कितना बड़ा अंतर है समाज और संसद में

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लेखक अनुपम कुमार भगत सिंह छात्र मोर्चा से संबद्ध हैं।
सीपीआई में रहकर क्राउड फंडिंग करनी पड़ रही थी, और AC भी खुद लगवाना पड़ रहा था और वहां से संसद जाना कठिन काम था।
कांग्रेस के पास बहुत पैसा है, यहाँ Ac पहले से लगा है और संसद जाना भी आसान है।
नाराज मत होइए, बल्कि खुश होइए क्योंकि कन्हैया कुमार ने बहुत सारे छात्र नेताओं का अंतर्विरोध को हल दिया है। जो सिद्धांत और विचारधारा के कारण बड़ी चुनावी पार्टियों में जाने से पहले हिचक रहे थे। अब उन छात्र नेताओं को कन्हैया कुमार के रूप मजबूत तर्क मिल गया है।
वैसे ये परंपरा नई नहीं है, मेरे जानने में संदीप सिंह, मोहित पांडेय, जयंत जिज्ञासु ( राजद) ऐसा कर चुके हैं।
और क्यों न करे ऐसा कन्हैया कुमार, जब वो यही मानते हैं कि चुनाव जीत कर ही वो समाज और देश को बदल या बचा सकते हैं। तो क्यों किसी चुनावी कम्युनिस्ट पार्टियों में समय बर्बबाद करें। कांग्रेस बाकी सभी चुनावी कम्युनिस्ट पार्टियों से अच्छा मंच उपलब्ध करवा रही है। यह समझना तो कम्युनिस्ट पार्टियों को चाहिए कि क्या उनका सिद्धान्त चुनाव लड़कर संसद – विधानसभा मे जाकर संघर्ष करने का है। यह जनता को गोलबंद करके सत्ता का दखल करना है।
जबतक इस अंतर्विरोध को कम्युनिस्ट पार्टियां हल नहीं करती है उनका रास्ता संसद है या जन संघर्ष तब तक उनके तपे-तपाये , संघर्षरत कैडर अपनी सुविधा अनुसार बड़ी चुनावी पार्टियों में जाते रहेंगे। क्योंकि छात्र राजनीतिक तक तो सब ठीक रहता है, उसके बाद जब छात्र जीवन ख़त्म हो जाता है तब यह अन्तर्विरोध सामने आता है। क्योंकि यह व्यवहारिक सत्य है कि इस जातिवादी- सामंती व साम्प्रदायिक समाज मे आप मुद्दों पर चुनाव नहीं जीत सकतें हैं।
क्योंकि समाज को संसद में बैठकर बदलना घोर अव्यवहारिक है। आप वाकई समाज को बदलना चाहते हैं तो आप समाज के बीच जाइये न, संसद में बैठकर क्या गलबात कर रहे हैं। जनता से मिलिए उनके बीच रहिए संगठन बनाइये और उनको गोलबंद करिए।
नेता वोट जाति और धर्म के नाम लेता है और संसद जाकर कॉर्पोरेट ( कृषि कानून,शिक्षा नीति,लेबर कोड आदि) के हित मे कानून पास करवाया देता है। कितना बड़ा अंतर है समाज और संसद में है।
चिंता की बात यह है कि जनता हर बार ठगी जाती है। उसके नेता दल बदलकर उच्चे ओहदे पर पहुँच जाते हैं और जनता फ़क़ीर बनी रहती है।
और ज्यादा चिंता मत करिए कन्हैया कुमार कोई जन नेता नहीं है वो वक्ता अच्छा है। छात्र नेता भी अच्छा होगा (शायद)। क्योंकि वो कितना जनता की बीच गया है, कितना जनता के दुःख दर्द और उनके बीच के अन्तर्विरोध को समझा और हल किया।
कन्हैया कुमार से निराश न होइए कॉमरेड चंदू से प्रेरणा ले जो Jnu से निकल कर जनता बीच गए। आप कॉम हेम मिश्रा को याद कीजिये जो JNU के छात्र है और जनांदोलनों की आवाज़ उठाने के कारण अभी उनको इस सत्ता ने आजीवन कारावास दे दिया है। लेक़िन उनको कोई जनता क्योंकि कॉम हेम ने न अपने लिए कोई किताब लिखी और न ही चुनाव लड़ा । सिर्फ़ जनता की मुक्ति महत्वकांक्षा लेकर संघर्सरत रहे।
कन्हैया कुमार से जितना आपने जितना सीखा है या प्रेरणा मिली है उतना लीजिए। हो सकता है आप उस से प्रभावित होकर इस संघर्ष की राजनीति में आएं हो लेक़िन कोई जरूरी नहीं उनको आंख बंद करके फॉलो करें।

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