अब अगर लॉक डाउन लगता है तो हमलोग खाये बगैर मर जायेंगे……

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रितेश विद्यार्थी
इलाहाबाद शहर में छोटी- बड़ी कुल मिलाकर करीब 200 के आस- पास झुग्गी- झोपड़ियों वाली मलिन बस्तियाँ हैं। जहाँ हज़ारों लोग अमानवीय परिस्थितियों में रहने के लिए विवश हैं। इन बस्तियों और उसमें रहने वाले लोगों की स्थिति देखकर कहीं से भी यह नहीं कहा जा सकता है कि वो सिविल सोसाइटी द्वारा परिभाषित ‘आम जनता’ की कैटेगरी में भी शामिल हैं। इन बजबजाती हुई बस्तियों में हजारों की संख्या में लोग रहते हैं। जिनके पास रोजगार का कोई भी साधन नहीं है। जिंदगी जीने के लिए उनसे जो बन पड़ता है, वो करते हैं। सफाई का काम, कबाड़ बीनने का काम, रिक्शा चलाने का काम , दिहाड़ी मजदूरी, रेहड़ी- पटरी का काम, सुवर पालने का काम आदि।
इलाहाबाद के शहरी मजदूर वर्ग का एक बड़ा हिस्सा इन बस्तियों में ही रहता है। यहां रहने वाले मजदूर बिल्कुल असंगठित हैं। इनका अपना कोई यूनियन नहीं है। वर्तमान समय में इनके बीच वामपंथी- आम्बेडकरवादी या अन्य किसी भी तरह का कोई संगठन सक्रिय नहीं है। यहां तक कि कुछ एनजीओ जो इनके बीच काम करते थे वो भी अब सक्रिय नहीं हैं। ऐसा लगता है कि इनका कोई माँ- बाप नहीं है। इनके बीच मजदूर वर्गीय चेतना का भी काफी अभाव है, राजनीतिक चेतना की तो बात ही छोड़ दीजिए। हाँ ये इतना जरूर जानते हैं कि किसी की भी सरकार बने इनके जीवन पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। कई बस्तियाँ तो ऐसी हैं जहां अधिकांश लोग बाबासाहब आम्बेडकर और भगत सिंह का नाम भी नहीं जानते। नशाखोरी यहां आम बात है। क्योंकि लुटेरे वर्गों ने जानबूझकर ऐसी हर मलिन बस्ती के सामने देशी दारू का ठेका खोल रखा है। ऐसी अमानवीय स्थिति में जीवन जीने के बाद भला होश में कौन रहना चाहेगा। इसलिए ये समाज नशाखोरी के जाल में फंसता चला गया है।
इन बस्तियों में रहने वाले ज्यादातर लोग दलित व मुस्लिम हैं। इनमें चित्रकूट, बाँदा, बुंदेलखंड और मध्यप्रदेश के अति पिछड़े इलाकों से आने वाले लोगों की संख्या ज्यादा है। गांवों में व्याप्त सामंती व्यवस्था ने उन्हें जमीन व घर हर चीज़ से वंचित कर दिया। इनमें से बहुतों के पास गाँव में घूर फेंकने भर भी जमीन नहीं है। जिसकी वजह से ये भागकर शहर आ गए। शहरों में कल- कारखानों व उद्द्योग धंधों के अभाव में ये बेरोजगारों की भीड़ में शामिल होते चले गए। इनके पास कोई सम्मान जनक व स्थायी काम नहीं है। पिछले लॉक डाउन में जब देश के छोटे- बड़े शहरों से तमाम मजदूर लौटकर अपने गाँवों की ओर जा रहे थे तब भी इन बस्तियों में रहने वाले लोगों के पास लौटकर जाने के लिए कोई जगह नहीं था। कुछ मानवीय लोगों, संस्थाओं व कुछ हद तक सरकार द्वारा बांटे गए राशन के बल पर और अपने पास बचा कर रखे गए कुछ पैसों के दम पर किसी प्रकार इन लोगों ने लॉक डाउन के महीनों को काट लिया।
इन बस्तियों में मुझे कोई ऐसा आदमी नहीं मिला जिसे कोरोना से डर लगता हो। क्योंकि कोरोना से ज्यादे खतरनाक बीमारियों से ये लोग पहले से जूझ रहे हैं। महिलाएं खून की कमी से जूझ रही हैं, बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। टीबी, मलेरिया, डेंगू, पीलिया, टायफाइड आदि दर्जनों बीमारियों से ये घिरे रहते हैं। जिनमें से कुछ संक्रामक भी होती हैं। इनके लिए शहर में कोई अस्पताल भी नहीं है। प्राइवेट अस्पतालों का खर्च ये वहन नहीं कर सकते। इनकी मौतों का तो कोई गणना भी नहीं होता। गरीबी की वजह से ये अंधविश्वास में जकड़े रहते हैं। इन्हें सबसे ज्यादा डर भूख से, बेकारी व बेरोजगारी से, दुबारा लॉक डाउन न लग जाये इससे लगता है। बस्ती के लोग कहते हैं कि अब अगर लॉक डाउन लगता है तो हमलोग खाये बगैर मर जायेंगे। क्योंकि पिछली बार तो हमलोगों के पास कुछ बचाकर रखे गए पैसे थे, इस साल तो कुछ भी नहीं है।
बहुत सी ऐसी बस्तियां हैं जहां लोग पचासों साल से झुग्गी- झोपड़ी बना कर रह रहे हैं। लेकिन आज तक उन्हें जमीन पट्टा नहीं हुआ। कब नगर पालिका का बुलडोजर आये और उनकी झुग्गी गिरा दे इसकी कोई गारंटी नहीं रहती है। कई बार इनकी झुग्गियां गिराई भी गईं लेकिन जिंदा रहने के जद्दोजहद में फिर से ये लोग वहीं पर या किसी नई जगह पर अपनी झुग्गी खड़ा कर लेते हैं। एक झुग्गी में पांच- पांच, दस- दस लोग रहते हैं। इनकी बस्तियों में न पीने के लिए साफ पानी का पर्याप्त प्रबंध है, न शौचालय है। अगर ये लोग महिलाओं के लिए टीन शेड लगाकर शौचालय का प्रबंध भी करते हैं तो आस पास की कॉलोनी वाले पुलिस बुलाकर उसे ध्वस्त करा देते हैं।
सरकार कहती है कि कोरोना से बचने के लिए घर में रहो, बार- बार साबुन से हाथ धूलो। क्या ये सब कुछ इन बस्तियों में संभव है? क्योंकि जिसमें ये रहते हैं उसे घर कहा ही नहीं जा सकता। यहां हर झुग्गी दूसरी झुग्गी से सट कर खड़ी है। ऐसे हालात में ये फिज़िकल डिस्टेनसिंग कैसे मेंटेन कर सकते हैं? सोशल डिस्टेनसिंग तो तथाकथित सभ्य समाज ने इनसे पहले से बनाकर रखा है। कौन है इनके बारे में सोचने वाला? इनकी राष्ट्रीयता क्या है? कहाँ है इनका देश? एक और बात जो मैंने महसूस किया वो है इनके मन में अपने पहचान का संकट। जिसकी वजह से वो अपनी- अपनी जाति से चिपके रहते हैं। इतना ही नहीं जो दलित हैं वे अपने को हिन्दू बताते व साबित करते रहते हैं।
शहरीकरण ने उन्हें भूख- गरीबी तो छोड़िये छुआ- छूत व जातिगत भेदभाव से भी मुक्त नहीं किया है। शहर के अन्य मध्यवर्गीय व कुलीन लोग इनके साथ खुलेआम छुआ छूत का व्यवहार करते हैं। इस व्यवहार के लिए इनकी भयानक गरीबी, दलित जाति का होना और अन्य लोगों की ब्राह्मणवादी मानसिकता जिम्मेदार है। जातिगत चीजें इनके बीच भी बरकार हैं। हालांकि आर्थिक स्थिति बहुत खराब व एक जैसी होने की वजह से वो उतना मजबूत नहीं है। इनकी बस्तियों के आसपास आपको अवैध जमीनों पर खड़ी आलीशान इमारतें, बंगले आदि दिख जाएंगे। लेकिन जब कभी भी बुलडोजर चलता है तो इनकी झुग्गियों पर ही चलता है।
इन हजारों- लाखों मजदूरों के अंदर अपने भविष्य को लेकर कोई सपना नहीं है। उनकी एक मात्र आकांक्षा यह है कि वो जहाँ रहते हैं उन्हें वहां रहने दिया जाए। उनकी झुग्गियां न तोड़ी जाएं। नेताओं और संगठनों पर इन्हें बिल्कुल भरोसा नहीं है। क्योंकि इन्हें बार- बार इन लोगों द्वारा ठगा गया है। अगर किसी संगठन ने कभी इनके बीच काम भी किया है तो सिर्फ इन्हें अपना पिछलग्गू बनाकर रखा है। उसने इनकी राजनीतिक चेतना बढ़ाने और उनके बीच से नेतृत्व पैदा करने का बिल्कुल प्रयास नहीं किया है। ताकि ये बिखरे हुए मजदूर अपने हक- अधिकारों के लिए संगठित हो सकें।
इनको संगठित करना, राजनीतिक चेतना से लैश करना और इनके बीच से नेतृत्व पैदा करना एक चुनौती जरूर है लेकिन असंभव नहीं है। हां ये काम त्याग की मांग जरूर करता है। इसके लिए अपने आप को पूरी तरह इनके जीवन में शामिल करना होगा। ताकि इनका भरोसा जीता जा सके व इनके अंदर दबे हुए स्वाभिमान को जिंदा किया जा सके, जिसे इस व्यवस्था ने कुचल दिया है। एक गरिमामयी जीवन क्या होता है इन्हें इसका एहसास कराया जा सके। यह समाज का सबसे वंचित वर्ग है। इसको गोलबंद किये बगैर मुकम्मल बदलाव की कोई भी लड़ाई अपने अंजाम तक नहीं पहुंच सकती।
एक्जीक्यूटिव कमिटी(EC)
इंक़लाबी छात्र मोर्चा(ICM)
इलाहाबाद।

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