अपनी दुर्दशा पर आँसू बहा रहा है काशी नागरी प्रचारिणी सभा का आर्यभाषा पुस्तकालय

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शुभनीत कौशिक की रिपोर्ट
हम रहने वाले हैं उसी उजड़े दयार के…
आज मैदागिन स्थित काशी नागरी प्रचारिणी सभा के आर्यभाषा पुस्तकालय गया। पुस्तकालय की स्थिति देखकर दिल बैठ गया। नागरी प्रचारिणी सभा पिछले एक दशक से जाता रहा हूँ। स्थिति पहले भी ख़राब थी। लेकिन आज तो कलेजा बाहर आने को हो गया। आर्य भाषा पुस्तकालय को बचाने के लिए बनारस के तमाम साथियों ने कोशिशें भी कीं, इसी साल गर्मियों में अदालत के निर्देशानुसार चुनाव भी हुए। लेकिन सभा की हालत जस-की-तस।
यह जो फटे हुए पुराने अख़बार आप देख रहे हैं, ये बनारस से छपने वाले दैनिक ‘आज’ की फ़ाइल है। वर्ष 1953 की। जनवरी 1953 की फ़ाइल नीचे फ़र्श पर औंधी पड़ी है। मेज़ पर बेतरतीब 1953 के ही दूसरे महीनों की फ़ाइलें धरी हैं।
जो रद्दी और दीमक खाई हुई किताबें देख रहे हैं। वे राजस्थानी भाषा और साहित्य, मुहावरे और लोकोक्ति कोश, सहित्येतिहास की दुर्लभ किताबें हैं। जो अब हमेशा के लिए ख़त्म हो गई हैं। उनका असली इस्तेमाल दीमकों ने ही किया। इनमें से अधिकांश किताबों के तो नाम भी पढ़ने में नहीं आ रहे थे। जिनके नाम पढ़ सका वे हैं :
• बाबू प्रभु दास, दृष्टांत कोष (इलाहाबाद : मिशन प्रेस, 1870)
• परदेश कहावत-रत्नाकर (इलाहाबाद : चर्च मिशन प्रेस, 1895)
• धरणीधर वाजपेयी व बालकृष्ण भट्ट, संस्कृत लोकोक्ति (प्रयाग : सरस्वती यंत्रालय, 1895)
• जयगोपाल कृत तुलसी शब्दार्थ प्रकाश (बनारस, 1898)
• अध्यापक रामरत्न, लोकोक्ति-संग्रह (आगरा : कोरोनेशन प्रेस, 1915)
• नारायण प्रसाद ‘बेताब’, प्रास-पुंज (कलकत्ता: हिंदी पुस्तक एजेंसी, 1919)
• विश्वंभरनाथ खत्री, लोकोक्ति कोष (कलकत्ता, 1923)
• देवनारायण उपाध्याय, लोकोक्ति-शिक्षक (ग़ाज़ीपुर : राम एंड कम्पनी, 1925)
• रामनरेश त्रिपाठी (संपा), घाघ और भड्डरी (इलाहाबाद : हिंदुस्तानी एकेडेमी, 1931)
• एमवी जम्बूनाथ, हिंदी मुहावरा कोष (बेंगलोर : शेषाद्रि एंड कम्पनी, 1935)
• कृष्णशंकर शुक्ल, हमारे साहित्य की रूपरेखा (बनारस : नंदकिशोर एंड ब्रदर्स, 1939)
• व्यथित हृदय, लोकोक्तियाँ (इलाहाबाद : रामनारायण लाल, 1943)
• लक्ष्मीलाल जोशी, मेवाड़ की कहावतें (उदयपुर : हिंदी विद्यापीठ)
• कहावत रत्नाकर न्यायावली और सुभाषितावली सहित (डूंगरपुर)
• रामदहिन मिश्र काव्यतीर्थ, हिंदी मुहावरे (बाँकीपुर : ग्रंथमाला कार्यालय)
• चंद्रलाल वर्मा, कुमाऊँनी भाषा की कहावतें
• कृष्णानन्द गुप्त, बुंदेली कहावत कोश (सूचना विभाग : लखनऊ)
• भोलानाथ तिवारी, हिंदी मुहावरा कोष (इलाहाबाद : किताब महल)
• बालमुकुंद ‘अर्श’ मलसियानी, मुहावरे और कहावतें (दिल्ली : विद्या प्रकाशन)
• रतनलाल मेहता, मालवी कहावतें (राजस्थान विश्व विद्यापीठ)
• व्यथित हृदय, खेती की कहावतें (बाँकीपुर : ग्रंथमाला कार्यालय)
• कामता प्रसाद जैन, हिंदी जैन सहित्य का संक्षिप्त इतिहास (वाराणसी : भारतीय ज्ञानपीठ)
• कामेश्वर शर्मा, हिंदी साहित्य को बिहार की देन (मुज़फ़्फ़रपुर : सुहृद संघ)
• कहावत कल्पद्रुम
आज सभा की लाइब्रेरी की यह दुर्दशा देखकर मन ख़राब हो गया। पहली बार यह लगा कि आर्यभाषा लाइब्रेरी का बच पाना अब मुश्किल है और यह अनिष्ट घटना हमारी आँखों के सामने ही घटेगी। एलईडी की रोशनी में नहाता हुआ बनारस देश-विदेश को रिझाता रहेगा। रील, टिकटॉक, इंस्टा, फ़ेसबुक, ट्विटर पर घाट और विश्वनाथ कारिडोर ट्रेंड होते रहेंगे, मेगा रैलियाँ और आयोजन होंगे। काशी की संस्कृति, इतिहास पर सभा से बमुश्किल कुछ किलोमीटर दूर स्थित विश्वविद्यालयों में राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सेमिनार होंगे, जिनमें लाखों-करोड़ों का वारा-न्यारा होगा।
और इस सब के बीच सरस्वती सदन, अभिमन्यु पुस्तकालय, कारमाइकल लाइब्रेरी, आर्यभाषा पुस्तकालय अंधेरे में दम तोड़ते रहेंगे। आर्यभाषा पुस्तकालय को बचाने का कुछ तो रास्ता होगा, कोई तो ज़रिया होगा, जिससे हिंदी-नागरी आंदोलन की यह समृद्ध थाती भावी पीढ़ियों के लिए सहेजी जा सके।
वर्तमान साहित्य पत्रिका के संपादक संजय श्रीवास्तवः माननीय उच्च न्यायालय, इलाहाबाद से अनुरोध है कि सोशल मीडिया में दिख रहे इस चित्र का संज्ञान ले। मा. न्यायालय नागरी प्रचारिणी सभा,काशी के इस ऐतिहासिक महत्व के आर्यभाषा पुस्तकालय में रखे बहुमूल्य पुस्तकों, दस्तावेजों को बरबाद करने वाले डा.सुधाकर पाण्डेय परिवार के आधिपत्य से इसे मुक्त कराते हुए इनके विरुद्ध सुसंगत धाराओं में कानूनी कार्रवाई का आदेश जारी करे।
व्योमेश शुक्ल

निर्णायक मुक़दमा इलाहाबाद हाईकोर्ट में है. बीते 9 जून को, सवा सौ साल के इतिहास में पहली बार, ज़िला प्रशासन की देखरेख में संस्था के चुनाव भी हो चुके हैं; लेकिन हाईकोर्ट के फ़ैसले के बिना वोटों की गिनती नहीं हो सकती. 9 जून से आज 26 सितंबर तक – पाँच बार मुक़द्दमे की तारीख़ भी लगी, लेकिन सूची में इस मुक़द्दमे का नंबर इतना पीछे रहा कि प्रॉपर मैंशनिंग आदि के बावजूद इसे सुना नहीं जा सका. मेरे जज़्बे में कोई कमी नहीं आयी है; लेकिन ऐसी सूचनाओं से मन हार-हार जाता है. महान हस्तलेख और कालजयी पांडुलिपियाँ ख़त्म हो रही हैं लेकिन पूर्व कांग्रेसी सांसद सुधाकर पांडेय का परिवार साठ साल से किसी दीमक की तरह उसे निर्लज्ज कुतरता चला जा रहा है. हिंदी समाज ध्यान दे : इस संस्था की बौद्धिक संपदा तो नष्ट हो गयी; अब उसकी भूसंपदा बिकेगी. यहीं. हमारी छाती पर. वहाँ शॉपिंग मॉल बनेंगे या बहुमंज़िला रिहायशी कोठियाँ. वे भी हम ही होंगे जो आने वाली पीढ़ियों को बतायेंगे कि यहाँ एक थी नागरीप्रचारिणी सभा.
अगर आप कुछ मदद कर सकते हैं तो कृपया कीजिये. पैसा नहीं चाहिये. वह है मेरे पास काम-भर. बस इस आवाज़ को, हिंदी के शोक को गूँजना चाहिये; ताकि न्यायालय हमें सुन ले. अगर न्यायालय सुन ले तो अब भी जीत हमारी तय है. ठोस मदद के लिये कुछ और जानना हो तो नीचे नंबर है. 9519138988

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