आदिवासी के लिए जंगल घर भी है, आवश्यकता भी ———–समरूपता संभव है

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सुश्री रोशनी बंजारे की कविता में जंगल जंगल है, प्रकृति है व वस्तुस्थिति है। वस्तुस्थिति ने आदिवासियों को आदिवासी बनाया है न कि आदिवासियों ने वस्तुस्थिति को बनाया है। आदिवासी के लिए जंगल घर भी है, आवश्यकता भी है और मजबूरी भी है। आदिवासी आरस्तु की भूमिका में हैं। आरस्तु कि भूमिका का अर्थ है आदिवासियों में एक तरह का समाजवाद जबकि पूँजीपति और उसकी सत्ता सिकंदर की भूमिका में है अर्थात वह जंगल पर भी कब्ज़ा करना चाहता है। जंगल पूँजीपतियों के लिए शोध का विषय है। आखिर क्यों है शोध का विषय? क्योंकि जंगल स्वयं में सम्पदा है तथा जंगल में भी सम्पदा है। आदिवासियों को विस्थापित करना पूँजीपतियों की मूल अवधारण है। पूँजीपति यह नहीं जानना चाहता है कि एक आदिवासी के लिए जंगल के मायने एक देश है क्योंकि आदिवासियों के लिए सरकार ने कोई भी समुचित व्यवस्था न की है और न उनके जीवन यापन के लिए कोई व्यवस्था बनाई ही है। यदि मानवता की मुख्य धारा में स्थापित करने के लिए वाजिव जरूरतों पर ध्यान देकर उन्हें शहर व समुचित मैदानी इलाकों में बसाया जाय, उनके शैक्षिक माहौल के लिए स्कूल कॉलेज खोले जाँय, उन्हें खेत खलिहान दिए जाँय, उन्हें नौकरियाँ दी जाँय और आम सभ्यता में सुसंस्कृत किया जाय तो किसी भी आदिवासी को अपनी जंगल को त्यागकर मातृभूमि के दूसरे आँचल में बसने में क्या दिक्कत होगी लेकिन यहाँ तो लूट सम्पदा की है, आदिवासियों की फिक्र किसे है। रोशनी लिखती हैं,

जान जाओगे तुम बेशक़ सिकंदर हो,

हम अरस्तु है;

तुमने हमारे जंगल हथियाये,

अब हमें बचाने की सारी उठापटक

कहीं सियासी न हो जाये।

रोशनी बहुत खूबसूरत विश्लेषात्मक कविता लिखते हुए एक जगह भाउक अपेक्षा में फँस जाती हैं। वे उनसे उनके परिवर्तित होने की आशा करने लगती हैं। वे आदिवासियों को पूँजीपतियों के शोध का विषय मानने लगती हैं जबकि पूँजीपतियों के शोध का विषय जंगल से होने वाला मुनाफा है। वे यह भी लिखती हैं कि पूँजीपतियों नेउन्हें समझ लिया है। इसका अंतर्भूत अर्थ है कि पूँजीपतियों को यह समझमें आ गया है कि जंगल आदिवासियों की मूलभूत आवश्यकता है या फिर आदिवासी भी उन्हीं की तरह मनुष्य हैं अथवा आदिवासियों की आवश्यकताएँ अन्य मनुष्यों की ही तरह है। वे लिखती हैं पूँजीपति अव स्वयं को आदिवासी जैसा सोचने लगेंगे और उन्हीं के जैसा हो जाएँगे। यह सच है कि पूँजीपतियों ने आदिवासियों को समझ लिया है लेकिन उन्होंने उनकी आवश्यकता और मनुष्यता की आवश्यकता को नहीं समझा है बल्कि समझ है कि आदिवासियों को कैसे जंगल से नेस्तनाबूत करके पूँजी का साम्राज्य खड़ा किया जा सकता है। जंगल में अपनी अस्मत, घर, जमीन और परिवार की रक्षा के लिए हथियार लिए कार्य करती स्त्रियों तक को आतंकवादी, नक्सलवादी व माओवादी की श्रेणी में डालकर बिना उनकी ख़्वाहिशों और विचारों की परवाह किए पुलिस और मिलेट्री के बंदूक का निशाना बना लिया जाता है और इसके विपरीत यह भी कहा जाता है कि आदिवासियों ने निर्ममता दिखाई है। एक संपत्ति, सम्पदा, मुनाफा और पूँजी पैदा करने के उद्देश्य से जान मरवा देता है दूसरा अपनी और अपनों की रक्षा में प्रतिवाद करता है। दोनों में कितना अंतर है। उस दर्द को न पूँजीपति समझना चाहते हैं और न सरकार। वैसे भी सरकार पूँजीपतियों की प्रबंधन समिति है,भला वह पूँजीपति के विरुद्ध आदिवासियों के हित की रक्षा क्यों करने लगी। वे सब कुछ समझते हैं किंतु पूँजी के लिए कोई भी समझौता उनकी हार व हानि है जिसके के लिए वे कुछ भी कर सकते हैं इसलिए रोशनी बंजारे के अनुभूतियों के मध्य बन रहे सहानुभूति और अपेक्षा के बीच वस्तुपरक न होकर भावपरक हैं। पूँजीपति और सरकार नामक संस्था कभी भी अपने उद्देश्य को छोड़ आदिवासियों जैसा न सोच सकते हैं न वैसा बन सकते हैं और न वैसा करेंगे ही। रोशनी बंजारे की कविता में उनकी अपेक्षा और पूँजीपतियों के मनः स्थिति और उद्देश्य के अंतर्द्वंद्व को पढ़ा जा सकता है,

हम तुम्हारे लिये शोध की वस्तु है,

अच्छा है यदि तुमने हमें समझ लिया।

तुम खुदको हम जैसा होने से रोक नहीं पाओगे।

रोशनी की कविता में नारी, उसका सशक्तिकरण, नारी-पुरुष में फर्क, प्रकृति, प्रज्ञा, अपेक्षा, समता और जश्न जैसे शब्द और अनुभूतियाँ व्यक्त हुई हैं। जंगल के संदर्भ में वे लिखती हैं कि नारी मुक्ति और नारी सशक्ति कारण निरर्थक हैं। यहाँ वे यह बात समझती हैं कि पूँजीपति, सरकार नामक संस्था और पुरुष सत्ता की दृष्टि में किसी आदिवासी स्त्री क्या, स्त्री समुच्चय का क्या अर्थ और महत्व है। रोशनी की अनुभूतियाँ विरल हैं। हालाँकि, आधुनिक और संवेदनशील जुझारू स्त्रियाँ यह बात समझ रही हैं कि स्त्री और पुरुष के देह में कोई अलग से सुराख के पर नहीं लगे हैं। दोनों प्राकृतिक भिन्नताओं के अतिरिक्त एक हैं। अनेकता तो हमारी सभ्यता और संस्कृति ने गढ़े हैं। ऐसा नहीं कि सब कुछ के लिए पुरुष ही जिम्मेदार है, बिल्कुल नहीं; स्त्रियाँ भी कालांतर में स्त्री शरीर को सेक्स सिम्बल बनाया और सजाया है बल्कि राखी सावंत जैसी अनेक स्त्रियाँ खुले आम कहने की हिम्मत करती हैं कि मेरे हर अंग हमारे असेट हैं, पुरुष जितना भी देखना चाहता है यदि सांविधिक कोई अड़चन न हो तो मैं सब दिखा सकती हूँ। वह जानती हैं कि आज स्त्री अंगों का क्या महत्व है। आज स्त्री अंग सिर्फ अंग नहीं रह गए हैं। आज स्त्री अंग में आनंद की अनुभति, सेंसेशन, रोमांस, सौंदर्य, आकर्षण और सेक्स अपील संलयित हो उठी है। जिस तरह से पदार्थ की परिभाषा करते हुए कहा जाता है कि पदार्थ, प्रक्रिया, ऊर्जा, स्पेस एक दूसरे में समाहित हैं और उन्हें एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता है। उसी तरह से स्त्री देह का सौंदर्यबोध स्त्री-पुरुष अनुभूतियाँ समाहित हो चुकी हैं। हालाँकि, स्त्री देह के सौंदर्य को स्त्री-पुरुष के सेक्स के सुखद अनुभूति की तरह पदार्थ और स्पेस आदि की परिभाषा को उचित नहीं ठहराया जा सकता है। स्त्री देह के प्रति सौंदर्य और सेक्स की सुखद अनुभूति को भौतिक परिस्थितियों को परिवर्तित करने पर बिलगाया जा सकता है। रोशनी बंजारे की कविता के इन पंक्तियों को गौर से पढ़ा जाना चाहिए। बंजारे के एक-एक शब्द में मनुष्य की विकसित अवस्थाओं और उसके द्वन्द्व जा दर्शन होता है। कविता के शब्द और वाक्य की संरचना में कई-कई कालखंड, भौतिक परिस्थितियाँ, परिवर्तन और भविष्य की संकल्पनाएँ मौजूद होती हैं। कविता में उन अवस्थितियों से गुजरना कवि के मस्तिष्क संरचना का अनुसरण करना है। इस कविता में वैचारिक अवस्थिति और उसके द्वन्द्व को देखा जा सकता है।

नारीमुक्ति

और, सशक्तिकरण

निर्रथक शब्द हैं;

हमारे औरत आदमी में

सिर्फ इतना ही फर्क है,

जितना प्रकृति ने बनाया है;

कुछ देर को छोड़ो किताबें

पढ़ो जंगल,

प्रकृति में ज़शन होगा उस दिन

जिस दिन सब आदिवासी हो जाएंगे।

रोशनी बंजारे की कविता की आखिरी पंक्ति पर ध्यान दें, “प्रकृति में ज़शन होगा उस दिन, जिस दिन सब आदिवासी हो जाएंगे” अर्थात एक जैसे हो जाँय। यहाँ रोशनी पूँजीपतियों और आदिवासियों में समरूपता की कल्पना तो करती ही हैं लेकिन वे स्त्री देह को लेकर भी आंदोलित हैं। उनके विषय का प्रारंभ नारी मुक्ति, सशक्तिकरण और स्त्री-पुरुष देह में प्राकृतिक विभिन्नता को लेकर भी चिंता है। उन अर्थों में वह सब के आदिवासी होने का अर्थ समरूपता से लगाती हैं। एक जैसे का अर्थ है स्त्री अंगों की दर्शनीय महत्ता निरर्थक हो जाय। यह सच है कि स्त्री और पुरुष प्राकृतिक तौर पर अलग हैं लेकिन यह बहुत बड़ा सच है कि रूप, सृंगार, पहनावे, अलंकार, शरीर की लोच-लचक, कमनीयता, अंगों का अलग निखार प्रबंध, नाभि को सौंदर्य प्रतीक के रूप में प्रदर्शन, काजल, बिंदी, पायल, झुमकी, मसकारे, लिपिस्टिक इत्यादि स्त्री को एक अलग आकर्षण प्रदान करते हैं। स्त्री मात्र व्यक्ति नहीं रह जाती है बल्कि जिस लिंग और मांस के लिए वह स्त्री है उसके लिए पुरुष एक अलग आकर्षण की वजह से टूट पड़ता है, दुष्ट हो जाता है बदचलन हो जाता है, रेपिस्ट हो जाता है। बंजारे की कविता उसी शारीरिक समानता की बात करती है। यदि स्त्री अलग से उन अंगों को न सजाए, शरीर को सेक्स सिम्बल न बनाए, आँखों को हिरणी की आँखें न बनाए, गले और कमर को सुराही की तरह शिल्प न प्रदान करे, प्रकृति द्वारा प्रदत्त हाथ-पैर-देह सिर्फ जीवन को पालने-पोषने में खर्च करे, तो रासायनिक प्रक्रियाओं की आवश्यकता के अतिरिक्त सेक्स भी भूख स्त्री और पुरुष दोनों में खत्म रहेगी। अतिरिक्त सेक्स व छूने की संवेदना खत्म हो जाएगी। स्त्री शरीर कोई वस्तु नहीं है। स्त्री शरीर कोई सेक्स नहीं है। स्त्री शरीर सौंदर्य की अनुपम और अनुपमेय कोई अद्भुत पदार्थ अथवा अनुभूति योग्य इकाई नहीं है जिसे विपरीत पदार्थ के लिए ग्रेविटी को पावरफुल बना कर रखा जाय। शरीर जीवन के लिए एक सामान्य उपहार है। शरीर का उपयोग जीने के लिए किया जाना चाहिए। हमने स्त्री शरीर को सेक्स का सिम्बल बना रखा है और चाहते हैं कि उस सौंदर्य की प्रतिमूर्ति को विपरीत लिंगी कामुक निगाहों न देखें और न आकर्षित होकर छुएँ। जहाँ तक अनैतिकता का सवाल है, बिना सहमति के किसी विपरीत लिंग के शरीर को छूना दंडनीय अपराध है क्योंकि वह नैतिकता की श्रेणी में नहीं आता है लेकिन पुरुष जब उस शरीर में जबर्दश्त आकर्षण पाता है, सिर्फ आकर्षण ही नहीं बल्कि उस आकर्षण के सौंदर्य का अंतर्भूत बोध भी स्त्री में पाता है तो वह अनैतिक होकर भी पाने की कोशिश करता है। मैं इस स्थिति को कतई जायज नहीं कहता हूँ लेकिन साथ में यह भी कहता हूँ कि स्त्री को प्रकृति द्वारा सिर्फ लिंग ही तो अलग प्रदान हैं, शेष तो उसने जबर्दशती ओढ़ रखा है। यदि जबर्दशती के आवरण को हटा दिया जाय और रोशनी बंजारे को फॉलो किया जाय तो पुरुष का वजहपूर्ण आकर्षण बेवजह हो जाएगा और बेवजह पुरुष अनैतिक कार्य संभव है, न करे। यहाँ आप को मेरी उन अंतिम पंक्तियों पर ध्यान देना होगा जब मैं यह कहता हूँ कि सामान्य तौर पर स्त्री ओउऋषीं जैसे ही रहे जैसा कि प्रकृति ने उसे बनाया है तो पुरुषों का आकर्षण खत्म हो जाएगा। आप को एक डर है कि जीवन नीरस हो जाएगा अर्थात स्त्रियाँ आधुनिक सौंदर्य के पैमाने में अति सुंदर लगती हैं और स्त्री-पुरुष के मध्य यही सौंदर्य आकर्षण का बिंदु रहता है। ऐसा नहीं है, एक स्त्री को दाढ़ी और बाल रखे हुए फूल पेंट-शर्ट में यदि पुरुष आकर्षक लगते हैं तो भला सामान्य स्थिति की मूल स्त्री पुरुषों को क्यों नहीं आकर्षक लगेगी। एक बात है पुरुषों और स्त्रियों के आंतरिक संवेदना के मनोगत आकर्षण के भूत मर जाएंगे।

आर डी आनंद

18.04.2021

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