ग्लोबल दुनिया में अकेले हम

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नई पीढ़ी की असफलता की मुख्य वजह पूँजीवाद के अधिकतम मुनाफे का वह कॉन्सेप्ट है जहाँ उन्नत टेक्नोलॉजी के सहारे मिनिमम मानव श्रम से अधिकतम मुनाफा अर्जित किया जाना है। मुझे एक बात याद है, घर के अंदर बातचीत के दौरान मैं अपने माँ/बाप से कहता था कि मेरा प्यार दुनिया भर के लिए है, कभी यदि सुकड़ गया तो भी माँ/बाप/भाई/बहन/नात/रिश्तेदार/मित्र/यार तक तो रहेगा ही लेकिन जो अभिभावक अपने बच्चों को उनकी दुनिया माँ/बाप/बीवी/बच्चे तक बता रहे हैं, उन बच्चों का प्यार सिकुड़ा तो माँ/बाप त्यागते हुए उनका प्यार सिर्फ उनकी बीवी और बच्चों तक रह जाएगा। आज जब मैं अभिभावक हूँ तो देख रहा हूँ मेरी ही पीढ़ी और मेरे ही अनुज अपने माँ/बाप और सगे/सहोदरों को नहीं अपना रहे हैं और मेरी अगली पीढ़ी तो बिल्कुल निजी जीवन जीने को अभिशप्त है।
अमित की कविता “ग्लोबल दुनिया में” बहुत ही दर्द भरी दास्ताँ कहती है। कविता की अभिव्यक्ति उत्तम है। कविता की भाषा अति सरल है। कविता का भाव गहरी अनुभूतियों पर आधारित है। जाके पैर न फटी बेवाई सो क्या जाने पीर पराई। इस कविता को शिद्दत से वही महसूस कर सकता है जो मानव मन को पढ़ना जनता है और वह भी समझ सकता है जो मानवता की वकालत करता है। इस कविता के दर्द को एक क्रान्तिकारी समझ सकता है जो सचमुच वसुधैवकुटुम्बकम की बात करता है, जो चाहता है कि हम सामूहिक जीवन जिएं, हम संयुक्त परिवार को टूटने से बचाएं। संयुक्त परिवार टूट रहा है। हम एकल परिवार में जी रहे हैं।
जब मैं स्नातक का छात्र था, आदर्श अधिक था किन्तु वह आदर्श समाज को परिवर्तित करने का आदर्श था। मेरी सामान्य बातें भी भाषण हो जाया करती थी। लोग उलाहने देते थे, खाना आँटता नहीं, चले हैं दुनिया बदलने। हम इस बात पर चर्चा करते थे कि हम जिस दुनिया के सुख के लिए क्रान्ति की बात करते हैं, वही दुनिया वाले हमारी ही मुख़ालिफत करते हैं और हमारा ही विरोध करते हैं। दुनिया वाले कितने नासमझ हैं कि अपने ही रक्षक को हतोत्साहित करते हैं। हमने उस समय यह देखा था कि वे अभिभावक अपने बच्चों से कहते थे, तुम्हें पढ़ने के लिए स्कूल भेजते हैं, नेतागिरी करने के लिए नहीं। वहाँ जाकर नेता न बन जाना। नौकरी करो। जिसका घर बना रहता है लोग उसकी प्रसंशा करते हैं, अकिंचनों-अतीमों का अनुसरण कोई नहीं करता है। लोग बने कै बजनिया हैं। जिसका बना रहता है उसको अनेक साले मिल जाते हैं लेकिन जिसका बिगड़ जाता है उसको खोजने पर भी जीजा नहीं मिलता है। ऐसी बातें सुनकर बहुत कोफ्त होती थी। ऐसे अभिभावकों की शिक्षा/संस्कृति ने अगली पौध घोर व्यक्तिवादी पैदा किया। हमारे घरों में हमारे अभिभावक हमारा विरोध करते थे। वे कहते थे, भगत सिंह/गाँधी/आम्बेडकर बनने की जरूरत नहीं है, नहीं तो भूखों मर जाओगे। कोई भी नहीं पूछेगा। भगत सिंह फाँसी पर झूल गए, क्या मिला? गाँधी को अंत में अपने ही लोगों ने गोली मार दी, देश को स्वतंत्र कराकर क्या फायदा पाए? आम्बेडकर दर दर की ठोकरें खाते फिरे और उनके बच्चे दवा के अभाव में मर गए, कौन हुआ उनका? यहाँ तक की आम्बेडकर की बीवी भी भूख और दवा के अभाव में उम्र से पहले ही मर गईं।
जब हम दुखी होते थे, तब हमारे सीनियर साथी कहते थे, साथी! घबराने की बात नहीं है, यह पूँजीवाद की देन है। पूँजीवादी संस्कृति व्यक्तिवाद को इसलिए पनपा रही है जिससे हर व्यक्ति घोर व्यक्तिवादी होकर अपनी रोजी/रोटी और अपना भला खोजता फिरे। पूँजीवाद यह शिक्षा देता है कि व्यक्ति को अपनी प्रज्ञा और कुशलता को अपनी सफलता/असफलता का जिम्मेदार मानना चाहिए। जो पास समझो मेहनत किया है जो फेल समझो उचित मेहनत नहीं किया है। पूँजीवाद यह नहीं सिखाता है कि 35 करोड़ बेरोजगार युवकों को रोजगार न होने के कारण रोजगार नहीं मिल रहा है बल्कि वह यह सिखाता है कि युवकों की बेवजह की नेतागिरी/क्रांतिकारिता/भाषणवाजी/ऐय्यासी/बदमाशी/आतंकवादी प्रवृतियों/ठीक से न पढ़ना/ठीक से तैयारी न करना इत्यादि रोजगार न पाने का कारण है। पूँजीवाद और अभिभावकों के व्यक्तिवादी चिंतन की वजह से नई पीढ़ी कैरियर ओरिएंटेड हो गई। नई पीढ़ी इतनी ज्यादे संकीर्ण हो गई है कि वह अपने बेरोजगार होने का कारण रोजगार का न होने को जिम्मेदार नहीं मानती है बल्कि यह मानती है सरकार क्या करे, प्रतियोगिता ही इतनी टफ है कि हम लोग खुद फेल हो जाते हैं। नई पीढ़ी अपनी असफलता का कारण स्वयं को मानती है। कुछ पंक्तियाँ देखिए:
शोषण की ऐसी-ऐसी
तकनीकें हमने इज़ाद कर ली हैं
कि उसमें खुद अपना पिसना भी
नज़र नहीं आता।
जबकि, नई पीढ़ी की असफलता की मुख्य वजह पूँजीवाद के अधिकतम मुनाफे का वह कॉन्सेप्ट है जहाँ उन्नत टेक्नोलॉजी के सहारे मिनिमम मानव श्रम से अधिकतम मुनाफा अर्जित किया जाना है। मुझे एक बात याद है, घर के अंदर बातचीत के दौरान मैं अपने माँ/बाप से कहता था कि मेरा प्यार दुनिया भर के लिए है, कभी यदि सुकड़ गया तो भी माँ/बाप/भाई/बहन/नात/रिश्तेदार/मित्र/यार तक तो रहेगा ही लेकिन जो अभिभावक अपने बच्चों को उनकी दुनिया माँ/बाप/बीवी/बच्चे तक बता रहे हैं, उन बच्चों का प्यार सिकुड़ा तो माँ/बाप त्यागते हुए उनका प्यार सिर्फ उनकी बीवी और बच्चों तक रह जाएगा। आज जब मैं अभिभावक हूँ तो देख रहा हूँ मेरी ही पीढ़ी और मेरे ही अनुज अपने माँ/बाप और सगे/सहोदरों को नहीं अपना रहे हैं और मेरी अगली पीढ़ी तो बिल्कुल निजी जीवन जीने को अभिशप्त है। कवि की यह पंक्ति मेरी बातों/मेरी यादों को बिल्कुल चरितार्थ कर रही है। प्रस्तुत है वह पंक्तियाँ:
ग्लोबल दुनिया में
किसी की मदद करना
सहारा देना या इज्जत देना
पुराने जमाने की बात है।
हमारा संबंध उत्पादन की भौतिक शक्तियों पर आश्रित होता है। हमारी इच्छाएँ, हमारे सपने भले ही कुछ और हों लेकिन उत्पादन की भौतिक शंक्तियाँ हमसे स्वतंत्र रूप से हम पर प्रभावी होती हैं। उत्पादन की भौतिक शक्तियाँ धीरे-धीरे एकाधिकारी होती चली जा रही हैं जिसकी वजह से न चाहते हुए भी मनुष्य उनकी गतिविधियों का दास होता जा रहा है। पूँजीवाद उस जादूगर की तरह हमारी नज़रें बन्द कर दे रहा है कि हाथी के न होने पर सभी दर्शकों को एक साथ हाथी ही दिखाई पड़ती है। मनुष्य का अचार/व्यवहार/विचार/संस्कार सब उत्पादन की भौतिक शक्तियों पर ही निर्भर कर रहा है। संसाधनों की अनुपलब्धता ने मनुष्य को चोर/उचक्का/बदमाश/व्यभिचारी/लुटेरा/हत्यारा/आतंकवादी/भाई का दुश्मन/डोली का लुटेरा/शराबी बनाया है। कविता की लाज़वाब पंक्तियाँ देखिए:
हमारी इच्छाएँ
हमारे सपने
भले ही आसमान छूते हों
लेकिन हमारा ज़मीर
धूल चाट रहा है ज़मीन पर।
हमारी संस्कृति मानव विरोधी इसलिए हो रही है कि पूँजीवाद ने मिनिमम श्रम की उपयोगिता के आधार पर अधिकतम मुनाफा कमाने का उद्देश्य मनुष्य के लाशों पर टिका रखा है। मनुष्य की नैतिक और भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति जरूरी है लेकिन इन आवश्यकताओं की पूर्ति के संसाधन आम आदमी के हाथों में नहीं हैं इसलिए मनुष्य संसाधनों के अभाव में अपनों का ही हत्यारा हो गया है।
सुरक्षा के इतने-इतने
बंदोबस्त करने के बाद भी
हम इतने असुरक्षित हैं
कि हमें अपने भाई से भी
डर लगने लगा है।
बड़े शहरों में दो कमरे से अधिक जगह नहीं है। अधिकतर तो एक कमरे के मकान में जीवन-यापन कर रहे हैं। कुछ की मजबूरी है और कुछ छोटे मकान में इसलिए रह रहे हैं जिससे उनको नौकरों जैसा झाड़ू-पोछा न करना पड़े। आज नई लड़कियाँ जब बहु बन कर घर बसाती हैं तो वे बड़े घरों को नहीं पसंद करती हैं। वे एकल/एकांत में पति के साथ में बाधा नहीं चाहती हैं। उन्हें साफ-सफाई अधिक करना पड़े, पसंद नहीं है। आज हमारा एकल परिवार का कॉन्सेप्ट है। घर छोटा है। छोटे घर में जगहें कम है। हम आसानी से बहाना कर सकते हैं कि हमारे पास रहने की पर्याप्त जगह नहीं है तो परिवार के अन्य सदस्यों को कैसे समायोजित करें। जब घर में लेटने/बैठने/सोने की जगह नहीं है तो माँ/बाप/भाई/बहन/भौजाई कैसे रुकेंगे? यदि रुक गए तो दिक्कत हो जाएगी इसलिए न वे आते हैं और न ये चाहते हैं कि कोई आए। न रहे बाँस न बजे बाँसुरी। यथा:
घरों में इतनी कम जगह बच गयी है
कि उसमें अतिथि तो क्या
माँ-बाप तक के लिए जगह नहीं।
हमारी संस्कृति इतनी नीच हो गई है और हम इतना गिरते चले जा रहे हैं कि माँ/बाप तक को अपने पास नहीं रखना चाह रहे हैं। किसी मजबूरी वश यदि माँ/बाप बेटे/बहु के साथ उनके आवास पर रुक गए तो उन्हें न कमरा नसीब होगा, न गद्दा/रजाई, न पंखा/कूलर। उन्हें किसी तरह गैलरी में जाड़ा, वर्षा और गर्मी  झेलना होगा। मानवता कितनी मर गई है कि बेटा/बहु/बच्चे एसी/कूलर/पंखा/ब्लोवर में कमरा बन्द करके सोते हैं और आवारा पशुओं की तरह माँ/बाप को असुरक्षित गैलरी/बालकनी/गैराज/बरामदा/पोर्च में डाल देते हैं। परिस्थिति की पीड़ा से अधिक अपनों के बेगानापन और उनके अजनबी व्यवहार से होता है।
सच तो ये है कि हमने जो
ग्लोबल दुनिया तैयार की है
उसमें हम सब अजनबी हैं
अपनी-अपनी समस्याओं के साथ
बिल्कुल अकेले।
इस कविता को पढ़कर मरहूम अभिनेता गुरुदत्त की फ़िल्म प्यासा याद आ गई। पूँजीवाद ने व्यक्तिवाद को किस तरह उभारा है कि अपने भी अपना कहने से कतराने लगे हैं।
आर डी आनंद

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