आइए आल इण्डिया वर्कर्स कौन्सिल की नज़र से दुनिया देखें

0
82

आल इण्डिया वर्कर्स कौन्सिल

राजनीतिक परिप्रेक्ष्य

एवम्

सांगठनिक परिप्रेक्ष्य

 

भूमिका

‘आल इंडिया वर्कर्स कौन्सिल’ की आमसभा द्वारा स्वीकृत (नागपुर अधिवेशन, 14-17 फरवरी, 2007) ‘राजनीतिक एवं सांगठनिक परिप्रेक्ष्य’ को संगठन के प्रथम महाधिवेशन (लखनऊ-15, 16 एवं 17 अगस्त, 2008) के अवसर पर पुनः मुद्रित किया जा रहा है। इन दो वर्षों में देश और दुनियां की आर्थिक-राजनीतिक स्थिति मे काफी बदलाव आया है, लेकिन इसकी मूल दिशा राजनीतिक परिप्रेक्ष्य के अनुरूप ही है। संगठन में शामिल साथियों के सकारात्मक योगदान ने उन बिन्दुओं को और स्पष्ट करने में अहम भूमिका अदा की, जिन पर अभी संशय बना हुआ था। नये तथ्य और आंकड़े भी हमारी समझ को आगे बढ़ाने में योगदान कर रहे हैं। जहां तक नयी बातों और तथ्यों का सवाल है, उन्हें संगठन के घोषणा-पत्र और राजनीतिक प्रस्तावों में ले लिया जायेगा, इसलिए मूल दस्तावेज को छोटे-मोटे सुधारों के साथ पुन: प्रकाशित करने का निर्णय लिया गया है। हमारी कोशिश हमेशा यही रही है कि आज की आर्थिक-राजनीतिक सच्चाई को प्रस्थान बिन्दु बनाया जाये और वास्तविक राजनीतिक कार्रवाई में भागीदारी करके अपनी समझ उन्नत की जाये। मजदूर जनता को पूंजीवादी राजनीति के जाल से निकालने का काम वास्तविक जमीनी राजनीति से अलग रहने की शिक्षा देकर नहीं किया जा सकता। मजदूर वर्ग का राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने के लिए अपनी वर्गीय समझ के साथ वास्तविक राजनीति में हस्तक्षेप करना होगा।

अब थोड़ा देश की वर्तमान राजनीति का जायजा लिया जाये। जुलाई, 2008 में भारत की संसद में ‘विश्वास प्रस्ताव’ पर घमासान युद्ध चल रहा था और मीडिया द्वारा उसे मनोरंजक बनाकर प्रस्तुत किया जा रहा था ताकि आम जनता के वास्तविक मुद्दों को जनता की नजरों से दूर रखा जा सके। यहां तक कि, ‘परमाणु करार’ जिस पर सारा झगड़ा शुरू हुआ उसका भी असली रूप लोगों के सामने नहीं आया। इस पूरे संघर्ष को वर्गीय आर्थिक हितों के टकराव की अभिव्यक्ति से काटकर व्यक्तिगत समझदारी-नासमझी, नैतिकता-अनैतिकता, झूठ-सच, ईमानदारी-बेईमानी से जोड़ दिया गया ताकि आम जनता की राजनीतिक सक्रियता को भ्रमित व बाधित किया जा सके।

वास्तव में इस लड़ाई के पीछे भूमंडलीकरण की नीतियों से जुड़े ‘आर्थिक सुधार’ के अगले कदम थे जिनका सीधा प्रभाव देश में मौजूद तमाम वर्गों-समूहों पर पड़ने वाला था और विभिन्न पार्टियां अपने-अपने वास्तविक वर्गीय आधार के हिसाब से मैदान में पक्षकार थीं। ये आर्थिक कदम हैं – श्रम कानूनों को शासक वर्गों के हित में लचीला बनाना, बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाना, बैंकिंग सेक्टर में निजी शेयर धारकों को वोट का अधिकार देना, पेंशन फंड प्रबन्धन को शेयर बाजार से जोड़ना, भारतीय संचार निगम एवं अन्य पब्लिक सेक्टर की कम्पनियों की शेयर बाजार में लिस्टिंग, खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी की भागीदारी बढ़ाना, सेज के लिये 5000 हेक्टेयर की जमीन की सीमा को बढ़ाना, पावर सेक्टर की पूर्ण सट्टेबाजी, भारतीय पूंजी का विदेशों में निवेश और फ्यूचर ट्रेडिंग का विस्तार। इन सारे ‘सुधारों’ का अर्थ है – मजदूरी और कीमतों पर एकाधिकारी एवं वित्तीय पूंजी का पूर्ण नियंत्रण, शेयर बाजार की धोखाधड़ी एवं लूट को बेलगाम छोड़ देना। इसका अर्थ है जीवन के लिए आवश्यक भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य, उपभोग सामग्री एवं सुविधाओं का मजदूर जनता की पहुंच से और दूर हो जाना, वास्तविक मजदूरी (20 रुपये प्रतिदिन) में और गिरावट, और इसका अर्थ है भुखमरी और आत्महत्याओं का सिलसिला बढ़ना। पूंजीवादी मीडिया की चाल देखिये, कि संसद में आयोजित जिस संघर्ष (बहस) के नतीजों से देश की 80 प्रतिशत जनता की गर्दन कटने जा रही थी, उसे यही जनता बतौर मनोरंजन ले रही थी।

रह गया “साम्प्रदायिक शक्तियों” के खिलाफ लड़ने के लिए ‘धर्मनिरपेक्ष शक्तियों’ की एकता का नारा, तो यह एक विशुद्ध पूंजीवादी ठगी है, जिससे पूंजीवादी राज्यसत्ता के वर्गीय चरित्र पर पर्दा डाला जाता है। इससे, सिद्धांतनिष्ठता की आड़ में सिद्धांतहीन समझौते-गठबंधन कायम करके ‘कुर्सी’ तक पहुंचने का काम आसान हो जाता है। जहां तक ‘देश हित’ और अन्तरात्मा का प्रश्न है तो आज देश के 56 खरबपतियों का हित ही देश हित है और पूंजी की सत्ता की हिफाजत ही उनकी अन्तरात्मा की आवाज है। संसदीय बहस में शामिल सभी पार्टियों की आत्मा की डोर इसी से जुड़ी हुई है। इसलिये संसद में होने वाले संघर्षों (बहसों) का नतीजा क्या होगा, यह तय था, क्योंकि मजदूर जनता का वास्तविक राजनीतिक प्रतिनिधित्व संसद में है ही नहीं और बाहर भी उसका आंदोलन ‘राजनीतिक तौर पर’ संगठित नहीं है।

क्या ‘परमाणु करार’ होने का सिर्फ यही अर्थ है कि अमेरिकी साम्राज्यवाद के सामने पूर्ण आत्मसमर्पण, क्या इससे मजदूर जनता के लिये यही कार्यभार निकलता है कि वह भारत के सत्ताधारी वर्ग की ओर से अमेरिकी साम्राज्यवाद से संघर्ष करे? आज के भारत के सत्ताधारी वर्ग का वैश्विक धरातल पर क्या रोल है? जेनेवा में विश्व व्यापार संगठन की बैठक में भारत जी-20 देशों के साथ मिलकर कृषि व्यापार में होने वाली असमानता के खिलाफ अमेरिका तथा यूरोपीय देशों से जोरदार संघर्ष कर रहा है। भारतीय उद्योग और व्यापार में विदेशी निवेश के बढ़ते जाने की चर्चा तो होती है, लेकिन देशी पूंजीपतियों द्वारा विदेशों में क्या निवेश हो रहा है, उसे भी तो देखना होगा। ऐसे निवेश के लिए 2007 में 1817 प्रस्ताव सरकार के पास आये और 15 बिलियन डॉलर का निवेश हुआ, वर्ष 2008 में 2261 प्रस्ताव आये और 23 बिलियन डॉलर का निवेश हुआ (स्रोत आर.बी.आई. रिपोर्ट)। इसमें विनिर्माण क्षेत्र में किया जाने वाला निवेश 43 प्रतिशत और सेवा क्षेत्र में 11 प्रतिशत। पूंजी, माल और कच्चे माल के आवागमन की प्रक्रिया एक साथ चल रही है और इससे पहले से मौजूद साम्राज्यवादी शक्तियों के साथ उनका अंतरविरोध भी तीखा होता जा रहा है।

यह अंतरविरोध, भारत के सत्ताधारी वर्ग को किसी न किसी साम्राज्यवादी गुट के साथ जोड़ेगा। होने वाले आर्थिक सुधारों का इस स्थिति से सीधा रिश्ता है। वित्तीय क्षेत्र में होने वाले सुधार औद्योगिक पूंजी और बैंकिंग पूंजी के सम्मिलन की कानूनी अभिव्यक्ति हैं। अर्थशास्त्र का यह सामान्य नियम भारत जैसे ‘गरीब’ देश में उतना ही लागू होता है, जितना अमेरिका और यूरोप जैसे ‘अमीर’ देशों में। यह सच है, कि वित्तीय पूंजी की ताकत, उन्नत तकनीकी, ऊर्जा के स्रोतों पर नियंत्रण और सैन्य उपकरणों-हथियारों के मामले में भारत विकसित देशों से और यहां तक कि चीन से भी पीछे है। लेकिन सस्ते और कुशल श्रम की उपलब्धता, प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता और राजकीय पूंजीवाद द्वारा तैयार एक मजबूत आधार इसकी प्रतियोगिता की क्षमता को बढ़ा देता है। इसी क्षमता के बल पर न सिर्फ वह मैदान में मजबूती से टिका हुआ है, बल्कि आगे बढ़ रहा है। अब देश की मजदूर जनता भारतीय पूंजीपति वर्ग की वैश्विक महत्वाकांक्षाओं के हिसाब से अपने कार्यभार तय करे या देशी-विदेशी पूंजी में जरा भी भेद किये बिना देश के भीतर पूंजी की सत्ता के खात्मे और हर प्रकार के साम्राज्यवादी गठबंधनों के खिलाफ अपनी कार्यनीति तय करे?

अमेरिकी साम्राज्यवाद का आर्थिक-राजनीतिक प्रभुत्व लगातार गिरता जा रहा है। इराक और अफगानिस्तान में उसकी सैन्य सत्ता भी लड़खड़ा रही है, डॉलर का भाव भी उसी हिसाब से गिर रहा है। लड़खड़ाते हुए महाबली के साम्राज्य (विशेष तौर पर पश्चिम एशिया) पर सबकी निगाहें लगी हुई हैं, ठीक उसी तरह जैसे रूसी साम्राज्य के एशियाई देशों पर अमेरिका की निगाहें लगी थीं। लेकिन, भूमंडलीकरण की नीतियों से विश्व स्तर पर पूंजी और व्यापार का एक ऐसा सम्मिलन निर्मित हुआ है कि किसी नये साम्राज्यवादी केंद्र का निर्माण अब संभव नहीं, अब उसका समूल नाश ही हो सकता है। आज दुनियां के पिछड़े से भी पिछड़े देश में जनवाद की लड़ाई लगातार आगे बढ़ रही है। नेपाल उसका जीता-जागता उदाहरण है। वैश्विक पूंजी ने हर जगह हलचल पैदा कर दी है एवं व्यापक स्तर पर उत्पादन प्रक्रिया का सामाजीकरण करती जा रही है। आज यह परिघटना वैश्विक रूप ले चुकी है। तो फिर उत्पादन के साधनों के सामाजीकरण के लिये संघर्ष का हमारा कार्य भार निकलता है।

भूमंडलीकरण के दौर की पूंजीवादी विकास प्रक्रिया का परिणाम देश की मजदूर जनता के सामने एकदम साफ है। आज देश की मेहनतकश जनता 20 रुपये से कम की दैनिक आमदनी पर जीवित रहने के लिए संघर्ष कर रही है, जबकि दुनिया में उपलब्ध हर प्रकार की आधुनिक सुख-सुविधाओं से देश भरा पड़ा है। आज हर मजदूर यह समझता है कि उत्पादन में आधुनिक मशीनों का प्रयोग, संचार के साधनों की उन्नति, नये उपनिवेश, नयी मंडियां, न मुक्त व्यापार और न ही ये सभी चीजें मिलकर भी (पूंजीवादी विकास के इस मॉडल में) मेहनतकश जनसाधारण की गरीबी मिटा सकती हैं। उत्पादन शक्तियों का हर नया विकास सामाजिक विरोधाभासों को, निश्चित रूप से, और गहरा बनायेगा और सामाजिक वैर-भावों को तेज करेगा। यह स्थिति दुनियां को एक नयी उथल-पुथल भरे दौर की ओर ले जा रही है। सवाल सिर्फ यह है कि मजदूर वर्ग को इसमें सशक्त हस्तक्षेप के लिए कैसे तैयार किया जाये, अर्थात् उसे राष्ट्रीय स्तर पर भविष्य के एक सत्ताधारी वर्ग के रूप में, कैसे संगठित किया जाये।

दुनियां के मजदूरों, एक हो! महज एक नारा नहीं बल्कि मजदूर वर्ग का राजनीतिक कार्यक्रम है। इसी कार्यक्रम को लागू करने की व्यावहारिक दिशा में बढ़ना ही आज का कार्यभार है।

राजनीतिक रिपोर्ट

इस रिपोर्ट को प्रस्तुत करने का लक्ष्य है, मजदूर वर्ग पर लगातार हो रहे हमलों को चिन्हित करना, उसकी प्रकृति एवं कारणों को समझना एवं उसके खिलाफ राजनीतिक संघर्ष की कारगर कार्यनीति तैयार करना। 16 वर्ष पहले, शीत युद्ध की समाप्ति के बाद अभूतपूर्व संकटों से ग्रस्त साम्राज्यवादी/पूंजीपति वर्ग द्वारा दुनियां के मजदूरों पर हमला करने की एक नयी रणनीति तैयार हुई, जिसे ‘भूमण्डलीकरण’ के नाम से जाना गया। इस रणनीति के तहत मजदूर वर्ग के संगठित प्रतिरोध के हर केन्द्र को न सिर्फ भौतिक तौर पर बल्कि वैचारिक तौर पर भी तहस-नहस कर दिया गया। चीन का ‘बाजार समाजवाद’ मजदूर वर्ग पर हमले का नया वैचारिक हथियार बना। इस प्रक्रिया में मजदूर जनता से वह सब कुछ छीन लिया गया जो उसने अपनी शक्ति, एवं वर्ग संघर्ष में अपनी जीतों से हासिल किया था। आज मजदूर जनता का श्रम और जीवन एक ऐसा माल है जिसका बाजार मूल्य लगातार गिरता जा रहा है। यह गिरावट पूंजीपति वर्ग को लगातार ताकत और नया जीवन दे रही है। पूंजीपति वर्ग का हमला निरन्तर जारी है और उसकी सत्ता लगातार निरंकुश होती जा रही है।

पूंजी की सत्ता के विरुद्ध संघर्ष के नये तरीके और संगठन विकसित करें-

भूमण्डलीकरण के हमले की प्रकृति को जब तक हम समझते और उसके खिलाफ संघर्ष की नयी रणनीति विकसित करते तब तक पूंजी की सत्ता ने हर जगह से हमें काफी पीछे ढकेल दिया था। एक दशक में मजदूर जनता एक शताब्दी पीछे ढकेल दी गयी। हमने परम्परागत तरीकों से ट्रेड यूनियन आन्दोलन के दायरे में मुकाबला करने की भरपूर कोशिश की लेकिन असफलता हाथ लगी। इन तरीकों से उन्नत धरातल के संघर्षों में मुकाबला नहीं किया जा सकता था और नये तरीके और संगठन हम विकसित नहीं कर पाये। आज हमारी सेना नेतृत्व विहीन एवं बिखरी हुई है, ऐसा माहौल बना दिया गया है, मानो हमेशा से ऐसा ही था और हम कभी संगठित होकर न लड़े, न जीते थे। इस दौर में पराजयवादी, पुनउत्थानवादी, अवसरवादी, सुधारवादी, अराजकतावादी विचारों का पुनर्जन्म हो रहा है ताकि मजदूर वर्ग की विचारधारा की चमक को धुंधला किया जा सके। पूंजीवादी मीडिया को पूरे तौर पर इस अभियान में लगा दिया गया। जनजीवन से कटे बुद्धिजीवी थोड़ी सुविधाओं के लालच में मजदूर वर्ग के खिलाफ प्रचार अभियान में लगा दिये गये हैं। इस सारे अभियान का मकसद है मजदूर वर्ग को बतौर वर्ग संगठित होने से रोकना!

भारतीय पूंजीपति वर्ग द्वारा विदेशों में अधिग्रहण –

भूमण्डलीकरण के पूरे दौर में भारत के पूंजीपति वर्ग ने अपनी ताकत बहुत बढ़ाई है। उत्पादन की तमाम शाखाओं एवं बैंकों पर अपना एकाधिकार कायम करके वह अब खुदरा बाजार को अपने एकाधिकार में लाने के काम में लग गया है। अस्सी के दशक में पूंजी की कमी के संकट से जूझती भारतीय अर्थव्यवस्था में आज पूंजी की अधिकता का दौर है और उसे लाभकारी तरीके से निवेश करने के लिये पूरी दुनियां में नये-नये क्षेत्रों की तलाश की जा रही है। भारतीय पूंजीपति वर्ग ने विदेशों में सन् 2005 में 467 उद्यमों का अधिग्रहण करने में 18.2 अरब डालर का निवेश किया है और सन् 2006 में 694 उद्यमों का अधिग्रहण करने में 24.06 अरब डालर का निवेश किया है। 2007 की शुरूआत में ही टाटा ने इंग्लैण्ड की कोरस स्टील फैक्टरी को खरीदने में 12 अरब डालकर का निवेश किया है। विकास की इस तेज गति को देखते हए यह कहा जा रहा है कि 2020 तक भारत दुनियां की महाशक्ति बन जायेगा, और भारत की गरीब जनता को इसकी खुशियां मनानी चाहिए। भारत की इस तथाकथित विकास प्रक्रिया में मजदूर जनता का कुछ हिस्सा है या नहीं? यह जानना हमारे लिये बहुत आवश्यक है।

मजदूर जनता को ठगने की कला –

थोड़ा करीब से देखें तो भारत के पूंजीपति वर्ग की सफलता के पीछे उसकी योग्यता नहीं बल्कि मजदूर जनता को हजारों तरीके से ठगने की कला है। हम जानते हैं कि पूंजी संचित श्रम होता है। भारत के पूंजीपति के पास पूंजी उगाहने के लिये अभी तक भारत की मजदूर जनता ही है। पूरी दुनियां में सबसे कम मजदूरी देने वाले देशों में भारत एक है। इसके ही दोहन से पूंजी का अंबार इकट्ठा हआ है। भूमण्डलीकरण के बाद से लगातार गिरती मजदूरी, बढ़ते काम के घंटे, ठेका मजदूरी, मजदूर जनता की छिनती सारी सुविधाएं, उन्नत तकनीकी से बढ़ती शोषण का दर, पेंशन- पी0एफ0 फण्ड की चोरी, कम मुनाफा देने वाले कारखानों की बन्दी एवं उनकी जमीनों की बिक्री से इकट्ठा धन, देश की सम्पत्ति और खनिज सम्पदा का कौड़ियों के मोल पूंजीपति वर्ग को हस्तांतरण, आउट सोर्सिंग की प्रणाली, देश के भीतर दस्तकारों-किसानों-छोटे व्यापारियों को उजाड़ने की कीमत चुकाकर विदेशी बाजार में घुसने एवं मुनाफा कमाने का अधिकार पाना, राज्य की कल्याणकारी जिम्मेदारियों को पूरी तरह मुनाफे और बाजार के मातहत ला देना आदि सच्चाईयों की जमीन पर आज के विकास का महल खड़ा हो रहा है। 2020 तक महाशक्ति बनने की घोषणा का अर्थ यही है कि मजदूर जनता और प्राकृतिक संसाधनों के विनाश का कार्यक्रम न सिर्फ जारी रहेगा बल्कि और घनीभूत होगा। अर्थात मजदूर जनता पर हमले बढ़ेंगे।

पूंजीपति वर्ग का स्वतंत्र राज्य, (विशेष आर्थिक क्षेत्र)

यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि आज अधिकांश उद्योग मुनाफे में चल रहे हैं, विकास की दर लगातार 9-10 प्रतिशत बनी हुई है। फिर भी मजदूर जनता का जीवन स्तर लगातार गिरता जा रहा है। इसका एक हिस्सा हर रोज समाज के तलछट में ढकेल दिया जाता है, जहां मनुष्य होने की सारी पहचान ही मिटा दी जाती है और पूरे समाज को उसकी पीड़ा से काट दिया जाता है। यह स्थिति देर तक कायम नहीं रह सकती। नफरत और विद्रोह अन्दर ही अन्दर सुलगता रहता है। वह किसी भी धक्के से विस्फोट कर सकता है। बलपूर्वक कायम किये गये श्रम और पूंजी के इस सम्बन्ध को सुरक्षित एवं स्थाई बनाने के लिये 400 से अधिक ‘विशेष आर्थिक क्षेत्र’ और ‘विशेष निवेश क्षेत्र’ कायम किये जा रहे हैं। यहां पर पूंजीपति वर्ग का ‘स्वतंत्र राज्य’ कायम होगा और मजदूरों की स्थिति कैदियों जैसी होगी। कानून के समक्ष ‘सबकी बराबरी’ का अधिकार देने वाले भारतीय संविधान के तहत इस दोहरी सम्प्रभुता को मान्यता दी जा चुकी है। देशी-विदेशी पूंजीशाहों को, श्रम कानूनों के दायरे से बाहर बसाये जा रहे इन क्षेत्रों में अपने कारखाने शिफ्ट करने की इजाजत भी दी जा चुकी है। इन क्षेत्रों के गठन के खिलाफ गरीब किसानों की लड़ाई वर्तमान में आजीविका के साधन छिनने की है जबकि मजदूर वर्ग के लिये यह उनके भविष्य को कैद से बचाने की लड़ाई है। यहां पर दोनों का हित जुड़ता है और मिलकर नयी दुनियां के लिये चलने वाले संघर्ष की दिशा में आगे बढ़ता है। मजदूर वर्ग को इसके महत्व को समझकर पहलकदमी लेनी पड़ेगी। यदि हम आगे बढ़कर इस संघर्ष को सही दिशा नहीं देते तो कर्ज और घाटे में डूबे गरीब किसान अपना धैर्य खोकर अपमानजनक समझौते की राह पकड़ लेंगे।

साम्राज्यवादी वित्तीय पूँजी की सट्टेबाजी-शेयर बाजार –

औद्योगिक विकास की उच्च दर में बड़ा हिस्सा सेवा क्षेत्र का है, जो पूरी तरह साम्राज्यवादी मुल्कों एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के नियंत्रण में है। सूचना-प्रौद्योगिकी, उच्च तकनीकी, शोध, रक्षा उत्पादन, पूंजीगत मशीनों, कम्प्यूटराइज़्ड मशीनों, बैंकिंग का पूरा क्षेत्र एवं विश्व व्यापार पर इनका ही नियंत्रण है। साम्राज्यवादी शक्तियां इनकी मनमानी कीमत वसूलती हैं। जाहिर है अन्नतः यह पैसा भारत की जनता की जेब से जाता है। इस स्थिति का फायदा उठाकर साम्राज्यवादी पूंजी ने भारत के पूंजी बाजार में काफी रियायतें प्राप्त कर ली हैं। विदेशी संस्थागत निवेश’ के रूप में बाहर से काफी पूंजी आ रही है और सट्टेबाजी के द्वारा काफी रूपया बाहर जा रहा है। यह रास्ता साम्राज्यवादी वित्तीय पूंजी के लिये अधिक सुरक्षित है। शेयर बाजार में लगी उनकी पूंजी भारत सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाने के भी काम आती है। वित्तीय पूंजी की दिलचस्पी कूपन काटकर मुनाफा बटोरने, उत्पादन का लाइसेन्स देकर एकाधिकारी मुनाफा कमाने में अधिक होता है। शेयर बाजार की सट्टेबाजी का पिछले 15 वर्षों में काफी विस्तार हुआ है और दुनिया के महत्वपूर्ण शेयर बाजार एक दूसरे से जुड़ गये हैं ताकि पूँजी अधिक तेजी से, अधिक मुनाफा देने वाले सस्ते श्रम के क्षेत्र में जा सके और असुरक्षित जगहों से निकल सके। जन विद्रोह या मजदूर संघर्ष की छोटी से छोटी घटना का शेयर बाजार पर प्रतिकूल असर पड़ता है। इसलिए आज की पूंजीवादी सत्ता जब भी शेयर बाजार की तेज विकास दर को बनाये रखने की बात करती है तो उसका व्यवहारिक पक्ष होता है, मजदूर जनता पर दमन बढ़ना। वैसे भी शेयर बाजार कानूनी चोरी का सबसे बड़ा केन्द्र होता है। आम आदमी को पता ही नहीं चलता कि कैसे अरबों-खरबों रूपये उसकी जेब से निकल जाते हैं। यह हर प्रकार के अपराधों की जन्मदाता है और मजदूर जनता की शत्रु है।

बिना कुछ किये मुनाफा कमाने के लालच में भारत के मध्य वर्ग का एक हिस्सा शेयर बाजार से जुड़ गया है। छोटे-छोटे शेयर धारकों के द्वारा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी सत्ता, समाज में अपने समर्थक पैदा करके अपना विस्तार करती है। भारतीय समाज में आज चौतरफा इसी वर्ग का प्रभाव और हित दिखता है। प्रतिक्रिया और लम्पटता की राजनीति को इससे बहुत ताकत मिलती है। मजदूर जनता के संघर्षों का यह घोर विरोधी है।

वर्ग संघर्ष से कटा साम्राज्यवाद विरोध-शासक वर्गों के ही काम आता है –

चूंकि पूंजी संचय के लिये भारत सामान्यतः अपने आंतरिक स्त्रोतों पर निर्भर रहने की नीति पर चला है एवं योजनाबद्ध तरीके से कोर क्षेत्र, तकनीकी शिक्षा, अधिरचना को विकसित किया है। तुलनात्मक रूप से इस मजबूत आधार के चलते उसके लिये साम्राज्यवाद से मोलभाव करना संभव होता है। साम्राज्यवाद पर दबाव बनाने के लिये वह जनता की साम्राज्यवाद विरोधी चेतना को भी विश्व बाजार में बेच लेता है। इसलिए जन-जीवन के सुख-दुख के संघर्षों एवं वर्ग संघर्ष से कटा हुआ साम्राज्यवाद विरोधी आन्दोलन अन्ततः शासक वर्गों के ही काम आता है। पूंजी संचय के लिये आंतरिक स्रोतों पर निर्भरता का दूसरा पहलू है देश के भीतर मौजूद श्रमशक्ति और प्राकृतिक संसाधनों का निर्ममतापूर्वक दोहन। इन अर्थों  में पूंजी की सत्ता अपने देश के भीतर एक परकीय एवं लुटेरी भूमिका में आती है। यहाँ पर औपनिवेशिक सत्ता के द्वारा बनायी गयी न्याय व्यवस्था, राज्य मशीनरी, पुलिस, शिक्षा व्यवस्था उसके लिये बहुत उपयोगी बन जाती है। अपनी सत्ता को बनाये रखने के लिये वह खुलकर उन्हीं तौर-तरीकों का इस्तेमाल करती है जो अंग्रेजी राज में विक्टोरिया हुकूमत करती थी। इस स्थिति में इसके लिये देश में पूर्ण जनवाद लागू करना एवं जनवादी जीवन दृष्टि का प्रसार करना संभव नहीं है, यह उसके लिये आत्मघाती होगा। इसलिए जनवाद की लड़ाई भी मजदूर वर्ग के राजनीतिक संघर्ष का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।।

शासक वर्ग की साम्राज्यवाद विरोधी भूमिका खत्म –

एक समय गुटनिरपेक्ष आन्दोलन में भारत की अग्रणी भूमिका थी और सबके साथ मिलकर यह साम्राज्यवादी दबाव का मुकाबला करती थी। भूमण्डलीकरण के दौर का लाभ उठाकर आज यह एक भिन्न स्थिति में पहुंच चुका है। अपनी विकसित उत्पादक शक्तियों एवं सामरिक शक्ति का फायदा उठाकर अपने भूतपूर्व सहयोगी विकासशील देशों में अपने बाजार का विस्तार करने में लग गया है। इन देशों में किये जा रहे साम्राज्यवादी हस्तक्षेप का मुखर विरोध करने की नीति को इसने त्याग दिया है। एक चालाक व्यापारी की तरह सभी साम्राज्यवादी गुटों के साथ सम्बन्ध बनाकर उनके प्रभाव को कम करता है एवं युद्धों में सीधे उलझने से बचता है। भारत की मजदूर जनता के साथ इसके जो अन्तरविरोध हैं उसकी आंच से बचने के लिये यह साम्राज्यवाद के साथ अपने अन्तरविरोधों को तीखा नहीं होने देता। भारत के पूंजीपति वर्ग की साम्राज्यवाद विरोधी भूमिका 1947 के बाद से ही लगातार कम होती गयी और आज तो बिल्कुल ही नहीं है। आज तो वह विश्व पूंजीवादी व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण पाया बन चुका है। आज भारत की विदेश नीति उसकी वैश्विक महत्वाकांक्षा को व्यक्त कर रही है। भारत के मजदूर वर्ग को पूंजीपति वर्ग की क्षेत्रीय महाशक्ति बनने की महत्वाकांक्षाओं के तहत किये जा रहे सैन्य समझौतों का मजबूती से विरोध करना होगा। यह उसका अंतर्राष्ट्रीयतावादी कर्तव्य है।

विश्व शान्ति के लिए पूंजीपति वर्ग की सकारात्मक भूमिका समाप्त –

इराक पर अमेरिकी कब्जे के बाद लाखों नागरिकों का कत्ल और फिर उसके राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को फांसी पर लटकाना और इन सब अपराधों के प्रति दुनियां भर के शासकों की चुप्पी से हमारे लिये नतीजा निकलता है कि विश्व शान्ति के लिये पूंजीपति वर्ग की कोई सकारात्मक भूमिका आज बची ही नहीं है। इस चुप्पी का कारण साम्राज्यवाद से डरना नहीं बल्कि उसकी आड़ में अपना हित साधना है। विश्व बाजार में अपनी पैठ बढ़ाना हर देश के पूंजीपति वर्ग की आज आवश्यकता है, अपनी अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए और अपने देश की जनता से गहराते अंतरविरोधों को कम करने के लिये। इसलिए एक देश दूसरे देशों की तबाही का फायदा उठाने की फिराक में अधिक हैं। भारत की बदली हुई विदेश नीति को इसी संदर्भ में देखना होगा।

अमेरिकी साम्राज्यवाद की हताशा और सद्दाम हुसैन की हत्या –

इस अपराधिक घटना को साम्राज्यवादी गुटों के बीच बढ़ती होड़ और खुद साम्राज्यवादी मुल्कों के भीतर लगातार गहराते संकटों के संदर्भ में ही समझा जा सकता है। सद्दाम हुसैन की हड़बड़ी में की गयी हत्या अमेरिकी साम्राज्यवाद की हताशा का परिणाम है। उसकी आर्थिक सत्ता लगभग दिवालिया होने के कगार पर खड़ी है। आज उसकी ट्रेजरी के द्वारा जारी किये गये बांडों का बहुत बड़ा हिस्सा यूरोप, जापान और चीन ने खरीद रखा है। उसकी सत्ता सिर्फ फौजी ताकत पर टिकी है। एशिया समेत पूरी दुनियां में उसने बड़ी संख्या में फौज तैनात कर रखी है। इससे उसके बजट पर दबाव बढ़ता ही जा रहा है। डालर की स्थिति बाजार में लगातार कमजोर होती जा रही है। लैटिन अमेरिकी देशों की ओर से बढ़ती चुनौती, रूस की ताकत का बढ़ना, चीन-भारत जैसे देशों की बढ़ती क्षेत्रीय महत्वाकांक्षायें और अमेरिकी जनता का गहराता असंतोष अमेरिकी साम्राज्यवाद के पराभव के दौर की शुरूआत का स्पष्ट संकेत कर रहा है। इराकी जनता का मुक्ति संघर्ष और अरब देशों की जनता का इसके पक्ष में बढ़ते समर्थन से पश्चिम एशिया पर अमेरिकी पकड़ कमजोर पड़ रही है, इससे उसकी बदहवासी बढ़ती जा रही है। सद्दाम हुसैन की फांसी इसी बदहवासी का नतीजा है। पश्चिम एशिया में धूल चाटने के बाद उसकी फौजी ताकत का मिथक भी टूट जायेगा। दूसरे साम्राज्यवादी गुट इसका फायदा उठाने के फिराक में लगे हैं लेकिन किसी की फौजी ताकत इतनी नहीं है कि वह अमेरिका का सर्वमान्य विकल्प बन सके। यह स्थिति एक नये विश्व युद्ध की जमीन भी तैयार कर रही है, जाहिर है कि भारत भी उसकी आंच से बचेगा नहीं। यही वक्त है आगे बढ़कर साम्राज्यवाद पर चोट करने का। इस युद्ध का नेतृत्व मजदूर वर्ग को करना होगा। इराक, फिलीस्तीन समेत पूरे विश्व में चल रहे साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष हमारे अपने संघर्ष हैं। साम्राज्यवाद का युद्ध और विनाश से सीधा रिश्ता है, इसे नष्ट किये बिना शान्ति की बात सोची ही नहीं जा सकती।

मुसलमानों के विरुद्ध द्वेषपूर्ण प्रचार और जनता की मुक्ति की लड़ाई –

यहीं पर यह भी बात उल्लेखनीय है कि आज एक साम्राज्यवादी एजेण्डे के तहत मुसलमानों के प्रति द्वेषपूर्ण प्रचार करके उन्हें खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है ताकि पश्चिम एशिया में किये जा रहे साम्राज्यवादी हिंसा एवं लूट को उचित ठहराया जा सके। इस प्रचार का अपने देश में भी काफी प्रभाव है और इसकी आड़ में भारत के सत्ताधारी भी अपना उल्लू सीधा करते हैं। इससे भारत की मजदूर जनता की वर्गीय एकता में दरार पड़ती है। इस झूठे प्रचार का दूसरा पहलू है मुस्लिम देशों की जनता की मुक्ति की लड़ाई एवं जनवाद का दमन और उनके ऊपर कठपुतली प्रतिक्रियावादी नेता शासकों का नेतृत्व बनाये रखना। इससे साम्राज्यवाद विरोधी लडाई की धार कुन्द होती है और वह व्यापक नहीं हो पाता। हमें इस बंटवारे की राजनीति का वर्चस्व तोड़ने की ठोस कार्यनीति लेनी होगी।

आतंकवाद के खिलाफ युद्ध वास्तव में जनता की जनवादी आकाक्षाओं के खिलाफ युद्ध है –

भूमण्डलीकरण और विश्व व्यापार संगठन की नीतियों को लागू करने से विश्व पूजीवाद को मजदूर जनता के संगठित प्रतिरोध को तात्कालिक तौर पर तोड़ने और अपने आपसी अन्तरविरोधों को ऊपरी तौर पर हल करने में अवश्य मदद मिली है। यह राहत बहुत अस्थाई थी। साम्राज्यवादी गुटों के आपसी झगड़े पुनः और तीखेपन के साथ उभर आये हैं। आज हर रोज पूरी दुनिया के पैमाने पर नये-नये आर्थिक-व्यापारिक-सामरिक गठबन्धन बन रहे हैं, बिखर रहे हैं। विश्व व्यापार संगठन मारपीट के अखाड़े में तब्दील होता जा रहा है। कोई भी देश एक खूटे से बंधकर स्थाई तौर पर रहने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि उनके भीतर लगातार नये सिरे से संगठित हो रहा जन-असंतोष उन्हें किसी एक मंजिल पर ठहरने नहीं दे रहा है। नये-नये सैन्य गठबन्धनों के पीछे प्रेरक शक्ति विश्व-बाजार में अपना हिस्सा बढ़ाने के साथ ही अपने देश के भीतर जनआन्दोलनों के दमन की तैयारी भी है। दनियां भर के शासक आज अपने-अपने देशों की जनता से सबसे अधिक डरे हुए हैं। ‘आतंकवाद के खिलाफ युद्ध’ विश्व की मजदूर जनता के खिलाफ युद्ध है, उसकी जनवादी आकांक्षाओं के खिलाफ युद्ध है। तमाम सैन्य सन्धियों में आज आतंकवाद से मुकाबले की बात अनिवार्यतः शामिल रहती है। भूमण्डलीकरण की नीतियों ने दूसरी तरफ पूरी दुनियां के मजदूरों को एक ही स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है, उत्पादन का अत्यधिक सामाजीकरण कर दिया है, इससे मजदूर वर्ग की अंतर्राष्ट्रीयतावादी राजनीति की जमीन बहुत व्यापक हो गयी है। पूंजीपति वर्ग द्वारा पूरी दुनियां को रणक्षेत्र बना देने की राजनीति का मुकाबला मजदूर वर्ग की अन्तर्राष्ट्रीयता की जमीन पर खड़े होकर करना होगा। देशी पूंजीपति वर्ग के प्रति जरा भी सहानुभूति या रियायत आज मजदूर वर्ग के आन्दोलन के लिये आत्मघाती होगी।

मजदूर संगठनों पर अघोषित प्रतिबन्ध –

पिछले 15 वर्षों में काम करने की परिस्थितियों में जो बदलाव किया गया है उसके पीछे मुख्य सोच है-मजदूर वर्ग को बतौर वर्ग संगठित होने से रोकना और सुधारवादी राजनीति के प्रभाव क्षेत्र में लाना। उद्योग के वे क्षेत्र जो सबसे अधिक संगठित और सचेत थे जैसे-कपड़ा, जूट उन्हें पूरी तरह बिखेर दिया। जहां पर बिखेरना सम्भव नहीं था वहां भारी पैमाने पर ठेका मजदूरों को लगाकर स्थाई मजदूरों का अनुपात बेहद कम कर दिया। इससे पुराना संगठन जो स्थाई मजदूरों को लेकर बना था बेहद कमजोर हो गया। नये ट्रेड यूनियनों के रजिस्ट्रेशन पर एक प्रकार से अघोषित प्रतिबन्ध लगाकर मजदूर वर्ग के संगठित होने को बाधित किया गया। कारखाना बन्दी के नियमों में ढील देकर मजदूर संगठनों के लिये बेहद प्रतिकूल माहौल बना दिया गया है। ट्रेड यूनियन मान्यता के नियमों में बदलाव लाकर उनके दायरे को बेहद सीमित कर दिया गया। यह सब पूंजीपति वर्ग की लम्बे समय से ‘श्रम कानूनों को लचीला’ ओर श्रमिकों को ‘गतिशील’ बनाने की मांग को पूरा करने के ध्येय से किया जा रहा है। यूं कहा जाय तो पूरी उत्पादन प्रक्रिया को एक ऐसा रूप दिया जा रहा है जिसमें मजदूर पूरी तरह असहाय और असंगठित रहें।

उत्पादन का केन्द्रीयकरण-विकेन्द्रीकरण और आउटसोर्सिंग –

ऊपर से देखने पर बड़े पैमाने पर कल-कारखानों की बन्दी और मजदूरों की बेरोजगारी दिखती है लेकिन औद्योगिक उत्पादन की दर लगातार बढ़ती जा रही है। कपड़ा, सूत, चीनी, दवा, खाद की मिलें बड़े पैमाने पर बन्द हुई है लेकिन उत्पादन में लगातार वृद्धि हो रही है। उद्योग के दूसरे क्षेत्रों में भी वृद्धि की यही दर है। इसके साथ ही नये निवेश के क्षेत्र-सेवा क्षेत्र, निर्माण, आई0टी0 , संचार, मीडिया, चिकित्सा, पर्यटन, मॉल, शिक्षा, निजी बैंक में विकास दर काफी ऊंचा है। इसका मुख्य कारण यहां कर्मचारियों का पूरी तरह असंगठित होना है। साम्राज्यवादी लूट का इन क्षेत्रों से सीधा रिश्ता है। उत्पादन को दो हिस्सों में बांटकर एक का विकेन्द्रीकरण (आउटसोर्सिंग) किया गया है तथा दूसरे का अत्यधिक केन्द्रीयकरण किया गया है, उन्नत तकनीकी एवं प्रबन्धन के द्वारा। वस्त्र उद्योग का आज 82.6 प्रतिशत विकेन्द्रीकृत आधुनिक पावर लूमों के द्वारा होता है। उपभोक्ता वस्तुओं, कल-पुर्जो, एसेसरीज़, केमिकल्स, दवाओं और हजारों तरह की चीजों का उत्पादन अब लघु एवं घरेलू इकाईयों में होता है। बड़ी-बड़ी कम्पनियों के माल यहां तैयार किये जाते हैं। इनकी संख्या 2004-05 में 119 लाख थी। इनकी संख्या की विकास दर 4.5 प्रतिशत, उत्पादन का 12.5 प्रतिशत और रोजगार में 4.5 प्रतिशत है। यह पूरा क्षेत्र श्रम कानूनों के दायरे से बाहर है। मूल्यों के आधार पर राष्ट्रीय औद्योगिक उत्पादन का चौथाई हिस्सा यहां पैदा होता है। उन कम्पनियों की संख्या बढ़ती जा रही है जो अपने ब्रान्ड नाम से सिर्फ उत्पादों की मार्केटिंग करती हैं, उनका उत्पादन और उसके निहित खतरों से कोई लेना-देना नहीं है। उत्पादन करने वाली छोटी इकाइयां और उसमें कार्यरत मजदूर एवं उसका परिवार इन ब्रांड कम्पनियों की लूट और जुल्म के अत्यधिक शिकार हैं। इनका पूरा जीवन ही अनिश्चतता और कमरतोड़ श्रम का शिकार है। इस नयी स्थिति में बन्द कारखानों को खुलवाने की लड़ाई पूंजी की सत्ता को उखाड़ फेंकने की लड़ाई का हिस्सा बन गयी हैं, उन्हें श्रम कानूनों के दायरे में चलाते रहने का दौर खत्म हो चुका है।

खुदरा बाजार पर कब्जा और महंगाई, बड़ी कम्पनियों की कारीगरी है –

उत्पादन की प्रक्रिया से पूरी तरह मुक्त ये ब्रान्ड नाम से संचालित कम्पनियां भारत के खुदरा बाजार पर एकाधिकार कायम करने की होड़ में लग गयी हैं। रिलायन्स, भारती. वालमार्ट जैसी बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां तेजी से खुदरा बाजार में आ रही हैं। इससे लाखों लोगों का रोजगार छिनेगा और मूल्यों पर सरकार का नियंत्रण पूरी तरह खत्म हो जायेगा। लगातार बढ़ती मंहगाई के पीछे व्यापार को पूरी तरह अपने नियंत्रण में लेती जा रही कम्पनियों की कारगुजारी है। इससे मजदूर जनता पर बहुत बुरी मार पड़ रही है।

अर्थवाद के दलदल में फंसा संगठित क्षेत्र और उसकी राजनीतिक भूमिका –

संगठित क्षेत्र का वह हिस्सा जो विकेन्द्रीकृत नहीं किया जा सकता था उसका नये सिरे से केन्द्रीकरण और पुनर्गठन किया गया है। पूरे औद्योगिक उत्पादन में इसका हिस्सा और भूमिका निर्णायक है। यहां के कर्मचारी को और क्षेत्रों की तुलना में अधिक वेतन और आर्थिक सुविधाएं प्राप्त हैं। लेकिन, आधुनिक तकनीकी और श्रम प्रबन्धन के द्वारा उत्पादक को इतना बढ़ा दिया गया है कि कर्मचारी द्वारा पैदा किये गये अतिरिक्त मूल्य में कई गुना वृद्धि हो जाती है। इस तरह से देखा जाए तो शोषण की दर यहां बहुत अधिक है। उन्नत उत्पादक शक्तियों और उन्नत संगठन के कारण मजदूर वर्ग की उन्नत राजनीति के लिए  इस क्षेत्र की अग्रणी भूमिका होगी। अर्थवादी राजनीति के वर्चस्व ने यहां कार्यरत मजदूरों की इस भूमिका को काफी क्षतिग्रस्त किया है और इससे देश का मजदूर आन्दोलन कमजोर पड़ा है। इसे अर्थवाद के दलदल से निकालकर राजनीतिक संघर्षों की मजबूत जमीन पर खड़ा करना होगा। इसे मजदूर वर्ग के सबसे दबे-कुचले हिस्सों एव ठेका मजदूरों के हक की लड़ाई लड़ना सिखाना होगा, इसी प्रक्रिया में इसकी अग्रणी राजनीतिक भूमिका पुनः निखरती जायेगी।

पूंजीपतियों की असंवैधानिक कमेटियों के निर्देश द्वारा काम करती सरकारें –

समाजवाद के दबाव से पूंजीपति वर्ग ने इस क्षेत्र के मजदूरों को कुछ अधिकार दे दिये थे एवं कुछ समझौते किये थे, जो श्रम कानूनों के रूप में मौजूद हैं। मजदूर वर्ग के नेतृत्व में चलने वाले समाजवादी आन्दोलन के कमजोर पड़ने से पूंजीपति वर्ग तेजी से उन समझौतों को तोड़ रहा है, अधिकारों को वापस ले रहा है और अपनी नग्न तानाशाही कायम कर रहा है। यहां तक कि देश-प्रदेश की चुनी हुई सरकारें खुले तौर पर पूंजीपतियों की गैर कानूनी तरीके से गठित कमेटियों के निर्देश पर काम कर रही हैं। मजदूरों के लिये सबसे सुरक्षित समझने वाले सरकारी क्षेत्र-रेल, परिवहन, बन्दरगाह, डाक, बैंक, संचार, खाद्य निगम, बिजली हर जगह यही हाल है। अर्थवाद और भ्रष्टाचार ने पहले ही इनकी संघर्ष क्षमता को घुन की तरह चाट डाला था ऐसे में यह हमला झेल पाना इनके लिये संभव ही नहीं था। इसलिए चौतरफा हताशा का माहौल है। इससे उबरने का एक ही रास्ता है कि पुनः इन्हें राजनीतिक आन्दोलन के दायरे में लाया जाये और परिस्थितियां इसके बेहद अनुकूल हैं। अपनी सफलताओं से संतुष्ट पूंजीपति वर्ग भारत को विश्व के महत्वपूर्ण विनिर्माण (मैन्यूफैक्चरिंग) क्षेत्र के रूप में विकसित करने की महत्वाकांक्षी योजना को लागू करने के लिये कल-कारखानों को जेलखानों में तब्दील करने जा रहा है। इसका मुकाबला राजनीतिक संघर्षों की जमीन पर खड़ा होकर ही किया जा सकता है।

भूमण्डलीकरण के पूरे दौर में मजदूरी पर जीने वालों की संख्या एवं उनकी गतिशीलता में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। इसके साथ ही मजदूरों की असुरक्षा भी बेहद बढ़ी है। पूंजीपति के लिये कारखाना बन्द करना, शिफ्ट करना, पूंजी निकालना आज बेहद आसान बना दिया गया है। इससे हड़तालों की संख्या लगातार गिरती जा रही है और लाक आउट की संख्या बढ़ती जा रही है। आर्थिक जीवन का हर क्षेत्र और पहलू पूंजी और बाजार के अधीन लाया जा चुका है। मनुष्यों के बीच के सम्बन्ध को पूरी तरह रूपान्तरित करके खरीदार और विक्रेता के सम्बन्धों में ढाला जा रहा है। कमीशन एजेण्ट और सेल्स मैन के रूप में ‘गुलामों’ की एक बड़ी फौज खड़ी की गयी है, जिनकी स्थिति मजदूरों से भी गयी-गुजरी है लेकिन चेतना बेहद कमजोर है। नये सम्बन्धों के कारण पूरे समाज में एक खास किस्म की संवेदनहीनता पनप रही है, जिसका शिकार वे लोग होते हैं जिनके श्रम का कोई खरीदार नहीं मिलता। मजदूर जनता के हजारों लोग हर रोज खत्म हो जाते हैं जिसकी कोई परवाह नहीं करता। टुकड़ों में बंटे हुए लड़ाईयों से इन बुराईयों को खत्म नहीं किया जा सकता। हमें मजदूर वर्ग के रूप में पूंजी की सत्ता पर धावा बोलना होगा।

किसानों को जमीन से बेदखल करने और ग्रामीण मजदूरों को तबाह करने की योजना –

विशेष आर्थिक क्षेत्र, विशेष निवेश क्षेत्र, विशेष पर्यटन क्षेत्र के नाम पर एवं कान्ट्रैक्ट फार्मिंग के लिये छोटे किसानों को उनकी जमीनों से बेदखल करने एवं ग्रामीण मजदूर को तबाह करने की बड़ी योजना पर काम चल रहा है। पूंजीवादी नीतियों के कारण अनाज का उत्पादन वैसे भी लगातार गिरता जा रहा है, इन नीतियों से और तबाही पैदा होगी। इसकी सीधी मार मजदूर जनता पर पड़ रही है, उनसे उनकी रोटी-प्याज भी छिन रही है। यह बात ठीक है कि छोटी जोत के किसानों के लिये इस व्यवस्था में मुक्ति का कोई मार्ग नहीं है, मजदूर वर्ग की सत्ता ही इसका समाधान कर सकती है। इसके लिए, मजदूर वर्ग के राजनीतिक आन्दोलन को गरीब किसानों के संघर्षों से जुड़कर इन्हें नयी दुनियां के लिये चल रहे संघर्ष का साथी बनाना होगा। परिस्थितियां इसके बेहद अनुकूल हैं।

श्रम और पूंजी के रिश्तों में क्या बदलाव लाये जा रहे हैं –

आज की उत्पादन प्रक्रिया में यदि श्रम और पूंजी के रिश्तों के बारे में आम परिघटना के रूप में यदि कुछ बातों को चिन्हित करना है, जिसका असर पूरे उद्योग जगत पर पड़ा है तो हम कह सकते हैं कि उत्पादन की पूरी प्रक्रिया को श्रम कानूनों के दायरे से बाहर किया जा रहा है, वैसे एक बड़ा असंगठित क्षेत्र पहले ही बाहर था। ठेका मजदूरी को आम नियम बनाया जा रहा है। न्यूनतम मजदूरी को अपराधिक स्तर तक नीचे गिरा दिया गया है। काम के घण्टों की पाबन्दी को लगभग समाप्त कर दिया गया है। पारिवारिक आवश्यकता के मुताबिक वेतन की जगह मजदूर की व्यक्तिगत भौतिक आवश्यकता के मुताबिक वेतन का नियम। ‘समान काम समान वेतन’ की नीति का पूरी तरह खात्मा। पेंशन के अधिकार को सीमित कर श्रमिकों के कल्याण के मद का पैसा पूंजीपतियों के कल्याण मद में शिफ्ट करना। आउटसोर्सिंग को खुली छूट देकर छंटनी को कानूनी बना देना। आम आदमी पर टैक्स का बोझ बढ़ाना एवं मंहगाई को बेलगाम छोड़कर वास्तविक मजदूरी में और कमी करना, शिक्षा और चिकित्सा को अत्यधिक महंगा करके मजदूर जनता के बच्चों को उससे वंचित करना, गरीबों की बस्तियों को उजाड़कर उन्हें शहर के बाहर बसाना, ट्रेड यूनियनों को निष्प्रभावी बनाना एवं कारखानों को “लेबर कैम्प” में तब्दील करना इत्यादि। इन नीतियों की वजह से पैदा हो रहे असंतोष को दबाने के लिये पुलिस, प्रशासन, न्यायपालिका, विधायिका का खुलकर प्रयोग करना। कुल मिलाकर ऐसी स्थिति निर्मित की जा रही है कि पूंजी की सत्ता के सामने मजदूर जनता का पूर्ण आत्म समर्पण सुनिश्चित किया जा सके। ऐसी स्थिति में जब राज्य पूंजीपतियों के समर्थन में खुलकर आ चुका हो तो मजदूर आन्दोलन को उस सत्ता से टकराने की तैयारी करनी चाहिए। भूमण्डलीकरण ने इस टकराव को अवश्यम्भावी बना दिया है, इससे कतराने का अर्थ अपनी तबाही को स्वीकार कर लेना है।

राज्य सत्ता की मजदूर जनता में गिरती नैतिक स्वीकार्यता व मजदूर जनता के बीच का बंटवारा –

नयी नीतियों ने उत्पादन प्रक्रिया का बड़े पैमाने पर समाजीकरण करके आय एवं मुनाफे के समाजीकरण की पुख्ता जमीन तैयार की है। अमीरी-गरीबी के बीच खाई का लगातार बढ़ाते  जाने से सामाजिक असंतोष भी व्यापक और गहरा होता जा रहा है और राज्य सत्ता की मजदूर जनता में नैतिक स्वीकार्यता भी गिरती जा रही है। पूरा समाज एक विकल्प के लिये छटपटा रहा है। बस जरूरत है मजदूर जनता को एक वर्ग के रूप में संगठित करके उसे राजनीतिक आन्दोलन की राह पर उतारने की। इसके लिए हम उन प्रश्नों को समझना होगा जिससे हमें एक वर्ग के रूप में संगठित होने में बाधा पहुँचता है। मजदूर जनता में कई स्तरों पर बंटवारा है. इसे खत्म करने की ठोस योजना लेनी होगी। केंद्रीयकृत एवं विकेन्द्रीयकृत उत्पादन प्रक्रिया से जुड़े मजदूरों के बीच का बंटवारा, एक संस्थान के भीतर स्थाई एवं ठेका मजदूरों का बंटवारा, उद्योग-सेवा क्षेत्र के मजदूरों के बीच का बटवारा, मजदूरों का ट्रेड यूनियनों की सदस्यता के आधार पर बंटवारा, स्त्री-पुरूष के रूप में बंटवारा, दलित-सवर्ण का जातीय अलगाव, धार्मिक अलगाव, बौद्धिक श्रम-शारीरिक श्रम का अलगाव, पूरी मजदूर जनता का शेष उत्पीड़ित-शोषित जनता से अलगाव और अन्ततः पूरे विश्व की मजदूर जनता का एक दूसरे से अलगाव। हमारे भीतर का यह अलगाव हमारे दुश्मनों की ताकत है। इन्हीं अलगावों के चोर दरवाजे से पूंजीवादी सत्ता हमारे किले में प्रवेश करके अपना वर्चस्व कायम करती है। इन अलगावों को खत्म करना हमारे आज की लड़ाई के लिये तो जरूरी है ही और भविष्य में पूंजी की सत्ता की घुसपैठ रोकने के लिये भी जरूरी है। मेहनतकश वर्ग की वर्गीय एकता उसकी अपनी जीवन दृष्टि एवं संस्कृति को स्थापित करने के संघर्षों में ही हासिल की जा सकती है। हमें पूंजीवादी कानूनी चश्में से दुनिया को देखना बन्द करके मजदूर वर्गीय नजरिये से समस्याओं को देखना एवं सुलझाना होगा।

पूंजीपति वर्ग की सकारात्मक भूमिका अब समाप्त –

सामंती विशेषाधिकारों के विरुद्ध मनुष्य की बराबरी के लिये लड़ने वाले पूंजीपति वर्ग अपने हाथों में सत्ता लेते ही सिर्फ खुद को मनुष्य का दर्जा देकर बाकी सबको मनुष्यता के दर्जे से बाहर ढ़केल देता है। इसके साथ ही नये प्रकार के विशेषाधिकारों को स्थापित करता है। पूंजीवाद की स्वाभाविक विकास प्रक्रिया उसे एकाधिकारी पूंजीवाद और फिर साम्राज्यवाद की मंजिल में पहुंचाती है। पूंजीपति वर्ग जनवाद की स्थापना की लड़ाई से शुरू करके, जनवाद का पूर्ण निषेध करने की मंजिल तक पहुंचकर मानव सभ्यता के इतिहास में अपनी सकारात्मक भूमिका खो देता है। साम्राज्यवाद से पहले की मंजिल में सिर्फ लूट-मार चलती थी लेकिन बाद की मंजिल की विशेषता यह रही कि ताकतवर साम्राज्यवादी देशों ने बल-पूर्वक एशिया, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका की सहज विकास प्रक्रिया को रोककर उनकी अर्थव्यवस्था को अपने हितों के मातहत कर लिया। इस मातहती को बनाये रखने के लिये साम्राज्यवादियों ने अपने अधीन मुल्कों के इतिहास को तोड़ा-मरोड़ा, उनका आर्थिक-सामाजिक-न्यायिक-शैक्षिक तानाबाना नष्ट करके एक बेहद परायी एव अप्राकृतिक अधिरचना थोप दी। इसकी छाप आज भी भारत के सामाजिक जीवन पर बहुत स्पष्ट और गहरी है। यहां के पूंजीपति वर्ग की इसके खिलाफ निर्णायक संघर्ष करने की न तो क्षमता है और न ही आवश्यकता। इसके उलट उसकी सत्ता को इससे बहुत सहारा मिलता है। जनवाद के लिये संघर्ष का कार्य अब मजदूर जनता के कन्धों पर आ गया है और इसके साथ ही थोपी गयी परायी एवं अप्राकतिक अधिरचना को नष्ट करके पूरे देश को बन्धन मुक्त करने का कार्यभार भी उसे ही पूरा करना है।

स्त्रियों के सस्ते श्रम का दोहन पूंजीवादी सत्ता का प्राण –

एक आंकड़े के मुताबिक अपने देश में सामाजिक श्रम में 70 प्रतिशत स्त्रियों का श्रम है। भूमण्डलीकरण के पूरे दौर में स्त्रियों की सामाजिक उत्पादन में भागीदारी लगातार बढ़ती जा रही है – उद्योग और सेवा क्षेत्र दोनों में। परिवार की आमदनी बढ़ाने के लिये स्त्रियां कम से कम मूल्य पर काम करने को तैयार हो जाती हैं। उनके सस्ते श्रम का दोहन पूंजीवादी सत्ता का प्राण है। बाहर काम करने वाली स्त्रियों के बड़े हिस्से को घरेलू काम-काज से मुक्ति नहीं मिलती। घर के भीतर लोक-लाज और पुरुष सत्ता उनके पीठ पर सवार रहती है और कारखाने में पूंजी के मालिक की सत्ता। स्त्रियों को दोनों सत्ताओं के विरूद्ध लड़ना है, पूंजी की सत्ता के विरुद्ध मजदूर वर्ग की लड़ाई में स्त्रियों की भागीदारी तभी बढ़ेगी जब मजदूर वर्ग घर के भीतर एवं समाज में चौतरफा व्याप्त पुरूष-सत्ता की जकड़बन्दी को तोड़ने में उनके साथ मजबूती से खड़े होंगे। पुरूष-स्त्री की संयुक्त ताकत से ही पूंजी के किले को गिराया जा सकता है एवं नये मनुष्य एवं नये समाज का निर्माण किया जा सकता है।

पूंजीवाद ने स्त्रियों को गुलामी से मुक्त नहीं कराया –

पूंजीवाद ने स्त्रियों को सामंती गुलामी के बन्धन से मुक्त नहीं कराया बल्कि घर की चौहद्दी से बाहर निकाल दिया ताकि उनके सस्ते श्रम और शरीर का दोहन किया जा सके। निजी सम्पत्ति और विशेषाधिकारों पर आधारित पूंजीवादी व्यवस्था के बने रहते पूर्ण नारी मुक्ति की बात सोची भी नहीं जा सकती। लेकिन इस बात का विलोम भी उतना ही सच है। पूंजी की सत्ता का विस्तार पुरूष सत्ता के रूप में घर-घर तक होता है, एक-एक व्यक्ति तक होता है। पूंजी की सत्ता के विरुद्ध खड़ा मजदूर वर्ग सत्ता के इन छोटे-छोटे किन्तु ऐतिहासिक रूप से ताकतवर केन्द्रो को नष्ट करते हुए ही आगे बढ़ सकता है। इन केन्द्रों से ही पूंजीवादी सत्ता का पुनर्जन्म होता है। इसलिए एक स्त्री का स्त्री होने के नाते शोषण-उत्पीड़न के जितने भी रूप हैं, उनके विरुद्ध लड़ना हमारे लिये अनिवार्य है। इसके साथ ही हमें अपने जीवन दृष्टि में भी मजदूर वर्गीय रूपान्तरण करना होगा। नारी की अवमानना, अवहेलना हमारी परम्पराओं, मूल्यों, मान्यताओं के साथ-साथ भाषा, मुहावरों, रूपकों तक में मौजूद हैं। इसके रूपान्तरण की सचेत प्रक्रिया शुरू करनी होगी।

नारी मुक्ति के बिना मजदूर वर्ग की मुक्ति नहीं –

आज की दुनिया की निर्भरता नारी श्रम पर बढ़ती जा रही है, स्त्रियां घर की चौखट से बाहर निकल कर पूंजी और पुरुष की बनायी दुनियां और उसके नियमों से टकरा रही है। यह टकराव उनके भीतर नयी ताकत और नया आत्म विश्वास पैदा कर रहा है। उनके मुक्ति आन्दोलनों का भविष्य मजदूर वर्ग के मुक्ति आन्दोलनों से जुड़ता जा रहा है। दोनों को एकजुट करके एक राजनीतिक शक्ति के रूप में ढ़ालना हमारी मुक्ति के लिये अनिवार्य है। नारी मुक्ति के बिना मजदूर वर्ग की मुक्ति सम्भव नहीं है।

वर्गीय एकता और जाति उन्मूलन की लड़ाई –

मजदूर वर्ग की वर्गीय एकता की राह में एक बड़ी चुनौती उसका जातीय विभाजन एवं जातीय श्रेष्ठता की सत्ता का किसी न किसी रूप में बने रहना है। यूं तो इस विभाजन का भौतिक आधार लगातार छोटा होता जा रहा है लेकिन पूंजीवादी राजनीति इसे बनाये रखने की पूरी कोशिश करती रहती है। वैसे भी इस भयावह सामाजिक बुराई को कानून बना करके और जाति आधारित आरक्षण की मांग के द्वारा मिटाने की बात स्वीकार करने का अर्थ है पूजीवादी व्यवस्था के सामने घुटने टेक देना। पूंजीवादी व्यवस्था मजदूर जनता के शोषण  पर टिका है और दलित एवं पिछड़ी जातियों का 90 प्रतिशत मजदूर जनता का हिस्सा है। इसलिए इस विरोधाभास का समाधान किये बिना जाति व्यवस्था एवं जातीय श्रेष्ठता का उन्मूलन नहीं किया जा सकता अर्थात जाति उन्मूलन की लड़ाई पूंजीवादी व्यवस्था और वगों के उन्मूलन की लडाई के साथ जुड़कर ही आगे बढेगी। निश्चित तौर पर सुधार की योजनाओं से लोगों को लाभ मिला है, लेकिन एक बहुत छोटे हिस्से को। यह छोटा हिस्सा खुद में एक विशेषाधिकार प्राप्त समूह बनकर अपनी जाति के बड़े हिस्से की मुक्ति की लड़ाई को उसके वर्गीय-आर्थिक सवालों से काटकर दिशाहीन एवं प्रभावहीन बनाता है। इससे मजदूर वर्ग की व्यापक एकता टूटती है। हम वर्ग सहयोग की राजनीति को वर्गीय राजनीति से ही चुनौती दे सकते हैं।

मजदूर वर्ग को ‘जाति’ की कोई जरूरत नहीं है –

यह बात गौरतलब है कि जातीय पहचान की राजनीति की बुनियाद पर खड़ी अधिकांश पार्टियां मजदूरों-किसानों के प्रश्न पर चुप रहती हैं, ये पार्टियां भूमण्डलीकरण की घोर जनविरोधी राजनीति के पक्ष में मजबूती से खड़ी होती हैं। जातियों के उन्मूलन के प्रश्न को धर्म परिवर्तन के द्वारा हल करने की राजनीति विद्रोहियों के पैरों में बेड़ियां डालने जैसी है, इससे पूंजीवादी व्यवस्था को सहारा मिलता है और जाति विरोधी आन्दोलन की ‘प्रबल व्यवस्था विरोधी ऊर्जा’ बिखर जाती है। मजदूर वर्ग को इस ऊर्जा को पहचानना होगा और अपने नेतृत्व में लेकर आगे बढ़ना होगा। जातीय वैर-भाव में उत्पादक शारीरिक श्रम के प्रति गहरा वैर-भाव भी मौजूद है। इसका प्रभाव हमारी भाषा, हमारे आचरण में स्पष्ट रूप से दिखता है। हमारा आचारण हमें मजदूर जनता के बड़े हिस्से से काट देता है। दलित जातियों के जीवन की धुरी श्रम, समानता सामूहिकता और प्रकृति के साथ सामंजस्य है, और यह नयी व्यवस्था की भी बुनियाद होगी। सवाल है इसे स्थापित करने का। जातीय उत्पीड़न से मुक्ति का सवाल सभी जातियों के उन्मूलन, सभी जातियों की मेहनतकश जनता की एकता और अन्ततः मेहनतकश वर्ग द्वारा राजनीतिक सत्ता का अधिग्रहण करके जातिविहीन, वर्गविहीन समाज की रचना करने की दिशा में आगे बढ़ना है। हमें यह स्पष्ट करना होगा कि मजदूर वर्ग को ‘जाति’ की कोई जरूरत नहीं है।

जातीय उत्पीड़न और वर्गीय उत्पीड़न –

यह हमेशा ध्यान रखना होगा कि जातीय विभाजन, वर्गीय विभाजन को बनाये रखने के लिये महत्वपूर्ण आधार का काम करता है। मजदूर जनता के जीवन में जातीय उत्पीड़न और     वर्गीय उत्पीड़न इस तरह एक दूसरे से गुंथा हुआ है कि उसे अलग करके नहीं देखा जा सकता है, हमें एक साथ दोनों को नष्ट करना होगा। इसलिए जातीय उत्पीड़न का हर रूप एवं जातीय श्रेष्ठता के हर रूप पर हमें मजदूर वर्गीय दृष्टि से हमला बोलना है। हर प्रकार की जातीय पहचान को बनाये रखने की राजनीति के खिलाफ मोर्चा खोलना होगा।

संस्कृति और शिक्षा के फ्रेम में मजदूर वर्ग पर हमला

मजदूर वर्ग की वर्गीय चेतना को कुन्द करने के लिये एक बहुत बड़ा हमला संस्कृति और शिक्षा के फ्रेम में किया जा रहा है। एक ऐसी संस्कृति परोसी जा रही है जो मानवद्रोही व्यवस्था और उसकी समग्र मशीनरी के साथ लोगों को अनुकूलित करती है और लोगों को आजाद रहने का भ्रम भी बनाये रखती है। संस्कृति अब जन-जीवन का हिस्सा नहीं बल्कि एक बिकाऊ माल है। इसे लोगों के जीवन से निकालकर उनके विरूद्ध खड़ा कर दिया गया है। इससे मनुष्य की अभिव्यक्ति की, विरोध की और प्रश्न खड़े करने का माध्यम ही छिन जाता है और वह भीतर ही भीतर घुटता रहता है। मानव श्रम अब सिर्फ भौतिक मूल्य पैदा करता है सांस्कृतिक मूल्य नहीं, सांस्कृतिक मूल्य पैदा करने का कारोबार पूंजी और बाजार की सत्ता के पास है। इससे मानव श्रम एवं उससे जुड़ी मजदूर जनता की दोयम दर्जे की स्थिति को लगातार बनाये रखने का आधार निर्मित होता है। यह हमला मजदूर जनता की चेतना पर है जो उसे लुटेरों, अपराधियों, घूसखोरों और पतित लोगों को नायक के रूप में देखना सिखाती है। वह यह नहीं देख पाती कि आज के युग का वास्तविक नायक वह खुद है। मजदूर वर्गीय संस्कृति की स्थापना और संस्कृति का जीवन से अलगाव खत्म करने का कार्यभार मजदूर वर्ग का अपना कार्यभार है। यह खुद को हथियार बन्द करने जैसा है ताकि लड़ाई जीती जा सके।

ताकतवर के प्रति आज्ञाकारी और कमजोर के प्रति निरंकुश –

यही हाल शिक्षा व्यवस्था का है, इसका आम जीवन की समस्याओं से कुछ भी लेना-देना नहीं है। पूरा पाठ्यक्रम ऐसा है जिसमें मजदूर जनता के जीवन की कोई छवि ही नहीं होती। यह मनुष्य को ताकतवर के प्रति आज्ञाकारी और कमजोर के प्रति निरंकुश बनाती है। मनुष्य की स्वाभाविक रचनात्मकता को मारकर उसे नकलची बनाती है। भाषा इसकी सबसे बड़ी समस्या है। मातृभाषा से बच्चों को काटकर उन्हें वैचारिक रूप से अपंग बना देती है। सर्वांगीणता की जगह यह एकांगीपन पैदा करती है। व्यक्तिवादी तरीके से आगे बढ़ने की प्रवृत्ति को इतना आगे बढ़ा देती है कि मनुष्य, मनुष्य का दुश्मन बन जाता है। श्रम और सामूहिकता के लिये इसमें कोई स्थान नहीं है। कुल मिलाकर यह शिक्षित गुलाम तैयार करती है। पहले तो शिक्षा का ढांचा पूंजीवादी शिक्षाविद् तैयार करते थे, लेकिन इधर तो अन्य क्षेत्रों की तरह इस कार्य को भी पूंजीपति वर्ग ने सीधे अपने हाथ में ले लिया है। वर्तमान शिक्षा नीति को दो पूजीपतियो ‘बिरला-अंबानी ने तैयार किया है। इसमें हर स्तर पर प्रतियोगिता को लागू करके बच्चों के जीवन को बेहद तनावपूर्ण बना दिया गया है। शिक्षा को योग्यता से काटकर क्रय शक्ति से जोड़ दिया गया है। पैसे, उपभोक्ता वस्तुओं के प्रति पागलपूर्ण लगाव पैदा करके मन एवं मनुष्यता को एकदम परे ढकेल दिया गया है। स्कूलों को बच्चों की जेल में बदल दिया गया है। यह सामाजिक विकृतियों को आधुनिक जीवन मूल्य के रूप में प्रस्तान करती है। झूठ, विश्वासघात, षड्यन्त्र, स्वार्थ, लालच, ओछापन जो पूंजीपति वर्ग के जीवन मूल्य हैं उसे सामान्यकृत करके पूरे समाज पर थोप रही है। लोगों की न्याय-अन्याय में फर्क करने की भावना एवं अन्याय के प्रति आवाज उठाने के प्राकृतिक गुणों को नष्ट करके उन्हें मुर्दा बना रही है। इन सबकी मार मजदूर जनता और उसकी एक जुटता पर पड़ती है। हमें मजदूर वर्गीय श्रम केन्द्रित शिक्षा प्रणाली के लिये भी काम करना होगा। मजदूर वर्ग को अपनी सत्ता कायम करने के लिये सत्ताधारी वर्ग को संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्र में पराजित करना होगा।

एन.जी.ओ. (गैर सरकारी संगठन) और फडिंग एजेंसियों का विरोध करें –

इधर मजदूर वर्ग की वर्गीय एकता को तोड़ने एवं उसकी वर्गीय चेतना को कुन्द करने के लिए एक बड़ा हमला एन0जी0ओ0 और फंडिंग संस्थाओं के द्वारा किया गया है। इसकी ताकत इसके फंड और इसकी सुधारवादी कार्य-प्रणाली में है। हमें दोनों स्तर पर इसका विरोध करना होगा। मजदूर आन्दोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं को सीधे एवं अपरोक्ष तरीके से पैसा देकर उन्हें अंदर से खोखला, पालतू एवं बेईमान बना देती है। इनका मुख्य जोर लोगों को स्कूली तरीके से शिक्षित करने पर होता है, समस्याओं को उसके आर्थिक-सामाजिक-वर्गीय संदर्भो से ये काटकर प्रस्तुत करते हैं ताकि संघर्ष को निर्जीव एवं दिशाहीन किया जा सके। ये वर्गीय-राजनीतिक एकजुटता की जगह नेटवर्किंग की नीति पर अमल करते हैं। निरर्थक बैठकें, निरर्थक वर्कशाप करते जाना इनकी कार्यनीति होती है। आन्दोलनों को रूटीनी कार्यक्रमों में बांधकर ठंडा करना, या गर्मागर्म बातों से उसमें अराजकता पैदा करना इनका धंधा है। इनका जोर फार्म, ऊपरी दिखावे एवं प्रचार पर बहुत होता है। इनका आन्तरिक ढांचा पूरी तरह नौकरशाहाना होता है पर रूप से जनवाद का मुलम्मा चढ़ा रहता है। इस कार्य-प्रणाली के प्रभाव के खिलाफ हमें हर स्तर पर लड़ना होगा। इन बातों के साथ यह भी ध्यान रखना होगा कि मजदूर आन्दोलन को कमजोर बनाने का यह वाह्य कारक है। कोई भी आन्दोलन मुख्यतः अपनी आन्तरिक कमजोरियों से पराजित होता है। यदि हम बाह्य कारकों को प्रधान बना देंगे तो हमारे भीतर की राजनीतिक विकास की प्रक्रिया रूक जायेगी और हम एन0जी0ओ0 के हमले से बचने की बात तो अवश्य जोर-शोर से करेंगे लेकिन अन्ततः उनके फंदे से बच नहीं पायेंगे। इसके साथ ही एन0जी0ओ0 में हजार-दो-हजार की नौकरी कर रहे लोगों को उनके वर्गीय चरित्र के आधार पर देखना चाहिए। हमें मजदूर वर्ग में यह समझ पैदा करनी होगी कि उनका राजनीतिक आन्दोलन उनके अपने प्रयासों, साधनों, कुर्बानियों से आगे बढ़ेगा न कि किसी दाता एजेन्सी या व्यक्ति के अनुदान से। सही मायने में मजदूर आन्दोलन को अपने पैरों पर खड़ा करने की लड़ाई लड़नी होगी। इसी संदर्भ में हमें डब्लू0एस0एफ0 की राजनीति को समझना और उसका विरोध करना होगा।

विकल्प – एक मजदूर वर्गीय जन राजनीतिक संगठन –

इन संदर्भो में मजदूर वर्ग के राजनीतिक आन्दोलन का अर्थ बहुत व्यापक हो जाता है। जब मजदूर जनता के लिये इस व्यवस्था में कोई जगह बची ही नहीं है तो छोटे-छोटे बिखरे संघर्षों से कुछ हासिल करने की सोचना ठीक नहीं है। एक ही विकल्प है, मजदूर जनता को वर्गीय आधार पर संगठित करके पूंजीवादी नीतियों के विरूद्ध जोरदार हमला बोलना। यदि देश की बहुसंख्या मजदूर जनता के घेरे में आती है तो नीतियों को बनाने में भी उसका हित केन्द्र में होना चाहिए। इसके लिये मजदूर वर्ग को खुद को एक राजनीतिक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करना होगा न कि एक याचक के रूप में। भूमण्डलीकरण के हमले ने मजदूर जनता को ट्रेड यूनियनों के दायरे से आगे बढ़ाकर एक ‘जन राजनीतिक संगठन’ के रूप में संगठित होने की जमीन तैयार कर दी है और इसकी चेतना की अभिव्यक्तियां भी दिखाई दे रही हैं, हमें इसे लेकर आगे बढ़ना है न कि इसके पीछे-पीछे चलना है।

मजदूर वर्ग द्वारा सत्ता की दावेदारी – जन संसद –

राजनीतिक संघर्ष का मतलब है, मजदूर वर्ग द्वारा सत्ता की दावेदारी प्रस्तुत करना। इसके लिये हर शोषित- उत्पीड़ित वर्ग-समूह की मुक्ति का कार्यक्रम देना पड़ेगा और उनकी लड़ाईयों में इमानदारी से भागीदारी करनी होगी। व्यवस्था का, न्याय प्रणाली का, अपना विकल्प देना होगा। सत्ता का प्रश्न केन्द्र में आते ही हमें खुद को एक वर्ग के तौर पर सत्ता संभालने के योग्य प्रमाणित करना है। अपनी दयनीयता का रोना बन्द करना होगा। संघर्षों की तात्कालिक एवं दूरगामी योजना प्रस्तुत करनी होगी। यह याद रखना होगा कि सभी शोषित-उत्पीड़ित वर्गों को मुक्त करके ही मजदूर वर्ग की मुक्ति होगी। मजदूर जनता की श्रेणी से अलग अन्य शोषित उत्पीड़ित वर्गों के हितों का, प्रतिनिधित्व करने वाले समानान्तर राजनीतिक मंच के गठन की भी पहलकदमी लेनी होगी। इसे ‘जन संसद’ या कोई अन्य उचित नाम दिया जा सकता है।

मजदूर वर्ग के राजनीतिक आन्दोलन का अर्थ यह नहीं है कि उसे अपने प्रतिनिधियों को संसद या विधान सभाओं में पहुंचाकर सरकार बनाने-बिगाड़ने की तिकड़मों का हिस्सेदार बनना होगा। हमें अपने वर्ग को यह समझाना है कि संसद, विधान सभायें पूंजीवादी सत्ता के दिखाने के दांत हैं, उसकी असली सत्ता उसकी फौज, पुलिस, नौकरशाही, न्यायपालिका में निहित है। ये संस्थाएं न तो जनता के वोट से गठित की जाती हैं और न ही उसके प्रति जवाबदेह हैं। पूंजीवादी कानूनों के तहत संसद के मार्फत मजदूर वर्ग की सत्ता कायम करने की बात करना मजदूर वर्ग को धोखा देना है।

व्यवहारिक कार्यक्रम द्वारा विकल्प –

कहने का अर्थ यह नहीं है कि मजदूर वर्ग की सत्ता में चुनाव की व्यवस्था नहीं होगी। सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़े हर पद पर चुनाव होगा, चुनाव वास्तविक एवं व्यापक होगा। लोगों को चुनने के साथ अपने प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का भी अधिकार होगा। नीतिगत प्रश्नों पर मजदूर वर्ग का फैसला अन्तिम होगा। इसके साथ ही पूंजीवादी मशीनरी की जगह जनसत्ता का ढांचा नीचे से लेकर ऊपर तक खड़ा करना होगा। यह कार्य कठिन एवं लम्बा है, इसके बिना हम पूंजीवादी मशीनरी और उसकी न्याय प्रणाली की गुलामी से मुक्त नहीं हो सकते और न ही उसकी अवहेलना-बहिष्कार का नारा दे सकते हैं। न्यायपालिका में लम्बित 3 करोड़ मुकदमें इसकी अक्षमता की नहीं बल्कि लोगों को न्याय देने के बहाने उलझाये रखने की नीति का परिणाम है। पूरी पूंजीवादी मशीनरी लोगों को निष्क्रिय करने और एक गोल दायरे में घुमाते रहने की सचेत कार्यवाही है। मजदूर जनता इससे पूरी तरह ऊब चुकी है और इसके बाहर निकलना चाहती है। हमें जनता की इस चेतना को व्यावहारिक कार्यक्रम में ढ़ालना होगा।

मजदूर आंदोलन को राजनीतिक संघर्षों की जमीन पर खड़ा करें –

इन तथ्यों के बावजूद मजदूर वर्ग के संघर्षों, जीतों का एक गौरवशाली इतिहास है। मई दिवस, पेरिस कम्यून, रूसी क्रान्ति, चीनी क्रान्ति और पूरी दुनियां एवं भारत में मजदूर वर्ग द्वारा की गयी निर्णायक लड़ाईयां हमारी विरासत हैं। इस पूरी प्रक्रिया में वास्तविक तौर पर मजदूर वर्ग वैचारिक एवं भौतिक तौर पर बेहद शक्तिशाली हुआ है। हम अपने को इस गौरवशाली इतिहास एवं पूरे विश्व के मजदूरों के संघर्षों से जोड़कर जब देखते हैं तो भारत के पूंजीपति वर्ग की सत्ता बेहद मामूली लगती है। हम न सिर्फ इसे चुनौती दे सकते हैं बल्कि पराजित भी कर सकते हैं। सवाल है, मजदूर आन्दोलन को अर्थवाद, सुधारवाद, कानूनवाद के घेरे से बाहर निकालकर राजनीतिक संघर्षों की जमीन पर खड़ा करने का और देश में चल रहे सभी मजदूर संघर्षों को इसके मातहत लाकर राजनीतिक तौर पर एकजुट करने का।

150 वर्षों के संघर्षों का अनुभव हमारे साथ है –

आज राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियां मजदूर वर्ग के राजनीतिक आन्दोलन के लिये बेहद अनुकूल हैं। हमें अपने इतिहास से, अपने लोगों से और पड़ोस एवं पूरी दुनियां में चल रहे जन आन्दोलनों से सीखते हुए आगे बढ़ना है। हमारी लड़ाई दुनियां के मजदूर आन्दोलनों की एक कड़ी है, और हमारी जिम्मेदारी पूरी दुनियां के मजदूर वर्ग के प्रति भी है। अन्तर्राष्ट्रीयतावादी दृष्टिकोण को त्याग कर हमारा आन्दोलन अपनी राजनीतिक धार खो देगा। आज के मजदूर वर्ग के पीछे 150 वर्षों के संघर्षों का अनुभव एवं सबक मौजूद है। हम आज बहुत उन्नत जमीन पर खड़े हैं। बस सही तरीके से शुरूआत करने की देर है।

हमें मिलकर दृढ़ता से एक नयी शुरूआत करने का संकल्प करना होगा। सच्चे अर्थों में मजदूरों का एक ऐसा “अखिल भारतीय जन राजनीतिक संगठन” खड़ा करना होगा जिसके झंडे तले जमीनी स्तर पर चलने वाला मजदूर जनता का संघर्ष एकीकृत हो कर पूंजी की सत्ता के किले पर धावा बोल सके।

दुनियां के मजदूरों एक हो!

 

आल इंडिया वर्कर्स कौन्सिल

(सांगठनिक परिप्रेक्ष्य)

‘आल इंडिया वर्कर्स कौन्सिल देश की व्यापक सर्वहारा-अर्घसर्वहारा आबादी मजदूर जनता का जन राजनीतिक संगठन है। यह न तो ट्रेड यूनियन, फेडरेशन, कनफेडरेशन और न ही मजदूर वर्ग की पार्टी है, बल्कि दोनों के बीच की कड़ी है। यह यूनियनों का मंच भी नहीं है। इसके गठन का आधार वर्ग और वर्ग के भीतर सक्रिय राजनीतिक कार्यकर्ता होते हैं। पार्टी की तरह कठोर विचारधारात्मक आधार पर इसे गठित नहीं किया जाता बल्कि वर्ग की सामान्य वर्गीय मांगों के आधार पर गठित किया जाता है। यूनियनों की तरह सामूहिक सौदेबाजी और श्रम कानूनों के दायरे में काम करने वाले सदस्यता आधारित संगठन की तरह भी इसका गठन नहीं होता। इसका मकसद पूंजीवादी सत्ता से श्रम के पक्ष में कुछ रियायतें हासिल करना नहीं बल्कि अपने संघर्षों के जरिये उसे बेनकाब करना। पीछे ढकेलना और पूरे समाज के समक्ष एक नया विकल्प पेश करना है। इसक साथ ही इसका लक्ष्य मजदूर वर्ग को एक राजनीतिक शक्ति के रूप में संगठित करते जाना है ताकि वह सत्ता अधिग्रहण के योग्य बन सके।

पूजी और श्रम के बीच सतत जारी वर्ग-संघर्ष में पूंजीपति वर्ग पूरी शक्ति और आक्रमकता के साथ आज भागीदारी कर रहा है, यहां तक कि सशस्त्र बल का भी प्रयोग कर रहा है। इसके खिलाफ हमारी भागीदारी महज ट्रेड यूनियन स्तर की है। यह इस युद्ध के लिये सिर्फ नाकाफी ही नहीं बल्कि कई बार नुकसानदेह भी होता है क्योंकि नकारात्मक नतीजों से लोगों का विश्वास ट्रेड-यूनियनों में कमजोर पड़ने लगता है। मजदूरों के हितों की लड़ाई जैसे ही राजनीतिक दायरे में प्रवेश करती है, वैसे ही उसके मुताबिक संगठन की आवश्यता पड़ती है। कौंसिल इस आवश्यकता का परिणाम है। यह अलग-अलग ट्रेड की विशिष्ट मांगों से आगे बढ़कर पूरे वर्ग की सामान्य मांगों को केन्द्र में रखकर आगे बढ़ता है और इन मांगों को सीधे तौर पर पूंजीपति वर्ग की सत्ता के समक्ष इस रूप में प्रस्तुत करता है कि इन मांगों के लिये वह हर स्तर पर संघर्ष के लिए तैयार हैं। वर्ग-संघर्ष में निर्णायक भागीदारी के लिये ऐसे संगठन की आवश्यकता होती है जो संघर्ष की लगातार उन्नत मंजिल में प्रवेश करते जाने की प्रक्रिया के साथ खुद उन्नत होता जाये। ट्रेड यूनियनों की यही सीमा है। पार्टी भी पूरे वर्ग को अपनी सदस्यता के घेरे में नहीं ला सकती। पूरे वर्ग की एकीकृत सक्रियता का एक ही संगठन है, उस वर्ग का जन राजनीतिक संगठन। इसमें व्यापकता होती है, लचीलापन होता है एवं इसमें नयी सत्ता के भ्रूण मौजूद रहते हैं।

मजदूर जनता का अस्तित्व एक पूरे समाज के मध्य है, जहां दूसरे वर्ग और समूह भी अस्तित्व में होते हैं। वह इन वर्गों से एक वर्ग के रूप में तमाम संबंधों से बंधा हुआ एवं उनके सुख-दुःख से जुड़ा होता है। इन वर्गो-समूहों की समस्याओं के समाधान के लिये वह एक वर्ग के रूप में ही हस्तक्षेप कर सकता है और इसी से उसकी राजनीतिक वरीयता इनके ऊपर स्थापित होती है। इन उत्पीड़ित-शोषित वर्गों को अपने पक्ष में खड़ा करके ही वह पूंजी की सत्ता को चुनौती दे सकता है। ट्रेड यूनियन मंच इस काम को नहीं कर सकते और बहुधा उनके द्वारा आयोजित हडतालों को दूसरे उत्पीड़ित वर्ग सकारात्मक तौर से नहीं ले पाते। हालांकि इसमें पूंजीवादी मीडिया के प्रचार की भी भूमिका होती है। इस रूप में जन राजनीतिक संगठन सबसे व्यापक, सबसे जनवादी और सबसे ताकतवर संगठन होता है।

शुरूआती दौर में इसके गठन में राजनीतिक कार्यकर्ताओं की भूमिका अधिक दिखेगी। धीरे-धीरे इसमें वर्ग की भूमिका, सक्रियता व भागीदारी बढ़ते जाना चाहिए और यह दिखना भी चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता तो यह जन राजनीतिक संगठन नहीं बन पायगा। ऐसा तभी हो सकता है जब इसकी शाखाओं का प्रसार एकदम नीचे तक हो जाय। हर स्तर पर कमेटियां सीधे तौर पर वर्ग के द्वारा चुनी जायें और ये कमेटियां ऊपरी स्तर पर राज्य एव अखिल भारतीय कमेटी को चुनें। इस तरह नीचे से ऊपर तक मजदूर वर्ग का एक ऐसा ढाचा खड़ा हो जायेगा जो एक साथ पूरे देश में सिर्फ मजदूर वर्ग ही नहीं बल्कि सभी उत्पीड़ित-शोषित वर्गों को पूंजीवादी सत्ता के विरूद्ध सक्रिय कर पायेगा।

इस संगठन का गठन ट्रेड यूनियनों का निषेध नहीं है बल्कि उसके कार्यों और दायरे का विस्तार है। ट्रेड यूनियनों में संगठित मजदूर अपने प्रतिनिधियों के मार्फत जन राजनीतिक सगठन में भी प्रतिनिधित्व प्राप्त करेंगे और इसके कार्यक्रमों को जो मजदूर वर्ग के सामान्य हित में है, लागू करने के लिये अपने सदस्यों को प्रेरित करेंगे। इससे ट्रेड यूनियनों की साख और ताकत बढ़ेगी। इसलिए ट्रेड यूनियनों, फेडरेशनों का स्वतंत्र अस्तित्व मजबूती से बना रहेगा और कौन्सिल इनके संघर्षों को हर प्रकार की मदद भी करेगी ताकि कोई भी ट्रेड यूनियन अपने संघर्षों में अकेला न पड़ने पाये। पूरे वर्ग की ताकत और अन्य उत्पीड़ित वर्गों की ताकत व समर्थन वास्तव में उसके साथ होगा।

निश्चित तौर पर आल इण्डिया वर्कर्स कौन्सिल में, मजदूर वर्ग में सक्रिय तमाम संगठनों, ग्रुपों का प्रतिनिधित्व होगा और इस तरह कई विचारों की टकराहट भी होगी। लेकिन किसी भी विचारधारा को गैर जनवादी तरीके से न तो थोपा जा सकता है और न ही कौन्सिल में व्यापक जनवाद के आधार पर लिये गये निर्णयों को मनमाने तरीके से तोड़ने-मरोड़ने की इजाजत होगी। हर ग्रुप को अपने विचारों व साहित्य का प्रचार करने का पूरा अधिकार होगा लेकिन कौन्सिल को क्षति पहुंचाने की कीमत पर नहीं। इस तरह कौन्सिल एक तीखे वैचारिक संघर्ष के मंच के रूप में भी काम करेगी। विचारों का यह संघर्ष मजदूर वर्ग के वर्गीय हितों से पैदा हुए प्रश्नों के आधार पर होगा ताकि यह अनन्त न होकर तर्कसंगत परिणामों तक पहुंच सके। मजदूरों में सक्रिय साम्प्रदायिक-फासीवादी संगठनों, फंडिंग एजेन्सीज से जुड़े गैर सरकारी संगठनों के लिये कौन्सिल में कोई स्थान नहीं होगा। इसमें कार्यरत मजदूरों-कर्मचारियों पर यह पाबन्दी नहीं होगी।

अपने देश में मजदूर जनता का बहुत बड़ा हिस्सा आज भी यूनियनों में संगठित नहीं है और काफी जगह यूनियनें महज कागज पर ही संगठित हैं। आज नए यूनियन रजिस्टर कराने के लिए हर राज्य में अपरोक्ष तौर पर रोक लगी है। आज पूरे देश में एक तरह से बहुसंख्यक मजदूरों का प्राथमिक संगठन भी नहीं है। इसका एक कारण तो यह है कि इन बहुसंख्यक मजदूरों के हितों का प्रश्न सीधे तौर पर राज्य की नीतियों से जुड़ा हुआ है। ये स्वाभाविक तौर पर मजदूर वर्ग के राजनीतिक संघर्षों के भागीदारी होंगे। काउंसिल सचेत तौर पर अपनी सक्रियता इनमें बढ़ाएगी। इसके साथ ही इनको अपनी-अपनी ट्रेड यूनियनें बनाने में पूरा सहयोग करेगी। ताकि इनके ट्रेड से जुड़े विशिष्ट सवाल भी सामने आ सकें। बिखरे मजदूरों की ट्रेड यूनियनें गठित करवाना भी उसकी राजनीतिक लड़ाई का एक जरूरी हिस्सा है। इनके ऊपर पूंजीवादी राजनीति की पकड़ को तभी तोड़ा जा सकता है और वर्गीय चेतना को धारदार बनाया जा सकता है

चूँकि यह एक व्यापक जन संगठन है इसलिए सदस्यता आधारित नहीं हो सकता है। मजदूर वर्ग का जन राजनीतिक संगठन पूरे देश में एक ही हो सकता है। अलग-अलग पार्टियों ग्रुपों के नेतृत्व में खड़े किए गए जन राजनीतिक संगठन वास्तव में जन संगठन नहीं बल्कि फ्रंटल संगठन है जो मजदूर वर्ग में पार्टी के हितों की पूर्ति के लिए गठित किए गए हैं। कई संगठनों के लिए उनका महत्व एक भर्ती केंद्र के रूप में है ना कि मजदूर वर्ग के राजनीतिक आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए। वह जन संगठन जो सभी ग्रुपों के लिए तथा वर्ग के सभी सदस्यों के लिए खुला है तथा जो पूर्ण जनवाद के आधार पर संचालित होता है वही सच्चे मायने में वर्ग का जन राजनीतिक संगठन बन पाएगा।

ऑल इंडिया वर्कर्स काउंसिल के गठन के पीछे यही समझ लागू की जा सकती है ताकि यह सही मायने में जन राजनीतिक संगठन की प्रभावी भूमिका में आकर मजदूर वर्ग के राजनीतिक आंदोलन की कमान अपने हाथों में ले सके।

हमारे कार्यभार:

  1. राष्ट्रीय पैमाने पर मजदूर वर्गीय आन्दोलन को संगठित एवं संचालित करना।
  2. मजदूरों के सभी संघर्षों को इस राष्ट्रीय आन्दोलन से जोड़ना।
  3. मजदूर वर्ग विरोधी राजनीति को बेनकाब करना एवं मजदूर जनता को इसके प्रभाव

से मुक्त होने में सहयोग करना।

  1. मजदूर वर्ग की वर्गीय चेतना को धारदार बनाना एवं उसे राजनीतिक तौर पर सक्रिय करना।
  2. कौन्सिल को सभी शोषित उत्पीड़ित, वर्गों समूहों के मुक्ति संघर्षों से जोड़ना एवं उनके वास्तविक हितों का प्रतिनिधित्व करने वाला कार्यक्रम प्रस्तुत करना।
  3. देश में सक्रिय तमाम क्रान्तिकारी, राजनीतिक ग्रुपों व पार्टियों से कौन्सिल का दोस्ताना । सम्बन्ध कायम करना एवं कौन्सिल में उनकी भागीदारी को विस्तारित करना।
  4. कौन्सिल का दरवाजा मजदूर वर्ग के व्यक्तियों एवं संगठनों के लिये सदैव खुला रखना। 8. इसे नीचे से लेकर ऊपर तक एक प्रतिनिधित्वकारी संगठन के रूप में विकसित करना

एवं जनवाद को सच्चे अर्थों में नीचे से ऊपर तक लागू करना।

  1. कौन्सिल के माध्यम से मजदूर वर्ग के अन्तर्राष्ट्रीय दायित्वों का निर्वाह करना।
  2. कौन्सिल के खर्च को पूरा करने के लिये पूरी तरह अपने वर्ग से सहयोग जुटाने की नीति पर अमल करना।

 

(लखनऊ, दिनांक: 24-7-2008 प्रथम महाधिवेशन तैयारी समिति, आल इंडिया वर्कर्स कौन्सिल)

 

आल इण्डिया वर्कर्स कौन्सिल, लखनऊ

सम्पर्क फोन: 09415568777 (ओ.पी. सिन्हा), 09889679480 (के.एन. शुक्ल), (09335223922 (रामकृष्ण) E-mail: opsinha21@gmail.com

केन्द्रीय कार्यालय :69/1, बाबा का पुरवा, पेपर मिल रोड, निशातगंज, लखनऊ

सम्पर्क पता : 281/28ए, मवइया पार्क के सामने, मवइया चौराहा, लखनऊ-4

आल इण्डिया वर्कर्स कौन्सिल के लिए रामकृष्ण द्वारा मवइया पार्क, मवइया चौराहा, लखनऊ से प्रकाशित। मुद्रक: श्रीकृष्ण प्रेस, मवइया पार्क, मवइया चौराहा, लखनऊ।

 

 

 

 

 

 

अंदर के पृष्ठों से………..

ऐसी स्थिति में जब राज्य पूंजीपतियों के समर्थन में खुलकर आ चुका हो तो मजदूर आन्दोलन को उस सत्ता से टकराने की तैयारी करनी चाहिए। भूमण्डलीकरण ने इस टकराव को अवश्यम्भावी बना दिया है, इससे कतराने का अर्थ अपनी तबाही को स्वीकार कर लेना है।

 

शिक्षा को योग्यता से काटकर क्रय शक्ति से जोड़ दिया गया है। पैसे-उपभोक्ता वस्तुओं के प्रति पागलपूर्ण लगाव पैदा करके मनुष्य एवं मनुष्यता को एकदम परे ढकेल दिया गया है। स्कूलों को बच्चों की जेल में बदल दिया गया है। यह सामाजिक विकृतियों को आधुनिक जीवन मूल्य के रूप में प्रस्तुत करती है। झूठ, विश्वासघात, षड्यन्त्र, स्वार्थ, लालच, ओछापन जो पूंजीपति वर्ग के जीवन मूल्य हैं उसे सामान्यीकृत करके पूरे समाज पर थोप रही है। लोगों की न्याय-अन्याय में फर्क करने की भावना एवं अन्याय के प्रति आवाज उठाने के प्राकृतिक गुणों को नष्ट करके उन्हें मुर्दा बना रही है।

 

दलित जातियों के जीवन की धुरी श्रम, समानता सामूहिकता और प्रकृति के साथ सामंजस्य है, और यह नयी व्यवस्था की भी बुनियाद होगी। सवाल है इसे स्थापित करने का। जातीय उत्पीड़न से मुक्ति का सवाल सभी जातियों के उन्मूलन, सभी जातियों की मेहनतकश जनता की एकता और अन्ततः मेहनतकश वर्ग द्वारा राजनीतिक सत्ता का अधिग्रहण करके जातिविहीन, वर्गविहीन समाज की रचना करने की दिशा में आगे बढ़ना है। हमें यह स्पष्ट करना होगा कि मजदूर वर्ग को ‘जाति’ की कोई जरूरत नहीं है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here