अनुभव,आक्रोश और आन्दोलन ही दलित-अस्मिता का मूलवर्ती आधार हैः डॉ. बजरंग बिहारी तिवारी

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‘अनुभव,आक्रोश और आन्दोलन ही दलित-अस्मिता का मूलवर्ती आधार है, जिसके बिना उसकी कोई पहचान नहीं की जा सकती. न्याय और हिस्सेदारी की माँग कर रहीं ये जो आज की पीड़ित आवाज़ें हैं, ये हमारी आज की भारतीयता हैं. यदि आप अन्याय को समझते हैं तो न्याय के लिए आवाज उठाना अपने मनुष्य होने का सच्चा परिचय देना है’ – उक्त बातें हिंदी के प्रख्यात आलोचक डॉ बजरंग बिहारी तिवारी ने प्रगतिशील लेखक संघ,फैजाबाद व साकेत साहित्य परिषद्, अयोध्या के संयुक्त तत्वावधान में स्थानीय प्रेस क्लब में आयोजित ‘भारतीयता और अस्मितामूलक विमर्श’ विषयक एकदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में कहीं. प्रगतिवाद को भारतीय वैचारिक आन्दोलन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव मानते हुए उन्होंने कहा कि इन आन्दोलनों के फलस्वरूप विचारधारा के महत्व को अन्याय को समझने की दृष्टि से पहचाना गया था लेकिन अनुभव की बात कहीं छूट गयी थी. यह अनुभव ही अस्मितामूलक साहित्य की जमीन को बनाता है जिसे दलित, स्त्री, आदिवासी व अन्य सामाजिक विमर्श संभव करते हैं. अम्बेडकर ने बर्ट्रेंड रसेल की पुस्तक की जो समीक्षा की थी उसे उद्धृत करते हुए उन्होंने बताया कि कोई भी सामाजिक बदलाव समाज के सभी घटकों के शामिल होने से होता है, किसी एक हिस्से से बदलाव की प्रकृति को स्थायी नहीं किया जा सकता. अस्मितावादी आन्दोलनों की भारतीयता को लेकर डॉ बजरंग ने कहा कि भारतीयता कोई स्थिर अवधारणा नहीं है बल्कि यह एक गत्यात्मक विचार है. जब भी सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन हुए हैं, भारतीयता की अवधारणा पहले की तुलना में बदल गयी है. वैदिक समय में, बुद्ध और जैन के समय में, सहजयानियों व सिद्धों-नाथों के समय में, स्वाधीनता आन्दोलनों के समय में भारतीयता की अवधारणा में कई बार परिवर्तन हुए हैं. सामाजिक न्याय व शांति के बोध को लेकर चल रहे अस्मितावादी विमर्श एक नयी भारतीयता की इबारत गढ़ रहे हैं, जिसे हमें पहचानना होगा. कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे हिंदी के सुप्रसिद्ध आलोचक डॉ रघुवंशमणि ने अस्मितावाद के सन्दर्भ में उत्तरआधुनिक प्रभावों की चर्चा करते हुए कहा कि परिधि अब केंद्र की ओर बढ़ रहे हैं लेकिन यह देखना होगा कि वे स्वयं मजबूत हो रहे हैं या उसे मजबूत कर रहे हैं. उन्होंने जोर देकर कहा कि विभिन्न अस्मितावादी आन्दोलनों में जब तक समन्वय नहीं होगा तब तक कुछ हासिल नहीं किया जा सकता. इन आंदोलनों के साथ यह भी देखा जाना चाहिए कि लोकतंत्र बचा रहे ताकि अस्मिता की आवाज़ें भी बनी रह सकें. डॉ रघुवंशमणि ने कहा कि आर्थिक ग्लोब्लाइजेशन आज शुरू हुआ है लेकिन वैचारिक ग्लोब्लाइजेशन प्राचीन भारत में था. अस्मिताओं के लिए इस वैचारिक ग्लोब्लाइजेशन को नए ढंग से परिभाषित करने की जरूरत है. दलित चिन्तक आर डी आनंद ने परिचर्चा में शामिल होते हुए कहा कि अस्मिताएँ डॉ अम्बेडकर के पहले भी थीं लेकिन वे यथास्थितिवाद की अस्मिताएँ थीं. उन्होंने भगत सिंह को याद करते हुए कहा कि उन्होंने आज़ादी के संघर्ष को सत्ता के हस्तानांतरण तक सीमित न रखकर उसे सामाजिक रूपांतरण की शक्ति बनाने पर जोर दिया था ताकि सामाजिक न्याय व उसकी स्वतंत्रता के ध्येय को प्राप्त किया जा सके. अतिथियों का स्वागत डॉ नर्वदेश्वर पाण्डेय, श्री आर डी आनंद व डॉ जनमेजय तिवारी ने बुके भेंट कर किया. कार्यक्रम का संचालन-संयोजन डॉ अनुराग मिश्र ने जबकि धन्यवाद ज्ञापन प्रलेस के अध्यक्ष श्री स्वप्निल श्रीवास्तव ने किया. कार्यक्रम में डॉ योगेन्द्र प्रसाद त्रिपाठी, डॉ परेश पाण्डेय, डॉ दानपति त्रिपाठी, डॉ पवन सिंह, डॉ बी के सिंह, डॉ विशाल श्रीवास्तव, मोतीलाल तिवारी, डॉ विंध्यमणि, डॉ डी एन सिंह, डॉ शिवकुमार तिवारी, डॉ प्रभात श्रीवास्तव, डॉ रवि कुमार चौरसिया, डॉ असीम त्रिपाठी, डॉ नीता पाण्डेय, डॉ रमेश सिंह, डॉ विष्णु कुमार, डॉ छाया सिंह, डॉ वेद प्रकाश वेदी, डॉ संतलाल, डॉ संतोष सरोज, डॉ आलोक कुमार सिंह, डॉ अखिलेश कुमार, डॉ अविनाश तिवारी, डॉ रामलाल विश्वकर्मा, डॉ कृष्ण कुमार पाल, डॉ दिनेश कुमार, डॉ चन्द्रदेव सिंह, डॉ प्रमोद मिश्र व डॉ आशुतोष त्रिपाठी व नगर के अनेक गणमान्य नागरिकों के साथ-साथ हिंदी विभाग के ढेरों विद्यार्थियों ने भाग लिया.

 

  • डॉ अनुराग मिश्र

कार्यक्रम-संयोजक

एसोसिएट प्रोफेसर-हिंदी

का सु साकेत स्नातकोत्तर महाविद्यालय अयोध्या

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