कैसी तो उलटबांसीः अब पूंजीवाद के ही खिलाफ जनवादी क्रांति!

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शिंजो एबे के बहाने
पिता विदेश मंत्री थे, नाना प्रधानमंत्री, परदादा बड़े सामंत व जनरल। और परिवार भी ऐसे ही, ये तो चंद उदाहरण दिए बस। जापान 1870 तक सामंती देश था जब उसकी राजशाही ने समझा कि भविष्य पूंजीवादी औद्योगिक समाज का है। अपने लोगों को दुनिया को समझने भेजा और दूसरे देशों के विशेषज्ञ बुलाए। खुद को पूंजीवादी देश में रूपांतरित किया।
नतीजा ये कि जहां एक पूंजीपति वर्ग खडा हो सत्ता का हिस्सेदार बना वहीं पुराना सामंती शासक वर्ग भी नए रंग, चाल व ढर्रे के शासक वर्ग में ढल गया और राजनीति फौज अफसरशाही न्यायपालिका में आज तक उसका दबदबा कायम है। शिंजो एबे इसी का उदाहरण है। हालांकि जापान औपचारिक तौर से बुर्जुआ जनतंत्र है पर उसके शासन तंत्र व सामाजिक-आर्थिक जीवन में सामंती मूल्यों का अभी भी काफी दखल है जैसे मालिक पूंजीपति को कामगार के लिए संरक्षक व उपकारक होने के भाव पर अत्यधिक जोर। बख्शीश रिश्वत की मजबूत परंपरा के लिए तो जापानी नेता व पूंजीपति जाने ही जाते हैं।
जापान के बड़े पूंजीवादी देश के रूप में उभरने तक पुराने विकसित पूंजीवादी देश दुनिया को आपस में बांट चुके थे। पहले साम्राज्यवादी विश्व युद्ध के वक्त जापानी शासक यह इंतजार कर कि ऊंट किस करवट बैठेगा विजयी खेमे की ओर से युद्ध में कूदे। (इटली भी ऐसे ही)। इन्हें उम्मीद थी कि जंग बाद माले गनीमत के बंटवारे में इन्हें भी हिस्सा मिलेगा। पर पुराने साम्राज्यवादी अंग्रेज अमरीकी फ्रांसीसी इस पर राजी नहीं थे। इसके बाद भी काफी सालों तक जापानी युद्ध बाद बनी लीग के फैसलों के पाबंद रहे। पर औपनिवेशिक बंटवारे में फिर भी हिस्सा न मिलने पर सामंती अभिजात्य के दखल व मूल्यों के प्रभाव वाले समाज के लिए बतर्ज जर्मनी व इटली फासीवाद व सैन्यवाद की राह पर बढना आसान विकल्प था।
1945 में फासिस्टों की जंगी पराजय के बाद जापान अकेले अमरीकी आधिपत्य में था इसलिए वहां न्यूरेमबर्ग जैसा मुकदमा तक न चला जिसमें सोवियत संघ की वजह से बहुत से जर्मन नाजियों को सजा हुई, अंग्रेज अमरीकी कुछ को ही बचा सके। जापान में लगभग सारे बच गए और नाम बदलकर लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी बन गए। आज तक इसी एक अति राष्ट्रवादी पार्टी का शासन जारी है हालांकि संसदीय जनतंत्र के चुनावी खोल में। जो दूसरी चुनावी पार्टी है वो धार्मिक राष्ट्रवादी है।
तुलनात्मक रूप से कम मजदूरी, काम के लंबे घंटे, यूनियनों का दमन, रोजगार का पितृसत्तात्मक मूल्य आधारित पैटर्न और मुद्रा के अवमूल्यन के जरिए अपने देश में उपभोग कम रख सस्ते उत्पादों का निर्यात बढा पूंजीपतियों के लिए विदेशी मुद्रा भंडार के रूप में ऊंचे मुनाफे वाले विकास मॉडल को अमरीकी आधिपत्य के दौरान जापानी शासक वर्ग ने सबसे पहले अपनाया क्योंकि यह अमरीकी शासक वर्ग के भी हित में था – अमरीकी उच्च उपभोग का एक अहम कारण उच्च उत्पादन के बावजूद जापानी जनता का तुलनात्मक रूप से निम्न उपभोग भी था क्योंकि इसी से जापानी पूंजीवाद अपने उत्पाद अमरीकी बाजार में सस्ते बेच सकता था। इस विदेशी मुद्रा भंडार के आधार पर ही तीन दशक तक जापानी पूंजीवाद अत्यंत कामयाब माना जाता था और विश्व के दस शीर्ष बैंकों में आठ जापानी थे। पर निम्न उपभोग पर आधारित आर्थिक मॉडल को मंदी में पहुंचना ही था। साथ ही पहले कोरिया आदि पूर्व एशियाई देशों और बाद में चीन ने जापान से भी कम मजदूरी पर वही निर्यात आधारित राह पकड़ी तो उस होड़ में जापानी अर्थव्यवस्था दो दशक से अधिक से उबरी ही नहीं है।
यहीं शिंजो एबे आये और आर्थिक सुस्ती के संकट से घिरे पूंजीवादी देश को फिर से अंधराष्ट्रवाद व सैन्यवाद की राह पर आगे बढ़ाना शुरू किया। एबे, मोदी व ट्रंप की दोस्ती का आधार यही समान नीति है तथा क्वाड इसका नतीजा है जो दुनिया भर में साम्राज्यवादी छीना झपटी के लिए बनाए जा रहे जंगी माहौल की एक कड़ी है।
पुनश्च: भारत में टीपू सुल्तान ने भी अंग्रेजों के तत्कालीन शत्रु फ्रांस व अमरीका की मदद से पूंजीवाद में ऐसे रूपांतरण का प्रयास किया था और रेशम, धातुकर्म, रॉकेट व हथियार उत्पादन को तत्कालीन तकनीक के आधार पर मैनुफैक्चरिंग में उन्नत करने की ओर काफी कदम बढाए थे। पर यहां पहले से पहुंच चुके अंग्रेजी शासन ने उस प्रक्रिया को बाधित कर यह रूपांतरण अपने औपनिवेशिक हितों की तर्ज पर किया।
दूसरे, जो मानते हैं कि भारत में जनवादी क्रांति नहीं हुई इसलिए अभी यहां पूंजीवाद नहीं अर्ध सामंती शासन ही है वो इतिहास के इन तमाम उदाहरणों को भूल जाते हैं कि बुर्जुआ वर्ग का राजसत्ता पर दखल करने का कोई एक अकेला विशिष्ट मार्ग नहीं है और उसे समाजवादी क्रांति की तरह ही ठीक वैसी क्रांति करने की जरूरत नहीं होती, वह सामंती वर्ग को अपने में समेट व रूपांतरित कर भी सत्ता दखल कर सकता है। ऐसे ही भारत का पूंजीवाद सत्ता दखल कर चुका है और अब पूंजीवाद के ही खिलाफ किसी जनवादी क्रांति की बात काल्पनिक बात बन गई है।
मुकेश त्यागी

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