पूंजीवाद में अराजकता को खत्म ही नहीं किया जा सकता

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पूंजीवाद, अराजकता और विकल्प
पूंजीवाद में अराजकता को खत्म ही नहीं किया जा सकता है। अराजकता का एक ही विकल्प है, नियोजन। परंतु पूंजीवाद को नियोजन से परहेज है क्योंकि नियोजन सामाजिक हितों के अनुरूप होगा न कि व्यक्तिगत लाभ के लिए। साधनों के सामाजिक जरूरतों के अनुरूप इस्तेमाल के लिए अर्थव्यवस्था के कुछ मौलिक प्रश्नों का हल ढूंढना होता है:
किन वस्तुओं का उत्पादन हों
कितनी मात्रा में उत्पादन हो
किनके लिए उत्पादन हो, और
किस तकनीक से उत्पादन हो।
पूंजीवादी, वित्तीय सट्टेबाजी आधारित एकाधिकारी व्यवस्था इनका कोई हल नहीं दे सकता क्योंकि इसके तहत सामाजिक साधनों के निजी संकेंद्रन के जरिए उत्पादन वितरण प्रक्रिया में निजी मुनाफे के लिए अधिक से अधिक लोगों, (उत्पादकों और उपभोक्ताओं) को मुख्य धारा से बाहर करने की होती है। परिणाम यह होता है कि एक ओर उत्पादन की मात्रा और जरूरतमंदों की जरूरतों में कोई तालमेल नहीं रह जाता और दूसरी ओर साधनों के अत्यधिक दोहन के कारण प्राकृतिक असानुलान पैदा हो जाता है। एक ओर सम्पूर्ण सामाजिक आर्थिक साधनों का इस्तेमाल चंद लोगों की अकूत दौलत केंद्रित करने के उद्देश्य की पूर्ति में झोंक दिया जाता है, और दूसरी ओर मानवता का बहुत बड़ा हिस्सा विपन्नता के गर्त में धकेल दिया जाता है। पूंजीवाद के इसी चरित्र के कारण औद्योगिक क्रांति के बाद उत्पादक शक्तियों में अकूत वृद्धि के बावजूद भूखे लाचार मानवता की मात्र में लगातार वृद्धि होती जा रही है।
सवाल यह है कि उत्पादन शक्तियों, तकनीकों में इतनी वृद्धि के बावजूद आज मानवता इतनी बदहाल क्यों है?
आज दुनिया के 99 फीसदी साधनों पर 10 फीसदी लोगों का नियंत्रण है। इसका अर्थ यह नहीं कि उत्पादन केवल 10 फीसद लोग ही करते हैं। बल्कि उत्पादन करने लायक और उससे कम उम्र वाली भी पूरी जनसंख्या उत्पादन कार्य में शामिल होती हैं। पर सामाजिक उत्पाद पर चंद लोगों का नियंत्रण होने के कारण और तथाकथित सांविधानिक स्वतंत्रता के कारण थोड़े लोगों को पूरे साधनों का इस्तेमाल कर पूरे उत्पाद को कुछ लोगों की जरूरतों को पूरी करने की स्वतंत्रता हासिल होती है और शेष अपार मानवता को भूखा, बीमार, अनपढ़ और विपन्न रह जाने की “स्वतंत्रता” प्राप्त होती है। पूंजीवादी लोकतांत्रिक स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्त्व की यही परिभाषा होती है जिसके आधार पर यह पाखंड किया जाता है और समाजवादी व्यवस्था को मानवीय स्वतंत्रता का घातक बताया जाता है।
इसी व्यवस्था का यह परिणाम होता है कि पूरा समाज अराजकता के अंधेरे में कराह रहा है।
इस अराजक व्यवस्था ने साधनों और उत्पादों को वित्त पूंजी के मकड़जाल में लपेट कर सट्टा बाजार में न केवल साधनों की बोली लगाता है वरन पूरे मानवता को ही गुलामी के सट्टा बाजार में बोली लगाने के लिए घसीट लाता है। यह किसी भी सामाजिक जरूरत को अपने दायरे में नहीं रहने देता है। यही कारण है कि आज पूरा विश्व, तथाकथित विकसित देशों सहित, बेरोजगारी, गरीबी और बीमारी के शिकंजे में फंसा हुआ है। किसी को इसकी कोई चिंता नहीं है। इस बेरोजगारी और गरीबी से लड़ने की किसी भी पूंजीवादी सत्ता के पास कोई योजना नहीं है। अरे नहीं, योजना तो एक बुरा शब्द है न, पूंजीवादी शब्दकोश में!
इसके उलट सारी सरकारें पूंजीपतियों के गठजोड़ में गरीब बेरोजगार मेहनतकशों के बजाय पूंजीपतियों के हित में और भी कड़े कानून बनाकर सामाजिक साधनों को और ज्यादा निजी हाथों में सौंप, मजदूरी की कीमत और मजदूरी की हालातों को और भी कठिन बनाकर मुनाफे और संपत्तिहरण में वित्त पूंजीपतियों साम्राज्यवादियों की के लिए अनुकूल परिस्थितियां पैदा कर रही हैं। और यह किसी एक देश या एक सरकार की नहीं वरन पूरी दुनियां के वित्तीय “अल्पसंख्यकों” के घिनौने गठजोड़ के तहत हो रहा है। यही यूनाइटेड नेशंस के 17 सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स (SDG) का सार है जिसका ढोल पूंजीवादी बुद्धिजीवी और अर्थशास्त्री जोर जोर से पीट रहे हैं।

तो अराजकता पूंजीवाद का मौलिक चरित्र है। न यह इससे बाहर आ सकता है और न ही ऐसा करना इस व्यवस्था के लिए संभव है। बीमारी, गरीबी, अंधविश्वास, अवैज्ञानिकता, महामारी, अकाल, बाढ़, जलवायु परिवर्तन में मानवता कराह रही है। पूंजीवादी गलघोंटू होड़ के कारण यह दिन पर दिन और गहराता जाएगा।
मानवता को इस त्रासदी से बचाने का एकमात्र उपाय इस व्यवस्था का यथाशीघ्र अंत है। परंतु इसके लिए मेहनतकशों को वर्गीय राजनीतिक चेतना से लैश करना, इसे सत्ता लेने की तैयारी करने के लिए जिस आंदोलन की जरूरत है वह बहुत ही शिथिल है। इस कार्यभार के लिए हमारा प्रयास नकदी है और यही पुनिवादियों साम्राज्यवादियों को लगभग भयमुक्त बना देता है। आज यह समाजवाद के भूत से भयग्रस्त नहीं के बराबर है। वैसे यदाकदा सत्तासिनों और पुनपतियों के मुंह से समाजवाद की बुराई सुनाई दे जाती है। मेहनतकशों की कलम और हथियार दोनो ही इसके सपने में दिखाई दे जाते हैं। पर इनसे इनकी नींद नहीं उड़ती, क्योंकि मेहनतकशों की सांगठनिक एकता बहुत ही कमजोर है।
अराजकता जारी रहेगी जबतक शोषित पीड़ित मानवता ऐसा होने देगी।
विद्यानंद चौधरी

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