कुमार मुकेश द्वारा लिए गए विभिन्न रोगों के विशेषज्ञों के साक्षात्कार

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कुमार मुकेश. हिसार
सवाल : गर्मियों में आंखों का बचाव कैसे किया जाए?
जवाब : आंखों में बार-बार ठंडे पानी के छींटे मारे और वाहन चलाते समय व पैदल चलते समय अच्छी क्वालिटी के धूप के चश्मों का प्रयोग करें ताकि आंखों का धूल व मिट्टी से बचाव हो सके।
सवाल : इन दिनों लेंस लगाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, कितनी फायदेमंद है?
जवाब : लेंस की प्रवृत्ति का कोई नुकसान नहीं है। कान्टैक्ट लेंस और लेसिक लेजर भी चश्मा लगाने की तरह ही आंखों का नंबर दूर करने की तकनीक है। तीनों तकनीक में से किसी को भी अपनाया जा सकता है, नुकसान किसी में नहीं है।
सवाल : टेलीविजन देखते समय आंखों के प्रति किस प्रकार की सावधानी रखनी चाहिए?
जवाब : टीवी कम से कम छह फीट की दूरी से देखना चाहिए। टीवी वाले कमरे में अंधेरा नहीं होना चाहिए। टीवी व आंखों एक ही लेवल पर होना भी जरूरी है।
सवाल : पढ़ते समय आंखों के प्रति किस प्रकार की सावधानी रखनी चाहिए?
जवाब : पढ़ाई चेयर-टेबल पर ही करनी चाहिए और टेबल लैंप की रोशनी बांई तरफ से सीधी किताब या कापी पर गिरनी चाहिए न कि आंखों पर। लेट कर बिल्कुल भी पढ़ाई नहीं करनी चाहिए और आंखों से किताब या कापी की दूरी कम से कम 33 सेंटीमीटर होनी चाहिए।
सवाल : चिकित्सा विज्ञान में आए दिन नई तकनीकें आ रही है, नेत्र रोगों के उपचार में क्या तकनीक आई है?
जवाब : ओसीटी तकनीक से आंखों के पर्दे की तस्वीर लेकर पांच वर्ष पहले ही यह बताया जा सकता है कि आंखों में मोतियाबिंद हो सकता है या नहीं।
सवाल : मोतियाबिंद का ऑपरेशन कितना सुरक्षित हुआ है?
जवाब : अब फकोइम्यूलसिफिकेशन तकनीक के द्वारा 2.8 एमएम के चीरे से ही आंखों में कोल्ड फेको और जोरशनल फेको लेंस की मदद से सख्त से सख्त मोतियाबिंद को बिना किसी नुकसान के सुरक्षित काटा जा सकता है।
सवाल : डायाबिटिज और बढ़ती उम्र के साथ कमजोर होती नजरों की बीमारी के निदान में क्या नई तकनीकें आई हैं?
जवाब : डायाबिटिज के कारण आंखों में आने वाली खून की नली के अलावा एआरएमडी (उम्र के साथ नेत्र पटल पर तस्वीर बनने के स्थान पर खून की नली बनना) का अब बिना ऑपरेशन के सिर्फ इंजेक्शन से ही उपचार किया जा सकता है।
सवाल : चश्मा उतरवाने की लेसिक लेजर तकनीक किस उम्र तक कारगर है?
जवाब : इस तकनीक में रिफेक्टिव सर्जरी से अब 40 की उम्र के बाद भी प्लस और माइनस के सभी नंबर के चश्मे स्थाई रूप से उतर सकते हैं।
सवाल : फिक्स लेंस में मल्टीफोकल लेंस के क्या फायदे हैं?
जवाब : कुछ वर्ष पूर्व शुरू हुए फिक्स लेंस डालने की तकनीक में अब मल्टीफोकल और अकोमोडेटिंग लेंस की सहायता से दूर, बीच और नजदीक तीनों नजर में सफाई रहने लगी है।
सवाल : सफेद की तरह काला मोतिया का उपचार क्या बिना ऑपरेशन संभव है?
जवाब : काला मोतिया में भी अब ऐसे उपचार आ गए हैं, जिनकी मदद से आंख के प्रेशर को अच्छी तरह से कंट्रोल किया जा सकता है और बिना ऑपरेशन के ही उपचार किया जा सकता है।
सवाल : मोतियाबिंद का होने का कारण क्या है और इसे कैसे पहचाना जा सकता है?
जवाब : मोतियाबिंद मुख्यत: उम्र के साथ होने वाली बीमारी है लेकिन कई बार जन्मजात रोगों के कारण आंख के एंगल में जब कोई फर्क रह जाता है तो बचपन और जवानी में भी यह बीमारी हो जाती है। ओपन एंगल में नजदीक के चश्मे बार-बार बदलने, सेंटर में ब्लैक फील्ड बनना और आंखों में भारीपन आना लक्षण है। क्लोज एंगल एकदम से आता है, जिसमें आंख लाल हो जाती है, पानी निकलना शुरू हो जाता है, नजर गिर जाती है, दर्द के मारे कभी-कभी उल्टी भी आ जाती है। दोनों का उपचार और ऑपरेशन संभव है।

दर्द से बचाए व्यायाम
बालाजी अस्पताल के हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. बीबी नागपाल

सवाल : सरवाइकिल स्पांडिलाइटिस क्यों और यह क्या है तथा इसका बचाव कैसे करें?
जवाब : यह रोग गांवों में विशेषकर महिलाओं में यह सिर पर बोझा (घास, घड़े आदि) उठाने से और शहरों में कंप्यूटर पर गलत स्थिति में बैठकर देर तक काम करने से, लिखने का ज्यादा काम करने से और क्लैरिकल जाब के कार्र्यों से होता है। दरअसल इसमें गर्दन की हड्डी के जोड़ के ऊपर अत्यधिक तनाव के कारण हड्डी बढ़ जाती है। छोटे-छोटे जोड़ों की बढ़ी हड्डियों से नसों पर दबाव पडऩा शुरू हो जाता है, जिसके कारण यह दर्द होता है। इसमें गर्दन के अलावा बाजू व हाथ में भी दर्द शुरू हो जाता है तथा कई बार हाथों की उंगलियों में सुन्नपन भी आ जाता है। व्यायाम व मांसपेशियों के गुड पोस्चर के अलाव पतला तकिया प्रयोग करके और फिजियोथैरेपी के लिए चिकित्सक से सलाह लेकर इससे बचा जा सकता है।
सवाल : कंप्यूटर पर कार्य करते हुए किस स्थिति में बैठना चाहिए?
जवाब : कंप्यूटर स्क्रीन ऐसी जगह होनी चाहिए कि गर्दन पर तनाव न पड़े। प्रत्येक आधा घंटे के काम के बाद पांच से सात मिनट का ब्रेक लेना चाहिए। नियमित कंप्यूटर पर कार्य करने वालों को चिकित्सक की सलाह पर कुछ नियमित व्यायाम भी करना चाहिए। कमर दर्द से बचाव के लिए कमर के पिछले हिस्से में कुर्सी पर छोटी व पतली गद्दी का प्रयोग किया जा सकता है।
सवाल : (जोड़ों का दर्द) आर्थराइटिस क्या है, यह कितने प्रकार का होता है?
जवाब : हड्डी व जोड़ों के ऊपर लचीली परत (कार्टीलेज) के घिसने के कारण ही आर्थराइटिस होता है। जब यह उम्र के साथ घिसती है तो उसे आस्टियो आर्थराइटिस (घुटनों का दर्द) कहते हैं। कई बार विशेषकर महिलाओं के शरीर में एंटी बाडी तत्व बनते हैं जो कार्टीलेज को नष्टï करना शुरू कर देते हैं। इससे रहूमोटॉयड आर्थराइटिस होता है। शरीर में यूरिक एसिड के बनने से जब कार्टिलेज नष्टï होती है तो उसे गौटी आर्थराइटिस कहते हैं। रीढ़ की हड्डी एवं कूल्हे के जोड़ के जाम होने व रीढ़ की हड्डी के आगे की तरफ झुकने से एंकीलोजिंग स्पांडिलाइटिस हो जाता है।
सवाल : आर्थराइटिस में क्या होता है और इससे कैसे बचा जा सकता है?
जवाब : इसमें जोड़ों में दर्द के अलावा सूजन आ जाता है। सुबह के समय जोड़ों में जकडऩ महसूस होती है और धीरे-धीरे जोड़ों की बनावट बिगडऩी शुरू हो जाती है। इसके बचाव का मुख्य तरीका गुड पोस्चर है।
सवाल : आर्थराइटिस का क्या उपचार है?
जवाब : सही समय पर चिकित्सक से संपर्क करने पर इसे दवाइयों से भी ठीक किया जा सकता है। बिगड़ भी जाए तो कृत्रिम जोड़ रूपांतरण का ऑपरेशन ही अंतिम उपचार है।
सवाल : कृत्रिम जोड़ रूपांतरण क्या है, इसके क्या फायदे हैं?
जवाब : कृत्रिम जोड़ रूपांतरण दरअसल खराब जोड़ों को ऑपरेशन के माध्यम से ठीक करने की तकनीक है। इसके बहुत अच्छे परिणाम हैं, ऑपरेशन के बाद मरीज अपनी सामान्य दिनचर्या बिना दर्द के जी सकता है। हालांकि जोड़ बदलना आखिरी उपचार है, सही समय पर दवाइयों का उपचार लेकर इससे बचा भी जा सकता है।
सवाल : बच्चों में कौन-कौन से हड्डी रोग बढ़ रहे हैं और इनका बचाव क्या है?
जवाब : बच्चों में पांवों का टेढ़ा होना, रीढ़ की हड्डी में रसोली होना, कैल्शियम और विटामिन डी की कमी से हड्डियों का लचीला होना (रीकेटस), जिसमें टांगें मुडऩी शुरू हो जाती है, आदि प्रमुख रोग हैं। इनमें काफी बीमारी जन्मजात होती है, जिनका बचाव नहीं बल्कि उपचार है। शक होने पर शीघ्रता से चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।
सवाल : महिलाओं में कमर दर्द बढऩे का कारण क्या है और इसका क्या बचाव है?
जवाब : इसका प्रमुख कारण गर्भावस्था के दौरान हारमोन के चलते हड्डियों को आपस में बांधकर रखने वाले लिगामेंट के कमजोर होने के अलावा बच्चों को दूध पिलाने से कैल्शियम की कमी, स्तनपान के दौरान बच्चों को गोद में लेकर आगे की तरफ झुककर बैठना है। इससे बचाव के लिए गर्भावस्था व स्तनपान के दौरान कैल्शियम का पूरा ध्यान रखना व नियमित रूप से विशेषकर पेट की मांसपेशियों का व्यायाम करना ही है।
सवाल : हड्डी के टूटने पर क्या करें?
जवाब : जो हड्डी टूटे उसे लकड़ी व छड़ी या मोटे गद्दे का सहारा दें। घाव हो तो उस पर पट्टी बांधे लेकिन घाव से ऊपर कसकर पट्टी न बांधे, इससे खून ज्यादा बहता है। रीढ़ की हड्डी की चोट हो तो मरीज को समतल जगह पर लेटाना चाहिए और उसी स्थिति में अस्पताल लेकर आना चाहिए, उसे बिठाना बिल्कुल नहीं चाहिए। टूटी हड्डी का सर्वोत्तम उपचार उसे जल्दी इलाज दिलाना ही है, इसलिए नीम हकीमों के पास भटकने से मामला बिगड़ सकता है जिससे बाद में सही परिणाम नहीं मिलता। क्योंकि हड्डी टूटेगी तो जुड़ेगी भी लेकिन जुडऩे के बाद जोड़ सही काम करे, यही विशेष बात होती है।
सवाल : भोजन में किन चीजों के इस्तेमाल से हड्डियां मजबूत होती हैं?
जवाब : दूध, दही, पनीर, अंडा, मांस व मछली में कैल्शियम की प्रचुर मात्रा होती है, जिनके सेवन से हड्डियां मजबूत होती हैं।
सवाल : रात को सोने की गलत स्थिति के कारण भी कई बार हाथ, गर्दन व कमर में दर्द होता है, इससे कैसे बचा जा सकता है?
जवाब : सोने का गद्दा ऐसा हो जो शरीर का आकार ले सके। यह बीच में धंसा हुआ नहीं होना चाहिए। स्प्रिंग के गद्दे सबसे बढिय़ा होते हैं लेकिन यह महंगे भी होते हैं।

टीकाकरण करता है बच्चों की बीमारियों से बचाव
जावा अस्पताल के बालरोग विशेषज्ञ डॉ. सतीश जावा ने बातचीत में बच्चों की विभिन्न बीमारियों और उनसे बचाव के बारे में दी सलाह।
सवाल : बच्चों में टीकाकरण कितना जरूरी है, इसमें क्या ध्यान रखें?
जवाब : बच्चों में टीकाकरण दरअसल बीमारियों से बचाव के लिए हेलमेट का काम करता है। वैसे तो काफी टीके आ गए हैं लेकिन सरकार के स्तर पर लगाए जाने वाले टीके तो कम से कम लगवाने ही चाहिए। यदि संभव हो तो हेपेटाइटिस बी, एचआईबी, (दोनों डीपीटी के साथ पहले छह माह में) हेपेटाइटिस ए (एक साल के बाद), चिकनपॉक्स (एक साल पर), एमएमआर (15 माह पर) का टीका अपने स्तर पर भी लगवा लेना चाहिए। अक्सर लोग डीपीटी की डेढ़ और पांच वर्ष की उम्र पर लगने वाली खुराक भूल जाते हैं, जो बहुत जरूरी है। यदि मां को या परिवार के सदस्यों को कोई बीमारी हो तो चिकित्सक को अवश्य बताना चाहिए ताकि बच्चे का बचाव किया जा सके।
सवाल : बच्चों में मालिश का क्या फायदा है, साबुन, पाउडर का प्रयोग करना चाहिए या नहीं?
जवाब : इसका कोई खास फायदा नहीं है, दरअसल मालिश मां और बच्चे के बीच मधुर संबंध बनाने का माध्यम है, इसलिए इसे दाई से न कराया जाए क्योंकि उनके हाथ सख्त होते हैं। गर्मियों में मालिश बिल्कुल नहीं करनी चाहिए और इसके लिए तीखा व सरसों का तेल प्रयोग करने की बजाय नारियल या जैतून के तेल प्रयोग करें। छह माह तक बच्चों को साबुन और काजल कभी भी नहीं लगाना चाहिए। पाउडर तभी लगाएं जब बच्चा स्वयं लगाने लग जाए।
सवाल : बच्चों में कौन से रोग छूआछूत के होते हैं और उन्हें कैसे बचा जा सकता है?
जवाब : चिकनपॉक्स व खसरा श्वास से फैल जाते हैं तो टाइफाइड, पीलिया और दस्त भोजन के जरिए बच्चों में जल्दी फैलते हैं। इससे बचाव का सही तरीका बच्चों को रोगियों से दूर रखना ही है।
सवाल : कुपोषण और मोटापा के क्या कारण हैं और इनसे बच्चों को कैसे बचाएं?
जवाब : छह माह के बाद भी बच्चों को सिर्फ मां के दूध पर रखना ही कुपोषण का मुख्य कारण है। इससे बचने के लिए छह माह के बाद बच्चों को अन्य चीजें भी खिलाना चाहिए। उन्हें ज्यादा दूध पिलाने, मिठाई व चाकलेट और साफ्ट ड्रिंक के शौक से बचाना चाहिए, क्योंकि इससे मोटापा हो जाता है, जिससे आगे चलकर शुगर, ब्लड प्रेशर और हृदय रोग हो जाते हैं। बचपन के मोटापे को नियंत्रित करना सबसे मुश्किल होता है।
सवाल : गर्मियों में बच्चे की दिनचर्या कैसी होनी चाहिए?
जवाब : गर्मियों में बच्चों को न ठंडे और न गर्म बल्कि ताजे पानी से और शिशुओं को गुनगुने पानी से प्रतिदिन नहलाएं। दो माह के बच्चे के कमरे का तापमान 28 डिग्री सेल्सियस तक तो बड़े बच्चों के लिए 25 डिग्री सेल्सियस तक रखें। तापमान ऐसा होना चाहिए जिसमें बड़ों को कंबल ओढऩे की जरूरत महसूस न हो। बच्चों को दोपहर को घर से बाहर न निकलने दें, यदि निकलें तो छाता दें और नींबू पानी व जूस पिलाएं। सफर में बच्चों को पाउडर से ही दूध बनाकर पिलाएं, काफी समय का बोतल में रखा गर्म दूध बिल्कुल न पिलाएं।
सवाल : बच्चों को आहार कितना और क्या देना चाहिए?
जवाब : छह माह तक के बच्चे को मां का दूध पिलाएं और बाद में मां तभी दूध पिलाएं जब छाती भारी हो जाए, जो कम से कम छह घंटे में होती। इस दौरान बीच में बच्चों को सूजी की खीर, दलिया, बिस्कुट, केला, आम व चीकू दिया जा सकता है। 10 माह के बाद रोटी भी दी जा सकती है लेकिन सख्त चीजें न दें और बाकी सभी चीजें खिलाएं। एक साल के बच्चे को मां की खुराक से आधी तो दो साल के बच्चे को पिता की खुराक से आधी खुराक की जरूरत होती है।
सवाल : बोतल से दूध पिलाना व बाजारी पाउडर खिलाना और नेपकीन का प्रयोग कितना सही है।
जवाब : बोतल से दूध पिलाना जहर के समान है, इससे अच्छा तो बच्चे को दूध ही न पिलाएं। बाजारी पाउडर में वही पदार्थ होते हैं जो घर की वस्तुओं में होते हैं, इसलिए इनका प्रयोग सिर्फ सफर के समय करें ताकि बाजार की वस्तु न खिलाने पड़े। रही बात नेपकीन की तो वह गर्मियों में बिल्कुल नहीं लगानी चाहिए और सर्दियों में भी सिर्फ आधे घंटे के लिए ही प्रयोग करना चाहिए। गर्मियों में नेपकीन के प्रयोग से डाइपर रैश (चर्म रोग) हो जाता है।
सवाल : स्तनपान से क्या महिलाओं के सौंदर्य पर दुष्प्रभाव पड़ता है?
जवाब : स्तनपान से महिलाओं के सौंदर्य पर दुष्प्रभाव नहीं पड़ता बल्कि सौंदर्य में वृद्धि होती है।
सवाल : स्तनपान के दौरान मां को क्या खाना चाहिए?
जवाब : स्तनपान के दौरान मां को वही भोजन करना चाहिए जो वे करती हैं लेकिन उसकी मात्रा सवाई होनी चाहिए। इसके अलावा मौसमी फल, सब्जी लें तथा आयरन व कैल्शियम की दवा लें।
सवाल : गर्भ धारण करने की सही उम्र क्या है और क्या ध्यान रखना चाहिए?
जवाब : गर्भ धारण करने की सही उम्र 20 से 30 वर्ष है, इसके बाद से ही बच्चे की देखभाल शुरू हो जाती है। नियमित जांच के बाद प्रसूति अस्पताल में ही करानी चाहिए, घर पर खतरनाक होती है। गरीबों को सरकारी अस्पताल में डिलीवरी कराने के लिए बाकायदा सरकारी सहायता भी मिलती है।
सवाल : स्वस्थ बच्चे को चिकित्सक के चेकअप की जरूरत है या नहीं?
जवाब : स्वस्थ बच्चे को भी चिकित्सक के चेकअप की जरूरत है। पहले साल हर माह, दूसरे साल तीसरे माह और बाद में छह-छह माह के अंतराल पर स्वस्थ शिशु का भी चेकअप कराना चाहिए।
सवाल : बच्चे को किस उम्र में स्कूल में दाखिला दिलाना चाहिए?
जवाब : बच्चा जब पांच वर्ष का हो जाए तब प्रथम कक्षा में होना चाहिए। हालांकि प्ले स्कूल में बच्चों पहले दाखिला दिलाया जा सकता है बशर्ते वहां पर पढ़ाई न कराई जाए।
सवाल : छोटे बच्चों के साथ होने वाली दुर्घटनाओं से कैसे बचाव किया जाए, यह कितनी खतरनाक हैं?
जवाब : बिस्तर, मेज, सीढिय़ों व छत से गिरने से भी बच्चे की मौत हो सकती है, इनसे बचाव के लिए गिरने के रास्ते बंद करने चाहिए। इसके अलावा गोद में लेकर चाय-काफी पीने से भी कई बार वह बच्चे में गिर जाती है, जिससे वह जल जाता है या रसोई में हैंडल वाले बर्तन पकड़कर वह अपने ऊपर उड़ेल सकता है। यही नहीं दो वर्ष तक का बच्चा बाथरूम में बाल्टी भर पानी में भी डूब सकता है, इसलिए उसे अकेला न छोड़ें। निर्माणाधीन मकान के बाहर बनाई जाने वाली टंकी सबसे खतरनाक हैं, इसे ढंककर रखना चाहिए। दवाई, साबुन, सर्फ, पालिश, मिट्टी का तेल, फ्लिट आदि बच्चों की पहुंच से दूर रखें। तीन साल के बच्चों को चने व मूंगफली न खाने दें। वाकर में बच्चों को बिल्कुल न बिठाएं, इनसे होने वाली दुर्घटना के चलते तो अमेरिका में इस पर रोक लगा दी गई है।

गर्मी में भी त्वचा को सुंदर बनाए
गुप्ता चर्म रोग व दांतों के अस्पताल के चर्म रोग विशेषज्ञ डॉ. सुरेंद्र गुप्ता से बातचीत
सवाल : चर्म रोग के क्या कारण हैं?
जवाब : चर्म रोग मुख्यत: शरीर के आंतरिक कारणों के अलावा पैरासाइट, बैक्टीरियल व वायरल इंफेक्शन के कारण होते हैं। गर्मियों में इनका प्रकोप कुछ ज्यादा ही होता है।
सवाल : त्वचा रोगों से कैसे बचा जा सकता है?
जवाब : शरीर के आंतरिक कारणों से होने वाले त्वचा रोगों का बचाव नहीं उपचार है लेकिन इंफेक्शन व अन्य बाहरी कारणों से होने वाले त्वचा रोगों से साफ-सफाई का ध्यान रखकर बचा जा सकता है।
सवाल : गर्मियों में त्वचा को कैसे बचाएं कि त्वचा रोग न हो?
जवाब : गर्मियों में हर रोज साबुन से नहाएं लेकिन साबुन बार-बार न लगाएं और तौलिया व कंघा अलग रखें। साफ व धुले हुए सूती कपड़े पहनें व धूप से बचे। यदि गर्मी में बाहर जाना पड़े तो सिर को कपड़े से ढक कर निकलें तथा दो गिलास पानी पीकर ही घर से बाहर जाएं। गर्मी में सफर करना पड़े तो बस या कार की सीट से चिपक कर न बैठे और घर आने के बाद नहा लें। मच्छरों से बचाव करें, इसके लिए पूरे बाजू के कपड़े पहनकर सोएं, मच्छर मार स्प्रे, अगरबत्ती व अन्य वस्तुओं का प्रयोग करें। यदि त्वचा रोग हो जाए तो खारिश न करें और शीघ्र अपने त्वचा रोग विशेषज्ञ की सलाह लें।
सवाल : अक्सर लोग मुल्तानी मिट्टी से नहाते हैं, यह कितना सही है और त्वचा के लिए क्या-क्या हर्बल वस्तुएं प्रयोग में लाई जा सकती हैं?
जवाब : दरअसल मुल्तानी मिट्टी त्वचा को नर्म बनाती है लेकिन यह साबुन का विकल्प नहीं है। इसके अलावा विदेशों में प्रचलित ब्रान बाथ (जौ या गेहूं के छिलके के आटे से मुल्तानी मिट्टी की तरह ही नहाना) तथा अन्य प्रचलित प्राचीन हर्बल विधियों से त्वचा को फायदा ही है नुकसान नहीं है।
सवाल : तेज धूप में जाकर घर आने पर क्या करना चाहिए?
जवाब : घर पर आते ही ठंडे पानी से मुंह धोएं और फिर पंखे या कूलर के सामने बैठ जाएं।
सवाल : चेहरे पर अनचाहे बाल क्यों आते हैं और इनका क्या उपचार है।
जवाब : अनचाहे बाल लड़कियों में हारमोन की गड़बड़ी से तो लड़कों में आनुवांशिक कारणों से आते हैं। लेजर तकनीक ही इनका उपचार है लेकिन लड़कियों को इस तकनीक के उपचार के अलावा दवा भी लेनी पड़ती है। इस तकनीक का त्वचा पर कोई दूसरा साइड इफेक्ट नहीं होता है।
सवाल : महिलाओं द्वारा प्रयोग में लाई जाने वाली कास्मेटिक का त्वचा पर कितना नुकसान होता है और इससे कैसे बचा जा सकता है?
जवाब : कास्मेटिक का नुकसान ही नुकसान है और एलर्जी, फोड़े व फुंसी इन्हीं के कारण से होते हैं। जितना हो सके इनका कम और कंपनी की सामग्री ही प्रयोग करें और घर आते ही इन्हें उतार लें।
सवाल : क्या धूप से त्वचा का रंग काला होता जाता है और इसका क्या उपचार है?
जवाब : धूप में पैराबैंगनी किरणों के कारण त्वचा का रंग काला हो जाता है, जिसे टेनिंग कहते हैं। बचाव ही इसका उपचार है। बचाव के साधन अपनाने से छह माह बाद जब त्वचा बदल जाती है तो वह अपने आप सही हो जाती है।
सवाल : काले रंग को गोरा करने की साबुन, क्रीम व अन्य साधनों पर कितना विश्वास किया जा सकता है?
जवाब : यदि ऐसा सच होता तो सभी गोरे हो जाते। इन पर कतई विश्वास नहीं किया जा सकता।
सवाल : हवा में व्याप्त प्रदूषण से त्वचा के कौन से रोग हो सकते हैं और उनका क्या बचाव है?
जवाब : हवा में व्याप्त प्रदूषण से बाल खुरदरे व भूरे हो जाते हैं तथा टूटने लगते हैं। इससे त्वचा भी खराब होती है। धूप आदि से बचाव की तरह ही प्रदूषण से भी बचाव किया जा सकता है।
सवाल : हाथों व उंगलियों की चमड़ी का उखडऩा क्या बीमारी है?
जवाब : यह कोई बीमारी नहीं है बल्कि मौसम के साथ शरीर में होने वाला बदलाव है। यह अपने आप ठीक हो जाता है।
सवाल : गर्मी के मौसम में कैसे और किस रंग के कपड़े पहनने चाहिए?
जवाब : गर्मी के मौसम में सूती कपड़े पहनने चाहिए। लाइट कलर के कपड़ों में गर्मी कम लगती है।
सवाल : गर्मी के मौसम में त्वचा को सुंदर बनाने के लिए क्या खाना चाहिए?
जवाब : पानी खूब पीने के अलावा हरी सब्जियां, फल, दूध, दही का प्रयोग करना चाहिए।
सुंदर दांतों के लिए सावधानी जरूरी
राजीव डेंटल क्लीनिक के दंत रोग विशेषज्ञ डॉ. राजीव जैन से बातचीत
सवाल : बच्चों के दांत किस उम्र में निकलते हैं तथा इनके निकलने के समय कैसी परेशानियां होती है, उनसे कैसे बचा जा सकता है?
जवाब : बच्चों में छह से आठ माह की उम्र में दूध का पहला दांत आता है। करीब दो वर्ष तक पूरे दांत आ जाते हैं। इसी प्रकार छह से सात वर्ष की उम्र में पहला पक्का दांत आता है और 12 वर्ष तक 28 दांत आ जाते हैं। अक्ल दाढ़ 18 वर्ष के बाद आती है। जब बच्चों में दांत निकलते हैं तो पेट खराब होना व बुखार होने की समस्या आती है लेकिन इनका दांत निकलने से कोई संबंध नहीं होता। दरअसल दांत निकलते समय बच्चों के मसूड़ों में खुजली होती है तब वे हर चीज मुंह में डालकर चबाने का प्रयास करते हैं। ऐसा करने पर वातावरण के काफी कीटाणु बच्चे के शरीर में आ जाते हैं जो बुखार व पेट दर्द का कारण बनते हैं। इनसे बचने के लिए बच्चे के हाथ में साफ वस्तुएं ही देनी चाहिए।
सवाल : बच्चों के दांत व मसूड़े किस तरह साफ करें और उनमें पेस्ट की आदत कब डालें?
जवाब : छोटे बच्चों के मसूड़े दूध पिलाने के बाद गीली रूई से साफ करें, अन्यथा उनमें रेम्पेंट कैरिस (दांतों को गलाने वाले कीड़े) लग सकते हैं, जिससे पूरे दांत काले-काले होकर खत्म हो जाते हैं। दो वर्ष की उम्र में नर्म ब्रुश से बच्चों में पेस्ट की आदत डालें और सुबह व शाम दिन में दो बार पेस्ट कराएं।
सवाल : बच्चे के दूध के दांत किस उम्र में टूटते हैं तथा उस समय क्या सावधानियां रखनी चाहिए?
जवाब : छह से सात वर्ष की उम्र में जब पक्का दांत आता है, तभी से बच्चे के दूध के दांत टूटने शुरू हो जाते हैं, जो 12 वर्ष तक जारी रहते हैं। यह सामान्य प्रक्रिया है फिर यदि बच्चे को ज्यादा तकलीफ हो तो चिकित्सक को जरूर दिखाना चाहिए।
सवाल : दांत टेढ़े-मेढ़े न निकलें, इसके लिए क्या सावधानियां बरतनी चाहिए?
जवाब : यदि माता-पिता के दांत टेढ़े हैं, तो फिर दांतों को टेढ़ेे-मेढ़े होने से नहीं रोका जा सकता है लेकिन निकलने के बाद उपचार संभव है। अंगूठा चूसने की आदत, पेन व पेंसिल मुंह में रखने की आदत आदि कारणों के अलावा दूध के दांत टूटे बिना पक्के दांत निकलना शुरू हो जाएं तब भी बच्चे के दांत ढेढ़े-मेढ़े निकल सकते हैं। इसे रोका जा सकता है लेकिन 12 वर्ष की उम्र के बाद ब्रेसिज (फिक्स तार) विधि से दांतों को सीधा किया जा सकता है। यह उपचार 12 वर्ष के बाद किसी भी उम्र में हो सकता है लेकिन इसमें डेढ़ से दो वर्ष तक का समय लगता है।
सवाल : दांतों को चमकीला कैसे बनाया जा सकता है?
जवाब : दांतों का प्राकृतिक रंग बदला नहीं जा सकता लेकिन दंत चिकित्सा की कुछ तकनीकों से उन्हें दिखावटी चमकीला बनाया जा सकता है। हालांकि इससे नुकसान नहीं होता है लेकिन यह प्रक्रिया खर्चीली है। दांतों को चमकीला बनाने के लिए विनिरिंग और पॉलिसिंग देश में प्रचलित है जबकि तीसरी विधि ब्लीचिंग का यहां प्रचलन नहीं है।
सवाल : कई बार ठंडा पानी पीते समय या खाना खाते समय वह दांतों को लगता है, क्या यह बीमारी है?
सवाल : दांतों को ठंडा पानी या खाना लगना कई कारणों से होता है। दांतों की सामान्य बीमारी पायरिया के अलावा घिसे हुए दांत, कीड़े लगे हुए दांत में भी ऐसा होता है। ऐसा होने पर तुरंत चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।
सवाल : दांतों की प्रमुख बीमारियां कौन-कौन सी है, उनसे कैसे बचा जा सकता है?
जवाब : दांतों की मुख्य बीमारी पायरिया व कीड़ा लगना है। दोनों का मुख्य कारण सही तरीके से और प्रतिदिन पेस्ट न करना है। पायरिया का उपचार स्केलिंग के अलावा हर छह माह में चिकित्सक से दांतों की जांच कराना है। कीड़े लगने का उपचार फीलिंग है लेकिन बिगडऩे पर आरसीडी (रेंट कनाल ट्रीटमेंट) है, जिसमें नसों की सफाई कर फीलिंग की जाती है। यदि उपचार न कराया जाए तो दांत गल कर गिर जाते हैं।
सवाल : नकली दांत कितने प्रकार के हैं? कौन से सही हैं।
जवाब : नकली दांत तीन तरीके से लगाए जा सके हैं। आरपीडी (रिमूवल पार्सल डेंचर) उतारने व चढ़ाने वाले दांत होते हैं। इसी प्रकार फिक्स दांत होते हैं, जो गोल्ड, व्हाइट मेटल व सिरेमिक के होते हैं, को बार-बार उतारना नहीं पड़ता। फिक्स इंप्लांट से भी नकली दांत लगवाए जा सकते हैं, जो काफी महंगे हैं और हर किसी को लगाया भी नहीं जा सकता।
सवाल : दांतों को लंबे समय तक स्वस्थ व सुंदर बनाए रखने के लिए क्या करना चाहिए?
जवाब : इसके लिए सुबह व शाम सही तरीके से पेस्ट करना चाहिए और हर छह माह बाद दंत चिकित्सक से अपने दांतों व मसूड़ों की जांच करानी चाहिए। ब्रुश से पेस्ट करने का सही तरीका दांतों को ऊपर से नीचे साफ करना है न कि सीधे दांतों को घिसना। इसके अलावा दांतों में प्रतिदिन फ्लोशिंग (विशेष तरीके के धागे से दांतों को अंदर से साफ करना) व जीभ साफ भी करनी चाहिए। माउथ फ्रेशनर कर प्रयोग चिकित्सक की सलाह पर ही करें, ज्यादा प्रयोग से नुकसान हो सकता है।
सवाल : किन परिस्थितियों में दंत चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए?
जवाब : यदि मुंह से बदबू आए, कीड़ा लग जाए, दांत टेढ़ा-मेढ़ा हो जाए, दांतों पर ठंडा पानी चुभे या दांतों से खून आने लगे तो चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।
नियमित सैर बचाता हृदय रोगों से
रवींद्रा अस्पताल के हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. रवींद्र गुप्ता से बातचीत
सवाल : स्वस्थ आदमी को हृदय रोग से बचने के लिए क्या करना चाहिए?
जवाब : हृदय रोग को बढ़ावा देने वाली बीमारियों का उपचार कराएं और स्मोकिंग, तंबाकू से बचे तथा वजन को कंट्रोल में रखें। नियमित सैर करें और वसा रहित खाना खाएं।
सवाल : हार्ट फेल और हार्ट अटैक क्या एक ही है?
जवाब : जी नहीं, यह दोनों अलग-अलग हैं। हार्ट अटैक कॉर्नरी आर्टरी के रुकने से दिल को हुए नुकसान को कहते हैं। हार्ट फेल हृदय की मांसपेशियों के फैलाव और सिकुडऩ की वजह से पंपिंग क्रिया के कम होने से पूरे शरीर में खून की सप्लाई के कम होने के कारण होता है। हार्ट फेल का एक कारण हार्ट अटैक है।
सवाल : हार्ट फेल का कारण क्या है, इससे कैसे बचा जा सकता है?
जवाब : दरअसल हार्ट फेल कई बीमारियों का एक समूह है, जिसमें कॉर्नरी आर्टरी डिजीज, उच्च रक्तचाप, शुगर, वॉल्व की खराबी व कोलेस्ट्राल आदि प्रमुख है। इन्हीं बीमारियों के उपचार से हार्ट फेल से बचा जा सकता है।
सवाल : विभिन्न बीमारियां हार्ट को कैसे फेल कर देती हंै, इसमें सबसे मुख्य बीमारी क्या है?
जवाब : हार्ट को फेल करने वाली मुख्य बीमारी कॉर्नरी आर्टरी डिजीज है। इसमें आर्टरी ब्लॉक हो जाती है और हार्ट में खून नहीं पहुंच पाता जिससे हार्ट की पंपिंग क्रिया कम हो जाती है और फिर हार्ट फेल हो जाता है। इसके अलावा उच्च रक्तचाप में दिल को दबाव के साथ शरीर में खून भेजना पड़ता है और लगातार ऐसा होने से हार्ट की मसल कमजोर होकर इसके फेल होने का कारण बनती है। इसी प्रकार शुगर हार्ट की मसल को सीधे तौर पर कमजोर करती है। वाल्व की खराबी से भी खून के अनुचित प्रवाह से हार्ट की मसल कमजोर हो जाती है।
सवाल : हार्ट की बीमारी का एक कारण कोलेस्ट्राल क्या हार्ट के लिए अच्छा भी रहता है?
जवाब : जी हां, हार्ट की बीमारी के लिए कोलेस्ट्राल अच्छा भी रहता है लेकिन यह सिर्फ एचडीएल ही है जिसकी मात्रा 40 से ज्यादा होगी तो वह हृदय की बीमारियों से बचाव करेगी। इसके अलावा बेड कोलेस्ट्राल की श्रेणी में आने वाले एलडीएल सामान्य लोगों में 130 से ज्यादा व हृदय रोगियों में 100 से ज्यादा खतरनाक है, टोटल कोलेस्ट्राल सामान्य लोगों में 230 और हृदय रोगियों में 200 से ज्यादा खतरनाक है तो ट्राइग्लीश्राइड 150 से ज्यादा खतरनाक है।
सवाल : किन लोगों को हृदय की बीमारियों के प्रति सचेत रहकर चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए?
जवाब : हृदय रोगियों के अलावा जिन व्यक्तियों की उम्र 50 से और महिलाओं की उम्र 55 से ज्यादा हो, उन्हें हृदय रोग विशेषज्ञ से नियमित जांच करानी चाहिए। इसके अलावा शुगर, ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्राल, मोटापा के रोगी और परिवार में यदि यह रोग हो तो इसके प्रति सचेत रहकर चिकित्सक से नियमित जांच करानी चाहिए।
सवाल : ईसीजी नार्मल आए तो क्या संतुष्टï हो जाना चाहिए?
जवाब : कॉर्नरी आर्टरी में खून के रुकने से छाती में हुए दर्द के समय ही ईसीजी निगेटिव आती है, सामान्य परिस्थितियों में इसका पता नहीं लगता। यदि ईसीजी सामान्य हो तो संतुष्टï होना गलत है। संतुष्टिï के लिए स्ट्रेस टेस्ट (टीएमटी और इको आदि) कराया जा सकता है और आजकल सीटी स्कैन की तर्ज पर सीटीएनजीओ टेस्ट भी आ गया है। इस सबके बावजूद शत प्रतिशत गारंटी एंजियोग्राफी से ही मिलती है।
सवाल : हृदय रोगियों को क्या खाना चाहिए और क्या नहीं?
जवाब : हृदय रोगियों को परहेज का सख्ती से पालन करना चाहिए। इसके अलावा सेचुरेटिड फैट (देसी घी में सबसे ज्यादा होता है), घी व तेल से बचना चाहिए। रोगियों को रोटी के साथ हरी सब्जी, दाल व फल आदि का सेवन करना चाहिए।
सवाल : हृदय रोगियों के लिए एल्कोहल फायदेमंद है या नहीं?
जवाब : भारत के पर्यावरण में एल्कोहल से हृदय रोगियों को कोई फायदा नहीं होता बल्कि एल्कोहल के कारण दिल डैमेज हो जाता है। वैसे प्रतिदिन 30 से 45 एमएल तक एल्कोहल से ज्यादा नुकसान नहीं होता लेकिन ज्यादा पीना मौत को आमंत्रण देना है।
सवाल : महिलाओं को इस रोग से बचने के लिए क्या करना चाहिए?
जवाब : जिस उम्र तक महिलाओं में मासिक धर्म आता है (मीनोपॉज), तब तक हृदय रोग का 80 प्रतिशत खतरा नहीं रहता लेकिन बाद में मोटापे के कारण महिलाओं में सबसे ज्यादा हृदय रोग होता है। इसलिए उनको अपना वजन बढऩे नहीं देना चाहिए, अन्य कारणों से भी बचना जरूरी है।
सवाल : क्या योग से हृदय रोगों का उपचार हो सकता है?
जवाब : योग हृदय रोग का उपचार नहीं है बल्कि नियमित योग से मरीज को फायदा जरूर मिलता है।
सवाल : हार्ट अटैक होने पर बचाव के लिए क्या करना चाहिए?
जवाब : हार्ट अटैक होने पर डिस्प्रीन 300 एमजी की टेबलेट घर पर ही दी जा सकती है। इसके बाद जल्दी से जल्दी नजदीकी हृदय रोग विशेषज्ञ के पास रोगी को ले जाना चाहिए।
सवाल : एंजियोग्राफी और एंजियोप्लास्टी में क्या फर्क है?
जवाब : एंजियोग्राफी एक टेस्ट है और एंजियोप्लास्टी उपचार है। नसों में रुकावट को देखने का टेस्ट ही एंजियोग्राफी है और इसे हार्ट अटैक के हर रोगी को कराना चाहिए ताकि सही स्थिति का पता लग सके। इसके बाद एंजियोप्लास्टि या बाइपास सर्जरी से उपचार किया जा सकता है।
सवाल : क्या बाइपास सर्जरी के स्थान पर एंजियोप्लास्टी से काम चल सकता है?
जवाब : एंजियोप्लास्टी से सिर्फ एक-दो नसों की सीमित रुकावट को खोला जा सकता है लेकिन यदि तीनों नसें काफी जगह से ब्लाक हों तो बाईपास सर्जरी ही अंतिम उपचार होता है।

सामान्य अस्पताल की प्रधान चिकित्सा अधिकारी एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. हिमानी कंसल से बातचीत
सवाल : गर्भावस्था के दौरान किन-किन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए?
जवाब : गर्भावस्था बीमारी नहीं बल्कि शारीरिक प्रक्रिया है लेकिन इसमें विशेष ध्यान रखना जरूरी है। इसमें सामान्य दिनचर्या में कोई फर्क नहीं आना चाहिए और घर का काम पहले की भांति, जितना हो सके करते रहना चाहिए। इस दौरान कम से कम तीन गिलास दूध, मूंगफली, गुड़, हरी सब्जियां, अनार व काले चने का पानी पीना चाहिए। इससे शरीर में खून की कमी नहीं रहती।
सवाल : प्रसव के बाद क्या परहेज करना चाहिए?
जवाब : सामान्य प्रसव के 15 दिन बाद सामान्य रूप से काम किया जा सकता है लेकिन सिजेरियन केस में एक माह का आराम जरूरी है। प्रसव के बाद पति-पत्नी को कम से कम 45 दिन का परहेज रखना चाहिए। इस दौरान मां पहले दिन से ही अपने बच्चे का सारा काम कर सकती है और सिजेरियन में भी एक घंटे स्तनपान कराया जा सकता है। इस दौरान बच्चे को शहद व घुट्टी आदि नहीं देनी चाहिए।
सवाल : डिलीवरी के समय दर्द कम करने के लिए गाय व भैंस के गोबर व मूत्र आदि के कुछ देशी उपचार बताए जाते हैं, इनसे क्या कोई फायदा होता है?
जवाब : इन देशी उपचारों से फायदा होने की बजाय इंफेक्शन का खतरा रहता है, इसलिए इनसे जितना हो सके, बचा जाए।
सवाल : दूध पिलाते समय मां को किस अवस्था में बैठना चाहिए?
जवाब : बच्चे को लेटे हुए दूध पिलाने के बजाय बैठकर दूध पिलाएं और बच्चे का सिर ऊंचा रखें।
सवाल : एक बार सिजेरियन से डिलीवरी हो जाए तो क्या दूसरी बार भी यह जरूरी होता है और टांकों में दर्द क्यों होता है?
जवाब : एक बार सिजेरियन ये डिलीवरी हो जाए तो दूसरी बार इसका चांस रहता है लेकिन यह जरूरी नहीं है कि दूसरी बार भी डिलीवरी सिजेरियर से ही होगी। टांकों में दर्द कभी नहीं होता, यह सिर्फ मानसिक अवधारणा है। असलियत में दर्द का कारण कुछ और होता है, जिसका भी उपचार संभव है।
सवाल : सिजेरियन आजकल फैशन बन चुका है, क्या बिना जरूरत के सिजेरियन करवाना सही है?
जवाब : जीं हां, यह बात बिल्कुल सही है कि सिजेरियन आजकल फैशन बनता जा रहा है। इसकी जरूरत के बिना महिला व उसके परिजनों के आग्रह पर सिजेरियन करना गलत है। हालांकि सिजेरियन की आजकल इतनी तकनीक आ गई है कि न तो टांकों का दर्द रहता है और न ही उनके कोई निशान रहते हैं, फिर भी सामान्य डिलीवरी ही बेहतर होती है।
सवाल : सिजेरियन डिलीवरी से क्या मोटापे की समस्या आती है, यह अवधारणा कितनी सही है।
जवाब : सिजेरियन ऑपरेशन और मोटापा का कोई संबंध नहीं है। मोटापा दरअसल हारमोनल गड़बड़ी के कारण आता है, डिलीवरी से इसका कोई लेना-देना नहीं है।
सवाल : प्रसूति के बाद महिला के चेहरे पर धब्बे बन जाते हैं, क्या इसका उपचार संभव है?
जवाब : प्रसूति का चेहरे पर बनने वाले धब्बों से संबंध है, लेकिन इसमें हरमोनल गड़बड़ी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसका उपचार चर्म रोग विशेषज्ञ के पास उपलब्ध है।
सवाल : अनियमित मासिक धर्म क्या है और इसके क्या खतरे हैं, क्या उपचार संभव है?
जवाब : यदि मासिक धर्म 28 से 30 दिन के बाद आए और तीन-चार दिन तक रहे तो यह सामान्य है। इससे पहले और बाद में आने वाली महावारी अनियमित कही जाएगी। इसका संबंध भी हारमोनल गड़बड़ी से है। इसका उपचार न करवाने पर रसौली और फिर कैंसर तक हो सकता है। इसका उपचार संभव है और गड़बड़ी होते ही उपचार करवाना ठीक रहता है।
सवाल : मां बनने की सही उम्र क्या है, पहले और बाद में क्या परेशानी होती है?
जवाब : मां बनने की सही उम्र 20 से 30 वर्ष की है। 20 वर्ष से पहले यदि कोई लड़की मां बनती है तो सिजेरियन की संभावना ज्यादा रहती और मां व बच्चे दोनों को खतरा रहता है इसी प्रकार 30 वर्ष की उम्र के बाद बच्चे में जन्मजात बीमारियों का खतरा रहता है।
सवाल : गर्भावस्था के दौरान महिला में खून की कमी क्यों होती है, कितना होना चाहिए, कैसे पूर्ति की जा सकती है?
जवाब : दरअसल मध्यम वर्ग से लेकर उच्च वर्ग में आज भी लड़कों और लड़कियों में भेदभाव है और लड़कियों की खुराक पर भी कोई ध्यान नहीं दिया जाता है। खून की कमी गर्भावस्था के दौरान तो होती ही है, सामान्य तौर पर भी होती है। इसके अलावा पेट में कीड़े भी इसका कारण है। गर्भावस्था के दौरान खाने में ध्यान जरूरी है। यदि खून 10 ग्राम से कम हो तो महिला को तीन माह बाद नौ माह तक 200 आयरन की गोलियां ले लेनी चाहिए और सामान्य हो तो भी 100 गोलियां लेनी जरूरी है।
सवाल : बाजारों में प्रचलित प्रेगनेंसी टेस्ट कीट कितनी भरोसेमंद है, किस पर विश्वास किया जाए?
जवाब : प्रेगनेंसी टेस्ट कीट 70 प्रतिशत ही भरोसेमंद हैं। अल्ट्रासाउंड से ही इसका सही पता लग पाता है। अब तो 40 दिन के बच्चे के दिल में भी धड़कन भी अल्ट्रासाउंड से सुनी जा सकती है।
सवाल : प्रेगनेंसी पाजीटिव का पता चलने पर क्या सावधानियां बरतनी चाहिए।
जवाब : तुरंत स्त्री रोग विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए और तीन माह तक आयरन की गोलियां बिल्कुल मत दें। इस दौरान फोलिक एसिड की गोलियां दी जाती है, जिससे बच्चे में जन्मजात बीमारियों का खतरा कम हो जाता है।
सवाल : पहले तीन माह उल्टियां काफी आती है और खाना शरीर को लगता नहीं, ऐसा क्यों होता है और क्या करना चाहिए?
जवाब : दरअसल बच्चे को जो खाना चाहिए वह मां के शरीर से ब्लड शुगर के रूप में ले लेता है। रात को सोने के बाद सुबह जब गर्भवती महिला उठती है तो उसके पेट में कुछ नहीं होता, जिसके कारण ही उल्टियां आती है। इससे बचने के लिए सुबह उठते ही मिठी चीज खानी चाहिए। इससे उल्टियों से भी बचा जा सकता है और ब्लड शुगर की कमी भी दूर हो जाती है।
सवाल : किन परिस्थितियों में गर्भवती महिला को खतरा रहता है?
जवाब : प्रसव के समय यदि उच्च रक्तचाप, खून का बहना, दौरे पडऩा, अत्यधिक उल्टी आना व शरीर में सूजन आए तो यह सब खतरे के निशान है। तुरंत चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए। घर पर सामान्य परिस्थितियों में भी डिलीवरी नहीं करवानी चाहिए, क्योंकि सरकार ने आज इस बारे में हर वर्ग को सुविधा दी हुई है। गरीबों की न सिर्फ मुफ्त में डिलीवरी होती है बल्कि उन्हें प्रोत्साहन राशि भी दी जाती है।

मंगलम लैब के संचालक पैथोलोजिस्ट डॉ. जीआर गुप्ता से रक्त जांच के बारे में बरती जाने वाले सावधानियों पर बातचीत
सवाल : रक्त की जांच करवाते समय क्या सावधानियां बरतनी चाहिएं?
जवाब : रक्त जांच पैथोलोजिस्ट द्वारा संचालित की जाने वाली लैब में ही करवाएं। इसके अलावा यह भी ध्यान रखें कि प्रयोगशाला संचालक अपनी लैब का एक्सटर्नल और इंटर्नल क्वालिटी को कैसे कंट्रोल करता है। रक्त जांच प्रयोगशाला का संचालन पैथोलोजिस्ट ही कर सकते हैं लेकिन शहर में डिप्लोमा इन मेडिकल लेबोरेट्री टेक्नीशियन (डीएमएलटी) व प्रयोगशाला में कुछ अनुभव प्राप्त कर चुके तकनीशियन भी प्रयोगशालाओं का संचालन कर रहे हैं। ऐसी लेबोरेट्री की रिपोर्ट विश्वास के लायक नहीं होती।
सवाल : साधारण पैथोलोजी लैब में जांच कराना कितना खतरनाक है?
जवाब : साधारण पैथोलोजी लैब में रक्त की जांच कराना जानलेवा भी साबित हो सकता है क्योंकि जांच रिपोर्ट असलियत में चिकित्सक का उपचार के लिए मार्गदर्शन करती है। यदि मार्गदर्शन ही गलत हो जाएगा तो उपचार सही ढंग से नहीं हो पाएगा। कानूनन पैथोलोजिस्ट के अलावा अन्य कोई तकनीशियन रक्त जांच की रिपोर्ट साइन नहीं कर सकता।
सवाल : जांच से पहले क्या खाएं और क्या न खाएं?
जवाब : रक्त जांच की रिपोर्ट खाली पेट सेंपल देने में सही आती है। खून में कोलेस्ट्राल, लिक्विड, शुगर, ईएसआर की जांच खाली पेट कराना बाध्यता भी है। कुछ खाने के बाद दिए गए रक्त नमूनों की जांच रिपोर्ट में फर्क आ जाता है, इसलिए खाली पेट जांच कराना अच्छा है।
सवाल : ब्लड ग्रुप की जांच कराना क्यों और कितना जरूरी है?
जवाब : ब्लड ग्रुप की जांच बेहद जरूरी है क्योंकि आपात स्थिति में इसके बिना कुछ भी नहीं किया जा सकता। निगेटिव ब्लड ग्रुप कम मिलता है, ऐसी स्थिति में यदि ब्लड ग्रुप का पता हो तो रक्त का इंतजाम सही समय पर हो जाता है। सरकार ने भी इसे जरूरी कर दिया है। लाइसेंस, पासपोर्ट आदि के हर फार्म में इसका बाकायदा कॉलम भी बनाया गया है।
सवाल : कैंसर रोग का अक्सर देरी से पता लगता है, जल्दी पता कराने के लिए क्या करना चाहिए?
जवाब : अक्सर लापरवाही के कारण जांच के अभाव में ही कैंसर का देरी से पता लगता है जो बाद में जानलेवा स्टेज पर होती है। इसका जल्दी पता लगाने के लिए इन दिनों फाइन निडल एस्पिरेशन सिटोलोग (एफएनएसी) टेस्ट प्रचलित है, जो सस्ता होने के साथ दो घंटे में परिणाम भी दे देती है। यदि शरीर के किसी जगह पर गांठ या रसोली हो तो यह टेस्ट करवा लेना चाहिए। इसकी जांच सिर्फ गांठ या रसोली में सूई चुभो कर की जाती है। पहले इसकी जांच के लिए गांठ या रसौली से टुकड़ा काटना पड़ता था और रिपोर्ट भी एक सप्ताह के बाद आती थी।
सवाल : स्वास्थ्य का पता करने के लिए सामान्यत: कौन से टेस्ट बिना चिकित्सक की सलाह पर ही करवा लेना चाहिए?
जवाब : बच्चों और महिलाओं को कम से कम साल में एक बार एचबी टेस्ट जरूर करवा लेना चाहिए और शुगर के मरीजों को हर माह शुगर की जांच करानी चाहिए। 45 वर्ष की उम्र के बाद हर व्यक्ति को साल में एक बार एचबी, ब्लड शुगर, ब्लड यूरिया, एसजीपीटी (लीवर) और लिपिट प्रोफाइल (खून में चर्बी की मात्रा) का टेस्ट करवा लेना चाहिए।
सवाल : शादी से पहले लड़का-लड़की को कौन सी जांच करानी चाहिए?
जवाब : शादी से पहले एचआईवी की जांच करवा लें तो बेहतर होता है क्योंकि एड्स सिर्फ असुरक्षित यौन संबंधों के कारण ही नहीं बल्कि अन्य कारणों से भी होता है। लड़का-लड़की दोनों थैलीसीमिया से पीडि़त हों तो उनकी संतान शत-प्रतिशत थैलीसीमिया से पीडि़त होगी। पति-पत्नी में एक को यह बीमारी हो तो बच्चे में यह बीमारी आने की 25 प्रतिशत संभावना रहती है। पति-पत्नी में यदि किसी एक का ब्लड निगेटिव हो तो बच्चों में कई बीमारियां आने की संभावना हो सकती हैं लेकिन इसे गर्भावस्था के दौरान कुछ इंजेक्शन से कम किया जा सकता है।
सवाल : क्या चिकित्सक जिससे कहे उसी से रक्त की जांच करानी जरूरी है?
जवाब : चिकित्सक को सिर्फ जांच रिपोर्ट से मतलब होता है। जांच वहीं करानी चाहिए जहां पर सभी प्रकार की सुविधाएं हों और प्रशिक्षित स्टाफ हो।
सवाल : बड़े शहरों की लैब से टेस्ट कराना कितना ठीक है?
जवाब : बड़े शहरों में अच्छी प्रयोगशाला में जाकर रक्त के नमूने देकर टेस्ट कराना ठीक है लेकिन यहां से रक्त के नमूने भेजकर टेस्ट कराना ठीक नहीं है। ट्रांसपोर्टेशन व तापमान के अन्य कारणों के चलते कई बार रक्त नमूने खराब हो जाते हैं और फिर उनकी रिपोर्ट ठीक नहीं आ पाती।

सेवक सभा अस्पताल के फिजीशियन डॉ. महेश दत्त छाबड़ा से बातचीत
सवाल : हीट स्ट्रोक क्यों होता है और इससे कैसे बचा जा सकता है?
जवाब : वैसे तो गर्मियों में साधारण बुखार भी बिगडऩे पर हीट स्ट्रोक का रूप ले लेता है लेकिन करीब 46 डिग्री सेल्सियस (115 डिग्री फारनेट) या इससे ऊपर के तापमान में कई घंटे काम करने पर लू लग जाती है। इस दौरान प्रति घंटा करीब आधा लीटर पानी पसीने में निकल जाता है। जब खून में पानी की मात्रा कम हो जाती है तो पसीना निकलना बंद हो जाता है और फिर शरीर का तापमान बढ़ जाता है। इसके बाद सिर में दर्द होने के अलावा चक्कर आना, कनफ्यूज होना, अद्र्धमूर्छित व पूर्ण मूर्छित होना, बेचैन रहना जैसे लक्षण दिखाई देते हैं और चेहरा लाल तथा त्वचा खुश्क हो जाती है। आंखें भी लाल तथा श्वास की गति तेज हो जाती है। पल्स 125 से 130 प्रति मिनट हो जाती है जो सामान्यत: 72 होती है और मुंह का तापमान 106 डिग्री फारनेट हो जाता है। इससे बचने के लिए शुरुआत में ही बचाव करना पड़ता है।
सवाल : लू लगना और हीट स्ट्रोक में क्या अंतर है?
जवाब : दरअसल अत्यधिक तापमान में लापरवाही बरतने पर लू लग जाती है। जब इसका उपचार नहीं कराया जाता तो हाइपर पाइरेक्सिरिया हो जाता है और जब इसका उपचार नहीं कराया जाता तो हीट स्ट्रोक की स्थिति आती है। हीट स्ट्रोक में गर्मी दिमाग पर अपना असर दिखाना शुरू कर देती है और मामला बिगडऩे पर मौत भी हो सकती है।
सवाल : हीट स्ट्रोक का घर पर क्या उपचार करना चाहिए?
जवाब : वैसे मरीज को तुरंत चिकित्सक के पास ले जाना चाहिए लेकिन जब तक कोई व्यवस्था नहीं होती तब तक घर पर कुछ उपचार किया जा सकता है। मरीज को टब में बिठाकर पानी का कपड़ा लेकर मलना शुरू करें और कपड़े निकालकर पानी से स्पंजिंग करते रहेें व पंखा चला दें। इस दौरान मरीज को पानी भी पिलाते रहें।
सवाल : लू लगने व हीट स्ट्रोक के अलावा गर्मियों में कौन-कौन सी जानलेवा बीमारियां हो सकती है?
जवाब : इनके अलावा गर्मियों में पानी व भोजन जनित काफी बीमारियां हो सकती हैं। दरअसल गर्मियों का मौसम रोग जनित कीटाणुओं के अनुकूल होता है और वह आसानी से खाने-पीने की चीजों के साथ फैल जाते हैं। इससे टाइफाइड, पीलिया, मलेरिया, दिमाग बुखार आदि बीमारियां हो सकती हैं, जिनमें जान भी जा सकती हैं।
सवाल : इन जानलेवा बीमारियों से कैसे बचा जा सकता है?
जवाब : इन जानलेवा बीमारियों से बचने के लिए सबसे पहले पानी को उबालकर या फिल्टर करके ही पीना चाहिए। इसके अलावा बाजार में खाने-पीने की कोई वस्तु न खाएं और घर पर इन वस्तुओं को ढंककर व उचित तापमान पर रखें। इसके अलावा कूलर की नियमित सफाई करें और घर के बाहर गंदगी नहीं होने दें ताकि मच्छर न पनप सकें। लू से बचने के लिए दोपहर 12 बजे से 5 बजे तक हो सके तो घर या कार्यालय में रहे। यदि निकलना पड़े तो नींबू पानी या जूस वगैरह पीकर जाए और सिर पर सूती कपड़ा लगाएं। बुखार होने पर तुरंत उपचार कराएं।
सवाल : कुछ लोग गर्मी से बचने के लिए बीयर पीते हैं, क्या इसका फायदा है?
जवाब : बीयर और शराब दोनों में ही एल्कोहल होता है और अत्यधिक गर्मी व अत्यधिक सर्दी में इनका प्रयोग बिल्कुल नहीं करना चाहिए। दरअसल इनके सेवन से शरीर में तापमान नियंत्रण की क्षमता कम हो जाती है और वातावरण के तापमान के अनुसार शरीर का तापमान चढ़ता व गिरता रहता है। ऐसी अवस्था में बीमारियां जल्दी लगती हैं।
सवाल : सर्दियों में होने वाले खांसी व जुकाम इन दिनों क्यों होते हैं?
जवाब : इन दिनों खांसी व जुकाम सर्दियों से ज्यादा होता है। कूलर व एसी से निकलकर जब धूप में जाते हैं और धूप से फिर सीधे कूलर व ऐसी कमरे में आते हैं और पसीने में बर्फ का ठंडा पानी पी लेते हैं तो यह बीमारियां लग जाती हैं। इससे बचने के लिए बाहर से आते ही पहले आराम करें और शरीर का तापमान ठीक होने पर पानी पीएं।
सवाल : हर्ट फेलियर रोगियों के लिए क्या इस मौसम में डाइयूरेटिक दवाओं में बदलाव करना चाहिए?
जवाब : इस मौसम में इन रोगियों की डाइयूरेटिक दवाओं में बदलाव जरूरी है, अन्यथा डी हाईडे्रेशन और फिर लू लगने जैसी समस्या भी आ सकती है। दरअसल डाइयूरेटिक दवाओं से पेशाब ज्यादा आता है और गर्मियों में शरीर का पानी पसीने से काफी निकल जाता है। ऐसी स्थिति में यदि इन दवाओं की मात्रा कम नहीं करेंगे तो शरीर में पानी की कमी आ जाती है, जिसके कारण अन्य रोग होने की संभावना बढ़ जाती है। इस मौसम में चिकित्सक से सलाह लेकर ही डाइयूरेटिक दवाओं की मात्रा लें।
सवाल : मधुमेह रोगियों को इस मौसम में क्या सावधानी बरतनी चाहिए?
जवाब : मधुमेह रोगियों को इस मौसम में खाने पीने पर कंट्रोल रखना चाहिए। अक्सर देखा गया है कि आम इस मौसम में सब खाते हैं लेकिन यह मधुमेह के रोगियों के लिए ठीक नहीं है।
सवाल : दमा रोगियों को इस मौसम में क्या सावधानी बरतनी चाहिए?
जवाब : इस मौसम में धूल भरी आंधी चलती है जो दमा रोगियों के लिए ठीक नहीं। ऐसी स्थिति में दमा रोगियों को घर से बाहर निकलते समय मुंह पर कपड़ा बांधकर निकलना चाहिए और जितना हो सके घर के अंदर ही रहना चाहिए।

डॉ. दिनेश पाहवा सर्जन बालाजी अस्पताल
सवाल : ऑपरेशन का नाम सुनते ही घबराहट होती है, आखिर यह विधि है क्या?
जवाब : शल्य चिकित्सा से घबराने की या डरने की आवश्यकता नहीं है। यह प्रक्रिया एक उपचार विधि है जिससे रोगी को रोगमुक्त किया जाता है। इससे शरीर को किसी प्रकार की हानि नहीं होती है।
सवाल : ऑपरेशन के समय अक्सर लोग उत्तेजित हो जाते हैं, क्या करना चाहिए और इसके लिए क्या तैयारियां करें?
जवाब : आपातकालीन अवस्था में जब भी ऑपरेशन के लिए अस्पताल जाएं, अपना संयम बनाए रखें। अपने शल्य चिकित्सक पर भरोसा रखें, क्योंकि उस अवस्था में वही आपकी सहायता कर सकता है। आपातकालीन अवस्था में चार से सात लोगों को रक्तदान के लिए तैयार रखें।
सवाल : दूरबीन पद्धति से ऑपरेशन का प्रचलन बढ़ा है, इसका क्या दायरा है और क्या फायदे हैं।
जवाब : आजकल कई प्रकार की शल्य चिकित्सा विधियां उपलब्ध है, जिनमें से दूरबीन पद्धति से ऑपरेशन अधिक प्रचलित है। परंतु ऐसा नहीं है कि हर प्रकार का ऑपरेशन, हर परिस्थिति में दूरबीन से संभव है। इस पद्धति से ऑपरेशन में संक्रमण की संभावना कम होती है और रोगी जल्दी अपनी दिनचर्या पुन: अपना सकता है। जहां तक खर्च की बात है, अलग-अलग ऑपरेशन व ऑपरेशन के पश्चात मरीज की स्थिति मुख्य निर्णायक कारक होती है।
सवाल : बारिश के मौसम में संक्रमण ज्यादा होता, यह अवधारणा कितनी सही है?
जवाब : बारिश के मौसम का ऑपरेशन या संक्रमण, घाव भरने के समय से कोई सीधा संबंध नहीं है। यह एक अति प्रचलित भ्रांति है। उचित समय अंतराल पर सही एंटीबायोटिक (संक्रमण रोधी दवा) देने पर किसी भी प्रकार के मौसम में संक्रमण की संभावना नगण्य होती है।
सवाल : ऑपरेशन के बाद रोगी दूध पीने से परहेज करता है, यह अवधारणा कितनी सही है?
जवाब : ऑपरेशन के बाद मरीज के खानपान में प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइट्रेट की मात्रा संतुलित होनी चाहिए परंतु अक्सर रोगी दूध पीने से गुरेज करता है। यह भी एक नितांत गलत तथ्य है कि दूध पीने से मवाद बनता है। रोगी को दूध व दही से बने पदार्थ अधिक मात्रा में लेने चाहिए ताकि शरीर की प्रोटीन व कैल्शियम की जरूरत पूरी हो सके। भोजन में फाइबर डाइट लें ताकि कब्ज न हो। इसके लिए हरी सब्जी, सलाद, पपीता, केला व चोकर सहित आटा लिया जा सकता है।
सवाल : ऑपरेशन के बाद मरीज को क्या परहेज रखना चाहिए?
जवाब : रोगी को पेट के किसी भी बड़े या छोटे ऑपरेशन के बाद उचित आराम की सलाह दी जाती है ताकि घाव जल्दी भरे व घाव कमजोर न रहे। रोगी को भारी वस्तु को उठाने, धकेलने, खींचने से परहेज करना चाहिए और बिना डॉक्टर की सलाह के व्यायाम भी नहीं करना चाहिए।
सवाल : पथरी क्यों होती है, क्या ऑपरेशन ही इसका उपचार है?
जवाब : कैल्शियम में आम्सलेट, यूरिक एसिड और प्यूरीन में से किसी के मिलने से पथरी होती है और यह मुख्यत: यूरेटर (गुर्दे व पेशाब की थैली की बीच की नलिका) में होती है लेकिन पित्त की थैली और पेशाब की थैली में भी हो जाती है। 4 से 5 एमएम की पथरी दिक्कत नहीं देती लेकिन 8 से ज्यादा एमएम की पथरी तकलीफदेय हो जाती है। शुरुआत में दवाइयों से इसे काटकर पेशाब के रास्ते से निकाला जा सकता है लेकिन बड़ी होने पर ऑपरेशन ही कराना पड़ता है। इसके मरीजों को खाने पीने में भी विशेष सावधानी रखनी पड़ती है।
सवाल : गंभीर पेट रोग के मुख्य लक्षण क्या हैं?
जवाब : पेट का फूलना, पेशाब का रुकना, पेशाब में खून आना, पेट में तेज दर्द, उल्टियां या कब्ज का होना मुख्य लक्षण है, जिनके लिए हमें तुरंत शल्य चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए और परामर्श के बाद जांच व निदान कराना चाहिए। इस प्रकार मरीज गंभीर अवस्था में पहुंचने से पहले ही उचित व सस्ता इलाज करा सकता है।
सवाल : पेट दर्द की अवस्था में अक्सर पेट मालिश कराई जाती है, यह कितनी उचित है?
जवाब : दर्द की अवस्था में पेट की मालिश एक प्रचलित प्रक्रिया है, जो कि किसी भी छोटे से पेट दर्द को ऑपरेशन की जरूरत तक पहुंचा सकती है। इस प्रकार की मालिश कभी भी नहीं करनी चाहिए।
सवाल : आंतों के फटने का क्या कारण है और इसके क्या लक्षण है?
जवाब : आंतों का फटना कई कारणों से होता है, जिसमें प्रमुख हैं मेदे का अल्सर का फटना, टायफाइड के अल्सर का फटना, टीबी की वजह से आंत का फटना व दुर्घटना में पेट की चोट की वजह से आंतें फट आती हैं। यह एक गंभीर अवस्था है, जिसमें पेट का बिल्कुल कठोर हो जाना, उल्टियां लगना, पेट में तीव्र दर्द होना व मल और वायु का निकास बिल्कुल बंद हो जाना मुख्य लक्षण है। इस अवस्था में तुरंत आपातकालीन ऑपरेशन एक मात्र उपलब्ध रास्ता है। दूसरी तरफ दुर्घटना में अक्सर पेट में मुख्यत: लीवर स्पलीन (तिल्ली) व आंतें क्षतिग्रस्त होती हैं। आपातकालीन ऑपरेशन से मरीज की जान बचाई जा सकती है।
सवाल : बवासीर का उपचार कराने में क्या सावधानियां बरतनी चाहिए?
जवाब : बवासीर का इलाज कभी भी अप्रशिक्षित लोगों से नहीं कराना चाहिए। शुरुआती अवस्था का इलाज शल्य चिकित्सा व आयुर्वेद से संभव है लेकिन अत्यधिक रक्तस्राव व बवासीर का मल से बाहर आने की अवस्था में ऑपरेशन ही एक मात्र उपचार है।
सवाल : हर्निया क्या है और इसका क्या उपचार है?
जवाब : सामान्य भाषा में हर्निया पेट की दीवार की कमजोरी की वजह से पेट की आंतों के बाहर निकलने की अवस्था को कहते हैं। यह जन्मजात भी होता है व उम्र के किसी भी पड़ाव पर हो सकता है। पेशाब में रुकावट, कब्ज, अनियंत्रित व्यायाम, लंबी खांसी व संक्रमित घाव, हर्निया होने के मुख्य कारण हैं। ऑपरेशन एकमात्र उपचार है। लंगोट या विशेष बेल्ट जैसा यंत्र पहनना रोग को बढ़ाता है।

सर्वादय अस्पताल के न्यूरो सर्जन डॉ. उमेश कालड़ा से बातचीत
मौत का चौथा सबसे बड़ा कारण है ब्रेन स्ट्रोक
सवाल : लकवा और ब्रेन स्ट्रोक क्या है और यह कितना खतरनाक है?
जवाब : ब्रेन स्ट्रोक कितना खतरनाक है, इसका अंदाजा इससे ही लगाया जा सकता है कि विश्व में होने वाली अकाल मौत में दुर्घटना, हर्ट अटैक और कैंसर के बाद यह चौथा सबसे बड़ा कारण है। लकवे का एक कारण ब्रेन स्ट्रोक है जो हर्ट अटैक की तरह ही ब्रेन की धमनियों के बंद होने से ब्रेन स्ट्रोक होता है। इसके अलावा दिमाग की नस फटने से भी लकवा हो जाता है।
सवाल : लकवे की आरटीपीए दवा क्या है और इससे क्या फायदा है?
जवाब : लकवे की आरटीपीए दवा दरअसल देश में दो-ढाई साल पहले ही आई है और यह ब्रेन स्ट्रोक के मामले में कामयाब है। बे्रन स्ट्रोक के तीन घंटे के अंदर यदि मरीज को यह दवा दे दी जाए तो उसे पूरी तरह वापस किया जा सकता है। यदि यह दवा न मिले तो लकवे का बढऩा, आंतडिय़ों, पेट और दिमाग से ब्लडिंग होने जैसे दिक्कत शुरू हो जाती है। हिसार में ही इस दवा से अब तक 12 मरीजों का उपचार किया जा चुका है। इसके अलावा नस फटने की स्थिति में 20 से 30 प्रतिशत मरीजों को ऑपरेशन की जरूरत पड़ती है जबकि 50 प्रतिशत मरीजों का जान का खतरा रहता है।
सवाल : लकवा किस कारण होता है और इससे कैसे बचा जा सकता है?
जवाब : मानसिक तनाव, उच्च रक्तचाप, स्मोकिंग, मोटापा, खून में चर्बी का बढ़ जाना, बैठे-बैठे दिनचर्या पूरी करने जैसे कारणों से लकवा होता है। इन सबको नियंत्रित करके ही इससे बचा जा सकता है।
सवाल : ब्रेन ट्यूमर क्या है और इसका क्या उपचार है?
जवाब : दिमाग की रसौली को ब्रेन ट्यूमर कहते हैं जो दो तरह की होती है। कैंसर की रसौली और बिजाइन ट्यूमर। बिजाइन ट्यूमर को पूरा निकालना संभव है तथा यह एक बार निकालने के बाद फिर से नहीं होता। दूसरी तरफ कैंसर की रसौली को पूरी तरह नहीं निकाला जा सकता। इसके मरीजों को ऑपरेशन केबाद जिंदगीभर सेक और दवाइयों की जरूरत पड़ती है।
सवाल : क्या ब्रेन ट्यूमर का पहले पता लगाया जा सकता है, इसके क्या लक्षण है?
जवाब : वैसे ब्रेन ट्यूमर के कारणों का अभी तक पता नहीं चल पाया है लेकिन जिस व्यक्ति को ब्रेन ट्यूमर होता है उसके सिर में दर्द, नजर की कमजोरी, शरीर के किसी अंग का रूक जाना, चलने में परेशानी होना, सुनाई नहीं देना, नसों की कमजोरी है। इसके अलावा 20 से 30 प्रतिशत मरीजों में यह मिर्गी से प्रदर्शित होता है। ऐसी परेशानी होने पर जांच के बाद इसका पता लगाया जा सकता है।
सवाल : रीढ़ की हड्डी की रसौली और टीबी का कैसे पता चलता है?
जवाब : रीढ़ की हड्डी में रसौली होने पर हाथ व पांव में कंपन और कमजोरी का आना, मल व पेशाब का रूक जाना या इनका नियंत्रण खत्म हो जाता है। ऐसा होने पर सीटी स्कैन व एमआरआई के द्वारा ही इसका पता लगाया जा सकता है, जिसका ऑपरेशन के जरिए उपचार भी संभव है। इसके अलावा रीढ़ की हड्डी की टीबी के भी टीबी के अलावा उपरोक्त लक्षण है।
सवाल : डिस्क कैसे स्लीप हो जाती है और इसका उपचार क्या है?
जवाब : डिस्क स्लीप में रीढ़ की हड्डी में जब मणकों के बीच से डिस्क स्लीप होकर नसों के ऊपर आ जाती है। इसके बाद चलने में दर्द का अनुभव, लगातार दर्द होने के अलावा मल और पेशाब अनियंत्रित हो जाता है। जांच के बाद इसका ऑपरेशन संभव है।
सवाल : दिमाग की टीबी कैसे होती है और इसके क्या लक्षण है, कैसे पता लगाया जा सकता है?
जवाब : दिमाग की टीबी पानी में या गांठ बनकर होती है। 50 प्रतिशत मरीजों का उपचार दवाइयों से हो जाता है लेकिन 20 प्रतिशत मरीजों को ऑपरेशन की जरूरत होती है। दिमाग की टीबी में मरीज को मिर्गी के दौरे भी आ सकते हैं। इसके अलावा सिर दर्द, उल्टी होना, नजर का कमजोर होना, बेहोशी की तरफ जाना भी लक्षण है। सिर के पानी की जांच सीएसएफ टेस्ट से और सीटी स्कैन से इसका पता लगाया जा सकता है।
सवाल : सिर में लगी चोट को न्यूरो सर्जरी के हिसाब से कब गंभीर माना जाए?
जवाब : सिर में चोट लगने के बाद जब सिर दर्द हो, उल्टी आ जाए, चक्कर आए, धुंधला दिखाई दे, चलते समय संतुलन न बने, कान व नाक से खून आए तो इसे गंभीर मानना चाहिए। ऐसा होने पर शीघ्र चिकित्सक से संपर्क करके जांच करवानी चाहिए।
सवाल : क्या पियुष ग्रंथी का बिना खोपड़ी खोले ऑपरेशन संभव है?
जवाब : हां, पीयुष गं्रथी का बिना खोपड़ी खोले नाक के रास्ते माइक्रोस्कोप द्वारा ऑपरेशन संभव है। दरअसल पियुष ग्रंथी शरीर की सभी क्रियाओं को नियंत्रित करती है। मस्तिष्क में इसका प्रमुख स्थान है और कुल मस्तिष्क की दो प्रतिशत रसौली पियुष ग्रंथी से शुरू होती है। नाक के रास्ते माइक्रोस्कोप से मरीज को बिना चीरा लगाए ऑपरेशन कर दिया जाता है। ऑपरेशन के बाद पांच से सात दिन बाद मरीज को घर भी भेज दिया जाता है।

दिल के प्रति दिलदार बनो
सीएमसी अस्पताल में हर गुरुवार अपनी सेवाएं देने वाले दिल्ली के अपोलो अस्पताल के कार्डियोलाजी डॉ. रमन पुरी से बातचीत
सवाल : हार्ट अटैक कितने प्रकार का होता है और कौन सा खतरनाक है?
जवाब : हार्ट अटैक चार प्रकार के होते हैं और चारों ही खतरनाक हैं लेकिन कुछ अटैक ज्यादा खतरनाक हैं। कई बार सामान्य जांच के दौरान ईसीजी में हार्ट अटैक आ जाता है, जिसे साइलेंट अटैक कहते हैं क्योंकि मरीज को इसका पता नहीं होता। जब अचानक छाती में दर्द व श्वास फूलने व कमजोरी के लक्षण दिखाई दें तो इसमें एंजाइना की संभावना होती है जो ज्यादातर देखा जाता है। तीसरा हार्ट अटैक वह होता है जब दिल की नाडिय़ां शत-प्रतिशत ब्लॉक हो जाती है और हार्ट की मसल डेमेज हो जाती हैं और फिर अटैक हो जाता है। चौथे प्रकार के हार्ट अटैक में मरीज की 30 सेकंड में मौत हो जाती है। यह हार्ट की रिदम खराब होने से होता है।
सवाल : हार्ट अटैक की संभावना किन व्यक्तियों में ज्यादा होती है?
जवाब : जो व्यक्ति स्मोकिंग करते हैं या तंबाकू चबाते हैं उनमें इसकी सबसे ज्यादा संभावना होती है। इसके अलावा हाई ब्लड प्रेशर, हाई कोलेस्ट्राल, हाई शुगर, आरामदायक जिंदगी जीना, तनावपूर्ण जिंदगी, रोग का पारिवारिक इतिहास, मोटापा कारण हैं। महिलाओं में मेनपाज (मासिक धर्म रुकने की उम्र) से पहले इसकी संभावना कम होती है। इनमें से एक भी कारण हार्ट अटैक को आमंत्रण दे सकता है लेकिन ज्यादा कारण किसी व्यक्ति में देखे जाएं तो इसकी संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
सवाल : हार्ट अटैक के कारणों की जांच किस उम्र में करा लेनी चाहिए।
जवाब : कोलेस्ट्राल, शुगर, ब्लड प्रेशर आदि की जांच के लिए पहले 40 उम्र के बाद का सुझाव दिया जाता था लेकिन आजकल 18 वर्ष की उम्र के युवाओं में भी इसकी संभावना देखी गई है। इसलिए 20 साल की उम्र में कार्डियक जांच करा लेनी चाहिए। यदि एक बार क्लीन चिट मिल जाए तो फिर पांच वर्ष बाद दोबारा जांच करानी चाहिए।
सवाल : हृदय रोग में कोलेस्ट्राल का कितना रोल है?
जवाब : कोलेस्ट्राल का हृदय रोग में सबसे ज्यादा रोल है। यदि कोलेस्ट्राल को एक प्रतिशत कम कर लिया जाता है या एचडीएल कोलेस्ट्राल की एक प्रतिशत मात्रा बढ़ा ली जाती है तब हार्ट अटैक की संभावना दो प्रतिशत कम हो जाती है।
सवाल : हृदय रोग से बचने के लिए किस तरह की दिनचर्या अपनानी चाहिए?
जवाब : हृदय रोग से बचने के लिए फास्ट फूड से परहेज करना चाहिए और 40 वर्ष की उम्र के बाद देसी घी का इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए और दिन में सिर्फ तीन चम्मच से ज्यादा तेल का प्रयोग न करें। इसके अलावा नियमित व्यायाम करें जो प्रतिदिन 7 से 8 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से पांच किलोमीटर (40 से 50 मिनट में पांच किलोमीटर) टहलना ही बेहतर होता है। व्यायाम डॉक्टर की सलाह से ही करें क्योंकि कई बार इससे रोग बढ़ जाता है। सर्दियों में व्यायाम सुबह के समय करने के बजाय लंच से पहले धूप में करें तो बेहतर होगा, सुबह के समय नुकसान हो सकता है। खाना खाने के बाद व्यायाम नहीं करना चाहिए।
सवाल : हृदय रोग के लिए ईसीजी, इको और टीएमटी जांच अलग-अलग क्यों करवाई जाती है?
जवाब : किसी को हार्ट अटैक हुआ हो तो उसका ईसीजी से पता चलता है लेकिन कई बार छह माह पुराना हार्ट अटैक का पता नहीं चलता। इको जांच में इस बात का पता चलता है कि रोगी का हृदय डेमेज है या नहीं। यदि 90 प्रतिशत नाडिय़ां ब्लॉक हो तो भी इको नार्मल आ जाती है। इसी प्रकार टीएमटी (स्ट्रेस टेस्ट) की जांच में यह देखा जाता है कि जब व्यायाम के समय हृदय को आक्सीजन की जरूरत होती है तो खून की सप्लाई ठीक तरह से हो रही है या नहीं। टीएमटी में यदि ईसीजी नार्मल आ जाए तो हृदय रोग की संभावना कम होती है। इस प्रकार अलग-अलग बातों का पता करने के लिए अलग-अलग टेस्ट किए जाते हैं।
सवाल : हृदय रोग का एक और टेस्ट एंजियोग्राफी कितना खतरनाक है?
जवाब : एंजियोग्राफी के बारे में धारणा है कि यह जानलेवा है लेकिन यह गलत है। यह सिर्फ 10 मिनट की जांच है। इससे यह पता लग जाता है कि हृदय की नाडिय़ां ब्लॉक है या नहीं और कितना प्रतिशत ब्लॉक है। किसी व्यक्ति को चलने में तकलीफ होती है तो उसकी 70 प्रतिशत नाडिय़ां ब्लॉक मिलेंगी और इससे कम ब्लॉकेज में रोगी को चलने में भी तकलीफ नहीं होती जबकि ज्यादा ब्लॉकेज में बैठे-बैठे भी तकलीफ हो जाती है। इस जांच के बाद चिकित्सक इस नतीजे पर पहुंचता है कि रोगी को क्या उपचार दिया जाए।
सवाल : हार्ट अटैक होने पर घर पर क्या प्राथमिक उपचार दिया जा सकता है?
जवाब : हार्ट अटैक के बाद समय महत्वपूर्ण होता है क्योंकि अटैक के एक घंटे के बाद ही हृदय की मसल डेमेज होनी शुरू हो जाती है। अटैक होने पर घर पर रोगी को डिस्प्रीन 350एमजी की टेबलेट लेनी चाहिए, जिसका कोई साइड इफेक्ट नहीं है। इसके अलावा छाती में दर्द हो तो सोरबिट्रेट 5 एमजी की टेबलेट जीभ के नीचे रखकर लेट जाना चाहिए और तुरंत रोगी को नजदीकी अस्पताल में पहुंचाना चाहिए।
सवाल : हार्ट अटैक के क्या लक्षण है?
जवाब : हार्ट अटैक होने पर रोगी की छाती के बीच में दर्द, दबाव या भारीपन महसूस होता है जो बाद में बाएं हाथ या चेहरे की हड्डियों में भी आ सकता है। इसमें श्वास के साथ दर्द नहीं बढ़ता और इसका दर्द पांच से दस मिनट तक रहता है। हार्ट अटैक हृदय की आर्टरी के शत प्रतिशत ब्लॉकेज होने पर ही होता है। हार्ट अटैक के बाद पहले चार घंटे में हार्ट की चिकित्सीय उपचार के बाद रिदम को खराब होने से बचाया जा सकता है। हार्ट अटैक के बाद 65 से 70 प्रतिशत मरीजों की आर्टरी खून पतला करने की दवाओं से खोली जा सकती है। कई बार एंजियोप्लास्टी की जरूरत पड़ती है।
सवाल : एल्कोहल का हृदय रोगों में क्या रोल है?
जवाब : एल्कोहल और हृदय रोगों पर कोई ठोस स्टडी नहीं हुई है लेकिन माना जाता है कि एल्कोहल से हृदय रोग से बचाने वाला एचडीएल कोलेस्ट्राल बढ़ता है। इसकी सलाह चिकित्सक कभी भी नहीं देता लेकिन जो लोग इसका सेवन करते हैं उन्हें प्रतिदिन 50 एमएल विस्की या 100 एमएल वाइन या 656 एमएल बीयर से ज्यादा का सेवन नहीं करना चाहिए। एचडीएल कोलेस्ट्राल को व्यायाम करके और सिगरेट बंद करके भी बढ़ाया जा सकता है।

ग्रेवाल अस्पताल के
सवाल : कैंसर कैसे होता है और उपचार कितना संभव है?
जवाब : कैंसर शरीर के विभिन्न हिस्सों में रसौली या जख्म के रूप में होता है जो जानलेवा होता है। दरअसल हमारा शरीर सैल से बना है और जब शरीर का सैल पर नियंत्रण खत्म हो जाता है तो वह कैंसर हो जाता है। इसकी शुरुआत एक सैल से होती है जो बाद में फैलता रहता है। लेकिन समय पर उपचार हो जाए तो बचाव संभव है। देरी से ठीक होने की उम्मीद कम होती है। हर स्टेज में बचाव की उम्मीद रहती। किसी स्टेज में यह उम्मीद कम होती है तो किसी में ज्यादा होती।
सवाल : कौन सी रसौली या जख्म कैंसर हो सकती है?
जवाब : किसी भी व्यक्ति या महिला के रसौली या जख्म लंबे समय से ठीक न हो तो उसे गंभीरता से लेकर चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए, क्योंकि वह कैंसर हो सकता है। सामान्य रसौली का भी कई समय तक उपचार न करवाया जाए तो वह कैंसर बन सकती है। यही नहीं पत्थरी भी काफी वर्र्षों तक पित्त की थैली व अन्य स्थान पर पड़ी रहे तो वह भी कैंसर बना देती है।
सवाल : कैंसर से बचने के लिए क्या-क्या करना चाहिए?
जवाब : इससे बचाव का मुख्य रास्ता धूम्रपान व तंबाकू आदि चबाने से परहेज करना, फास्ट फूड, तले व वसा युक्त भोजन से परहेज करना ही। एल्कोहल के सेवन से जिगर का कैंसर हो जाता है। सामान्य खाना इस रोग से काफी ज्यादा बचाए रखता है लेकिन अनुवांशिक कारणों से भी यह रोग हो जाता है।
सवाल : कैंसर की कौन सी स्टेज पर उपचार संभव नहीं है?
जवाब : कैंसर की चार स्टेज मानी जाती है और हर स्टेज पर उपचार संभव है लेकिन उपचार का प्रतिशत घटता जाता है। पहली स्टेज में शत प्रतिशत उपचार हो जाता है क्योंकि इसमें खराब सैल फैलना शुरू होता है, फैलता नहीं। इसके बाद की स्टेज में भी उपचार संभव है लेकिन उम्मीद कम हो जाती है, खत्म नहीं होती।
सवाल : महिलाओं में कौन सा कैंसर सबसे ज्यादा होता है, क्या सावधानी बरतनी चाहिए।
जवाब : महिलाओं में मुख्य रूप से ब्रेस्ट कैंसर और बज्जे दानी का कैंसर होता है, इसलिए 30 वर्ष की उम्र के बाद महिलाओं को ब्रेस्ट की सेल्फ एग्जामिनेशन अपने चिकित्सक से सीखकर करते रहना चाहिए, क्योंकि इसका सबसे पहले मरीज को ही पता लगता है। दूसरी तरफ बज्जे दानी के कैंसर का पता असमय खून के स्त्राव से चल जाता है। इसके लिए महिलाओं को 40 वर्ष की उम्र के बाद हर वर्ष चैकअप भी करवाना चाहिए।
सवाल : कैंसर की बीमारी के लिए फैली भ्रांतियां कहां तक सही है?
जवाब : कैंसर की बीमारी के उपचार को लेकर काफी भ्रांति भी फैली हुई है जिसके कारण मरीज सही उपचार करवाने की बजाय देसी दवाइयों के चक्कर में फंसकर अपना रोग बिगाड़ लेता हैं। लोग यह सोचते हैं कि कैंसर का टेस्ट करवाने से यह शरीर में तेजी से फैलता है और शुरुआती स्टेज में ऑपरेशन करवाने से भी यह रोग जल्दी फैल जाता है, जो पूर्णत: निराधार है, क्योंकि जो उपचार शुरुआती स्टेज में हो जाता है, वह बाद में संभव नहीं होता।
सवाल : कैंसर का उपचार करने की कौन-कौन सी विधियां हैं?
जवाब : वैसे कैंसर का उपचार रेडिया थैरेपी (बिजली का सेक) और कीमो थैरेपी (दवाइयों) से होता है। कुछ प्रकार के कैंसर का उपचार सिर्फ दवाइयों से होता है तो कुछ प्रकार का उपचार सिर्फ रेडियो थैरेपी से होता है। इसी तरह कैंसर के कुछ प्रकार का उपचार दोनों थैरेपी से हो जाता है।
सवाल : ब्लड कैंसर कितना खतरनाक है?
जवाब : ब्लड कैंसर सबसे ज्यादा खतरनाक है, जिसका उपचार दवाइयों और बोन मैरो ट्रांसफर से होता है लेकिन बोन मैरा ट्रांसफर हर जगह उपलब्ध नहीं होता। मरीज को कैंसर फैलने के बाद भी उम्मीद नहीं छोडऩी चाहिए, क्योंकि हर स्टेज पर बचाव की उम्मीद होती है।
सवाल : इस मौसम में कौन-कौन से पेट रोग हो सकते हैं, बचाव के लिए क्या करें?
जवाब : इस मौसम में होने वाली बीमारियों में मुख्य रूप से पीलिया, आंतडिय़ों की सोजिश, डायरिया और मीयादी बुखार शामिल हैं। इससे बचाव के लिए पीने का पानी उबालकर या फिल्टर करके पीएं और बाजार की वस्तुएं न खाएं। बचाव का मुख्य कार्य खाने पीने में सफाई रखना है।

गिरधर अस्पताल के संचालक डॉ. विकास गिरधर से नाक की बीमारियों पर बातचीत
सवाल : छींक आना क्या नाक की बीमारी की निशानी है?
जवाब : नहीं यह बीमारी नहीं बल्कि एक बचाव की क्रिया है जो होने वाली बीमारी के प्रति आगाह करती है। दरअसल नाक हमारे शरीर में छलनी का काम करता है और वायु प्रदूषण का सबसे पहले असर नाक पर होता है। छींक अथवा नाक से पानी बहना इसी बचाव की क्रिया की एक कड़ी है।
सवाल : जुकाम क्यों होता है और इसकी कारगर दवा है या नहीं?
जवाब : एक वायरस से श्वास द्वारा व्यक्ति से व्यक्ति के संपर्क से फैलने वाले जुकाम का दंश दुनिया का हर व्यक्ति झेलता है लेकिन अभी तक इसकी कोई कामयाब वैक्सीन विकसित नहीं हो पाई है। दरअसल इसमें नाक की पूरी श्लेष्मा खूब मात्रा में तरल द्रव बनाती है ताकि संक्रमण जल्दी से जल्दी साफ किया जा सके। कुछ वायरस नाक में ही रहते हैं लेकिन ठंड या प्रदूषण आदि से सक्रिय होकर जुकाम करते हैं।
सवाल : जुकाम से बचने के लिए क्या करना चाहिए?
जवाब : जुकाम के दौरान खूब तरल चीजों का सेवन करना चाहिए। सादे पानी की अथवा थोड़ी विक्स डालकर भाप लें। इस दौरान पौष्टिïक भोजन लें और संक्रमण से अन्य लोगों को बचाने के लिए सार्वजनिक स्थल पर यथासंभव जाना ठीक होने तक स्थगित कर दें व हाथ न मिलाएं। खुली हवा में घूमें।
सवाल : जुकाम क्या अपने आप ठीक हो जाता है, उपचार न लेने पर क्या हो सकता है?
जवाब : जुकाम अपने आप ठीक नहीं होता। इसका उपचार न कराने से साइनसों का संक्रमण, कानों का संक्रमण, गले का संक्रमण या आंखों के गिर्द संक्रमण व नासिका का चर्म संक्रमण जैसी जटिलताएं हो सकती हैं। इसलिए जुकाम के दौरान कान दर्द या माथे या गाल की हड्डियों में तीव्र दर्द होने पर तुरंत विशेषज्ञ से परामर्श लें। इस दौरान दी जाने वाली दवाएं लक्षणों की तीव्रता कम करने व जटिलताओं को रोकने के लिए दी जाती है।
सवाल : साइनस क्या है और इसमें क्या होता है?
जवाब : चेहरे की हड्डियों में स्थित खोखले भाग को साइनस कहते हैं। इनसे छोटी-छोटी अस्थिमय नलिकाएं नाक में खुलती है, जिनमें श्लेष्मा की सूजन से साइनसों में द्रव इक_ा होता है जो संक्रमित हो जाता है और साइनस की स्थिति के अनुसार चेहरे में गालों के साथ, माथे में दर्द होता है। गले में लगातार नाक के पीछे नजला गिरना, गले में खराश रहना, बार-बार नाक साफ करके बलगम थूकना के अलावा चेहरे में भारीपन या बार-बार सिर दर्द आदि लक्षण हो तो समझ लेना चाहिए कि क्रोनिक साइनस हो गया। सही निदान के लिए एक्सरे अथवा सीटी स्कैन करवाना पड़ता है। इस बीमारी में साइनस में एकत्रित द्रव नाक के रास्ते सुराख करके सामान्य सलाइन से धोकर संक्रमित द्रव्य निकाला जाता है। ज्यादा पुरानी बीमारी में ऑपरेशन की जरूरत होती है।
सवाल : एलर्जी क्या है और इसका क्या उपचार है?
जवाब : वातावरण में उपस्थित अवयवों के प्रति नाक जब अति संवेदी हो जाए तो इसे एलर्जी कहते हैं। धूल, मिट्टी, धुआं व सर्दी आदि के जवाब में जब नाक तीव्र प्रतिक्रिया दें तो उसे एलर्जी कहते हैं। यह वंशानुगत रोग है व शरीर के अधिकतर हिस्सों जैसे नाक, चमड़ी, फेफड़े व आंखों आदि पर असर कर सकता है। इलाज के लिए परहेज व दवाइयां लंबे समय तक प्रयोग करने पड़ते हैं। यदि एलर्जी के कारण नाक में मांस बढ़ जाए तो नाक रुकने लगता है जिसके लिए ऊपरी परत नष्टï कर दी जाती है। यदि नाक में सफेद मांस की गांठें बढ़ जाती हैं तो उन्हें दूरबीन से ऑपरेशन द्वारा निकाला जाता है। दिमाग व आंखों के पास तक जुड़े होने के कारण कई बार सुरक्षा की दृष्टिï से पूरी तरह बीमारी निकालना संभव नहीं होता। इसलिए लगातार एलर्जी की दवाइयों का प्रयोग व अन्य परहेज फायदेमंद होता है।
सवाल : नाक की हड्डी क्यों बढ़ती है और इसका सही उपचार क्या है?
जवाब : नाक की हड्डी बढऩा भी वंशागत के अलावा चोट लगने, भू्रणावस्था व जन्म के समय नाक पर दबाव पडऩे आदि से होता है। इसमें दोनों तरफ की नासिकाओं के बीच की हड्डी बढ़कर टेढ़ी हो जाती है और हवा व नाक के द्रव के कुदरती निकास में रुकावट डालती है। नाक का द्रव साइनसों में एकत्र होकर संक्रमित हो जाता है तथा रेशा गले में या कान पर असर करने लगता है। बार-बार नाक बंद, जुकाम, गले में खराश, बार-बार थूकने की आदत, कान बहना, टांसिल का संक्रमण आदि रोग होने लगते हैं। इसका जल्दी उपचार दवाओं या ऑपरेशन से न कराया जाए तो कान व गले के ऑपरेशन की भी नौबत आज जाती है।
सवाल :नाक की सफाई में क्या सावधानी बरतें?
जवाब : नाक की सफाई उंगली से बार-बार न करें। सुबह नहाते समय लिक्विड पैराफिन को उंगली से लगाने के बाद ही इसकी सफाई करें। यदि नाक में रेशा जम जाए तो लिक्विड पैराफिन की कुछ बूंदे लेट कर नाक में डाल लें।
सवाल : नाक की बीमारियों में योग कितना कारगर है?
जवाब : योग में प्राणायाम, अनुलोम- विलोम व कपालभांति आदि से नाक को कोई नुकसान नहीं है और फायदा मिलता है। सही मार्गदर्शन में की गई जलनेति भी फायदेमंद है लेकिन सूत्रनेति के बारे में विज्ञान सहमत नहीं है।

निश्चेतन विशेषज्ञ डॉ. राकेश दुआ से बातचीत
सवाल : एनिस्थिसिया या निश्चेतन प्रक्रिया क्या है?
जवाब : निश्चेतन प्रक्रिया वह खोज है, जिसकी वजह से शल्य चिकित्सा का निरंतर विकास संभव हुआ है। इस विधि से ऑपरेशन के समय मरीज के शरीर को कुछ समय के लिए चेतना विहीन कर दिया जाता है लेकिन इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि मरीज के सभी अंग सुचारू रूप से कार्य करते रहें।
सवाल : निश्चेतन प्रकिया कितने प्रकार की होती है?
जवाब : यह मुख्यत: दो प्रकार की होती है, संपूर्ण व क्षेत्रिक निश्चेतन। संपूर्ण निश्चेतन में मरीज को पूर्ण रूप से बेहोश कर दिया जाता है और उसे ऑपरेशन होने तक बिल्कुल भी आभास नहीं होता। क्षेत्रिक प्रक्रिया में शरीर के एक विशेष हिस्से को जहां ऑपरेशन होना है, सन्न कर दिया जाता है। इसमें ऑपरेशन के दौरान मरीज होश में रहता है तथा उसे ऑपरेशन का आभास रहता है लेकिन दर्द नही होता।
सवाल : एनिस्थिसिया देने से पूर्व मरीज की क्या-क्या जांच आवश्यक है और यह क्यों करवाई जाती है?
जवाब : निश्चेतन प्रक्रिया मानव शरीर की आंतरिक व्यवस्था में एक जबर्दस्त हस्तक्षेप है। दरअसल इस प्रक्रिया में अधिकतर दवाइयां खून की नसों व फेफड़ों के रास्ते दी जाती है जो तीव्रता से काम करती है और दिल व खून की नसों को प्रभावित कर सकती है। इसलिए दिन व फेफड़ों की जांच सबसे महत्वपूर्ण है। अधिकतर दवाइयां पेशाब व पित्त के रास्ते शरीर से बाहर निकल जाती है लेकिन गुर्दे और जिगर की जांच भी बहुत जरूरी है। इसके अलावा खून की मात्रा, मुंह, दांतों व रीढ़ की हड्डी की जांच भी महत्वपूर्ण है। इन जांच में यदि कोई गड़बड़ी आती है तो ऑपरेशन से पहले उसे ठीक करना जरूरी होता है।
सवाल : ऑपरेशन से पहले मरीज को क्या-क्या सावधानी रखनी चाहिए?
जवाब : ऑपरेशन से पहले मरीज को खाली पेट रहना चाहिए। चार घंटे पहले तरल पदार्थ और छह घंटे पहले ठोस पदार्थ, दूध व चार आदि न लें। इस दौरान गैस वाले तरल पदार्थ जैसे सोडा व साफ्ट ड्रिंक बिल्कुल न लें। ऑपरेशन के दौरान तंग वस्त्र न पहनें ताकि श्वास लेने में दिक्कत न आए और नकली दांत, कांटेक्ट लैंस, कृत्रिम हाथ व पांव आदि उतारकर आना चाहिए और सुनने की मशीन लगाकर रखनी चाहिए। ऑपरेशन से पहले यदि महिलाएं मेकअप करती है तो खून में आक्सीजन की मात्रा जानने में दिक्कत आती है। ऑपरेशन से कुछ दिन पूर्व पान, बीड़ी, सिगरेट, शराब, तंबाकू, जर्दा आदि का सेवन न करें।
सवाल : ऑपरेशन से पहले हुक्का व बीड़ी को बंद करना क्यों जरूरी है?
जवाब : बीड़ी, सिगरेट व हुक्का आदि श्वास नलिकाओं व फेफड़ों पर बुरा असर डालती है, जिसकी वजह से ऑपरेशन के दौरान व बाद में श्वास की तकलीफ जेसे दमा व निमोनिया होने की आशंका अधिक हो जाती है। इसके अलावा बीड़ी व सिगरेट में होने वाले तत्व हमारे दिल की धड़कन को असामान्य करते हैं। इसे कम से कम ऑपरेशन के एक हफ्ता पहले बंद कर देना चाहिए।
सवाल : रीढ़ की हड्डी में सुन्न का टीका लगाना किसे कहते हैं?
जवाब : यह एक प्रकार की क्षेत्रिक निश्चेतन प्रक्रिया है, जिसे स्पाइनल एनिस्थिसिया कहते हैं। इस विधि में रीढ़ की हड्डी के रास्ते सूई डालकर मेरुरज्जु के पास दवा दी जाती है। इसका अधिकतर प्रयोग नाभी से नीचे पेट के ऑपरेशन, गुर्दा व टांगों के ऑपरेशन के लिए किया जाता है। इस प्रक्रिया में शरीर का नाभी का हिस्सा सुन्न हो जाता है लेकिन मरीज होश में रहता है।
सवाल : रीढ़ की हड्डी में टीका लगने के बाद क्या पीठ दर्द की शिकायत बढ़ती है?
जवाब : यह एक भ्रांति है जो महिलाओं में ज्यादा फैली हुई है, जो गलत है। इसमें बहुत पतली सूई का इस्तेमाल किया जाता है जो रीढ़ की हड्डी व आसपास के उत्तकों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाती है। पीठ दर्द होने के अन्य कारण होते हैं।
सवाल : ऑपरेशन के दौरान मरीज की क्या-क्या निगरानी की जाती है?
जवाब : ऑपरेशन के दौरान मरीज की जब्ज, ब्लड प्रेशर, ईसीजी, आक्सीजन, कार्बन डाई आक्साइड, तापमान व पेशाब की मात्रा की निगरानी की जाती है।
सवाल : निश्चेतन प्रक्रिया कितनी सुरक्षित है?
जवाब : यह प्रक्रिया पूर्णत: सुरक्षित तो नहीं है लेकिन आधुनिक प्रक्रिया बहुत अधिक सुरक्षित है, फिर भी इसका अपना निहित खतरा है। किसी भी ऑपरेशन के दौरान रिस्क का निर्धारण सर्जरी, निश्चेतन व मरीज की अवस्था करती हैं। इसमें सबसे महत्वपूर्ण मरीज की अवस्था है। मरीज की बीमारी के अनुसार ऑपरेशन में खतरा बढ़ता जाता है।
सवाल : निश्चतेन प्रक्रिया और ऑपरेशन को सफल बनाने में मरीज क्या सहयोग कर सकता है?
जवाब : ऑपरेशन से पहले जांच के दौरान पूछे गए प्रश्नों को उचित जवाब दें और किसी भी बीमारी को मत छिपाएं। अगर कोई नशा करते हो तो डॉक्टर को बताने से मच हिचकिचाएं। यदि किसी बीमारी की दवा खा रहे हैं तो उसे जैसा बताया गया है खाते रहें, अपने आप खाना बंद न करें।

राज अल्ट्रासाउंड के रेडियोलाजिस्ट डॉ. राजीव राजवंशी से बातचीत।
सवाल : अल्ट्रासाउंड बार-बार कराने से क्या कोई नुकसान है? गर्भवती महिला व गर्भस्थ शिशु पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है?
जवाब : अल्ट्रासाउंड सबसे सुरक्षित एवं विश्वसनीय निदान तकनीक है। इसको बार-बार कराने से कोई नुकसान नहीं होता है। न ही गर्भस्थ शिशु को नुकसान होता है जबकि एक्सरे एवं सीटी स्केन नुकसानदायक है।
सवाल : अल्ट्रासाउंड किन परिस्थितियों में कराना चाहिए?
जवाब : जिगर, पित्त की थैली, अग्नाशय की सभी बीमारियां, गुर्दा, पेशाब की थैली, गदूद की बीमारियां, सभी प्रकार की पथरी, बच्चादानी, अंडेदानी की बीमारियां, कैंसर का निदान व फैलाव से संबंधित जानकारी, गर्भस्थ शिशु व उसके विकास व अन्य विकारों की जानकारी के लिए अल्ट्रासाउंड कराना चाहिए। समय-समय पर संबंधित चिकित्सक मरीज को इसकी सलाह देते हैं और रिपोर्ट के आधार पर ही उपचार शुरू किया जाता है।
सवाल : अल्ट्रासाउंड कराने के क्या नियम है और क्या-क्या सावधानियां बरतनी चाहिए?
जवाब : अल्ट्रासाउंड में पेशाब का दबाव जरूरी है। पित्त की जांच के लिए दो-तीन घंटे का उपवास भी जरूरी है।
सवाल : अल्ट्रासाउंड कराने के लिए पेशाब के प्रेशर के लिए दवा लेना कितना सही है?
जवाब : अल्ट्रासाउंड कराते समय पेशाब का दबाव बनाने के लिए दवाई नहीं लेनी चाहिए। यदि दवाई लेनी भी पड़े तो वह चिकित्सक की सलाह के बाद ही लें। कई बीमारियों में दवा लेने से ब्लड प्रेशर निम्न हो जाता है, जिससे काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
सवाल : उम्र के हिसाब से अल्ट्रासाउंड कराने में क्या कोई नुकसान है, बच्चों व बूढ़ों में कोई साइड इफेक्ट होता है?
जवाब : अल्ट्रासाउंड सबसे सुरक्षित निदान विधि है। इसके अभी तक कोई बुरा असर नहीं है। अल्ट्रासाउंड वास्तव में उच्च आवृत्ति की ध्वनि तरंगे हैं जिनसे शरीर के अंदर की छवि कंप्यूटर से बनती है।
सवाल : अल्ट्रासाउंड की नई तकनीकें क्या आई हैं, उनका मरीजों को क्या फायदा है?
जवाब : अल्ट्रासाउंड की नई तकनीक रंगीन डोपलर व डिजिटल इमेज आई है। इन तकनीकों से निदान आसान हो गया है।
सवाल : एक्सरे किरणों का क्या नुकसान है? एक्सरे कराते समय क्या सावधानियां बरतनी चाहिएं?
जवाब : एक्सरे निदान की पुरानी व अच्छी तकनीक है। इसमें किसी गर्भवती महिला या गर्भ धारण के प्रथम तीन माह में एक्सरे करने से कभी-कभी नुकसान हो सकता है। ज्यादा एक्सरे बढ़ती कोशिकाओं और बच्चों को नुकसान कर सकते हैं।
सवाल : डिजीटल एक्सरे का क्या लाभ है?
जवाब : डिजीटल एक्सरे या कंप्यूटराइज्ड एक्सरे में फिल्म बनाने की तकनीक का डिजिटलाइजेशन किया जाता है। इसमें फिल्म आप अपनी इच्छानुसार निकाल सकते हैं। चिकित्सक स्वयं कंप्यूटर पर देख सकता है। इसमें छोटी पथरी भी स्पष्टï दिखती है। किसी भी हिस्से को बड़ा आकार देकर देख सकते हैं।
सवाल : डॉक्टर की सलाह के बिना अल्ट्रासाउंड कराना ठीक है या नहीं?
जवाब : अल्ट्रासाउंड चिकित्सक की सलाह के अनुसार कराना चाहिए, क्योंकि बीमारी का निदान कई रिपोर्ट मिलाकर किया जाता है। सिर्फ अल्ट्रासाउंड से किसी बीमारी का पूरा पता नहीं लगता। हालांकि कुछ मामलों में सिर्फ अल्ट्रासाउंड ही कराया जाता है।
सवाल : कलर (रंगीन) अल्ट्रासाउंड और ब्लैक एंड अल्ट्रासाउंड में क्या फर्क है? किसका फायदा ज्यादा है?
जवाब : रंगीन अल्ट्रासाउंड कोई तकनीक नहीं है। ये भ्रांति है। दरअसल रंगीन डोपलर होता है जो रक्त वाहिकाओं में गतिमान रक्त को उसकी गति के अनुसार से नीला, लाल या हरा रंग देता है। इसको मरीज रंगीन अल्ट्रासाउंड कहते हैं जबकि सही मायने में यह रंगीन डापलर (कलर डोपलर) कहलाता है। अल्ट्रासाउंड काला-सफेद (ब्लैक एंड व्हाइट) ही होता है।

जिंदल अस्पताल की नाक, कान व गला रोग विशेषज्ञ डॉ. माधुरी मेहता से कान की बीमारियों पर बातचीत
सवाल : बारिश के मौसम में कान का क्या ध्यान रखना चाहिए?
जवाब : इस मौसम में कान संवेदनशील हो जाता है तथा कई प्रकार के इन्फेक्शन का खतरा रहता है। इस मौसम में बिना चिकित्सक की सलाह के कान के साथ कुछ भी नहीं करना चाहिए और न ही कोई दवा डालनी चाहिए, चाहे वह घरेलू उपचार ही क्यों न हो।
सवाल : कानों की सलाई से सफाई करना व खुजलाना कितना सही है?
जवाब : कानों को कभी बिना रुई के तिनके या सलाई से नहीं खुजलाना चाहिए। बाजार में आने वाली इयर बड सुरक्षित है और इनका इस्तेमाल भी चिकित्सक से सलाह लेकर किसी लोशन के साथ करना चाहिए। इससे कान में इनफेक्शन का भी खतरा रहता है और बिना सावधानी के कान की सफाई करने से भी पर्दे को नुकसान पहुंच सकता है।
सवाल : कान बहे तो क्या करना चाहिए?
जवाब : कान बहने का कारण ज्यादातर लापरवाही होती है। यदि कान बहे तो तुरंत चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए क्योंकि लापरवाही से बड़ी बीमारी भी हो सकती है। लापरवाही बरतने पर कान का पर्दा व हड्डी भी गल जाती है। कान बहने की स्थिति में नहाते समय कान में पानी न जाने दें और चिकित्सक से सलाह लेकर कान में वेसलीन लगी रुई लगाकर ही नहाएं।
सवाल : फार्मासिस्ट की सलाह पर कान की सफाई के लिए नियमित रूप से दवा डालना कितना सही है?
जवाब : सामान्य व्यक्ति को कान की नियमित सफाई की जरूरत नहीं होती, यह प्राकृतिक रूप से हो जाती है। बिना सलाह के कान में दवा डालना ठीक नहीं है क्योंकि कई बार नुकसान हो सकता है। दरअसल कान में लिक्विड व सोलिड वेक्स जमा होता है। लिक्विड वेक्स अपने आप निकल जाता है जबकि सोलिड वेक्स के कारण समस्या आती है, जिसे चिकित्सकीय सलाह की जरूरत पड़ती है।
सवाल : कान पर थप्पड़ मारना कितना खतरनाक है?
जवाब : ऐसे मामले बच्चों से संबंधित बहुत ज्यादा आते हैं। इससे कान का पर्दा भी फट जाता है। 20 से 40 प्रतिशत फटा हुआ पर्दा अपने आप ठीक हो सकता है लेकिन ज्यादा नुकसान होने पर ऑपरेशन की जरूरत पड़ती है।
सवाल : कनमैलियों से कान की सफाई कराना सही है क्या?
जवाब : कनमैलियों से सफाई कराना ठीक हो, इसकी कोई गारंटी नहीं है और यह अनुभव पर निर्भर करता है। वैसे कान के प्रति लोगों को संवेदनशील रहना चाहिए और इसकी सफाई अनुभवहीन हाथों से नहीं करानी चाहिए।
सवाल : टेली शाप पर पक्षियों व सूई की आवाज सुनाने वाली मशीनों का प्रयोग करना ठीक है या नहीं?
जवाब : इन मशीनों का प्रयोग सामान्य व्यक्ति के लिए गलत नहीं है लेकिन यह भी पूरे समय करना गलत है। कान के मरीजों को इसका बिल्कुल प्रयोग नहीं करना चाहिए।
सवाल : श्रवण शक्ति बढ़ाने का कोई व्यायाम है क्या?
जवाब : नहीं, इसका कोई व्यायाम नहीं है लेकिन इसका उपचार है। यदि जन्म से श्रवण शक्ति कम है तो उसका उपचार मामले को देखकर ही बताया जा सकता है लेकिन वायरल इन्फेक्शन, चोट व दवाइयों के साइड इफेक्ट का उपचार संभव है लेकिन जितनी देरी हो उतनी मुश्किल आती है।
सवाल : नहाते समय कान की सुरक्षा के लिए क्या सावधानियां बरतनी चाहिए?
जवाब : नहाते समय कान की सुरक्षा के लिए सामान्य व्यक्ति को किसी भी प्रकार की सावधानी की जरूरत नहीं है, क्योंकि कुदरत ने कान को मानव जीवन की दिनचर्या के अनुरूप बनाया है। हो सके तो सामान्य व्यक्ति को एक साल में एक बार चिकित्सक से जांच जरूर करवा लेनी चाहिए।
सवाल : कान में थर्मोकाल व अन्य वस्तुएं फंसने पर क्या करें?
जवाब : थार्मोकाल, मूंगफली आदि वस्तुएं बच्चों के कान, नाक व गले में कई बार फंस जाती है। श्वास नली में यदि यह फंस जाए तो बच्चों की मौत भी हो सकती है। ऐसी स्थिति में तुरंत चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।
सवाल : ज्यादा समय तक मोबाइल सुनना कितना सही है?
जवाब : मोबाइल तरंगों पर कार्य करता है और यह तरंगे नुकसान न पहुंचाए कहना गलत है। फिलहाल इस पर शोध चल रहा है तथा इससे जितना बचा जा सके, ठीक है।
सवाल : इयरफोन से गाने सुनना, पार्टियों में गानों व जागरण में भजनों की तेज आवाज क्या कान को नुकसान पहुंचा सकती है?
जवाब : दरअसल चंद समय के लिए हाई डेसिबल साउंड व अधिक समय के लिए लो डेसिबल साउंड भी कान के लिए खतरनाक है। आवाज से कान के अंदर बने सूक्ष्म बाल मूव करते हैं और ज्यादा समय के लिए कम आवाज व कम समय के लिए भी अधिक आवाज से ये बाल डेड हो जाते हैं जिससे सुनने की शक्ति कम हो सकती है। इसका अभी तक सटीक उपचार भी नहीं है। फिलहाल जो उपचार है, वह लंबा है लेकिन गारंटेड नहीं है।

गुप्ता अस्पताल के मनोरोग एवं यौन रोग विशेषज्ञ डॉ. नरेंद्र गुप्ता से बातचीत
सवाल : क्या मानसिक बीमारी के कारण भी यौन रोग होते हैं?
जवाब : यौन (गुप्त) रोग शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार के होते हैं। शारीरिक यौन रोग विदेशों में ज्यादा होते हैं। भारत में मानसिक रोगियों की संख्या ज्यादा है। विदेशों में यह रोग मुख्य रूप से डायबिटीज व रीढ़ की हड्डी व अन्य रोगों के कारण होते हैं। शारीरिक यौन रोग वे होते हैं जो सेक्स से एक से दूसरे व्यक्ति में फैलते हैं, इनमें एसटीडी (सेक्सुअल ट्रांसमिटिड डिजीज) प्रमुख हैं, जिनमें गोनोरिया, सिफिक्स, एचआईवी और एड्स शामिल हैं।
सवाल : मनजनित यौन रोग कौन-कौन से होते हैं और ये कितने खतरनाक हैं।
जवाब : मनजनित यौन रोगों को कल्चर बाउंड सिंड्रोम भी कहते हैं और यह कमजोर व्यक्तित्व वाले व्यक्ति या महिला को होते हैं। इनमें मुख्यत: इरेटिक डिसआर्डर (गुप्तांग में तनाव न आना), धात, स्वप्नदोष, शीघ्रपतन आदि है। यह कमजोर व्यक्तित्व वालों को होता है, जिसके कारण वे डिप्रेशन का शिकार हो सकते हैं।
सवाल : धात और स्वप्नदोष क्या वास्तव में रोग होते हैं?
जवाब : धात एक प्रकार का सेक्स क्रिया से पहले पुरुषों के गुप्तांग से निकलने वाला पारदर्शी चिकना द्रव्य है जो एक सामान्य प्रक्रिया है, क्योंकि यह लुब्रिकेंट का कार्य करता है। इसलिए यह कोई बीमारी नहीं है। इसी प्रकार जब वीर्य अधिक मात्रा में जमा हो जाता है तो रात के समय वह निकल जाता है।
सवाल : सेक्स का स्वास्थ्य से क्या संबंध हैं, ज्यादा सेक्स क्या खतरनाक होता है?
जवाब : सेक्स का स्वास्थ्य से गहरा संबंध हैं। ज्यादा सेक्स खतरनाक नहीं होता। सेक्स करने से व्यक्ति को मानसिक शांति मिलती है जो स्वास्थ्यवद्र्धक है। सेक्स करने से किसी भी प्रकार की कोई कमजोरी नहीं आती, चाहे यह कितनी ही बार किया जाए।
सवाल : चिकित्सकीय सलाह के बिना सेक्स पावर बढ़ाने की दवा लेना कितना खतरनाक है?
जवाब : चिकित्सकीय सलाह के बिना सेक्स पावर बढ़ाने की दवा लेना अन्य बीमारियों को आमंत्रण देना है। बाजारों में उपलब्ध कई दवाओं के सेवन से तो हृदय रोग व रक्तचाप आदि की समस्या आ सकती है तथा इनकी आदत भी पड़ सकती है। सेक्स पावर दवा लेने से पहले अच्छे चिकित्सक से सलाह लेना जरूरी है।
सवाल : क्या ज्यादा समय तक मोबाइल फोन सुनने से भी यौन रोग हो सकते हैं?
जवाब : हां, यह सही है कि ज्यादा समय तक मोबाइल फोन सुनने से यौन रोग हो सकते हैं, जिनमें नामर्दी प्रमुख हैं। दरअसल ज्यादा समय तक मोबाइल फोन सुनने से मस्तिष्क में जाने वाली तरंगों का जो प्रभाव पड़ता है, वह अलग है लेकिन बाहरी कारण से व्यक्ति डिप्रेशन, चिंता, चिड़चिड़ापन, सिर में भारीपन, माइग्रेन व याददास्त में कमी आदि समस्याओं से परेशान रहता है। इन मानसिक रोगों के कारण व्यक्ति में नामर्दी भी आ सकती है। इसलिए मोबाइल फोन कम से कम प्रयोग करना चाहिए और हैंडसेट से जितनी दूरी बनाई जा सकती हो, बनाएं। इसके लिए इयरफोन व ब्लूटूथ का प्रयोग भी किया जा सकता है।
सवाल : मौजूदा भागदौड़ की दिनचर्या के कारण कौन से यौन रोग बढ़ रहे हैं?
जवाब : मौजूदा भागदौड़ की दिनचर्या के कारण लिबिडो (सेक्स करने की इच्छा) कम हो रही है। हिसार में भी काफी युवा इस बीमारी की चपेट में हैं और मनोरोग विशेषज्ञों के पास आ रहे हैं। यही नहीं इस दिनचर्या के कारण जब तनाव ज्यादा रहता है तो शुक्राणुओं की संख्या भी कम हो जाती है, जो बाद में व्यक्ति को संतानहीनता की स्थिति तक ले जाती है। इसका मुख्य उपचार इच्छाओं को नियंत्रण में करना है। ऐसी मित्रमंडली बनानी चाहिए जो ड्रिंक व स्मोकिंग की बजाय आत्मसंतुष्टिï की बातें करें। परिवार को ज्यादा समय दें और अपनी मौजूदा स्थित पर संतोष करके आगे बढऩे का सही रास्ता अपनाना चाहिए और जब सफलता न मिले तो चिंता नहीं करनी चाहिए।
सवाल : फुटपाथों पर टेंट लगाकर बैठने वाले नीम हकीमों से क्या रोगियों को कोई फायदा मिलता है?
जवाब : नीम हकीमों के पास जो दवा होती है, उसकी कोई जांच नहीं होती। उन दवाओं से क्या फायदा हो रहा है और क्या नुकसान हो रहा है, इसका अनुमान लगाना कठिन है। इसलिए इन नीम हकीमों के चक्कर में पडऩे के बजाय अच्छे मनोरोग विशेषज्ञ से संपर्क साधना चाहिए।

सेवक सभा अस्पताल के पेट रोग विशेषज्ञ एवं सर्जन डॉ. योगेश आर जैन से पेट रोग पर बातचीत
सवाल : पेट दर्द के क्या-क्या कारण हैं। क्या हर मामले में दर्द निवारक दवा लेना उचित है?
जवाब : पेट के 9 हिस्से होते हैं और किसी भी हिस्से में खराबी से पेट दर्द हो जाता है। हर प्रकार के दर्द के लिए एक दवा नहीं हो सकती और कई बार यह नुकसानदायक भी हो जाती है। पेट दर्द प्रमुख रूप से आंत में खराबी, पाचन नली में खराबी, गुर्र्दों में खराबी, लीवर में खराबी, पित्त की थैली में खराबी और पेशाब की थैली में खराबी आदि के कारण से होता है।
सवाल : सामान्यत: पेट खराब होने का क्या कारण है?
जवाब : कब्ज और दूषित खाना खाने से ही पेट खराब होता है। इससे पेट में भारीपन, बार-बार लैट्रिन आना, पतली व चिकनी लैट्रिन आना व गैस होना आदि इसके प्रमुख लक्षण हैं। यह दूषित खाने व पीने की चीजों का सेवन करने से हो जाता है। घरों में हाथ साफ करने के लिए प्रयोग होने वाले एक साबुन से भी यह बीमारी हो सकती है। इसलिए हो सके तो हाथ साफ करने के लिए लिक्विड का प्रयोग करें या फिर हर सदस्य अलग-अलग साबुन रखे।
सवाल : बच्चों में पेट के कीड़ों की समस्या क्यों होती है?
जवाब : पेट में कीड़ों की समस्या किसी को भी हो सकती है, क्योंकि यह दूषित खानपान से होती और बच्चों को इसका कुछ पता नहीं होता। बच्चों के खाने-पीने के सामान को स्वच्छ रखने के अलावा उनके खाने-पीने के तरीके पर यदि ध्यान रखा जाए तो पेट में कीड़ों की समस्या नहीं होगी।
सवाल : करीब 40 वर्ष की उम्र में भारी शरीर वाली महिलाओं को पेट दर्द की समस्या क्यों होती है?
जवाब : भारी शरीर वाली महिलाओं में तेजाब बनना, गैस बनना, पेट में भारीपन, जी मचलना व उल्टी आने समस्या रहती है। ज्यादातर मामलों में इसका कारण पित्त की थैली में पथरी का होना होता है।
सवाल : पित्त की थैली में पथरी का ऑपरेशन कराना जरूरी है क्या?
जवाब : पित्त की थैली में यदि पथरी हो और उससे कोई परेशानी नहीं हो तो भी ऑपरेशन कराने में देर नहीं करनी चाहिए। विलंब करने से पथरी नलकी (सीबीडी) में आ जाती है, जिससे पीलिया भी हो जाता है। ऐसे में पथरी के साथ-साथ पीलिया का भी ऑपरेशन करना पड़ता है। बारिश में पथरी कई बार पेनक्रियाटिक डक्ट में भी चली जाती है, जिससे पेनक्रियाटाइटिस हो सकता है जो जानलेवा है। इसके अलावा पित्त की थैली में पस भी पड़ सकता है। इसका ऑपरेशन दूरबीन से कराना ही ठीक रहता है।
सवाल : गुर्दे की पथरी में ऑपरेशन कराने में जल्दबाजी करनी चाहिए या नहीं?
जवाब : गुर्दे की पथरी पेशाब के रास्ते निकल सकती है, लेकिन इसका उपचार एलोपैथी में नहीं आयुर्वेद में है। यदि पथरी का आकार ज्यादा नहीं है तो आयुर्वेद की दवाओं से भी इलाज किया जा सकता है लेकिन चिकित्सक की सलाह पर।
सवाल : कई बीमारियों की जड़ कब्ज से कैसे बचा जा सकता है और इससे क्या-क्या बीमारियां हो सकती हैं?
जवाब : वास्तव में कब्ज कई बीमारियों की जड़ है और इसका मुख्य कारण वर्तमान में फास्ट फूड का कल्चर है। यह बीमारी पहले पश्चिमी देशों में ज्यादा होती थी लेकिन अब भारत में भी फास्ट फूड कल्चर आने से यह बीमारी आ गई है। इससे बचने के लिए जितना हो सके हरी सब्जियां, सलाद, फल, चोकर की रोटी खानी चाहिए। कब्ज से मुख्य रूप से बवासीर, भगंदर व फिशर बीमारियां हो सकती हैं। इनका प्रमुख लक्षण लैट्रिन में खून आना है।
सवाल : एसिडिटी और तेजाब बनने के कारण क्या है और यह कितनी खतरनाक है?
जवाब : एसिडिटी और तेजाब बनने का मुख्य कारण मिर्च, मसाला व तली और खट्टी चीजें खाना, चाय, बीड़ी, सिगरेट व शराब पीना है। जब एसिडिटी होती है तो पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द व जलन होती है तथा मुंह में खट्टा पानी आता है। इसका उपचार न कराने पर आंत फटने का डर रहता है।
सवाल : अपेंडिक्स क्या है और यह क्यों परेशान करता है?
जवाब : दरअसल यह शरीर का वेस्टिजल आर्गन है। कई कारण से इसमें पस पडऩे के अलावा इंफेक्शन हो जाता है, तब यह दिक्कत करता है। यह बच्चों में ज्यादा होता है और ऑपरेशन न कराने पर जानलेवा भी हो सकता है। इसमें खराबी होने पर पहले नाभि के चारों तरफ दर्द होता है और फिर पेट के दार्ईं तरफ निचले हिस्से में दर्द आ जाता है।
सवाल : पीलिया (हेपेटाइटिस) क्यों होता है और कितना खतरनाक है?
जवाब : पीलिया पित्त की थैली में पथरी के अलावा लीवर की खराबी के कारण होता है। हेपेटाइटिस ए और ई दूषित पानी व खाने से तथा हेपेटाइटिस बी और सी खून की खराब के कारण होता है जो खतरनाक है।

सेवक सभा अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक एवं वरिष्ठ फिजीशियन डॉ. बालकृष्ण गुप्ता से धूल-मिट्टी व प्रदूषण से होने वाले रोगों पर बातचीत।
सवाल : राजस्थान से सटे होने के कारण धूल-मिट्टी से जिले में कौन-कौन से रोग ज्यादा होते हैं?
जवाब : धूल-मिट्टी में मुख्य रूप से डस्ट माइट कीटाणु होता है जो अन्य परिस्थितियों के साथ मिलकर कई रोग पैदा कर देता है। क्षेत्र में धूल-मिट्टी के कारण मुख्य रूप से श्वास की एलर्जी, जुकाम, नजला, छींक आना, नाक बहना, साइनस व गला खराब रहने जैसी बीमारियां ज्यादा हो रही हैं। यह रोग ध्यान न देने पर दमे में भी बदल जाता है, जिससे यहां दमे के मरीजों की संख्या भी कम नहीं है।
सवाल : इस प्रकार के वातावरण में इन रोगों से कैसे बचा जा सकता है?
जवाब : इन रोगों का सबसे बड़ा उपचार बचाव ही है। इसके लिए धूल-मिट्टी के संपर्क में आते समय कुछ सावधानियां रखनी जरूरी है। जैसे मोटरसाइकिल पर चलने वाले व्यक्ति अपने नाक व मुंह पर रूमाल लगा सकते हैं। खासकर इस मौसम में जब फसलों की कटाई होती है, धूल-मिट्टी की समस्या ज्यादा बढ़ जाती है। यही नहीं सर्दियों में डस्ट माइट व धूल-मिट्टी के अन्य कीटाणु ज्यादा सक्रिय हो जाते हैं, जिसके कारण इन बातों का ज्यादा ध्यान देना पड़ता है।
सवाल : क्या घर की सफाई करते समय भी धूल-मिट्टी परेशान कर सकती है?
जवाब : हां, घर की सफाई के दौरान भी धूल-मिट्टी परेशान करती है, खासकर दीपावली व होली के दौरान जब पूरे घर की सफाई की जाती है। रुटीन में घर की सफाई करते समय भी नाक व मुंह पर कपड़ा जरूरी बांधना चाहिए। महिलाओं को खासकर आटा छानते समय भी इस प्रकार की सावधानी बरतनी चाहिए।
सवाल : खेत में काम करने वालों को फसल कटाई के समय क्या करना चाहिए?
जवाब : खेत में काम करने वालों को फसल कटाई के समय धूल से बचने के लिए नाक व मुंह को कपड़े से ढकना चाहिए। गांव में खासकर पशुओं का काम करने वाले लोगों को भी इस तरह का ध्यान रखना जरूरी है।
सवाल : साधारण जुकाम पर अक्सर लोग ध्यान नहीं देते, क्या यह खतरनाक है?
जवाब : सामान्यत: दवा लेने के बाद व न लेने के बाद भी तीन से चार दिन में जुकाम ठीक हो जाता है लेकिन अक्सर लोग दवा नहीं लेते जो कई बार खतरनाक हो जाता है। जुकाम का ध्यान न देने से कफ जमकर गला खराब हो जाता है और फिर छाती जम जाती है। इन परिस्थितियों में टांसिल की बीमारी होने का खतरा रहता है।
सवाल : क्या दमे के मरीजों को जिंदगी भर दवाओं और कृत्रिम आक्सीजन के सहारे रहना पड़ता है?
जवाब : अक्सर दमे के मरीजों का उपचार सालों चलता रहता है लेकिन मेडिकल साइंस में इसका उपचार है, बशर्ते सावधानी व परहेज रखा जाए। यदि कोई मरीज चिकित्सक के दिए गए निर्देश के अनुरूप दमे का उपचार कराए तो वह पूर्ण रूप से ठीक हो सकता है।
सवाज : दमे की बीमारी का पता कैसे लगता है?
जवाब : एलर्जी की शुरुआत से होने वाले दमे के रोग में श्वास का फूलना ही मुख्य लक्षण है जो धूल-मिट्टी में घूमने व सर्दियों के मौसम में ज्यादा तकलीफदेय हो जाता है। यदि ऐसा हो तो तुरंत चिकित्सक से मिलकर पीएफटी (प्लीमेनरी फंक्शन टेस्ट) कराना चाहिए।
सवाल : सर्दी से गर्मी और फिर गर्मी से सर्दी वाले बिगड़ते मौसम में कौन सी बीमारियां हो सकती है? ऐसे में क्या करना चाहिए?
जवाब : बिगड़ते मौसम में श्वास की एलर्जी के अलावा वायरल, सर्द-गर्म व छाती के जमने की समस्या मुख्य रूप से होती। इस बार की गर्मी में समय-समय पर आए बदलाव में यह समस्याएं काफी देखने को मिली। इस प्रकार के मौसम में लोगों को समयानुसार बचाव के साधन अपनाने चाहिए, जैसे ठंडे मौसम में सर्दी से बचाव तो गर्मी के मौसम में बाहर कम निकलना चाहिए।
सवाल : श्वास की एलर्जी वाले मरीजों को खाने-पीने में क्या सावधानी रखनी चाहिए।
जवाब : श्वास की एलर्जी सहित जुकाम, नजला, छींक आना, नाक बहना, साइनस व गला खराब वाले मरीजों को ठंडी, खट्टी व तली हुई चीजों से परहेज रखना चाहिए। इन मरीजों को न तो ज्यादा ठंडे पानी व अन्य पेय का इस्तेमाल करना चाहिए और न ही ज्यादा खट्टी चीजों का इस्तेमाल करना चाहिए।
सवाल : इस मौसम की सबसे प्रमुख बीमारी मलेरिया से बचाव के लिए क्या करना चाहिए?
जवाब : इस मौसम में अभी मलेरिया के काफी रोगी आ रहे हैं। इससे बचाव के लिए पूरे बाजू के कपड़े पहनने के अलावा रात को सोते समय मच्छरदानी व ओडोमोस का प्रयोग करना चाहिए। इसके अलावा घर के समीप पानी जमा नहीं होने दें। यदि हो तो उसमें मिट्टी का तेल डाल दें और कूलर की सफाई नियमित रूप से करें। इस दौरान यदि हल्का बुखार भी हो तो तुरंत मरीज की जांच करानी चाहिए।

मल्होत्रा अस्पताल के मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. अजय मल्होत्रा से नशे की प्रवृत्ति पर बातचीत
सवाल : नशे की बढ़ती प्रवृत्ति के कारण क्या है?
जवाब : प्रतिस्पर्धा के चलते बढ़ते मानसिक तनाव के अलावा उत्सुकतावश इनका सेवन शुरू करना, नशेड़ी दोस्तों के साथ रहना, घर में तिरस्कार मिलना व आपराधिक प्रवृत्ति तथा नशीली वस्तुओं और दवाइयां का आसानी से मिलना ही नशे की प्रवृत्ति के मुख्य कारण है।
सवाल : ऐसा क्यों हैं कि कुछ लोग नशा करके छोड़ देते हैं और कुछ लोग उसके आदी हो जाते हैं?
जवाब : नशे के कई कारण हैं जो इसकी आदत के लिए जिम्मेदार हैं। वंशानुगत कारण में खास तरह के जीन पाए जाते हैं जो व्यक्ति को नशे की लत के लिए प्रेरित करते हैं। इसके अलावा मनुष्य के दिमाग में एक प्लेजर सेंटर होता है, जो नशा लेने से ज्यादा एक्टिव हो जाता है जिससे बार-बार नशा करने की आदत बन जाती है। इसी प्रकार उदास रहने वाले, आपराधिक प्रवृत्ति तथा डिपे्रशन के शिकार लोगों में नशा करने की संभावनाएं ज्यादा होती हैं। डिप्रेशन के 3-4 प्रतिशत रोगी शराब की लत में पड़ जाते हैं।
सवाल : बुरी संगत नशे की लत के लिए किस हद तक जिम्मेदार है?
जवाब : नशेडिय़ों को अक्सर उनके घर से दुत्कार मिलती है, जिसके कारण उनका अपने घर से नाता टूट जाता है। इस प्रकार के व्यक्ति घर से बाहर रहते हैं तथा अपने जैसे व्यक्तियों की दोस्तों के रूप में तलाश करते हैं या अन्य को बना लेते हैं। इस प्रकार के व्यक्तियों की संगत ही बुरी होती है जो नशे की लत के लिए काफी जिम्मेदार है।
सवाल : नशे की आदत हो गई, कैसे पता चलता है?
जवाब : जब कभी-कभी शराब व धूम्रपान करने वाले व्यक्ति को यह लगना शुरू हो जाए कि वह उस पर शारीरिक या मानसिक रूप से निर्भर हो गया है तो यह आदत बन जाती है। मानसिक निर्भरता में नशे की हरदम इच्छा रहना, नशीले पदार्थ को पाने के लिए अधिक समय खर्च करना, नशीली वस्तुओं को पाने के लिए अधिक पैसा खर्च करना और आपराधिक वारदात और मारपीट करना तक शामिल हैं। दूसरी तरफ शारीरिक निर्भरता में नशे की मात्रा को लगातार बढ़ाते रहना या नशा न मिलने पर शरीर में विकार हो जाना लक्षण है।
सवाल : कौन-कौन से पदार्र्थों का नशे के रूप में प्रयोग किया जाता है?
जवाब : शराब, वाइन, बीयर, वोदका, रम, जिन, मारफीन, हिरोइन, स्मैक, सुल्फा, फोर्टबिन, भांग, चरस, गांजा, कैप्सूल, कोकीन, नींद की गोलिया, आयोडेक्स, वेक्स तक का नशे में प्रयोग कर लिया जाता है।
सवाल : नशे की लत को छोडऩा क्या वास्तव में कठिन है?
जवाब : ऐसा नहीं, आजकल आधुनिक दवाइयों से किसी भी प्रकार का नशा छुड़वाया जा सकता है परंतु सबसे अधिक जरूरी है आत्मविश्वास। जबरदस्ती अस्पताल में लाए गए मरीज का उपचार वैज्ञानिक तरीके से नहीं हो पाता। जब तक मरीज नशे से नफरत नहीं करेगा और वह स्वयं उसे छोडऩा नहीं चाहेगा, तब तक उपचार सफल नहीं हो पाता। मरीजों को बिना बताए खाने में दवाइयां देने से नुकसान ज्यादा और फायदा कम होता है।
सवाल : क्या नशे का एक बार उपचार कराने के बाद रोगी इसे फिर से शुरू कर देता है?
जवाब : उपचार के समय यदि मरीज का नशे को पूरी तरह छोडऩे का मन न हो तो वह उसे फिर से शुरू कर सकता है। कई बार नशे की लत छोडऩे वाले को घर में शक की नजर से देखा जाता है जिसके कारण उनमें अविश्वास की भावना आती है जो फिर से नशा करने के लिए प्रेरित करती है। इसके अलावा बुरी संगत को छोडऩे के बाद वापस उसमें जाने से भी नशा फिर से शुरू कर दिया जाता है।
सवाल : नशे की लत को पूरी तरह समाप्त करने के लिए किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
जवाब : नशेडिय़ों का उपचार कराते समय बीमार से नहीं बीमारी से घृणा करें, क्योंकि नशे की लत भी अन्य बीमारियों की तरह एक बीमारी है जिसे प्यार और विश्वास से दूर किया जा सकता है न कि मार या दुत्कार से। इसके अलावा नशा करने वाले की मानसिकता को समझाकर उसके दुष्परिणामों के बारे में अवगत कराएं और चिकित्सक से उपचार कराएं। यही नहीं नशे की लत दवाइयों के अलावा काउंसलिंग और साइकोथेरेपी से भी ठीक हो सकती है लेकिन वह इसके स्तर पर निर्भर करती है।

सोनी अस्पताल की बालरोग विशेषज्ञ डॉ. अर्चना सोनी से शिशुओं की देखभाल पर बातचीत
सवाल : जन्म के तुरंत बाद बच्चे की देखभाल कैसे करें?
जवाब : यदि बच्चा स्वस्थ है तो उसे अतिरिक्त देखभाल की जरूरत नहीं है। ऐसे में उसे मां के पास ही रखा जाना चाहिए। मां और बच्चे की शारीरिक निकटता इस आरंभिक अवस्था में महत्वपूर्ण होती है। गर्भाशय की गर्माहट से निकलकर जब बच्चा बाहर आता है तो उसे अच्छी तरह पोंछकर सूखे कपड़े में लपेटें और सूती व ऊनी कपड़े पहनाएं।
सवाल : नवजात शिशु को क्या आहार दें?
जवाब : नवजात शिशु का आहार तो केवल मां का दूध है। स्तनपान हर बच्चे का प्राकृतिक अधिकार है। आमतौर पर शुरू में दो-तीन दिन बच्चे को ग्लूकोज मिला पानी या ऊपर का दूध दिया जाता है जो गलत है, क्योंकि एक स्वस्थ शिशु की शुरू के एक-दो दिनों में दूध की जरूरत कम होती है। बच्चे को ऊपर का दूध देने से संक्रमण होने की संभावना बढ़ जाती है। वैसे किसी भी मौसम में स्तनपान करने वाले बच्चे को चार माह तक पानी की जरूरत नहीं होती।
सवाल : शिशु की किन बातों को सामान्य व किस को असामान्य मानें?
जवाब : शिशु यदि 24 घंटे के अंदर मल का त्याग न करें। वैसे दो-तीन दिन तक मल काला और चिकना होता है, उसके बाद यह रंग बदलकर सुनहरे पीले रंग का और ढीला हो जाता है। बच्चा जब भी दूध पिए या हवा निकाले तो कई बार थोड़ा सा दस्त होना सामान्य बात है। इसी प्रकार 48 घंटे में बच्चा पेशाब न करें तो तुरंत चिकित्सक को दिखाएं। इसी प्रकार नवजात शिशु ज्यादातर समय सोता है लेकिन छूने से जाग जाता है तथा शुरू के कुछ सप्ताह शिशु दिन में सोता है और रात को जाग जाता है।
सवाल : बच्चे का सामान्य विकास किस प्रकार होता है?
जवाब : जन्म के समय बच्चे का वजन ढाई से तीन किलोग्राम के बीच होता है। शुरू के के तीन-चार माह में शिशु का वजन 750 ग्राम से एक किलोग्राम हर महीने बढ़ता है। इसलिए जब भी टीकाकरण के लिए शिशु को अस्पताल लेकर जाएं, उसका वजन जरूर कराएं और उसका बाकायदा चार्ट बनाएं।
सवाल : शिशु के लालन-पालन में पिता की क्या भूमिका होनी चाहिए?
जवाब : बच्चे की देखरेख माता को थका देेने वाला काम है। इसलिए पिता को चाहिए कि इस कार्य में अपनी पत्नी का हाथ बटाएं तथा जब भी आप बच्चे को डॉक्टर के पास या टीका लगवाने के लिए लेकर जाएं तब आप दोनों बच्चे के साथ जाएं।
सवाल : शिशु को छह माह के बाद क्या आहार दें?
जवाब : छह माह तक मां के दूध पर रखने के बाद शिशु को वह हर नरम आहार खिलाएं जो घर पर बनता है। ध्यान रहें एक वर्ष के बच्चे को वयस्क व्यक्ति से आधी खुराक की जरूरत होती है। बच्चे को खाना खिलाने के लिए उसके पीछे भागने के बजाय अपने साथ बिठाकर अलग बर्तन में उसे खाना दें ताकि वह स्वयं खाना सीखे। शिशु को सिर्फ दूध पर रखने से उसमें हिमोग्लोबिन की कमी हो जाती है, इसलिए उसे गुड़ व चना आदि देना तथा अनार का जूस पिलाना बेहतर रहता है।
सवाल : बच्चे मिट्टी व अन्य वस्तुएं क्यों खाते हैं?
जवाब : जब बच्चे को दूध पर ही रखा जाता है तो उनमें खून की कमी हो जाती है, दूध में आयरन की मात्रा काफी कम होती है। खून की कमी के कारण ही बच्चा मिट्टी, कागज आदि खाने जैसी असामान्य हरकतें करने लगता है जिसे वैज्ञानिक भाषा में पाइका कहते हैं। इसके लिए तुरंत चिकित्सक से संपर्क करें और आयरन की अधिक मात्रा वाला खाना खिलाएं।

खेतरपाल अस्पताल के संचालक डॉ. एनके खेतरपाल से नशे से जुड़ी बीमारियों के बारे में बातचीत
सवाल : नशा क्या है और शराब पीने वाले किस व्यक्ति को शराबी कहा जा सकता है?
जवाब : ऐसे पदार्थ जो दिमाग में हलचल पैदा कर रासायनिक क्रिया से खुशी प्रदान करें, उसे नशा कहते हैं लेकिन शराब पीने वाले हर व्यक्ति को शराबी नहीं कहा जा सकता। यदि कोई व्यक्ति तय मात्रा से ज्यादा शराब पी लें और बाद में जब गिल्टी फील करे या उसका काम बाधित होने लगे, उसके बिना रह न सके तो वह व्यक्ति शराबी है।
सवाल : कैसे पता चले कि कोई व्यक्ति शराबी हो रहा है?
जवाब : यदि कोई व्यक्ति शराब के बारे में सोचने लगे और उसी के बारे में बातें करें, शराब पीने की मात्रा बढ़ जाए, जल्दी में शराब पीना, आराम करने के लिए शराब पी लेना, अकेले में शराब पीना, शराब पीते समय होने वाली घटनाओं को भूल जाना, शराब न पीने से कोई शारीरिक परेशानी शुरू होना जैसे लक्षणों में से तीन-चार हों तो, समझ लो शराब पीने वाला व्यक्ति शराबी हो गया है।
सवाल : क्या अन्य बीमारियों की तरह नशे का कारण भी अनुवांशिक है?
जवाब : जीं, हां नशा भी अन्य बीमारियों की तरह एक बीमारी है और यह बीमारी अनुवांशिक कारण से भी हो जाती है। यदि किसी व्यक्ति के पूर्वज नशे के आदी हो उसमें नशे की लत लगने की संभावना काफी ज्यादा होती है लेकिन यदि वह नशा छुए भी न तो उसे यह लत नहीं लग सकती। एक बार नशा कर लेगा तो यह लत लग जाएगी।
सवाल : नशेड़ी की मर्जी के बिना क्या नशा छुड़ाया जा सकता है, इसके लिए प्रचलित दवाइयां कितनी ठीक है?
जवाब : कुछ अपवादों को छोड़कर नशेड़ी की मर्जी के बिना नशा नहीं छुड़वाया जा सकता है लेकिन नशेड़ी को यदि चिकित्सक के पास लाया जाए तो उसमें नशा छोडऩे की इच्छा पैदा की जा सकती है। वैसे नशेड़ी को देखे बिना सिर्फ दवा से उसकी मर्जी के बिना नशा छुड़वाना गलत है, ऐसे मामलों में साइड इफेक्ट भी हो सकता है।
सवाल : स्कूल जाने वाले बच्चों का परिजनों को कैसे पता चले कि वे नशे के आदि हो चुके हैं?
जवाब : नशे की लत में पडऩे वाले स्कूल और कालेज मेंं जाने वाले बच्चों की उपस्थिति कम हो जाती है उनकी कार्य कुशलता का स्तर गिर जाता है। इसके अलावा अधिकतर मामलों में नशेड़ी की आंख लाल, आंखों के नीचे पलकों में सोजिश, जुबान का तुतलाना, भूख और वजन का कम होना, चाल में परिवर्तन आना, बहुत अधिक पसीना आना। इसी प्रकार मानसिक परिवर्तन में गुस्से के दौरे उठना, आलस्य रहना, नींद कम आना, यादास्त कम होना, एकाग्रता शक्ति कम होना, स्नेह संबंधों का कम होना आदि शामिल हैं।
सवाल : नशेडिय़ों की दिनचर्या में किस तरह का बदलाव आता है?
जवाब : नशेड़ी युवकों या व्यक्तियों के कपड़ों पर खून के निशान मिलना, कमरों में सिरिंज व विचित्र पैकेट मिलना, संडास में अधिक समय बीताना, बहानों से जेब खर्च की मांग बढ़ाते जाना, घर में कीमती वस्तुओं और पैसों की चोरी होना, पारिवारिक वार्तालाप से बचना और उबासिया और अंगड़ाइयां लेना। इस तरह के परिर्वतन आए तो पता लगाना चाहिए कि संबंधित व्यक्ति कोई नशा तो नहीं कर रहा।
सवाल : अफीम का नशा कितना खतरनाक है, क्या इसे छुड़ाया जा सकता है?
जवाब : अफीम का नशा न सिर्फ व्यक्ति के शरीर को नकारा बना देता है बल्कि अफीम पर उसका खर्च आमदनी से बहुत अधिक हो जाता है। यदि यह न मिले तो संबंधित व्यक्ति के शरीर में दर्द होना, नींद न आना, दिल घबराना, श्वास का चढऩा, खून की कमी होना, बुखार होना, दस्त लगना, आंख व नाक से पानी बहना आदि की शिकायत मिलनी शुरू हो जाती है। इसे व्यक्तिगत नियंत्रण से स्वयं अपने आप धीरे-धीरे अफीम की मात्रा कम करके भी छोड़ा जा सकता है। चिकित्सक से उपचार करवाकर इसे एक साथ छोड़ा जा सकता है।
सवाल : धूम्रपान से शरीर को किस प्रकार हानि होती है?
जवाब : दरअसल धूम्रपान के धुएं में तीन हजार से अधिक तत्व होते हैं जिनमें 90 प्रतिशत गैस तथा 10 प्रतिशत ठोस तत्व होते हैं। 30 पदार्थ ऐसे होते है जो कैंसर के कारक हैं जो शरीर के अंदर जाकर चिपचिपा पदार्थ बन जाते हैं, जो श्वास की नली पर जमा होकर श्वास क्रिया को प्रभावित करते हैं। दस सिगरेट पीने से 180 ग्राम तार फेफड़े में जमा हो जाता है। इसी प्रकार निकोटिन की तुलना फसलों में छिड़काव किए जाने वाले कीटनाशक से की जाती है।

आयुष्मान क्योर एंड केयर सेंटर के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. अशोक वर्मा से सर्दियों में बच्चों को होने वाली बीमारियों पर बातचीत
सवाल : गर्मी से सर्दी में बदलते इस मौसम में बच्चों को कौन सी बीमारियां हो सकती हैं?
जवाब : इस मौसम में बच्चों को अक्सर वायरल से होने वाली बीमारियों उल्टी, दस्त, खांसी, निमोनिया, खसरा, चिकनपाक्स हो सकते हैं। इसके अलावा मच्छरों से होने वाली मलेरिया व डेंगू बीमारी की दस्तक का भी यही मौसम है। इस मौसम में बच्चों को एलर्जी से होने वाली बीमारियां जैसे दमा, नजला, जुकाम, चमड़ी की एलर्जी और खुश्क त्वचा आदि भी होती है।
सवाल : वायरल से होने वाली बीमारियों से बचाव के लिए क्या सावधानी बरतें?
जवाब : वायरल की बीमारियों से बचाव के लिए बच्चों को सर्दी से बचाना जरूरी है। इसके लिए बच्चों को गर्म कपड़े पहनाना चाहिए, ठंडी चीजों से परहेज कराना चाहिए। इसके अलावा परिवार का कोई भी बीमार व्यक्ति बच्चों के संपर्क में न आए तथा मच्छरों से बचाव के लिए मच्छरदानी व क्रीम का प्रयोग करें। घर के समीप पानी एकत्रित न होने दें।
सवाल : दमा की बीमारी में अक्सर इन्हेलर के प्रयोग से लोग कतराते हैं, क्या यह भ्रांति है?
जवाब : इन्हेलर के प्रयोग में सबसे प्रचलित भ्रांति यह है कि इसका प्रयोग करने से मरीज इसका आदी हो जाता है, जो बिल्कुल गलत है। इन्हेलर तो सबसे सुरक्षित तरीका है तथा इसके प्रयोग से शरीर में हजार गुणा कम दवा जाती है, क्योंकि इन्हेलर में प्रयोग होने वाली दवा की मात्रा माइक्रोग्राम में होती है, जबकि अन्य दवा मिलीग्राम में ली जाती है।
सवाल : सर्दियों में एलर्जी के कारण होने वाली खुश्क त्वचा का बचाव कैसे करें?
जवाब : बच्चों की त्वचा यदि खुश्क होने लगे तो उस पर घर में उपलब्ध वैसलीन का इस्तेलाम करें। शिकायत ज्यादा हो तो तुरंत चिकित्सक की सलाह से कोई उचित एमोलिएंट का प्रयोग करें।
सवाल : उल्टी-दस्त में किन बातों का ध्यान देना जरूरी है?
जवाब : उल्टी-दस्त और टायफाइड में अक्सर लोग बच्चों का खाना-पीना बंद कर देते हैं जो गलत है। खाना-पीना बंद करने से ठीक होने के बजाय बच्चा ज्यादा बीमार हो जाता है। इन बीमारियों में बच्चों को जितनी भूख हो, उतना खाना देना चाहिए।
सवाल : बुखार में अक्सर बच्चों को नहलाया नहीं जाता, यह कहां तक ठीक है?
जवाब : बुखार में बच्चों को नहलाना जरूरी है। यदि बच्चों को नहलाया नहीं जाता तो उनके शरीर के रोम छिद्र बंद रहते हैं जिससे उनके शरीर का तापमान बढ़ जाता है। हालांकि बच्चों को बुखार में गर्म पानी से ही नहलाना चाहिए।
सवाल : स्वस्थ बच्चे को चिकित्सक के चेकअप की जरूरत है या नहीं?
जवाब : स्वस्थ बच्चे को भी चिकित्सक के चेकअप की जरूरत है। पहले साल हर माह, दूसरे साल तीसरे माह और बाद में छह-छह माह के अंतराल पर स्वस्थ शिशु का भी चेकअप कराना चाहिए।
सवाल : बच्चे को किस उम्र में स्कूल में दाखिला दिलाना चाहिए?
जवाब : बच्चा जब पांच वर्ष का हो जाए तब प्रथम कक्षा में होना चाहिए। हालांकि प्ले स्कूल में बच्चों पहले दाखिला दिलाया जा सकता है, बशर्ते वहां पर पढ़ाई न कराई जाए।
सवाल : बच्चों को आहार कितना और क्या देना चाहिए?
जवाब : छह माह तक के बच्चे को मां का दूध पिलाएं और बाद में मां तभी दूध पिलाए, जब छाती भारी हो जाए जो कम से कम छह घंटे में होती। इस दौरान बीच में बच्चों को सूजी की खीर, दलिया, बिस्कुट, केला, आम व चीकू दिया जा सकता है। 10 माह के बाद रोटी भी दी जा सकती है लेकिन सख्त चीजें न दें और बाकी सभी चीजें खिलाएं। एक साल के बच्चे को मां की खुराक से आधी तो दो साल के बच्चे को पिता की खुराक से आधी खुराक की जरूरत होती है।
सवाल : बच्चों में टीकाकरण कितना जरूरी है, इसमें क्या ध्यान रखें?
जवाब : बच्चों में टीकाकरण दरअसल बीमारियों से बचाव के लिए काफी जरूरी है। वैसे तो काफी टीके आ गए हैं लेकिन सरकार के स्तर पर लगाए जाने वाले टीकेलगवाने ही चाहिए। यदि संभव हो तो हेपेटाइटिस बी, एचआईबी, (दोनों डीपीटी के साथ पहले छह माह में) हेपेटाइटिस ए (एक साल के बाद), चिकनपॉक्स (एक साल पर), एमएमआर (15 माह पर) का टीका अपने स्तर पर भी लगवा लेना चाहिए। अक्सर लोग डीपीटी की डेढ़ और पांच वर्ष की उम्र पर लगने वाली खुराक भूल जाते हैं, जो बहुत जरूरी है। यदि मां को या परिवार के सदस्यों को कोई बीमारी हो तो चिकित्सक को अवश्य बताना चाहिए ताकि बच्चे का बचाव किया जा सके।

वीके न्यूरो केयर अस्पताल के न्यूरो सर्जन डॉ. वीके गुप्ता से दिमाग की बीमारियों पर बातचीत
सवाल : दिमाग से संबंधित रोग कितने प्रकार के होते हैं?
जवाब : चोट के कारण होने वाले (ट्रॉमेटिक) और बिना चोट के होने वाले (नान ट्रॉमेटिक) दिमाग से संबंधित रोग दो प्रकार के होते हैं। नान ट्रामेटिक रोग में सोजिश और रसोली (कैंसर वाली रसोली और बिना कैंसर वाली रसोली) वाली बीमारी होती है। इसके अलावा उम्र के साथ होने वाली बीमारी जिसमें लकवा, ब्रेन हेमरेज व दिमाग में पानी भरना और रीढ़ की हड्डी की टीबी आदि प्रमुख है।
सवाल : दिमाग की इन बीमारियों के कौन से लक्षण मुख्य हैं?
जवाब : उपरोक्त सभी बीमारियों में बेहोश हो जाना, सिर दर्द होना, आंखों की रोशनी का कम होना, हाथ और पांव का काम करना बंद कर देना, चलने में दिक्कत आना व मुंह का टेढ़ा हो जाना मुख्य लक्षण है। इसके अलावा रीढ़ की हड्डी की टीबी होने पर कमर या गर्दन में दर्द होता है तथा हाथ व पांव में कमजोरी, सूनापन आ जाता है। इसका मुख्य लक्षण मल व पेशाब का नियंत्रण खो जाना भी है।
सवाल : दिमाग की किन बीमारियों से बचा जा सकता है और कैसे?
जवाब : टेंशन को कम करके दिमाग की आधी बीमारियों से बचा जा सकता है। इसके अलावा दिमाग की लकवा बीमारी से कुछ सावधानी बरत कर बचा जा सकता है। इस रोग के लक्षण भी हृदय रोग की तरह ही डायबिटिज, हाई ब्लड प्रेशर व हाई कोलेस्ट्राल हैं। ये बीमारियां हो तो तुरंत चिकित्सक की सलाह पर चिकनी वस्तुओं का परहेज करें और तुरंत न्यूरो सर्जन से जांच कराएं कि लकवे की शिकायत तो नहीं है।
सवाल : सामान्यत: दौरों में लोग झाड़-फूंक के चक्कर में पड़ जाते हैं, यह कितना सही है?
जवाब : दौरों की बीमारी चाहे वह मिर्गी का दौरा हो या अन्य, यह सिद्ध हो चुका है कि दिमाग में दिक्कत आने से होती है, न कि कोई दैवीय आपदा के कारण, इसलिए इस बीमारी में झाड़-फूंक के चक्कर में पडऩे के बजाय चिकित्सक द्वारा बताई जाने वाली दवा का नियमित सेवन करें। यदि दवाइयां नियमित रूप से ली जाती हैं तो यह बीमारी ठीक हो जाती है।
सवाल : सामान्य व्यक्ति को दिमाग की बीमारियों का वहम मिटाने के लिए क्या जांच करानी चाहिए?
जवाब : जब तक किसी व्यक्ति में दिमाग की बीमारी के लक्षण दिखाई न दें, तब तक किसी प्रकार की जांच कराने की जरूरत नहीं है। ब्रेन हेमरेज (अचानक मौत) का वहम मिटाने के लिए दिमाग की एंजियोग्राफी कराई जा सकती है। दूसरी तरफ दिमाग की बीमारी का कोई भी लक्षण दिखाई दें तो तुरंत चिकित्सक से संपर्क करके उचित जांच करानी चाहिए।
सवाल : सिर दर्द में आमतौर पर लोग प्रचलित दवाइयां लेते हैं, यह कितना सही है?
जवाब : सिर दर्द दिमाग की बीमारियों का मुख्य लक्षण है। इस बीमारी में प्रचलित दवाइयां लेकर सिर दर्द तो ठीक कर लिया जाता है लेकिन बिना चिकित्सक की सलाह के ली गई दवाइयों के साइड इफेक्ट के खतरे के अलावा बिना जांच के अन्य दिमाग की बीमारियों की जानकारी भी नहीं मिल पाती, जो भविष्य में समस्या पैदा कर देती है।
सवाल : लकवे में दी जाने वाली प्रचलित दवा आरटीपीए क्या है और इसका क्या फायदा है?
जवाब : लकवे की आरटीपीए दवा देश में ढाई-तीन वर्ष पहले ही आई है और यह ब्रेन स्ट्रोक के मामले में कामयाब है। ब्रेन स्ट्रोक के तीन घंटे के अंदर यदि मरीज को यह दवा दे दी जाए तो उसे पूरी तरह वापस किया जा सकता है। यदि यह दवा न मिले तो लकवे का बढऩा, आंतडिय़ों, पेट और दिमाग से ब्लीडिंग होने जैसी दिक्कत शुरू हो जाती है।
सवाल : आरटीपीए दवा क्या ब्रेन स्ट्रोक के हर मरीज को दी जा सकती है?
जवाब : नहीं यह दवा हर मरीज को नहीं दी जा सकती। जिस मरीज के सीटी स्कैन या एमआरआई में ब्रेन में नुकसान मिले, ब्लड प्रेशर अनियंत्रित मिले, मरीज में खून के जमने की ताकत सामान्य न हो, छह सप्ताह तक कोई ऑपरेशन हुआ हो तो यह दवा जानलेवा हो सकती है। उपरोक्त जांच एक घंटे के अंदर हो जाती है और चिकित्सक के पास यदि मरीज को दो घंटे के अंदर लाया जा सके तथा एक घंटे में इन जांच को कराकर मरीज को इसके होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है।

मेट्रो अस्पताल के न्यूरो सर्जन एमसीएच डॉ. आर कुमार से बातचीत
सवाल : सड़क दुर्घटना में सिर में गंभीर चोट में लगने पर क्या करें?
जवाब : सिर में चोट लगने पर सबसे महत्वपूर्ण बात मरीज को जल्दी से जल्दी सुविधा संपन्न ट्रामा सेंटर तक लाना है ताकि उसे सिर में लगी चोट से अन्य नुकसान कम से कम हो। इस मामले में समय का फैक्टर जितना महत्वपूर्ण है, उतना कुछ नहीं है।
सवाल : गंभीर रूप से घायल मरीज को वेंटीलेटर पर क्यों रखा जाता है?
जवाब : गंभीर रूप से घायल मरीज ठीक से श्वास नहीं ले पाता, जिसके कारण सिर की चोट के बाद शरीर के अन्य अंगों में चोट का असर आ जाता है। मरीज को कृत्रिम श्वास देने के लिए ही उसे वेंटीलेटर पर रखा जाता है। वेंटीलेटर में विशेषज्ञ इस बात का ध्यान रखता है कि उसे एक मिनट में कितनी बार श्वास देना है तथा उसकी पल्स रेट क्या रखनी है।
सवाल : सिर की चोट से गंभीर रूप से घायल मरीज को किस अस्पताल में ले जाना चाहिए?
जवाब : सिर की चोट से गंभीर रूप से घायल मरीज को ऐसे अस्पताल में ले जाना चाहिए जहां पर वेंटीलेटर, सिटी स्कैन व न्यूरो सर्जन की सुविधा एक ही परिसर में हो ताकि उपचार या ऑपरेशन में समय का ध्यान रखा जा सके। मरीज को एक जगह से दूसरी जगह शिफ्ट करते समय एंबुलेंस में भी यह सुविधा होनी चाहिए।
सवाल : सिर की चोट में उपचार के लिए एबीसी को आधार बनाया जाता है, यह क्या है?
जवाब : एबीसी में ए का मतलब एयर वे मैनेजमेंट, बी का मतलब ब्रेथिंग और सी का मतलब सर्कुलेशन है। एयर वे मैनेजमेंट में इस बात का ध्यान रखा जाता है कि मरीज को आक्सीजन लेने में दिक्कत तो नहीं आ रही है। यदि आ रही है तो कृत्रिम श्वास की व्यवस्था की जाए। मरीज की गंभीर अवस्था में यदि दिमाग तक आक्सीजन नहीं पहुंचती तो दिमाग को और ज्यादा नुकसान हो जाता है। इसी प्रकार ब्रेथिंग में मरीज की श्वास प्रक्रिया का पूरा ध्यान रखा जाता है। इसी प्रकार सर्कुलेशन में बीपी और पल्स आदि का ध्यान रखा जाता है।
सवाल : सिटी स्कैन कराने के बाद भी कई बार मरीज की एमआरआई क्यों कराई जाती है?
जवाब : दरअसल इस बारे में मरीज के परिजन भ्रमित रहते हैं। वास्तव में सिटी स्कैन से दिमाग में खून के क्लाट व फ्रैक्चर का पता लगाया जाता है। यदि दिमाग में खून का कोई क्लाट या हड्डी में कोई फ्रैक्चर न मिले और मरीज फिर भी ठीक न हो तो दिमाग की अंदरूनी चोट का पता लगाने के लिए ही एमआरआई की जाती है। कई बार एग्जोनल चोट (अंदरूनी चोट) के कारण मरीज बेहोश हो जाता है, जिसके बारे में एमआरआई से ही पता चलता है। इसी से पता चलता है कि मरीज को कितने दिनों बाद होश आएगा या नहीं।
सवाल : सिर की चोट के बाद दूसरी समस्या से निपटने के लिए क्या कोई दवा नहीं है?
जवाब : इससे निपटने के लिए पहले कोई दवा नहीं थी लेकिन अब एरोवेन व सिटी काल्म इंजेक्शन की सहायता से दिमाग को होने वाले अन्य नुकसान से बचा जा सकता है।
सवाल : दिमाग की चोट के ठीक होने के बाद कितने दिनों तक दिमाग की बीमारियां हो सकती हैं?
जवाब : सिर की चोट का असर यदि दिमाग में हो जाए तो कम से कम एक साल तक दिमाग की अन्य बीमारी होने का खतरा रहता है। इसलिए ऐसे मरीज को एक वर्ष तक अपने न्यूरो सर्जन से सलाह लेते रहना चाहिए।
सवाल : सिर की चोट के उपचार के बाद कई बार मरीज के व्यवहार में काफी बदलाव आ जाता है, यह किस कारण होता है?
जवाब : उपचार के बाद आमतौर पर मरीज अग्रेसिव हो जाता है, चिड़चिड़ा रहने लगता है, झगड़ा करने पर उतारू हो जाता है लेकिन यह एक सामान्य प्रक्रिया है। कई बार तो मरीज अपनी याददाश्त भी खो देता है लेकिन ऐसी परिस्थितियों में घबराना नहीं चाहिए और शांत होकर उपचार कराना चाहिए।
सवाल : दिमाग की अन्य बीमारियों के लिए क्या-क्या बातें जिम्मेदार हैं?
जवाब : सिर की चोट के अलावा दिमाग की अन्य बीमारियों के लिए डायाबिटिज, उच्च रक्तचाप, हायपर टेंशन, एल्कोहल व स्मोकिंग, हाई कोलेस्ट्राल और एक ही स्थान पर बैठकर अपनी दिनचर्या पूरी करना जिम्मेदार है। इन सभी बातों से बचने के लिए हर व्यक्ति को सुबह के समय एक निश्चित अवधि तक सैर या व्यायाम करना चाहिए।
सवाल : किस सिर दर्द को दिमाग की बीमारी से देखकर जोड़ें और क्या करें?
जवाब : सिरदर्द वैसे तो 60 से 70 प्रतिशत तक व्यक्तियों में मिलता है लेकिन जो पुराना दर्द है, उसे गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है। यदि सिर दर्द के साथ उल्टी आए और उल्टी आते ही आराम मिल जाए। सिर दर्द के साथ आंखों के सामने धुंधलापन आए तो उसे गंभीरता से लेना चाहिए। इस प्रकार का दर्द दिमाग से संबंधित अन्य बीमारी का संकेत भी हो सकता है, इसलिए न्यूरो सर्जन से मिलकर आवश्यक जांच के बाद उचित उपचार कराना चाहिए।

होली अस्पताल के नाक कान व गला रोग विशेषज्ञ डॉ. सुभाष मित्तल से बातचीत
सवाल : ठंडे मौसम में नाक, कान व गले के मुख्य रोग क्या और क्यों होते हैं?
जवाब : ठंडे मौसम में जुकाम, नजला व सर्दी नाक के प्रमुख रोग है जिनके बढऩे से सूखी खांसी, छाती में घुटन व श्वास की बीमारी हो जाती है। इसका मुख्य कारण एलर्जी होती है लेकिन नाक की हड्डी के टेढ़ा होने, मांस बढऩे से नजला हो जाता है जो बाद में बाहर निकलने की बजाय गला, कान, साइनस में भी जा सकता है।
सवाल : एलर्जी किन लोगों में ज्यादा होती है?
जवाब : एलर्जी परिवार से एक दूसरे को चलती है लेकिन यह जरूरी नहीं है कि सभी को हो। इसके अलावा जिन लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है, उन्हें ठंडे मौसम में यह बीमारियां हो जाती है।
सयाल : एलर्जी से बचने के लिए क्या करना चाहिए?
जवाब : जिन लोगों को ठंड से एलर्जी है, उन्हें इस मौसम में सुबह बिस्तर से उठने से लेकर रात को बिस्तर में जाने तक एहतियात बरतने की जरूरत है। इन लोगों को अपने तकिए के पास जुराब लेकर सोना चाहिए ताकि सुबह उठते ही पहन लिए जाए और फर्श को कारपेट से कवर रखना चाहिए। सुबह नंगे पांव फर्श पर नहीं रखना चाहिए। बैड टी लेकर तुरंत बाद ठंडे पानी से पेस्ट नहीं करना चाहिए और गर्म पानी से नहाने के बाद संभव हो तो बाथरूम में ही कपड़े पहनने चाहिए यदि संभव न हो तो ड्रेसिंग गाउन का प्रयोग करें।
सवाल : एलर्जी का ऐलोपैथी उपचार क्या है?
जवाब : एलर्जी का एलोपैथी उपचार है। आजकल काफी बढिय़ा एंटी एलर्जी दवा आ गई है जिनका लंबे समय तक इस्तेमाल करने से भी कोई साइड इफेक्ट नहीं होता।
सवाल : एलर्जी का कोई टेस्ट है या नहीं?
जवाब : भारत में एलर्जी के टेस्ट उपलब्ध है लेकिन वह विदेशी तर्ज पर है, जो कारगर नहीं है। हालांकि चिकित्सक रोगी को देखने के बाद यह बता सकता है कि रोगी को किस चीज से एलर्जी है। एलर्जी का बचाव व उपचार है, टेस्ट बेहतर नहीं है।
सवाल : जुकाम क्या अपने आप ठीक हो जाता है, उपचार न लेने पर क्या हो सकता है?
जवाब : जुकाम अपने आप ठीक नहीं होता बल्कि दो घंटे के अंदर यदि एंटी एलर्जी टेबलेट ले जी जाए तो जुकाम उसी समय ठीक हो जाता है जो दवा न लेने पर बढ़ भी सकता है। इसका उपचार न कराने से साइनसों का संक्रमण, कानों का संक्रमण, गले का संक्रमण या आंखों के गिर्द संक्रमण व नासिका का चर्म संक्रमण जैसी जटिलताएं हो सकती हैं। इसलिए जुकाम के दौरान कान दर्द या माथे या गाल की हड्डियों में तीव्र दर्द होने पर तुरंत विशेषज्ञ से परामर्श लें।
सवाल : साइनस क्या है और इसमें क्या होता है?
जवाब : चेहरे की हड्डियों में स्थित खोखले भाग को साइनस कहते हैं। इनसे छोटी-छोटी अस्थिमय नलिकाएं नाक में खुलती है, जिनमें श्लेष्मा की सूजन से साइनसों में द्रव इक_ा होता है जो संक्रमित हो जाता है और साइनस की स्थिति के अनुसार चेहरे में गालों के साथ, माथे में दर्द होता है। गले में लगातार नाक के पीछे नजला गिरना, गले में खराश रहना, बार-बार नाक साफ करके बलगम थूकना के अलावा चेहरे में भारीपन या बार-बार सिर दर्द आदि लक्षण हो तो समझ लेना चाहिए कि क्रोनिक साइनस हो गया।
सवाल : श्वास की बीमारी का उपचार है या नहीं
जवाब : श्वास की बीमारी यदि नाक की हड्डी व मांस बढऩे के कारण हुई है तो उसका सटीक उपचार है लेकिन दूसरे कारणों में उपचार रोगी की स्थिति पर निर्भर करता है।
सवाल : लगातार मोबाइल व म्यूजिक सुनने से कोई परेशानी हो सकती है य नहीं।
जवाब : लगातार मोबाइल व म्यूजिक सुनने से कंट्यूनेस नोइज ट्रामा हो जाता है, जिसका कोई उपचार नहीं है और व्यक्ति बहरा हो सकता है। दूसरी तरफ सडन नोइज ट्रामा जो बम ब्लास्ट व तेज म्यूजिक से होता है, का उपचार संभव है।
सवाल : रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए क्या खाना चाहिए?
जवाब : रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए दालें, आलू, मटर, पनीर, दूध, अंडे, मछली व चिकन खाना चाहिए। बाजार में मिलने वाला अंडा वेजिटेरियन है क्योंकि उसमें चूजा नहीं होता और जिसमें जीव नहीं है, वह नोनवेज नहीं है। अंडे को हर व्यक्ति खा सकता है।

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