विकल्प की तलाश

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विकल्प की तलाश

विकल्प एक जादुई शब्द है
आकर्षित करता है
जो हमेशा ही
जिसे ढूँढने की जुगत में
रहते हैं सब
कि मिले जीवन में
एक से अधिक रास्ता
कमाने,खाने और जीने का
शायद यह जरूरी भी है
वरना एकाधिकार
जन्म देता है अहंकार को

बिना विकल्प के जीना
कई बार साबित होती है जानलेवा
जैसे कि धड़धड़ाती हुई ट्रेन
वैकल्पिक रास्ते के अभाव में
मंजिल तक पहुँचने का
संकेत मिलते ही
बिना दायें-बायें देखे यंत्रवत
गाजर-मूली की तरह
आदमियों को काटती हुई
बढ़ जाती है आगे
और पीछे छोड़ जाती है
रूदन,क्रदंन,हताशा
और सत्ताधारियों का काल सच
कि आम आदमी भेड़-बकरियों से
ज्यादा कुछ भी नहीं

भयावह है कि
बिना सुरक्षित इंतजाम के
खेल-तमाशे के जाल में
ठेल दिया जाता है
जीवित धड़कनों को
हँसते-खिलखिलाते नौनिहालों को
काम-काज से
फुर्सत के दो पल पाये
कामगारों को
रेल की पटरियों पर
लाशों में तब्दील हो जाने के…
लड़कियाँ, चूड़ियाँ और बाजा़र

कहावत है कि
हमने चूड़ियाँ नहीं पहन रखी
सच में
क्या सच में…?
चूड़ियाँ निशानी है कायरता की
या प्रतीक है
लड़की जैसी नाजुकता की

खैर! जाने दें इस बात को
पर इंकार नहीं किया जा सकता कि
लड़कियाँ हैं तो चूड़ियाँ हैं
और एक सच यह भी कि
चूड़ियों का होता है
अपना ही अर्थ शास्त्र

ये नहीं करती फर्क
काली,गोरी, मोटी, पतली
कलाईयों में
इन्हें चाहिए बस हाथ
जो खनका सके
और सहेज कर रख सके
ये नहीं करती फर्क
अमीरी-गरीबी में
सावन-भादों आते ही
हरी काँच की चूड़ियों से 
सज जाते हैं बाजा़र

नाजुक सी होतीं है
ये काँच की चूड़ियाँ
और होती हैं बहुत नाजुक
लड़कियाँ भी
लड़कियाँ, चूड़ियाँ और बाजा़र
सभी चलते हैं साथ-साथ

बिकती है बाज़ार में
लड़कियाँ भी और चूड़ियाँ भी
पर चूड़ियाँ कभी
बाजारू नहीं होती
बाजारू तो होती हैं बस
वे बेबस बदकिस्मत लड़कियाँ
जो जाने-अन्जाने 
कभी हालात के मारे…
जब हम मिले थे

ठीक-ठीक मुझे याद है
जब सावन-भादों बरस रहे थे
मकई के पौधों का कच्चापन
और बिचड़ों की बुआई चल रही थी
ऐसे ही में हम-तुम मिले थे
पक कर उतर रही नरम गरमी में

बरसों-बरस बीत गए
इस बात को
कई रास्ते और मंजिलें
हमनें तय किये थे मिल कर
फिर भी मुझे याद है अभी तक
ठीक कुम्हार की गीली मिट्टी की तरह
थे हमे भी अपने गठन के दौर में
और जागती आँखें देखा करती थी
सपने ही सपने

फिर जब हम घुलने-मिलने लगे थे
दूध और पानी की तरह
और गेहूँ की बालियॉ
पक कर उतर रही थी
उस एक वसंती शाम को
आया था दूर देश से एक बटोही
और चुपचाप तुम चली गई
पीछे छोड़कर
उदास पड़ी कोयल
और झड़ रहे बौरों को

आज भी जब आता है वसंत
कूकती है कोयल और लगते हैं बौर
आँखें मेरी
सावन-भादो होने लगती हैं
और जब खिलती है
नरम-नरम सी धूप
तुम्हारे होने की गर्माहट
मिल जाती है मुझे।

श्वेता शेखर
श्वेता शेखर पटना की कवयित्री हैं और हमारा मोर्चा को उनकी ये कविताएँ राजीव कुमार झा के सौजन्य से प्राप्त हुई हैं

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