जातीय समस्या का निदान :वर्ग शत्रु की पहचान

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एक बार फिर ये बात साबित हो गई कि मौजूदा निज़ाम ,संसाधनहीन जनता को सिर्फ एक वोट समझता है । इलेक्शन खत्म वोट का महत्व भी खत्म । जब इलेक्शन आएगा तब धर्म और जाति के ठेकेदारों को मैनेज कर के भोली भाली जनता को मूर्ख बना लिया जाएगा । पार्टी बदल बदल कर इलेक्शन लड़ लिया जाएगा । इलेक्शन जीत भी जाएंगे । संसद भी पहुंच जाएंगे । बस हो गया सुधार । हो गया स्थापित लोकतंत्र ।
अभी हाथरस में जो दरिंदगी हुई थी । उस की शिकार पीड़िता ने  दम तोड़ दिया है ।
हर बार दरिंदगी के बाद दम तोड़ते शोषित के साथ दम तोड़ती है संसदीय व्यवस्था । दम तोड़ती है प्रतिनिधित्व की संसद और विधानसभाएं । दम तोड़ती है , प्रतिनिधित्व की प्रसाशनिक सरनचनाएँ । दम तोड़ता है ,राष्ट्र । दम तोड़ती है , मानवता ।दम तोड़ते हैं , हम भी । लेकिन यह देश मृत्यु उपासकों का देश है । यहां जीवन की कोई कदर नहीं है । यहां शोषण को धर्म , जाति ,भाषा , क्षेत्र , लिंग आदि में बांट कर देखा जाता है ।
हम भूल जातें हैं कि बांट कर देखने की हमारी विशेषताएं हमें प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष तौर पर नपुंसक बना चली हैं । हम शरीर में ठंडा खून लिए घूमते हैं । हमारी हड्डियां पूंजीवादी संसदीय फेक्ट्री में गल कर रबड़ हो चुकी हैं । ये हवा देख कर मुड़ना , झुकना और ज़मीन पर चटाई की तरह फैल जाना सीख गई हैं । हम रोना तो अभी भी जानते हैं लेकिन चिल्लाना भूल गए हैं । शांति का उपदेश सुनते सुनाते हम इतने शांत हो गए हैं कि आंदोलन भी शांतिप्रिय तरीके से करने के अभ्यस्त हो गए हैं । सभ्य नागरिक होने के बहाने ने हमारे चारों ओर खड़ी कर दी हैं असभ्यता और अमानवीयता की आसमान छूती दीवारें ।
 हम इन दीवारों को जाति और धर्म की जीभ से लगातार चाट रहें हैं ।
दूसरी तरफ वो जब चाहे । जहां चाहै । हमारी बहन बेटियों का गोश्त सअधिकार नोच रहे हैं ।
ख़ैर
इस दरिंदगी को लेकर सोशल मीडिया पर लोग कलम युद्ध मे उतर आये हैं ।
सुनने/पढ़ने में आ रहा है कि वह दलित की बेटी थी ।
इस लिए कोई कैंडल मार्च नहीं निकालेगा।
इस लिए “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ ” का नारा देने वाले भी चुप हैं !
मुख्यमंत्री यू पी वाले भी चुप हैं क्यों कि अपराधी उनकी जाति के हैं।
प्रशासनिक अधिकारी भी सवर्ण हैं इस लिए दलित बेटी पर चुप हैं ।
सवर्ण समुदाय हत्यारों के पक्ष में उतर आया है ।
दलित बेटी को निर्भया नहीं कहा जायेगा।
कोई महिला आयोग कुछ नहीं कर रहा क्यों कि यह दलित बेटी थी !
इस देश में जाति ही सब कुछ है । यहां जाति से ही सब तय होता है । हमारे साथ यूँ ही अन्याय होता रहेगा ।
कितने सवर्ण सड़क पर उतरे ? दलितों के लिए कोई नहीं बोलेगा ।
दलित आज भी दलित ही हैं ।
दलित का मारा जाना सवर्णो के लिए न्यायसंगत है ।
वगैरहा वगैरहा ।
पहली बात , तुम्हारा सारा चिंतन ही सवर्ण विरोध में है तो कैसे कोई सड़क पर आएगा ?
दूसरी बात , औरों से सवाल पूछने वाले तुम सड़क पर आ गए क्या ?
तीसरी बात , यदि वह बेटी सिर्फ दलित बेटी थी तो तुम अब तक आंदोलनरत क्यों नहीं हुए ?
चौथी बात , खुद कहते हो कि दलित की पीड़ा सवर्ण नहीं समझ सकता तो किस मुंह से दूसरों की बाट जोह रहे हो ?
पांचवी बात , यदि सवर्ण बलात्कारी और हत्यारों के पक्ष में उतर आए हैं तो तुम कन्हा हो ?
छठी बात , जो संसद में दलित सांसद जनता के टेक्स से मिलने वाली सुविद्याएँ लूट रहे हैं वो कन्हा हैं ?
सातवी बात , बहुजन नेत्री सुश्री मायावती जी सड़क पर क्यों नहीं हैं ?
आठवी बात , अन्याय की जातिगत व्याख्या करने वालों अब और किस घटना का इंतज़ार है आप को ?
नौंवी बात , कलम के सहारे रबड़िय रीढ़ को कब तक
 छुपाओगे ?
बाबा साहेब ने सही कहा था कि ” यह संविधान किसी काम का नहीं , मुझे मौका मिले तो सब से पहले मैं ही इसे आग लगा दूंगा “
लेकिन तुम्हें तो यह बता दिया गया है कि यह संविधान तुम्हारे भगवान तुम्हारे बाबा साहेब न लिखा था । बस तुम तब से ही इसे हॄदय से लगाये बैठे हो । दूसरी तरफ़ अन्यायी इसी संविधान में मिले सम्पत्ति के अधिकार के दम पर न्याय को खरीद लेते हैं । तुम मुंह बाए खड़े देखते रहते हो ।
यह सिलसिला यूँ ही चलता रहेगा । क्यों कि दलित आंदोलन की कमान अवसरवादी मध्यवर्ग के हाथ में है ।वह अपनी माहवार तीन चार लाख की आमदनी को तुम्हारे लिए खतरे में क्यों डालेगा । उसका काम वातानुकूलित कमरों में आरामदायक कुर्सी पर बैठ कर चल रहा है ।
जिस से न न्याय मिल रहा है ।
न मौसम बदल रहा है ।
हमें शोषक की पहचान जाति के रूप में नहीं बल्कि वर्ग शत्रु के रूप में करनी होगी । तभी दलितों के साथ होने वाला अन्याय रोका जा सकेगा । जो दलित नेता , बुद्धिजीवी अन्याय में चुप हैं । उनके साथ मिले हुए हैं । न्याय के लिए मनुवादी पूंजीवादी सत्ता के समक्ष इस्तीफा दांव पर नहीं लगा रहे हैं । वह भी हमारे वर्ग शत्रु हैं ।
हमें रामनाथ और रमुआ में फ़र्क़ करना होगा ।
हमें रामविलास और रामु में फ़र्क़ करना होगा ।
हमें मायावती और माई में फ़र्क़ करना होगा ।
हमें रामदास और रमदासिया में फ़र्क़ करना होगा ।
राजनीति और आर्थिक अवसर व्यक्ति का वर्ग बदलते हैं । इस बात को झुठलाया नहीं जा सकता । इसी लिए हमारे रहबर उनकी गोद में बैठे हैं और हमारी अस्मिता हमारे अधिकारों का सौदा कर रहे हैं । दलित और सर्वहारा दोनों निम्न वर्ग हैं । दोनों वर्ग मित्र हैं ।दोनों का एक ही वर्ग शत्रु है ।
रवि निर्मला सिंह

 

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