कलम के सिपाही एसके दत्ता पर टूटा प्रशासनिक वज्रपात

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अगर आप में थोड़ी भी संवेदना बाकी है.. तो इस अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाइए
@ अरविंद सिंह
इतने के बाद भी अगर आप को क्रोध नहीं आता है. इतने के बाद भी अगर आप की आंखों में पानी नहीं आता है. इतने के बाद भी अगर आप की संवेदना,सरकार-और उसके सिस्टम को धिक्कारती नहीं, तो हमें पत्रकार, चिकित्सक, व्यापारी, अधिवक्ता और सबसे पहले इंसान होने पर सवाल खड़ा करती है. आप पूछेंगे क्यों- जवाब है कि एक इंसान जो जीवन के साठ साल में से चालीस बरस आजमगढ़ और पूर्वांचल की पत्रकारिता को देने के बाद आखिर में आर्थिक तंगी से जुझते हुए अपनी तीन- तीन बेटियों को पढ़ाने लिखाने और परिवार का पेट पालने के लिए एक अदद दुकान के लिए भूखंड लगभग बीस बरस पहले नगर पालिका परिषद से आवंटित कराता है. अपने पैसे से निर्माण करता है, और उसका किराया भी नगर पालिका को नियमित जमा करता है, आज अचानक से उपजिलाधिकारी आजमगढ़ ने उसे अवैध बताते हुए उसपर शाम लगभग सात बजे बुलडोजर चला जमीदोज़ कर दिया, जबकि दो दिन पहले एसडीएम ने धारा-133 की नोटिस जारी कर आवंटी किरायेदार और आवंटन कर्ता संस्था नगर पालिका आजमगढ़ को 25 मार्च को अपने न्यायालय में हाजिर होकर जवाबदेही दाखिल करने का फरमान दिया था. आज उन्हें अपने ही कानून और विधि प्रक्रियाओं पर से जैसे विश्वास नहीं रहा और पक्षकार को सुनवाई की नोटिस जारी कर तो दिया लेकिन सुनवाई का अवसर ही नहीं दिया. यह तो नैसर्गिक न्याय विधि की घोर अवहेलना है.
दरअसल हम बात कर रहे हैं आजमगढ़ के सबसे पुराने फोटो जर्नलिस्ट एसके दत्ता की. और फोटो में जो जमीदोज़ मलबा दिखाई दे रहा है, वह 24 मार्च को शाम सात बजे पायनियर अखबार का ब्यूरो दफ्तर था, और उसमें कर्मचारी काम करते थे. शाम के सात बजे के बाद वह एसडीएम सदर की तुगलकी फरमान और विधि व्यवस्था की भेंट चढ़ कर मलबे में तब्दील हो गया. जबकि 25 मार्च को डिप्टी कलेक्टर साहब इसके वैध और अवैध पर सुनवाई करने वाले थे. वहीं इसको लेकर आवंटी एसके दत्ता ने सिविल कोर्ट में मुकदमा भी किया है और इस भूखंड और कमरे का कमीशन भी हुआ है, नगर पालिका परिषद और डीएम, एसडीएम इसमे पक्षकार हैं. इससे तो यह साबित होता है कि एसडीएम सदर किसी को सुनवाई का अवसर ही नहीं देते, बल्कि तानाशाही पर स्वयं उतर जाते हैं. सवाल यह उठता है कि अगर यह आवंटन गलत था तो इसे सुनवाई का अवसर देने के बाद गिरा देते. और अगर यह गलत था तो नगर पालिका के विरुद्ध क्या कार्रवाई किए, जो बीस साल से किराया ले रहा है..
अगर अब भी आप को यह अन्याय नहीं लगता तो… फिर आप अपनी संवेदना का जनाजा उठते देखते रहिए.. अगला नंबर आप का हो सकता है.. क्योंकि कि जब सिस्टम निरंकुश और तानाशाह हो जाएगा तो लोकतंत्र का जनाजा उठने से कोई नहीं रोक सकता है…उनके लिए यह केवल दुकान भर नहीं था, बल्कि जीवन जीने का आधार था..
 दो दशक की पत्रकारिता की प्राचीरों को भग्नावशेषों में तब्दील करके तुम खुश तो बहुत होगें..न.?
@ अरविंद सिंह #आजमगढ़
खुश तो होगे बहुत.. कि तुमने अपनी सनक एक फ़कीर कलमकार की गृहस्थी को ध्वस्त कर पूरी कर ली.खुश हो होगें बहुत कि..साला बड़ा.. पत्रकार बनता..फिरता था. वो क्या कहते हैं ..फ्रीलांस जर्नलिस्ट..एक ही झटके में उसके समूचे अस्तित्व को जमीदोज़ कर दिया. उसके बच्चों को सड़क पर ला दिया.. कितना खुश हो रहे होगे न..जब अपनी पिता की बीस बरस की कमाई और चालीस बरस की पत्रकारिता की साख और विश्वास को तुम्हारे बुलडोजर के नीचे जमीदोज़ होते बेटियां देखी होगीं. . बच्चियाँ गिड़गिडाई होगी. चिल्लाई होगीं. क्योंकि ऐसा करने से तुम्हारे अहम की तुष्टि होती है.. न..

सच तो यह है तुम आज निरंकुश पावर में हो..और तुम्हारी यह पावर तुम्हारे निरंकुश सनक पर सवार होकर चलती है. तुम्हारे अंदर एक हीनग्रंथि है कि-तुम हारना नहीं सिखे हो, और जीतने के लिए कितना भी नीचे जा सकते हो..किसी भी कीमत को चुका सकते हो, क्योंकि तुम एक पत्रकार से नहीं अपने आप से लड़ रहे हो, अपनी उत्तेजना और हार के डर से लड़ रहे हो. जब तुम रोजाना अपने दफ़्तर से आवास, आते-जाते देखते थे कि एक पत्रकार का दफ्तर कैसे चल रहा है.. क्योंकि उसके चलते रहने से तुम्हें ऐतराज था. इस कार्यालय के होने से ऐतराज था. क्योंकि तुम्हारी सनक पर सवार तुम्हारी शक्ति तुमसे रोज सवाल करतीं थीं कि-तुम इसे कब गिराओगे.?.. क्योंकि तुम्हे उत्तेजना चाहिए, सनसनी और भय चाहिए ..जिसका केन्द्र तुम रहो.. इसी लिए तुमने रात के अंधेरे को चुना, दिन के उजाले को नहीं. इसी लिए तुमने सुनवाई के अवसर देने से पहले ही इसे जमीदोज़ कर देना चाहते थे, और अपने अहम की तुष्टि कर ली. तुम्हे खुशफहमी में रहने का पूरा अधिकार है. क्योंकि तुमने केवल किताबी ज्ञान अर्जित की है वह भी थोड़ा-थोड़ा.. आईएएस होना..ज्ञानी होना नहीं होता है.. एक इंसान बन पाना तो सर्वोत्तम कसौटी है.. लेकिन भूलना मत यह नैयर -ए-आजम की सरजमीं है. जिसने भूख का भूगोल और बग़ावत का इतिहास न केवल पढ़ा है..बल्कि जीया है.. हर जुर्म और ज्यादती के विरूद्ध आवाज उठती रही है..यूँ ही नहीं कहाँ गया है कि ‘जो जर्रा यहाँ से उठता है, वो नैयर -ए-आजम होता है.. .!
और हाँ जो आदमी पत्रकारिता के भग्नावशेषों पर आज खड़ा होकर अनंत की तरफ देख रहा है- वह आदमी नहीं, एक मुकम्मल बयान है/ माथे पर उसके चोट का गहरा निशान है.. जिसे सब नहीं देख सकते हैं.. आप जैसे तो बिलकुल भी नहीं..क्यों कि आप अभी पावर के सनक पर सवार हो.. तुम्हें घृणा नहीं प्रेम की जरूरत है.. और दोनों का उदगम एक ही होता..

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