पारिजात की पंखुड़ियाँः अजित कुमार राय

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(समकालीन संदर्भों में त्रयी का संस्कृति-चिंतन)
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भारतीय मनुष्य को ऑक्सीजन थोड़ी कम भी मिले तो वह जी लेगा परन्तु संस्कृति के बिना उसका सामाजिक जीवन असंभव है । भारतीय प्रज्ञा का आनुवंशिक उत्तराधिकार महाप्रलय के बाद भी नष्ट नहीं होगा । वह दूर्वादल की तरह अक्षत है क्योंकि बदलती पारिस्थितिकी के अनुसार समायोजन की उसमें असीम क्षमता है । हमने मृत्यु के अधिष्ठाता देवता से गंगा को अपनी जटाओं में धारण करना सीखा है । गंगा जो शुभ-अशुभ को आत्मसात् कर अपनी अस्मितागत पहचान बनाए रखती है । गंगा जो निरंतर प्रवहमान है । बहुत से लोग संस्कृति को स्थिर प्रत्यय समझते हैं और अपने को मुकुट, पीताम्बर, बाँसुरी और धनुष-बाण से ही जोड़े रखते हैं । किन्तु जापान के कवि ‘योननागुची’ ने भारत के स्वभाव को समझा था – समझा था उसकी मिट्टी की आनुवंशिकता को । उसने बीसवीं शती के पूर्वार्द्ध में अपनी भारत यात्रा के दौरान एक पुस्तक लिखी थी – ‘द गैंगेज काल्स मी’ । महामना मदन मोहन मालवीय जी से होते हुए वह पुस्तक श्रीकृष्ण राय ‘हृदयेश’ तक पहुँची । उन्होंने उसका हिन्दी काव्यानुवाद किया – ‘गंगा मुझे पुकारे’ ।
हमने नदियों, वृक्षों, वनस्पतियों की अर्चना की । प्रत्येक पत्थर को विष्णु का विग्रह समझा । आज जब पर्यावरण प्रदूषण नहीं, विनाश की ओर बढ़ रहा है तो अग्नि, पवन व वरुण की अभ्यर्थना का रहस्य समझ में आता है । एड्स के संहारक संक्रमण के संदर्भ में यौन-शुचिता या विवाह नामक संस्था की अर्थवत्ता खुलती है।
किन्तु हम संस्कृति के प्रति अंधविश्वास नहीं रखते । आज पृथ्वी अपनी धुरी बदल रही है । अहिंसा, क्षमा, सेवा और सत्य को समर्पित मसीहा जिस देश का पैगम्बर हो वह अन्य देशों को धर्षित किए चला जा रहा है और हमारे सारे देवी-देवताओं के हाथों में असंख्य आयुध हैं, आठ-आठ हाथों से हमने शक्ति-साधना की फिर भी हम हारते रहे हैं । उपनिवेश बने रहने के लिए अभिशप्त हैं । हमारी प्रतिरोधक क्षमता कुंठित हो गई है क्योंकि हमने गांधी को गँवा दिया, बुद्ध को खो दिया । इसलिए हिन्दुत्व पराभूत हुआ, ईसाइयत पराजित हुई । धर्म हारा, राजनीति के माथे मुकुट बँधा । ‘गुलाब’ पर ‘गेहूँ’ ने विजय पाई ।
अभी-अभी ब्रिटेन के न्यूकैसेल विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने क्लोनिंग तकनीक के जरिए एक संकर भू्रण विकसित किया है जिसमें डी.एन.ए. मानव का और बाकी हिस्सा गाय का है । प्रोफेसर जॉन बर्न लाख दावा करें कि यह शोध ‘नैतिक पैमाने’ पर पूरी तरह खरा उतरता है और भू्रण को जीवन देने का उनका कोई इरादा नहीं है । परन्तु परमाणु बम बनाने वालों नें भी नहीं सोचा होगा कि राजनीति अपने संकीर्ण निहितार्थों के लिए उनका दुरुपयोग करेगी । अभी क्या हमारे भीतर पशुता के लक्षण कम थे ? हमारे ‘नाखून’ आज भी बढ़ते रहते हैं । उन्हें काटने या तराशने की बजाय और बढ़ाना कहाँ तक समीचीन है ? हमें रचनात्मक संदर्भों में पशु बनना भी स्वीकार था । हिरण्यकश्यप के त्रास से मुक्ति दिलाने और विश्व मानस में वैष्णवता को प्रतिष्ठित करने के लिए हमें नृसिंह बनना पड़ा था । पर आज हमारे राजनीतिज्ञों में क्या वह इच्छा शक्ति शेष है कि एक ध्रुवीय मनुष्यहन्ता वर्चस्व के खिलाफ विश्व जनमत तैयार कर सके ? हमने वन में रहकर सभ्य आचरण सीखा । राजनीति पर तप का अंकुश लगाया । साधारण लोगों में आत्मविश्वास जगाया और बन्दर-भालुओं को संगठित कर विश्वविजेता का गर्व चूर किया । रावण मनुष्य को पशु (मारीच) बनाने की कला में यदि दक्ष था तो राम पशुओं को मनुष्य बनाने की तकनीक में विचक्षण । हनुमान जी के मानवीय गुणों का अतिक्रमण अभी तो संभव नहीं लगता –
शत घूर्णावर्त तरंग भंग उठते पहाड़
जलराशि राशि जल पर चढ़ता खाता पछाड़ ।
करने को ग्रस्त समस्त व्योम कपि बढ़ा अटल
लख महानाश शिव अचल हुए क्षण भर चंचल ।।
निराला की ‘राम की शक्तिपूजा’ के साक्ष्य से असीम ऊर्जा के स्रोत होते हुए भी हनुमान को अहंकार तो दूर अपने बल का बोध भी नहीं था । क्या बजरंगियों, विहिप और आर.एस.एस. को अपनी दिङ्मूढ़ प्रकृति या जड़ता को तोड़ने के लिए हनुमान या राम का आवाहन नहीं करना चाहिए ? अपने मिथकों को समझने के लिए हमें आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, पं0 विद्यानिवास मिश्र और कुबेरनाथ राय के सम्मुख खड़ा होना चाहिए । इन्हें ललित निबंध-संस्थान की ‘वृहत्त्रयी’ कहा जा सकता है । क्षेत्रीय संस्कृति और वैश्विक संस्कृति के द्वंद्व में भारतीय संस्कृति का भावी स्वरूप क्या होगा या कैसा होना चाहिए, इसे समझने के लिए वैचारिक पाथेय यहीं से प्राप्त होगा ।
कितनी बड़ी विडंबना है कि आज जबकि वैश्वीकरण और बाजार-संस्कृति के बहाने सांस्कृतिक-आर्थिक साम्राज्यवाद भारत में अपने पाँव फैला रहा है, हम अलग-अलग शिविरों में विभक्त आपस में ही लड़ रहे हैं ! परम्परावादी, प्रगतिवादी, जनवादी, स्त्री विमर्श और दलित विमर्श के पैरोकार के रूप में हमारा दायाँ हाथ बायें हाथ से लड़ रहा है । कौन जीतेगा – पता नहीं पर हम हारेंगे और हमारा खंडित दर्शन हमें भूत बनाकर छोड़ देगा । ‘समय चलता जायगा निर्बाध अपनी चाल ।’ वैसे भी आज समाज में साहित्य की भूमिका संदिग्ध हो गई है क्योंकि जिन कंधों पर दिलों को जोड़ने का गुरुतर भार था वे खुद अलग हो गए हैं । ‘मतभेद’ और ‘मनभेद’ का फर्क मिट गया है । हमारा बाजार से कोई विरोध नहीं, बाजार के दुष्प्रभावों और उसकी अपसंस्कृति से विरोध है । उसके समरूपीकरण (होमोजेनाइजेशन) से विरोध है । डा0 शम्भुनाथ के शब्दों में ‘‘सवाल है कि हम वैश्वीकरण, संचार-क्रान्ति और बाजारवाद के ढाँचे में जनतंत्र को धीरे-धीरे विसर्जित कर देना चाहते हैं या जनतंत्र के ढाँचे में वैश्वीकरण, संचार-क्रान्ति और बाजारवाद को ले आना चाहते हैं । इसीलिए वैश्विक संदर्भ में विद्यानिवास जी सांस्कृतिक समानता नहीं, ‘सांस्कृतिक संवाद’ की बात करते हैं । बहुलतावादी सामासिक-संस्कृति की बात करते हैं । किन्तु आज देश ग्लोब हो गया है और हम आयातित विचारों के बाजार बन गए हैं । पश्चिमी देशों का सांस्कृतिक कचरा हमें समृद्ध करता है । उपनिवेशवादी भाषा हमारी शान बढ़ाती है । लॉर्ड मैकाले ने तो हमें अंग्रेजी भाषा सिखाई जिससे हमें लाभ ही हुआ । इसी अंग्रेजी शिक्षा ने ब्रिटिश शासन की जड़ खोदी । किन्तु आज का संकट गहरा है । अंग्रेजी अब भाषा नहीं, माध्यम बनने का सपना देख रही है । अंग प्रत्यारोपण की प्रक्रिया में हमारा हृदय और गुर्दा बदलने के लिए ‘अमित’ डाक्टर लगे हुए हैं । अब तो जानवरों का गुर्दा और दिल भी हमारे भीतर धड़केगा । यह टेक्नॉलाजी का चमत्कार है । कभी गांधी ने जेल से मृत्यु शय्या पर पड़ी पत्नी को गुजराती में पत्र लिखने की अनुमति न मिलने पर पत्र ही नहीं लिखा और कहा कि ‘‘मेरी बीमार और मरणासन्न पत्नी को पत्र मिले या न मिले, मैं अंग्रेजी में पत्र नहीं लिखूँगा ।’’ पुस्तकें भले अंग्रेजी में लिखी जायँ, हमारे जीवन व्यवहार की भाषा भारतीय ही होगी । यह संदेश है गांधी का । हम हिन्दी में सांस लेंगे, बंगला में समझेंगे, मराठी या तमिल में बोलेंगे, पंजाबी में व्यवहार करेंगे । एक भाषिक अद्वैत या व्यवहार की एक पूर्णांक इकाई की उपलब्धि । किन्तु वर्तमान यथार्थ कुछ भिन्न है । डॉ प्रभाकर श्रोत्रिय के अनुसार ‘‘भारतीय भाषाएँ अंग्रेजी के डंडे सेे एक-दूसरे को पीटती रहीं और इस तरह देख नहीं पाईं कि वे खुद पिट रही हैं । ।’’ डॉ रामविलास शर्मा और कुबेरनाथ राय अंग्रेजी के प्रोफेसर थे किन्तु लिखा उन्होंने हिन्दी में ही। छिन्नमूल बुद्धिजीवियों के दम्भ से अलग ‘भारतीय आधुनिकता’ की खोज का प्रतिमान ! अपने को खोजने और रचने का यही उपक्रम बहुश्रुत और ‘कथा-कौतुकी’ आचार्य द्विवेदी के ललित निबंधों में लक्षित होता है । उनका पाण्डित्य प्रायः प्रच्छन्न है और काल के आयामों की थाह लेने वाली दृष्टि देकर अलग हो जाता है । स्मृति से लेकर वर्तमान इतिहास तक हृदय का छंद सजग पर्युत्सुक बना रहता है । उनमें वैचारिकता और लालित्य चेतना का अद्भुत साहचर्य घटित होता है । वे विषय के खूंटे से बँधे नहीं रहते, विषय की खूंटी पर स्वयं को टाँग देते हैं । पर इस व्यक्तित्व विधायिनी भाषा में कल्पना की निर्बंध उड़ान भी जमीनी तथ्यान्वेषण के लिए होती है । वैसा अन्वेषण नहीं, जैसा ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक पार्टिकिल फिजिक्स के नियमों को सत्यापित करने और ब्रह्माण्ड की संरचना को समझने के लिए परमाणुओं के बीच टक्कर कराने की व्यवस्था कर रहे हैं । 4.4 अरब पाउण्ड के खर्च से बनी यह सत्रह मील लंबी और लगभग 150 फीट ऊँची इस मशीन में परमाणुओं की टक्कर के दौरान खरबों डिग्री सेंटीग्रेड तापमान उत्पन्न होगा और हम बिग बैंग (महाविस्फोट) के समय में पहुँच जायेंगे । क्या इस प्रयोग का कोई साइड इफेक्ट नहीं होगा ? इससे जो अपार ऊर्जा का उत्सर्जन होगा उसका क्या होगा ? क्या ब्रिटेन के वैज्ञानिकों को धरती को हिला देने वाले इस एक्सपेरीमेंट का नैतिक अधिकार है ? क्या हम विश्वामित्र की तरह प्रतिसृष्टि की रचना करने की महत्वाकांक्षा से पीड़ित हैं या महाभारत की भांति सभ्यता की ध्वंसात्मक संरचना के कायल हैं ? जो भी हो पृथ्वी की कीमत पर ब्रह्माण्ड रचना का रहस्य कोई मूर्ख भी नहीं जानना चाहेगा ।
कुबेर नाथ राय ने अपने लेखन में मनुष्य, पृथ्वी और ईश्वर के त्रिक का संयोजन किया है और रामकथा को सूर्यकाव्य माना है । कृष्ण गीता में कहते हैं – ‘समासों में मैं द्वन्द्व समास हूँ ।’ द्वन्द्व समास अर्थात् संयोजक भूमिका – मनुष्य और मनुष्य के बीच, मनुष्य और ईश्वर के बीच, मनुष्य और पृथ्वी के बीच । वास्तव में ईश्वर के बिना मनुष्य का जीवन अधूरा है बल्कि असंभव है । ईश्वर तो हमारी अंतश्चेतना है, सर्वभूतान्तरात्मा है, विश्व-प्रज्ञा है । ईश्वर तो हमारा नैतिक अधिष्ठान है । ईश्वर से जुड़कर ही मनुष्य की चेतना अपने अहंकार को ‘अन्तर्यामी’ का रूप दे सकती है । और इस अंतर्यामी को उस ‘अक्षर’ के साथ जोड़ सकती है जिसके प्रशासन में सारे सूर्य, चन्द्र, तारा और ग्रह चलते हैं, ऋतुएँ अपना चक्र पूरा करती हैं । श्रोत्रिय जी ठीक ही कहते हैं – वस्तु जगत को ही यथार्थ मानने के तीखे बोध ने ईश्वर को मार दिया । लेकिन क्या इससे धर्म के नाम पर होने वाले झगड़ों का अन्त हुआ ? उल्टे इसने झगड़ने का ऐसा निर्भय समरांगण दे दिया जहाँ कोई आन्तरिक मूल्य परक बाधा ही नहीं रही । अगर ईश्वर के मरने से साम्प्रदायिकता मर जाती तो ईश्वर की मौत का भी जश्न मनाया जा सकता था । मनुष्य से मनुष्य को जोड़ने में यदि ईश्वर बाधक बने तो उसकी बलि चढ़ाई जा सकती है किन्तु वह तो प्राणों की ऊर्जा है, जीवन का रस है – वह ‘अमृता दृष्टि’ है जिसे पाकर जीवन-विष से सारी शिकायतें दूर हो जाती हैं । भारतीय मनुष्य सारे अभावों, गरीबी और पीड़ाओं के बावजूद पर्वों का उल्लास मना सकता है बल्कि अभावों का उत्सव मना सकता है । भूख को ‘उपवास’ का अर्थ देना ही मेरी दृष्टि में भारतीय संस्कृति का विश्व को अवदान है जिसे न समझ पाने के कारण ही वी.एस. नॉयपाल भारत को ‘घायल सभ्यता’ और ‘अन्धकार क्षेत्र’ के रूप में देखते हैं । उन्हें भारत ‘फंतासियों और खंडहरों’ का देश नजर आता है । यद्यपि उनकी इस स्थूल दृष्टि या अवधारणा को हमारे सांस्कृतिक पाखंड ने ही बल प्रदान किया और वे हमारी सभ्यता की विकृतियों को ही संस्कृति समझ बैठे – ‘‘गांधी की संवेदनशील कर्मठता यहाँ के भावशून्य ध्यान और निर्विचारता में बदल गयी । भारत की असफलता के केन्द्र में यही पूजा भाव है जो हर यथार्थ को उदात्त प्रतीकों में रूपान्तरित कर उसे पूज्य बना डालता है और यथार्थ यथावत घिनौना बना रहता है ।’’ किसी दूसरे ग्रह से देखी गई धरती की तरह यह भारत का जमीनी यथार्थ तो है परन्तु जिन्होंने ध्यान के एक भी प्रयोग नहीं किए, ध्यान के संबंध में उनकी ‘वैज्ञानिक’ टिप्पणी पर तरस आता है । जिस प्रकार मैक्समूलर ने स्थापना दी कि आर्य भारत में बाहर से आए – संभवतः वे जर्मन, ग्रीक, फारसी आदि जाति समूह का हिस्सा थे । उसी प्रकार नॉयपाल को भी लगता है कि भारतीय नेताओं में दधीचि की हड्डियाँ गलाने वाले गांधी सबसे कम भारतीय थे । गोया हिन्दुस्तान में तो राक्षसों को रहना चाहिए अथवा असभ्य आदिवासियों को । यहाँ सभ्याचरण से सम्पन्न मनीषी कैसे हो सकते हैं ? गोया बुद्ध और विवेकानन्द को पश्चिम ने ही पैदा किया और सूर्य का उदय शायद पश्चिम में ही होता है । पूरे विश्व को उपनिवेश बनाकर लूटने और संकीर्ण स्वार्थों के लिए देशों को बर्बाद करने वाली पश्चिमी सभ्यता के प्रति नॉयपाल का आलोचनात्मक विवेक मर जाता है । पश्चिम उन्हें प्रकाश का उद्गम नजर आता है। नोम चॉम्स्की उनसे कहीं अधिक ईमानदार, साहसी और प्रबुद्ध हैं जिन्होंने एकेडमिक जगत को आत्मालोचना और सत्य के निर्वाचन का दायित्व बोध दिया – बहती रोशनियों में ठहरे अँधेरे का अनावरण किया । दुर्भाग्यवश आचार्य द्विवेदी और दिनकर भी मैक्समूलर के प्रभाव में बह गए और अंग्रेजों की साम्राज्यवादी नीति (फूट डालो और राज्य करो) को समझ नहीं पाए । उनकी कूट बुद्धि आर्यों और द्रविणों को आपस में लड़ाती ही नहीं, अंग्रेजों के आक्रमण और उपनिवेश को वैधता भी प्रदान करती है । अब आर्य बाहर से आकर यहाँ कब्जा कर सकते हैं तो अंग्रेज क्यों नहीं । वह तो डॉ रामविलास शर्मा ने इतिहास, समाजशास्त्र, पुरातत्व, भाषा विज्ञान, साहित्य, दर्शन, मिथक, देवतन्त्र आदि अनेक स्रोतों से प्रमाणित कर दिया कि आर्य भारत के मूल निवासी थे । अंग्रेजी के प्रोफेसर होने के नाते वे अंग्रेजों की चाल को बखूबी समझते थे । उनका लक्ष्य अतीत की पुनर्व्याख्या या पुनरुत्थान नहीं, बल्कि अतीत के विरूपण से विभाजित भारत को किसी नए विभाजन की आशंका से सावधान करना है । आचार्य द्विवेदी यदि सांस्कृतिक इतिहास के सर्जक हैं तो डॉ शर्मा ने संस्कृति का नया इतिहास लिखा और विदेशी साम्राज्यशाहों के चमकदार ‘इतिहासवाद’ का पात्र उलट दिया जिसके नीचे सत्य छिपा था । बड़ा विचित्र विभ्रम है कि भौगोलिक विविधताओं और ‘विरुद्धों के सामंजस्य’ वाले दर्शन के देश में आर्य और द्रविण जैसी भिन्न प्रकृति के लोगों का साहचर्य क्यों नहीं संभव है । और मेरा एक सवाल है कि यदि आर्य जर्मनी आदि देशों से आए तो सभी तो यहाँ आ नहीं गए होंगे । क्या वेदांत दर्शन के समरूप (सर्वांगसम नहीं) संस्कृत भाषा और सोच का वह ढाँचा तत्कालीन विश्वमंच के किसी और भूभाग के साहित्य में मौजूद है ? अगणित महापुरुषों को जन्म देने वाली उर्वर धरती तब तक बंजर थी जब तक बाहर से आर्य आ नहीं गए । अपनी जन्मभूमि को स्वर्ग से अधिक श्रेयस्कर मानने और सोने की लंका को छोड़कर अयोध्या लौटने वाला ‘कूटस्थ’ चिंतन ‘स्याद्वादी’ मुद्रा में भी अपने मूल उद्गम को कभी याद क्यों नहीं करता ? हो सकता है आत्महंता जन-बादी इतिहासकार इसका उत्तर ढँूढें अथवा वेद के रचनाकाल को खींचकर ईसा बाद सिद्ध करने का प्रोजेक्ट हाथ में लें । यद्यपि नोबेल लॉरिएट टी0 एस0 इलियट ‘द वेस्ट लैण्ड’ शीर्षक अपनी जटिल प्रलंबित कविता में द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका से उपजे संत्रास का समाधान भारतीय दर्शन की जमीन पर ही देखते हैं । आर्य-द्रविड़ के पार्थक्य और अभिन्नता या ‘द्वैताद्वैत’ संबंध को मानस के एक प्रसंग द्वारा समझा जा सकता है । रावण जब हनुमान से पूछता है कि तुम कौन हो –
कह लंकेस कवन तैं कीसा । केहि के बल घालेहि बन खीसा ।। ………
तो हनुमान उत्तर देते हैं –
सुनु रावन ब्रह्माण्ड निकाया । पाइ जासु बल विरचति माया ।।
जाके बल बिरंचि हरि ईसा । पालत सृजत हरत दस सीसा ।। ….
जाके बल लवलेस तें, जितेहु चराचर झारि ।
तासु दूत मैं जाकरि हरि आनेहु प्रिय नारि ।।
अर्थात् रावण में भी राम की ही ऊर्जा प्रवाहित हो रही है ।
एडवर्ड सईद भी अंग्रेज विचारकों के बौद्धिक षड़यंत्र का पर्दाफाश करते हुए उनके बहुप्रचारित सिद्धांत ‘सभ्यताओं के संघर्ष’ की खूब खबर लेते हैं । पश्चिमी दुनियाँ ने ‘इस्लामिक आतंकवाद’ को सरलीकृत करके पूरी दुनियाँ के मुसलमानों पर चस्पा कर दिया है । वे इस बात से बहुत क्षुब्ध हैं कि ‘‘पूरब’ पश्चिम द्वारा रची गई एक फैंटेसी है जिसके माध्यम से पश्चिम इसे अपने से अलग करता है । इसे ‘अदर’ के रूप में विवेचित करता है । निश्चित रूप से इसके पीछे उसका वह सभ्यतागत अहं-बोध है जिसके तहत उसने अपने उपनिवेशों को लूटा ।’’ सच तो यह है कि अहं-बोध ही असभ्यता का लक्षण है । कम से कम सुसंस्कृत होने की पहचान तो नहीं ही है । जातीय अस्मिता या आत्मगौरव भी आत्महीनता से उबरने या आत्म-परिष्कार के संदर्भ में ही सही है, परपीड़न के संदर्भ में नहीं । वैसे यह सच है कि पश्चिम अधिक सभ्य है किन्तु भारत अधिक सुसंस्कृत ।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी मनुष्य के सर्वोत्तम चिंतन और सर्जनात्मक आचरण-पद्धति को ही संस्कृति की संज्ञा देते हैं । संस्कृति और परंपरा दोनों पार्श्ववर्ती शब्द हैं । परंपरा संस्कृति का संवाहक रथ है । संस्कृति द्विवेदी जी के लिए आन्तरिक भावात्मक सत्ता है । वे संस्कृति को लोकोपकार की उस उदात्त भूमिका में देखते हैं । जिसका सर्वोपरि लक्ष्य पूर्ण सभ्यता की रचना है । उसकी प्राथमिकता मनुष्य को उच्चतम नैतिक गुणों से लैस करना है । इसीलिए ‘चारुता’ की साधना-प्रक्रिया में कलाकार ‘ज्यों का त्यों’ के सत्य का अन्यथाकरण करता है । कला या रचना में वस्तुनिष्ठ यथार्थ से अधिक कलाकार की अन्तर्वेदना शामिल है । वे इतिहास और संस्कृति को जीवन के ठोस संदर्भों में देखना चाहते थे । अपने ऐतिहासिक उपन्यासों में भी उन्होंने सांस्कृतिक परिवेश का ही निर्माण किया है । ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ में इतिहास का अतिक्रमण कर बाण को आधुनिक बनाने और उनकी संवेदना को अपनी संवेदना में अन्तरित करने का महत् कार्य सांस्कृतिक अनुष्ठान को वर्तमान के लिए उपादेय बनाता है । उनका सांस्कृतिक अनुशीलन सम्राटों को नहीं, सामान्य जनता को सम्बोधित है । इतिहास की भव्य तरलताओं से अधिक वे लोक जीवन की बहुरंगी छवियों से आकृष्ट हैं । इस संस्कृति के निर्माण में आर्येतर सभ्यता (द्रविण, यक्ष, गंधर्व, नाग, असुर, वानर आदि) का यथेष्ट योगदान है । ‘अशोक के फूल’ में खिलती हुई सांस्कृतिक संचेतना हमें मानवीय सभ्यता की निरंतरता और सौंदर्य-बोध का साक्षात्कार कराती है – ‘‘धरती से मिले बिना स्वर्ग की वस्तुएँ मनोहर नहीं होतीं ।’’ कालिदास उनके प्रिय कवि हैं । उनमें यक्षों-गंधर्वों की सौन्दर्यानुभूति और पारम्परिक मनीषा के संचयी मन का संश्लेष है । उनके यहाँ अशोक सुन्दरियों के आसि×जनकारी नूपुर वाले चरणों के मृदु आघात से फूलता था, कोमल कपोलों पर कर्णावतंस के रूप में झूलता था और चंचल नील अलकों की अचंचल शोभा को सौगुना बढ़ा देता था । किन्तु अन्ततः वह उस विशाल सामन्त सभ्यता की परिष्कृत रुचि का प्रतीक है जो साधारण प्रजा के परिश्रम पर पली थी और उसके ससार रक्तकणों को खाकर ही बड़ी हुई थी । अन्यत्र वे नीरन्ध्र संस्कृति के रंध्रों से झाँककर शोषक तन्त्र के निहितार्थों को साफ पहचानते हैं – ‘‘हमने कम पाप किए हैं ? करोड़ों को हमने अनजाने में नीच बना रखा है, करोड़ों को जानबूझ कर पैरों तले दबा रखा है और करोड़ों को हमने उपेक्षा से महान संदेशों के अयोग्य समझ रखा है !’’ इसके बरक्स परदुःखकातर या द्रवणशील संस्कृति स्वयं को दूसरों के लिए दलित-द्राक्षा की तरह निचोड़ देने में ही अपना रूपक प्राप्त करती है ।
संस्कृति के भविष्य या भविष्य की संस्कृति के संधान के लिए उन्होंने अतीत से बड़ा गहरा संवादी संबंध बनाया । परंपरा या इतिहास-विच्छिन्नता को वे भयानक सांस्कृतिक दारिद्रय के रूप में देखते हैं । किन्तु वे उसके ‘शुद्धतावादी’ और पुनरुत्थानवादी खतरों से आगाह भी करते हैं । ‘राष्ट्रवाद’ को गाली समझने वालों को उनका ‘जातीय (राष्ट्रीय) साहित्य’ शीर्षक चर्चित निबन्ध पढ़ना चाहिए । जैसे प्रेमचन्द ने महाराणा प्रताप के राष्ट्रीय संघर्ष और उनकी जातीय स्वाधीनता की जिन शब्दों में सराहना की है वह आज भी स्पृहणीय है । कथित प्रगतिशील रचनाकार प्रेमचन्द के प्रताप प्रेम को अछूत क्यों मानते हैं ? हमने दूसरे की स्वाधीनता का भी आदर किया और दूसरे देशों को गुलाम नहीं बनाया किंतु अश्वमेध यज्ञ के द्वारा सम्राट बनने की महत्वाकांक्षा ने हमें अपने ही खून से संघर्ष सिखाया और प्रहरी हिमालय यह सब खड़ा-खड़ा देखता रहा । शिवालिक की पहाड़ियोें पर मुस्कुराते हुए द्वन्द्वातीत ‘कुटज’ को देख कर वे उसकी ‘दुर्दम्य जिजीविषा’ पर मुग्ध होते हैं । शिव की लटियाई हुई जटा की तरह ही अपनी वैचारिकी को काव्यात्मक लालित्य से संश्लिष्ट करते हुए वे इतिहास-विधाता की लीला और मनुष्यता की जय-यात्रा के साक्षी बनते हैं । कुटज का संदेश है कि कठोर पाषाण की छाती चीर कर पाताल की गहराइयों से अपना खाद्य खींच लो । झंझा-तूफान को रगड़ कर अपना प्राप्य वसूल लो । जीना भी एक कला है बल्कि तपस्या है । जियो तो प्राण ढाल दो जिंदगी में । यही फक्कड़ाना मस्ती और अपराजेय जीवनी शक्ति उनके लेखक में भी है । ‘देवदारु’ केवल साधारण वृक्ष नहीं और न ही गंगा केवल सामान्य नदी । ये न जाने कितने युगों की स्मृतियों का सार लेकर हमारे सम्मुख उपस्थित है । इस प्रकार वे ‘दूसरी परंपरा की खोज’ न कर परंपरा को समग्रता में समझने की दृष्टि विकसित कर रहे थे । कबीर का उद्धार इसी परंपरा की एक कड़ी है । डॉ0 विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार ‘‘वर्णवादी एकेडमिक दृष्टि से अलग नाथ-सिद्धों व कबीर की प्रतिष्ठा वस्तुतः उपेक्षित साधारण जनता एवं व्यापक हिन्दी समाज की सांस्कृतिक प्रतिष्ठा है ।’’ किन्तु क्या द्विवेदी जी जड़ कबीरपंथियों की अंधता का उपचार कर सकेंगे ? कबीर ने जो सीमाएँ तोड़ीं वही कबीरपंथ की सीमाएँ बन गईं । आज स्वामी रामदेव जैसे लोग योग के बहिरंग की पैकेजिंग कर करोड़ों रुपये कमा रहे हैं । यह संन्यासियों का परिग्रह या घर जोड़ने की माया अद्भुत है । द्विवेदी जी की श्रम-संस्कृति की जगह बिना श्रम के अथवा दूसरों के श्रम पर ‘करोड़पति’ बनने के सपने दिखाने वाली मीडियाकर अथवा एम्वे संस्कृति कितनी वरेण्य है ? किन्तु यहाँ रुककर कहना होगा कि सोमरस चाहे गंधर्वों से प्राप्त किया जाता रहा हो अथवा साक्षात् ब्रह्म से, मांस-मदिरा का सेवन किसी भी अर्थ में उचित नहीं कहा जा सकता । आज हमारे अधिकांश लेखकों को शब्दों की जुगाली से पहले द्राक्षासव में डूबना अनिवार्य हो जाता है किन्तु कहना नहीं होगा कि शास्त्रीय इतिवृत्तों या जनश्रुतियों पर आधारित द्विवेदी जी का अनेक तथ्य-संग्रह आज अप्रासंगिक हो चुका है । भारतीय पौराणिकता का बहुत सारा अंश आज निरर्थक हो चुका है । इसलिए निबंधों के विचार-बंध के बीच वह उबाऊ लगता है । जितना मिथकीय अर्थ आधुनिकता को सँवारने के लिए उपयुक्त हो, आज उसी का ग्रहण उचित है । कुबेरनाथ राय में भी इसी प्रकार संदर्भ बहुलता, लोकायत, डीह-डाबर, तन्त्र और आगम का अत्यधिक विस्तार खटकता है । कुल मिलाकर व्यक्ति व्यंजक या ललित निबंध विधा के प्रवर्तक के रूप में द्विवेदी जी का महत्व अक्षुण्ण है । नई परम्परा को निरूपित करने से अधिक महत्वपूर्ण है परवर्ती लेखकों को प्रभावित करना । यह उनके कालजयी व्यक्तित्व का प्रमाण है ।

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