किंतु-परंतु के साथ अंबेडकर की भी जय हो!!!

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बाबा साहब अम्बेडकर की 65वीं स्मृति दिवस पर ‘चार्वाक’ की टीम उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करती है. बाबा साहब हमारे पुरखों में से एक ऐसे शख्सियत हैं जो जातिगत उत्पीड़न के खिलाफ अनवरत संघर्ष करने, दलितों और महिलाओं के अधिकारों के लिए संविधान में अपने योगदानों के लिए हमेशा याद किए जाएंगे. उनके समतामूलक समाज का सपना वर्णों और जातियों में बंटे भारतीय समाज के सभी सामाजिक समूहों के लिए था. वे साफ शब्दों में कहते हैं कि हमारा भारतीय समाज बीमार है और इसका कारण वर्णों और जातियों की सोपानक्रम असमानता ही है. वे इस मामले में मुतमईन हैं कि वर्ण और जातियों की गैरबराबरी खत्म होने से केवल दलित और महिलाएं ही अत्याचार और गुलामी से मुक्त नहीं होंगे बल्कि सवर्ण भी अपने जातिय श्रेष्ठताबोध से मुक्त होकर एक स्वस्थ इंसान बनेंगे. इस आर्थिक और सामाजिक गैरबराबरी के खिलाफ बाबा साहब अम्बेडकर आजीवन संघर्ष करते रहे और अंततः वर्ण-जातिव्यवस्था की आर्थिक और सामाजिक गैरबराबरी से बहुत व्याकुल और निराश होकर 14 अक्टूबर 1956 को बौद्ध धर्म अपनाया.
डॉ. अम्बेडकर के लेखन और उनकी अंतर्दृष्टि के हवाले से आज हम सभी जानते हैं कि वर्ण-जातिव्यवस्था ही हिंदू धर्म है. यदि अपने समाज से जातियों का समूलनाश हो जाए तो हिंदू धर्म का अस्तित्व ही नहीं रहेगा. सांप्रदायिक हिंसा का कारण भी हिंदू धर्म ही है जिसका ईधन जातिव्यवस्था है. सांप्रदायिक हिंसों में सबसे ज्यादा नुकसान किसी भी तबके के गरीबों और अल्पसंख्यक समुदाय का ही होता है. हम न चाहते हुए भी रोजमर्रा के जीवन में जातिव्यवस्था की संस्कृति का पालन करते हैं. यह अपनेआप में बहुत पीड़ादायी है कि जिससे हम नफरत करते हैं वह हमारी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है. इस देश में किसी भी धर्म या सम्प्रदाय का व्यक्ति वर्ण-जातिव्यवस्था की गैरबराबरी और उत्पीड़न से अछूता नहीं है. इसकी कीमत सबसे ज्यादा गरीब चुकाते हैं. दलितों, महिलाओं और आदिवासियों की पीड़ा तो अकल्पनीय है.
वर्ण और जातिव्यवस्था की आर्थिक-सामाजिक संरचना ने अपने उद्भव काल से इतिहास के कई उतार-चढ़ाव को तय किया है. मुगल साम्राज्य और अंग्रेजी राज भी इस शैतान से हाथ मिला लिया था. आधुनिक काल में भी यह दीर्घजीवी बना हुआ है. इससे जाहिर है कि हमारे समाज में इसकी नींव बहुत गहरी है. इसकी नींव गौतम बुद्ध (ईसा पूर्व 600-500) के करीब ही पड़ गई थी. इसीलिए गौतम बुद्ध ने अपने जीवन काल में हर हमेशा वर्ण व्यवस्था का विरोध किया है. प्राचीन काल में वर्ण-जातिव्यवस्था एक जटिल सामाजिक परिघटना के कारण अस्तित्व में आया था. इस संस्कृति को जिन्दा रखने के लिए ही इतिहास के अलग-अलग कालखंडों में वेद, पुराण, उपनिषदों इत्यादि की रचना की गई है जिसका प्रतिरोध हमारे पुरखों ने लगातार की है. बाबा साहब अम्बेडकर उसी परम्परा के आधुनिक महापुरुष थे.
भारतीय समाज दुनिया के अनेक जटिल समाजों में से एक है. यह कहना ज्यादा उचित है कि इसकी जटिलता इसके सांस्कृतिक विविधता के कारण भी है. दुनिया के नक़्शे में दक्षिण एशिया का भौगोलिक क्षेत्र अपने जलवायु की विविधता के कारण प्राकृतिक खूबसूरती से लबरेज है. इस भौगोलिक क्षेत्र में दुनिया के अन्य भौगोलिक क्षेत्रों के मुकाबले में जीवन यापन बहुत आसान रहा है. जिसके कारण दुनिया के अन्य भू-भागों से समय-समय पर अन्य कबीलाई जनजातियाँ भारतीय भू-भाग में शरण लेती रही हैं. इस विविधता की अकल्पनीय व्यथा और पीड़ा दलितों, महिलाओं और आदिवासियों के इतिहास और वर्तमान का हिस्सा है.
दोस्तों! आज हम आधुनिक युग में हैं. हमारे और आपके सीने में हमारे पूर्वजों की पीड़ा, गुस्सा, साहस और लाड़ाकूपन ज़ज्ब है. हमारे और आपके कंधों पर बाबा साहब अम्बेडकर के समतामूलक समाज के सपने को पूरा करने का कार्यभार है. गरीबी, जातिगत उत्पीड़न, महिलाओं का उत्पीड़न, आदिवासियों को जल, जंगल, जमीन से बेदखली और अल्पसंख्यक समुदाय पर सांप्रदायिक हिंसा की समस्या हमारे सूझबूझ और लड़ाकूपन का इम्तिहान ले रही है. हमें एक साथ कई मोर्चों पर काम करने की प्रतिभा और ज़िद को साबित करना है. हमें एक तरफ आरक्षण के संवैधानिक अधिकार को बचाए रखना है तो दूसरे तरफ सभी तबके के गरीबों को संगठित भी करना है. हमें एक ही साथ पूंजीवादी और जातिगत शोषण-उत्पीड़न के खिलाफ लड़ना है. हमें एक ही साथ मर्दों के द्वारा महिलाओं पर हो रहे जुल्म के खिलाफ और उनके आपसी एकजुटता के लिए भी लड़ना है. जनता की आवाज उठा रहे बुद्धिजीवियों को भारतीय शासक वर्ग द्वारा हत्या, गिरफ़्तारी और मुकदमों से बचाना भी है और उनके कमियों-कमजोरियों की सख्त आलोचना भी करनी है. भारतीय और दुनिया के लुटेरे इतिहास के ऐसे मुकाम पर हैं कि श्रम की लूट के लिए देश की सीमाओं को लांघकर एकजुट हो चुके हैं. लूट के लिए हमारे बीच मौजूद जातिगत, धार्मिक, लैंगिक और देशभक्ति इत्यादि मतभेदों का इस्तेमाल कर गरीबों को ही आपस में लड़ा रहे हैं. सारी देशभक्ति गरीबों के मत्थे है. लूटेरे देशभक्ति को ठेंगा दिखाते हुए देश की सीमाओं को लांघकर दुनिया के मेहनतकशों का शोषण-उत्पीड़न में मशगूल हैं. ऐसे में दुनिया के उत्पीड़ित मेहनतकश हमारे भाई-बन्धु हैं. हम दुनिया के किसी भी भू-भाग में हो रहे मेहनतकशों के शोषण-उत्पीड़न का प्रतिरोध करके उनसे अपनी एकजुटता जाहिर कर अपनी ताकत को बढाएँगे. आइये! हम अपने पुरखों की सूझबूझ, दूरदर्शिता और जिजीविषा को अपने जेहन में ज़ज्ब करते हुए बाबा साहब के सपनों को साकार करने के लिए अनवरत संघर्ष का संकल्प लें. हम आपसे चार्वाक के कारवां में शामिल होने की भी अपील करते हैं. चार्वाक प्राचीन भारतीय भौतिकवादी दर्शन है. चार्वाक दर्शन वैदिक दर्शन और संस्कृति का विरोधी रहा है. अजित केशकंबली को चार्वाक दर्शन के अग्रदूत के रूप में श्रेय दिया जाता है.
“शोषण-उत्पीड़न मुक्त समाज ही हमारा लक्ष्य है”
संपर्क – 9313428953, 9015748869,
email -charvakphilosopher@gmail.com
#चार्वाक के तरफ से जारी

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