आदिवासियों को लेकर हुए आयोजन में पार्वती तिर्की ने भी पढ़ी कविताएं

0
896

राँचीः अंतरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस आदिवासियों के अधिकारों को बढ़ावा देना एवं उसकी सुरक्षा के साथ-साथ आदिवासी पर्यावरण संरक्षण जैसे मुद्दों को बेहतर बनाना है। यह पहली बार संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा दिसंबर 1994 को निर्णय लिया गया था कि प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस के रूप में मनाया जाता जायेगा। इस वर्ष भी भारत के अन्य भागों के अलावा झारखंड में भी हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी 9 अगस्त 2023 को विश्व आदिवासी दिवस मनाया बड़ी ही हर्षोल्लास  के साथ मनाया गया। झारखण्ड सरकार एवं जनजातीय कल्याण शोध संस्थान (TRI)  के संयुक्त तत्वावधान में  इस वर्ष भी त्रिदिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम  9 अगस्त से शुरू होकर 10 एवं 11 अगस्त तक चला एवं 11 अगस्त को ही समापन किया गया। 9 एवं 10 अगस्त का आयोजन बिरसा मुंडा स्मृति जेल पार्क में किया गया था एवं समापन जनजातीय कल्याण शोध संस्थान के सभागार में किया गया। सेमिनार चार भागों में विभक्त किया गया था –

1) जनजातीय ज्ञान और व्यावहारिक मानवविज्ञान का अतीत और भविष्य

2) राष्ट्रीय आदिवासी साहित्य सेमिनार

3) जनजातीय इतिहास: उभरती दुनिया में मुद्दे और परिप्रेक्ष्य

4) जनजातीय अर्थव्यवस्था :एक वैकल्पिक अर्थव्यवस्था की परिकल्पना

राष्ट्रीय आदिवासी साहित्य सेमिनार का विषय ‘कथा एवं कथेतर साहित्य’ रखा गया था, जिस पर पूरे भारतवर्ष के वक्ता सेमिनार में अपने वक्तव्य केन्द्रित किया। उक्त सेमिनार में भारत के विभिन्न राज्यों से साहित्यकार, विशेषज्ञ, भाषाविद आए थे। असम, मणिपुर, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, सिक्किम, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, झारखंड, छत्तीसगढ़, जम्मू-कश्मीर, अंडमान-निकोबार आदि क्षेत्रों से प्रमुख साहित्यकारों को आमंत्रित किया गया था। जनजातीय कल्याण शोध संस्थान के निदेशक डॉ॰ रणेन्द्र कुमार ने विषय प्रवेश के साथ सभी वक्ताओं का स्वागत किया। प्रथम दिन अर्थात 9 अगस्त का प्रथम सत्र, मध्यान भोजन के बाद शुरू किया गया। प्रथम सत्र में वक्त इलाहाबाद विश्वविद्यालय, हिन्दी विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ॰ जनार्दन गोंड, वरिष्ठ साहित्यकार एवं साहित्य अकादमी के सदस्य महादेव टोप्पो, दिल्ली विश्वविद्यालय, हिन्दी विभाग की सहायक प्राध्यापिका डॉ॰ स्नेहलता नेगी,  त्रिपुरा विश्वविद्यालय की सहायक प्राध्यापिका डॉ॰ मिलन रानी जमातिया,  प्रोफेसर ई॰ विजय लक्ष्मी आदि मंच पर उपस्थित थे। इस सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार महादेव टोप्पो ने किया। लगभग सभी वक्ताओं ने अपनी आदिवासी भाषा के उपन्यास पर ही अपनी व्याख्यान को केन्द्रित किया और हिंदी अनुवाद के रूप में पुस्तकों का प्रकाशित होने की बात कही। प्रथम सत्र का वक्तव्य प्रोफेसर जनार्दन गोंड दिया। तत्पश्चात बाकी के वक्ता ने अपने-अपने विचार रखे। प्रो॰ जनार्दन गोंड ने अपनी गोंडी आदिवासी के आंकड़ों पर एवं साक्षरता आदि पर बात करते हुए उनके साहित्य पर बारीकी से चर्चा किया। प्रोफेसर मिलन रानी जमातिया ने ककबरक साहित्य एवं उनके उपन्यास के बारे में बताया और उन्होंने यह भी बताया कि वह इन साहित्य का हिंदी में भी अनुवाद कर चुकी हैं। तत्पश्चात स्नेहलता नेगी ने किन्नौर प्रजाति के उपन्यास पर चर्चा की। इस सत्र के अध्यक्षता कर रहे महादेव टोप्पो  ने आज के युवाओं को अपनी परम्पराओं से संबद्ध रहने के लिए अपनी पुरखा साहित्य पढ़ने की अभिप्रेरणा दी, और अपने सारगर्भित बातों को लेकर निष्कर्ष तक पहुंचा। इस सत्र का धन्यवाद ज्ञापन डॉ॰ पार्वती तिर्की ने किया।

10 अगस्त का कार्यक्रम 3 सत्र में कार्यक्रम को बांटा गया। प्रथम सत्र में वक्ता प्रो॰ थुंबुई हिन्दी विभाग नागालैंड विश्वविद्यालय,  प्रो॰ स्नेहलता नेगी, प्रो॰ कुसुम माधुरी टोप्पो, श्री सुंदर मनोज हेंब्रम, लोक बाबू, प्रो॰ सुरेश जगन्नाथम,  प्रो॰ सावित्री बड़ाईक, प्रो॰ मिलन रानी जमातिया, प्रो॰ प्रमोद मीणा आदि उपस्थित थे। इस सत्र की अध्यक्षता लोक बाबू ने किया।  प्रो॰ स्नेहलता नेगी ने किन्नौर की प्रजाति के विषय में अपनी बातों को रखा। प्रो॰ कुसुम माधुरी टोप्पो ने उरांव आदिवासी की कुंड़ूख़ लोक साहित्य पर चर्चा की जिसमें कुछ गीत के अंश गाकर सुनाया। प्रो॰ मिलान रानी जमातिया ने हाचुक खुरियो उपन्यास में अनुवाद के माध्यम से आदिवासी जीवन दर्शन के बारे में व्याख्यान दिया। प्रो॰ थुंबुई ने नागालैंड के साहित्य की चर्चा करते हुए संक्षेप में साहित्य रचना के भंडारण में कमी को बताया। प्रोफेसर सावित्री बड़ाईक एवं अन्य वक्ताओं ने भी अपना महत्वपूर्ण वक्तव्य प्रस्तुत किया। अध्यक्षीय भाषण लोक बाबू ने दिया, और निष्कर्ष तक चर्चा को ले गए । अंतिम सत्र काव्य पाठ का था जिसमें अंतरराष्ट्रीय कवयित्री जसिन्ता केरकेट्टा, हिन्दी की युवा प्रख्यात कवयित्री डॉ पार्वती तिर्की ने हाल ही में प्रकाशित ‘फिर उगना’ काव्य संग्रह से कुछ कविताओं का रसास्वादन करवाया। साथ ही रूपम मिश्र आदि ने अपनी उत्कृष्ट कविताएं प्रस्तुत कीं। 11 अगस्त को जनजातीय कल्याण शोध संस्थान के सभागार में समापन सत्र रखा गया। जिसमें वरिष्ठ साहित्यकार पद्मश्री हलधर नाग एवं अन्य साहित्यकार एवं वक्ताओं को ससम्मान धन्यवाद के साथ उनका आभार प्रकट किया गया। उपरोक्त त्रिदिवसीय कार्यक्रम के तीनों दिनों के सभी सत्रों का संचालन सरोज झा ने किया। उनका संचालन कार्यक्रम को सुसज्जित कर रहा था।

 

 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here