कव्वे तो हर रोज़ दिवाली मना रहे हैं …………

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सदियों ने पल-पल है जिसका रूप सँवारा
ऋषियों, मुनियों ने जिसको पाला पुचकारा
ऐसा देश हमारा, ऐसा देश हमारा

जाने क्यों अब उल्टी गंगा बहा रहे हैं
सारी नगरी ख़ुद जैसी ही बना रहे हैं
एक टके की भाजी खाजा बता रहे हैं
बगुले सारे ख़ुद को हंसा दिखा रहे हैं
धो लेते हैं हाथ, जहाँ भी बहती धारा
ऐसा देश हमारा, ऐसा देश हमारा

कव्वे तो हर रोज़ दिवाली मना रहे हैं
ढपली ले अपने रागों को सुना रहे हैं
दिल्ली दूर, मगर आशाएँ बँधा रहे हैं
पाँचों उँगली घी में, दावत उड़ा रहे हैं
खा-पीकर बैठे हैं घर का राशन सारा
ऐसा देश हमारा, ऐसा देश हमारा

चाचा चोर, भतीजा क़ाज़ी, क्या बोलें हम
दोनों ही आपस में राज़ी क्या बोलें हम
मक्खी को छोड़ें, पर हाथी निगल रहे हैं
चोर-चोर मौसेरे भाई उछल रहे हैं
आँसू के ही घूँट पिए, अब सच बेचारा
ऐसा देश हमारा, ऐसा देश हमारा

मगरमच्छ हँस-हँसकर मछली फँसा रहे हैं
मानसरोवर में बगुले खिलखिला रहे हैं
लम्बा टीका, मीठी वाणी वो रखते हैं
तेल चमेली का अपने सिर पर मलते हैं
कर-कर जतन इन्होंने अपना रूप सँवारा
ऐसा देश हमारा, ऐसा देश हमारा

इतना पानी पी बैठे रोएँगी सदियाँ
बादल तक सूखे हैं, क्या सागर, क्या नदियाँ
बच्चे जब पीने के पानी को तरसेंगे
चुल्लूभर पानी में हम सब डूब मरेंगे
बची नहीं दो बूँद आँख में, है अँधियारा
ऐसा देश हमारा, ऐसा देश हमारा

डॉ. सीमा विजयवर्गीय

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