पहाड़ी जंगल, दूर तक फैली बलखाती सुंदर घाटियां, वेगवती नदियां, खिले हुए अनगिनत रंग-बिरंगे फूल, नेत्रों से पी जा सकने वाली इस प्राकृतिक छटा और इस सबसे मिलने वाले आनंद को तो कोई छीन न लेगा मुझसे|” (पृ. 118) ‘ब्रह्मकुमारीज’ से जुड़ाव को लेकर अपना पक्ष स्पष्ट करते हुए सुमित्रा कहती हैं कि वे उनके आत्मा-परमात्मा, शिवधाम और आध्यात्मिक विचारों से नहीं जुडीं लेकिन “मानव मनोवृत्तियों, परिवार और समाज के संबंधों, मनोग्रंथियों पर जैसी बातचीत मैं किसी घनिष्ठ मित्र से करना चाहती थी वैसी विश्लेषणपरक, गंभीर वार्ता बहुत रोचक शैली में मैंने इन ऑडियो टेपों में सुनी| … पुनः मन एक नवीन उत्साह से भर गया|” (पृ. 158-9)

दलित स्त्रीवाद को मजबूत व्यक्तित्वों की आवश्यकता है तो उसे साफ़ और गहरी राजनीतिक समझ की भी जरूरत है| कहना चाहिए कि शक्ति और सत्ता की समझ के बगैर आक्रोश व सदिच्छाएं भटक सकती हैं| ‘टूटे पंखों से परवाज़ तक’ में राजनीतिक संदर्भ लगभग नहीं हैं| यह अनुमान करना कठिन है कि विभिन्न राजनीतिक दलों, विचारधाराओं और शासन प्रणालियों पर लेखिका क्या सोचती हैं| उनका कोई ‘पॉलिटिकल स्टैंड’ है या नहीं? अगर लोकतांत्रिक प्रणाली और संवैधानिक प्रावधानों से बने कल्याणकारी राज्य का संज्ञान न लिया जाए तो लगेगा कि लेखिका की (स्कूल-कॉलेज-यूनिवर्सिटी में) पढ़ाई, बैंक में नौकरी और फिर प्रोफ़ेसर पद पर नियुक्ति मात्र उनकी अपनी मेहनत और मेधा का परिणाम है| तसव्वुर कीजिए कि अगर बैंकों का राष्ट्रीयकरण न किया गया होता तो क्या उसमें वंचित जातियों की इस पैमाने पर नियुक्तियां हो पातीं! सामाजिक न्याय की प्राप्ति के लिए विकलांगों हेतु विशेष भर्ती अभियान चलते? ऐसे ही एक ‘स्पेशल ड्राइव’ में लेखिका की बैंक में नियुक्ति हुई थी| कॉलेज में व्याख्याता पद पर नियुक्ति भी कल्याणकारी राज्य के प्रावधानों का नतीजा थी| अब जबकि संवैधानिक मूल्यों के उलट धारा बह चली है, बैंकों का विलय करके उनका निजीकरण किया जा रहा है, उच्च शिक्षा संस्थानों में स्थायी नियुक्तियों पर स्थायी विराम लग रहा है तब क्या सुमित्रा जैसी युवतियां ‘अपनी प्रतिभा और श्रम’ के बल पर वांछित मुकाम तक पहुँच सकेंगी? अब क्या न्यायपूर्ण सामाजिक रूपांतरण की प्रक्रिया ठहर नहीं जाएगी? लेखिका के अनचाहे उनकी आत्मकथा हमें इस विकट प्रश्न के सम्मुख ला खड़ा करती है और मानवाधिकार के सवाल पर अपना ‘स्टैंड’ तय करने को प्रेरित करती है|

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bajrangbihari@gmail.com

4 COMMENTS

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