निर्माण मज़दूरों को ठेके पर नहीं करना चाहिए जोड़इया-पोतइया का काम

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हमारा मोर्चा के कार्यकारी संपादक कामता प्रसाद की ओर सेः मज़दूर साथियों को रंगाई-पुताई, टाइल्स लगाने, गड्ढा खोदने, छत ढालने, नलसाजी आदि-आदि का काम ठेके पर नहीं करना चाहिए और इसके लिए दिहाड़ी पर ही काम करने पर अड़े रहना चाहिए। अगर वे ऐसा नहीं करेंगे तो थोड़े से अधिक पैसे कमाने की लालच में वे अपनी सेहत गर्क करेंगे और मज़दूरों के बीच जानलेवा होड़-प्रतिस्पर्धा को जन्म देंगे जो वर्ग के तौर पर मज़दूर वर्ग के हक में नहीं।
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रत का सबसे अमीर बैंकिंग पूंजीपति उदय कोटक बहुत चिंतित है कि मजदूरी दर बढने का दबाव बढता जा रहा है और मजदूरी दर बढने से महंगाई की उच्च दर स्थाई बन सकती है। उपभोक्ता के रूप में जब भी महंगाई समाज में समस्या बनती है तो पूंजीपति वर्ग और उसके भडैत प्रचारक बुद्धिजीवी ऐसे ही मजदूरों को सामाजिक शत्रु के रूप में पेश करने लगते हैं जबकि महंगाई के लिए वास्तविक जिम्मेदारी अगर किसी की है तो पूंजीपतियों की। खास तौर पर इजारेदारी के मौजूदा दौर में तो महंगाई का प्रमुख कारण पूंजीपतियों की सुपर मुनाफाखोरी ही है। वास्तविकता तो अभी बेहद ऊंची बेरोजगारी और इसलिए मजदूरों की बढी आपूर्ति के कारण रोजगार की आपसी होड में गिरती वास्तविक मजदूरी (महंगाई की तुलना में) है। अर्थव्यवस्था के कुछ छोटे हिस्से जहां किसी विशिष्ट कौशल की जरूरत हो इसके अपवाद हो सकते हैं पर आम स्थिति तो मजदूरी गिरने की ही है। नियमित स्थाई मजदूरों के बजाय अस्थाई ठेका कैजुअल मजदूरी इसका एक मुख्य तरीका है और सभी उद्योगों में इनकी तादाद ही अधिक होती जा रही है।
पर नहीं, उसे बुरा भला मत कहिए, बेचारे पूंजीपति मजदूरी बढने की चिंता तो मजदूरों के प्रति अपनी मानवीय हमदर्दी के कारण करते हैं! उनके गुरु एडम स्मिथ ढाई सौ साल पहले ही बता गए हैं कि मजदूरी देने में उदारता बरतने से मजदूर जल्दी अमीर बनने की लालसा में हद से अधिक मेहनत करने लगते हैं और उनकी सेहत जल्द बरबाद हो जाती है।

अब समझिए असली महान शासक वर्ग विद्वान कैसे होते हैं। आम बुर्जुआ व छोटे मालिक मजदूरी बढने और रोजगार गारंटी का विरोध यह कहकर करते हैं कि इससे मजदूर सुस्त व कामचोर हो जाते हैं। तुरंत समझ आ जाता है कि ये मजदूरों के शत्रु हैं। पर एडम स्मिथ सामान्य बुद्धिजीवी नहीं थे, वास्तविक बुर्जुआ गुरु थे। वे इस बात का खंडन करते हैं कि मजदूरी बढने से मजदूर काहिल हो जाते हैं। उनकी चिंता है कि अधिक मजदूरी की संभावना से पैदा लालसा की वजह से श्रमिक अधिक मेहनत कर अपना शरीर जल्द बरबाद कर लेते हैं। कमाल की बात यह है कि पूंजीवादी व्यवस्था के दायरे में सच्चाई भी यही है। घंटों के हिसाब से, पीस रेट या ओवरटाइम के जरिए जहां कुछ अधिक पैसा मिलने की संभावना होती है वहां वास्तव में मजदूर खुद ब खुद अधिक घंटे काम करने लगते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि ऐसे वे जल्दी ही अधिक कमा व बचा खुद मालिक बन जायेंगे। हालांकि, चंद दुर्लभ अपवादों को छोडकर ऐसा होता नहीं, पूंजीवाद में ऐसा संभव ही नहीं है। वे वास्तव में अपनी सेहत ही बरबाद करते हैं। असल में होता क्या है कि मजदूरी की इन पद्धतियों में पैसा अधिक मिलता प्रतीत होता है पर वास्तविकता में मजदूरी दर कम हो जाती है।
इसीलिए जहां थोड़ा भी वर्ग सचेत मजदूर संगठन होते हैं वे श्रमिकों को घंटे/पीस रेट, ओवरटाइम के जरिए ज्यादा कमाई की लालसा में नहीं भरमाते, ऐसा काम सिर्फ दलाल/गद्दार यूनियन/नेता करते हैं क्योंकि इससे भ्रमित मजदूर आपसी होड में उलझ जाते हैं और उनकी एकता टूट जाती है। मजदूर वर्ग हित से संचालित यूनियन हमेशा काम के सीमित घंटों (जैसे 8 घंटे काम, 8 घंटे आराम, 8 घंटे मनोरंजन) के साथ मजदूरी में वृद्धि की मांग उठाते हैं। और जो सबसे अधिक वर्ग सचेत हैं वो तो इस मांग को उठाते हुए साथ में यह भी बताते चलते हैं कि यह भी मात्र सीमित तात्कालिक राहत की ही मांग है, पूंजीवादी व्यवस्था में मजदूरों का शोषण कभी समाप्त नहीं हो सकता। उसके लिए तो पूंजीवाद का ही उन्मूलन करना होगा। अतः वे मजदूर वर्ग को इस राजनीतिक संघर्ष के लिए भी वैचारिक व सांगठनिक रूप से तैयार करते हैं।

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