मप्र के वह बाबा ज्योर्तिमय, जिनको सुभाष समझा गया

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18 अगस्त 1945 को तायहोकु में विमान हादसे में निधन की खबर के बाद सुभाष चंद्र बोस एक बड़ी पहेली बन गए. आज भी माना जाता है कि उनका निधन उस विमान हादसे में नहीं हुआ बल्कि वो उसके बाद भी जीवित रहे. इस बात की सत्यता को जांचने के लिए तीन जांच आयोग बने. लेकिन इसके बाद भी नेताजी को लेकर बहुत कुछ अनुत्तरित सा है. फैजाबाद में रहने वाले गुमनामी बाबा को अगर लोग आज भी सुभाष मानते हैं तो मध्य प्रदेश में ग्वालियर के करीब आश्रम में रहने वाले बाबा को लोग नेताजी ही मानते रहे. 50 से दशक से 80 के दशक के बीच तीन बाबाओं को लोग शर्त लगाकर सुभाष चंद्र बोस बताया करते थे. बड़े पैमाने पर ये चर्चाएं देशभर में फैली थीं कि ये बाबा दरअसल नेताजी है, जो अपनी पहचान छिपाए हुए हैं.

सबसे पहले ये चर्चाएं 50 के दशक के आखिर में शुरू हुईं. ये कहा जाता था कि कूच बिहार के चीन से सटी सीमा के पास शॉलमारी आश्रम में रहने वाले स्वामी शारदानंद कोई और नहीं बल्कि सुभाष ही हैं. नेताजी के कई करीबियों ने भी इसकी पुष्टि की. इन बाबा का नाम साधू शारदानंद था. यहां तक सुभाष ने अफगानिस्तान में जिस शख्स उत्तमचंद मल्होत्रा के यहां करीब महीने भर तक शरण ली थी, उन्होंने भी उनसे मिलने के बाद उन्हें नेताजी ही बताया. बाद में ये साधू देहरादून आ गए. वहीं उनका 70 के दशक में निधन हो गया.

70 के ही दशक में ग्वालियर के पास नागदा गांव में एक आश्रम बनाकर चुपचाप रहने वाले स्वामी ज्योतिर्देव को भी उनके अनुयायी सुभाष ही मानते थे. इससे पहले 60 के दशक के आखिर में फैजाबाद के गुमनामी बाबा का नाम सबसे ज्यादा पुख्ता तरीके से सुभाष के तौर पर लिया गया.तीसरे गुमनामी बाबा के लिए भी ऐसा ही कहा गया. हालांकि जांच के बाद तीनों ही बाबाओं के बारे में ये कहा गया कि वो सुभाष नहीं थे. खासतौर पर 1999 में अटलबिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा गठित किए गए जस्टिस मनोज मुखर्जी आयोग ने अपनी रिपोर्ट में तीनों बाबाओं का विस्तार से जिक्र किया. ये बताया कि वो क्यों सुभाष नहीं थे.

वो बाबा फर्राटे से अंग्रेजी और बांग्ला बोलता था

संजय श्रीवास्तव की नई किताब “सुभाष बोस की अज्ञात यात्रा” में मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट और तीनों बाबाओं के बारे में विस्तार से लिखा गया है. 1959 में अचानक बंगाल का शॉलमारी आश्रम सुर्खियों में आ गया. शुरू में तो लोगों का ध्यान उस पर नहीं गया लेकिन जब आश्रम का दायरा 100 एकड़ तक जा पहुंचा तो लोगों के कान खड़े हुए.
पता चला कि ये आश्रम किसी साधू शारदानंद का है. फिर बंगाल की बड़ी बड़ी हस्तियों और अफसरों से उनसे मिलने की खबरें आने लगीं. साधू शारदानंद फर्राटे से बंगाली और अंग्रेजी बोलते थे. महंगी सिगरेट और शराब पीते थे. यहां तक कि सुभाष के कई करीबियों ने इस बाबा से मिलने के बाद ये दावा किया कि वो कोई और नहीं बल्कि सुभाष ही हैं.

कौन था असल में शॉलमारी आश्रम का बाबा
ये बाबा हमेशा अपना चेहरा ढंककर रहते थे. अपनी फोटो नहीं खींचने देते थे. अंगुलियों की छाप से बचने के लिए रुमाल का इस्तेमाल करते थे. न तो एक्स-रे कराते थे और न ही ब्लड टेस्ट. 1961 में राज्य सरकार और केंद्र सरकार ने शॉलमारी आश्रम के बाबा की जांच करनी शुरू की. बाद में आश्रम ने खुद स्पष्टीकरण दे दिया कि न तो उसके साधू और संस्थापक स्वामी शारदानंद सुभाष हैं और ना ही उनका उनसे कोई लेना-देना है. बाद में इस साधू के बारे में पता लगा कि वह जतिन चक्रवर्ती थे. रिवोल्यूशन पार्टी के सदस्य थे. वो एक अंग्रेज जिलाधिकारी की हत्या करके फरार हो गए थे.
बाद में स्वामी शारदानंद ने शॉलमारी आश्रम छोड़ दिया. वो कई स्थानों पर घूमते हुए देहरादून पहुंचे. वहां कई साल तक रहे. वहीं 1977 में उनका निधन हो गया. हालांकि अब भी कई लोग मानते थे कि वो ही सुभाष थे.

नागदा के रहस्यमयी स्वामी ज्योतिर्देव

मध्य प्रदेश में ग्वालियर के करीब एक छोटा सा रेलवे स्टेशन है श्योपुर कलां. इसके पास ही एक गांव है नागदा. 70 के दशक में एक साधू यहां आकर आश्रम बनाकर रहने लगा. वो भी हमेशा पहरे में रहता था. लोगों से मिलता-जुलता नहीं है. गांववालों का मानना था कि निकटवर्ती गांव में एक विमान दुर्घटना में वो साधू बच गए थे. फिर वो वहीं रहने लगे. ये हैं बाबा ज्योतिर्देव, जिनके बारे में कहा गया कि वो सुभाष चंद्र बोस हैं. वो ग्वालियर के करीब एक गांव नागदा में अचानक प्रगट हुए और आश्रम बनाकर रहने लगे

दस्तावेजों से पता लगा वो नेताजी नहीं थे

इन साधू को उनके अनुयायी स्वामी ज्योतिर्देव कहते थे. गांववाले कहते थे कि वो लगातार सीनियर अधिकारियों से पत्र-व्यवहार करते थे. वो गांव के बाहर भी जाते थे. उनका निधन भी मई, 1977 में हो गया. उनके निधन के बाद मध्य प्रदेश सरकार ने उनके सारे रिकॉर्ड अपनी सुपुर्दगी में ले लिये. हालांकि पुलिस ने जब इन दस्तावेजों की जांच की तो उससे साबित नहीं हुआ कि वो सुभाष थे.

सबसे ज्यादा चर्चा हुई गुमनामी बाबा की
जिस बाबा की सबसे ज्यादा चर्चा सुभाष के रूप में हुई, वो फैजाबाद के गुमनामी बाबा थे. मुखर्जी आयोग के सामने कई लोगों ने दावा किया कि गुमनामी बाबा ही नेताजी थे. जो स्तालिन के निधन के बाद सोवियत संघ से बच निकले. फिर भारत आ गए. यहां वो कई स्थानों पर रहे. फिर फैजाबाद में स्थायी वास किया.
गुमनामी बाबा के 1985 में निधन के बाद जब सामान देखा गया तो उसमें जो सामान थे, उसमें सुभाष के पारिवारिक चित्र, किताबें, सुभाष द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले गोल ऐनक, महंगी सिगरेट, लाइटर, सिगार, रोलैक्स घड़ियां और ना जाने कितने ही सामान थे. आप सुभाष बोस से जुड़ी ऐसी ही तमाम बातों को किताब सुभाष बोस की अज्ञात यात्रा में पढ़ सकते हैं, जिसमें गहन रिसर्च के बाद नेताजी से जुड़े तमाम अनछुए तथ्यों पर रोशनी डाली गई है

गुमनामी बाबा की सहायिका के बेटे की गवाही

मुखर्जी आयोग के सामने कई लोगों ने गवाही दी, इसमें एक गवाह थे राजकुमार शुक्ला, जो गुमनामी बाबा की सहायिका सरस्वती देवी के पुत्र थे. वो आयोग के सामने इसलिए नहीं आ सकीं, क्योंकि उनकी मृत्यु हो चुकी थी. राजकुमार शुक्ला ने बताया कि उनकी मां 1955-56 में श्रृंगार नगर, लखनऊ में गुमनामी बाबा उर्फ भगवान जी के संपर्क में आईं. फिर 16 सितंबर 1985 तक उनके साथ काम करती रहीं.
राजकुमार शुक्ला का कहना था कि उनकी मां उन्हें बताती थीं कि बाबा के पास कोलकाता से कई लोग लगातार मिलने आया करते थे, जिसमें आजाद हिंद फौज से ताल्लुक रखने वाले लोग भी थे.

मुखर्जी आयोग ने गुमनामी बाबा के बारे में क्या कहा

शुक्ला ने आगे कहा कि उनकी मां ने भी बाबा का चेहरा कभी नहीं देखा लेकिन वो कहती थीं कि गुमनामी बाबा ही सुभाष हैं. हालांकि शुक्ला ने आयोग के सामने जो सबूत दिए वो नाकाफी थे. आयोग के सामने पेश हुए कोई भी शख्स इस बारे में कोई सबूत नहीं दे सका. आयोग गुमनामी बाबा के पास से मिले बहुत से सामानों को अपने साथ कोलकाता लेकर गया. जहां उसकी जांच हुई. बाद में मुखर्जी आयोग ने ये निष्कर्ष निकाला कि गुमनामी बाबा किसी भी हालत में सुभाष नहीं हो सकते.
आयोग का निष्कर्ष था कि ना तो गुमनामी बाबा की हैंड राइटिंग सुभाष से मेल खाती है और ना ही उनके दांतों का डीएनए सुभाष के परिवार से मिलान करने पर मिल पाया. हालांकि आयोग ने माना कि वो निश्चित रूप से सुभाष के करीबी रहे होंगे. बाद में उत्तर प्रदेश सरकार ने गुमनामी बाबा की जांच के लिए विष्णु सहाय आयोग की नियुक्ति की. इस आयोग ने भी वही बात कही, जो मुखर्जी आयोग ने कही थी.

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