किससे लडना है और कैसे लडना है, ये जाने बिना आपकी जीत संभव नहीं

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किताब – आम्बेडकर के बाद दलित राजनीति 
लेखक – वरिष्ठ साहित्यकार श्री आर.डी आनंद 
             श्री आर डी आनंद जी दलित समाज के उन चंद लेखकों में से हैं जो भारत के समकालीन दलित समाज की नब्ज को पहचान और डा आम्बेडकर के समाज दर्शन के फलीभूत होने में बाधक अवरोधकों ( जैसे – दलितवाद, ब्राहमनवाद, पूंजीवाद, जाति, जाति सशक्तिकरण, ,,,, आदि ) पर निरंतर लिखते रहे हैं। श्री आनंद जी की पहचान एक मार्सवादी के रुप मे है लेकिन वे विशुद्ध बौद्धिष्ट और सच्चे आम्बेडकरवादी हैं।40 से ज्यादा किताबें लिखने के दौरान उन्होंने बुद्ध , मार्क्स, आम्बेडकर, आम्बेडकर विचारधारा और मार्कस्वाद, मान्वर कांशिराम – एक संक्षिप्त अध्यन, भारतीय संविधान और डा आम्बेडकर, क्या आर्य भारतीय हैं , दलित साहित्य और मार्क्सवाद, दुनिया देश और दलित यही नही राजनीति, अर्थशाष्त्र, मार्क्सवाद, आम्बेडकरवाद, साम्यवाद, समाजवाद, पुरुष प्रधानता, नारीवाद, दलित स्त्रियां – दोहरा अभिषाप आदि अनेक विषयों पर अपनी पैनी कलम चलाते रहे हैं और वर्तमान में भी अध्ययन व लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हैं।
        श्री आनंद जी वर्तमान में दलित समाज के होते दिशाहीन  या यूं कहें कि निर्रथक विषयों के पचडे में फंस होते जा रहे प्रतिक्रियावादी रवैये से क्षुब्ध दिखाई पडते हैं। उनके लेखों में उनके मन की पीडा स्पष्ट नजर आती है कि आखिर क्यों हम अर्थहीन विषयों को कब्र से निकाल उनका पोस्ट मार्टम कर परस्पर प्रतिक्रियावादी होते जा रहे हैं? आखिर क्यों हम अपने उद्देश्यों को पहचानने में सफल नही हो रहे हैं? ऐसे ही ढेर सारे सवालों को हल करती है उनके द्वारा लिखित पुस्तक “आम्बेडकर के बाद दलित राजनीति “।
     किताब ”आम्बेडकर के बाद दलित राजनीति ” कुल 208 प्रष्ठों में सिमटी है।जिसकी भूमिका स्वयं श्री आनंद जी ने लिखी है। अपनी भूमिका में श्री आनंद जी इस किताब के प्रकाशित करने का मूल उद्देश्य दलित समाज की सामाजिक स्थिति का मुल्याकंन करना बताते हैं। आखिर दलित समाज वर्तमान में वैचारिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। इस समाज का कोई एक संगठन भी नही है । जितने संगठन व पार्टीयां उभरकर सामने आ रही हैं वे अलग अलग उद्देश्यों को लेकर समाज में उतरकर समाज को ही दिग्भ्रमित कर रहे हैं। अपनी भूमिका में श्री आनंद जी साफ लिखते हैं कि, –
  ” अभी तक हमारे समाज के चितंको को यह ही नही पता है कि दुश्मन कौन है? किससे लडा जाए और कैसे लडा जाए? हमारी मुफलिसी के लिए व्यक्ति दोषी है या व्यवस्था? कुछ को कहने में देर नही लगती है कि कि दोषी व्यवस्था है ।जब उनसे पूछते हैं कि फिर किसी जाति विशेष को क्यों गाली दे रहे हो? उन्हे नही मालूम है कि दुनिया की सारी चीजें केवल दो भागों में बंटी है, उसी प्रकार केवल दो व्यवस्था है -1)पूंजीवाद और2)समाजवाद।
     हमारे समाज का चितंक एक ऐसे वाद के खिलाफ लड रहा है, जिसको वह ब्राहमनवाद कहता है । इस वाद के खिलाफ लडकर हमारे समाज ने 100 साल से ज्यादा का समय गुजार दिया है,लेकिन कुछ खास परिवर्तन नही हुआ । दरअसल, हम परछाई को लाठी से पीट रहे हैं। किसी भी व्यवस्था का मूलाधार उस समाज की अर्थव्यवस्था है, धर्म और संस्कृतियां उसकी अधिरचना है ।बिना मूलाधार पर प्रहार किए अधिरचना को बदला नही जा सकता है । इसिलिए लडाई का केन्द्र बिन्दु रोटी होनी चाहिए । रोटी मजबूत भरपेट मिले, सम्मान मिल जाएगा ।”
       ”आम्बेडकर के बाद दलित राजनीति ” किताब में डा आम्बेडकर; जीवन और दर्शन , बामसेफ से बसपा का सफर,  बसपा का ब्राहमन सम्मेलन, ब्राहमनवाद पूंजीवाद का दलाल है, राष्ट्रीय करण के संबंध मे डा आम्बेडकर, जाति प्रथा और आरक्षण, आरक्षण और प्रतिक्रिया, दलित गुमराह तो नहीं, व्यवस्था परिवर्तन ही उपाय है जैसे कुल 35 लेख समाहित हैं। सभी लेख दलित समाज के मन से भ्रम के जालों को साफ करते हुए हमे हमारी मित्र सहायक शक्तियों को पहचान उनका सहयोग लेने को भी प्रेरित करते हैं ।
     भारत में यदि कंही क्रांति की संभावना जिस समाज में दिखाई देती है, वह दलित समाज ही है । अफसोस दलित दलित बने रहते ही व्यवस्था परिवर्तन कर लेना चाहता है । दलित बने रहना भी एक तरह से ब्राहमनवाद को ही मजबूत करना है ।दुश्मन चाहता है कि हम दलित ही बने रहें, जिससे उसके साथ उसकी दूसरी सहायक मित्र शक्तियां ने जुडने पायें । हालांकि हाल ही में चल रहे किसानों के विरोध प्रदर्शन को ही लें, इस प्रदर्शन में सभी किसानों का किसान हित में मत और लक्ष्य स्पष्ट है जिससे इन किसानो के साथ सभी क्षेत्रों से छोटे व बड़े किसान जुड़ते जा रहे हैं। यह आन्दोलन क्षेत्र और जाति के लेबल से मुक्त हो और भी मजबूत होता जा रहा है । बस इतनी सी ही बात तो श्री आनंद जी इस किताब के माध्यम से कहना चाहते हैं कि हमें दलित,  महादलित , ओबीसी के खोल से बाहर निकल  श्रमिक वर्ग के रूप में,  सबको समान शिक्षा, समान स्वास्थ्य सेवायें, और योग्यता अनुसार समान रोजगार के अवसर की मांग के साथ आगे बढना होगा । फिर देखिए आपके साथ देश का ओबीसी और अल्पसंख्यक स्वतः जुडता चला जाएगा ।  तभी डा आम्बेडकर जी का अधुरा संविधान पूरा होगा जिसमें हमें राजनीतिक समानता के साथ- साथ सामाजिक व आर्थिक समानता भी प्राप्त होगी । लेकिन उसके लिए हमे दलित नामक खोल से जितना शीघ्र हो उतना शीघ्र बाहर आना होगा ।
     निजिकरण  के फलस्वरुप  वर्तमान में उच्च शिक्षा सक्षम हो चुके दलित समाज के पहुंच से भी बाहर होती जा रही है और राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा की दयनीय स्थिति के कारण नयी पीढ़ी अच्छे से तैयार नही हो पा रही है । ऐसे में भविष्य में आरक्षण कंही हमारे सर पर बोझ न बन जाए उससे पहले ही हमे आरक्षण की समिक्षा कर लेनी चाहिए ।  किताब के “जाति प्रथा और आरक्षण ” नामक लेख में श्री आनंद जी इस ओर ध्यान आकर्षित भी करते हुए अर्जुन सेन कमिटी की रिपोर्ट का बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा उठाते हुए लिखते हैं ,कि –
                              15 लाख दलित नौकरी कर रहे हैं जिससे 3 करोड दलित खा-पी रहा है । 27 करोड निरक्षर हैं । न खेत न व्यवसाय । उसके लिए आरक्षण से कौनसा फायदा दिलवा रहे हैं? क्या प्रतिनिधित्व का आधार वह तय नहीं करता है?  , फिर कंहा गया उसका उचित हिस्सा? उसकी रोजी – रोटी के लिए दलित और संविधान क्यों चुप हो जाता है? उन्होंने गरीबों के लिए भी सोचिए कि क्या उन्हे ये आरक्षण और संविधान कुछ दे सकता है?  खाया – अघाया दलित चिंतित हो जाता है कि यदि उसका आरक्षण खत्म हो गया, तो उसका क्या होगा। जो यंहा तक आरक्षण के सहारे पोजिशन तैयार किया है, पलभर में बालू की भीत की तरह ढह जाएगा और पुनः उन्होंने दलित गरीबों के मध्य जाना और रहना पड़ सकता है ,  जो निरक्षर और गरीब हैं और प्रतिदिन 20 रुपए खर्च करने भर को ही कमा पाते हैं। यह अर्जुन सेन कमिटी की रिपोर्ट है।”
     दलित समाज के विभिन्न पहलुओं को स्पष्ट करते और उनका तार्किक विश्लेषण करते हुए छोटे व महत्वपूर्ण लेखों को अपने में समेटे किताब ” आम्बेडकर के बाद दलित राजनीति “2018 में  परिकल्पना प्रकाशन से प्रकाशित हुई है। यह किताब दलित समाज के वैचारिक संक्रमण की  मुकम्मल तस्वीर प्रस्तुत करती है जिसे सभी प्रगतिशील दलित युवाओं को जरूर पढना चाहिए , जिससे वे अपना वास्तविक दुश्मन कौन और हमारी सहायक मित्र शक्तियां कौन हैं से भली भांति परिचित हो सकें।
    सभी लेखों को बेहतर ढंग से प्रकाशित करने के लिए परिकल्पना प्रकाशन बधाई का पात्र है।
किताब – आम्बेडकर के बाद दलित राजनीति 
लेखक – श्री आर.डी आनंद 
प्रकाशक – परिकल्पना प्रकाशन
    प्रष्ठ – 208
    मुल्य- 225/-
                                                 ———/ अमित कबीर
                                              जिला-  सहारनपुर ( उप्र )
                                               संपर्क – ६३९७२०५९८२

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