स्त्री विमर्श की सैद्धांतिकी 

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अभय कुमार दुबे ने ‘हंस ‘ के नवंबर -2009 अंक में प्रभा खेतान के बहाने नारीवाद की हिन्दी राजनीति पर गंभीरता से विचार किया है, और उन्होंने इस बात को रेखांकित किया है कि वर्जीनिया वुल्फ़ और सीमोन द बोउवा की प्रस्थापनाओं और फ्रांसीसी दार्शनिक परिदृश्य से बाहर निकलते हुए अपने जीवन के अंतिम वर्षों में प्रभा खेतान देशज नारीवाद की पूर्व पीठिका तैयार कर रही थीं । भूमंडलीकरण की आलोचना के सन्दर्भ में उन्होंने नारीवाद की जिन निष्पत्तियों का सूत्रीकरण किया वे फ्रांसीसी नारीवाद के संक्रामक प्रभाव से काफी कुछ मुक्त थी । स्त्री की संभावनाओं को उसकी जैविक अनिवार्यता या भिन्नता के खाँचे में रखकर देखते हुए भी वे जैविक तात्त्विकतावाद को समर्थन नहीं देती हैं । क्योंकि इसने विमर्श की गतिशीलता को काफी क्षति पहुँचाई। परिवार की संस्था को खारिज़ करने के बजाय उसे नारी मुक्ति के संघर्ष-क्षेत्र के रूप में देखती हैं । और उसमें स्त्री के अधिकाधिक अधिकारों की क्रमशः प्राप्ति की बौद्धिक जद्दोजहद से जूझते हुए एक नया परिवार बसाने का प्रयोग करती हैं, जो उनकी ज़िन्दगी के निजी दायरों को लगातार प्रभावित करता है । शायद इसीलिए उन्होंने पुराणों, धर्मशास्त्रों और स्मृतियों के अध्ययन का बीड़ा उठाया था । हमारे समय की बौद्धिकताएँ इसी व्यवहारिक पद्धति से चाय के प्याले में तूफ़ान उठाने की सीमाओं से निकलकर समाज को बदलने का औजार बनती हैं । यह सच है कि भारतीय नारीवाद का फलक बहुत विशाल और विविधतासम्पन्न है । इसकी घटनात्मकता में एक सतत प्रवाह है और अंतर्विरोध भी । अन्तर्विरोधों के बिना अग्रगति संभव नहीं है । हिन्दी नारीवाद की एक प्रस्थापना स्त्री-विमर्श को देह-विमर्श में रिड्यूस करती है, और दूसरी इस वैचारिकी को अधिकारों के विमर्श में ही सीमित कर देने की परियोजना अपना लेती हैं । जेंडर को क्लास के नेतृत्त्व में चलाने की परियोजना नाकाम हो जाने के बाद पुराने किस्म के मार्क्सवादी और बदलते हुए समाज के दबाव में स्त्री-पुरुष संबंधों को फिर से गढ़े जाने के आग्रह से आहत शुद्धतावादी भी अपना चोला बदलकर इसी एक ही जमात में बैठे हुए हैं । यह पक्ष स्त्री की यौनेच्छा को गौर करने के क़ाबिल ही नहीं मानता, जबकि वैकल्पिक यौनिकताओं के आंदोलन तथा खुद को सेक्स वर्कर घोषित कर चुकी वेश्याओं के घोषणापत्र की चुनौतियाँ जड़ीभूत सौन्दर्याभिरुचि को छेड़ती रहती हैं । अधिकारों की चौहद्दी नारी के अंतरंग जीवन में जैसे ही प्रवेश करती है, परिवार और विवाह की संस्था को प्रश्नांकित करती है । समाज पहले से कहीं अधिक रोमांटिक हुआ है, और नयी नारी यौन पवित्रता के पुरुष द्वारा निर्धारित मानकों पर खरी उतरने वाली नेक लड़कियों का शास्त्र बनने से ही संतुष्ट नहीं है । अधिकांश बौद्धिक विवाहिताएँ पुरुष के लिए खुद को सेक्स की सुरक्षित और सस्ती आपूर्ति का माध्यम भर महसूस करती हैं । इसलिए उन्हें लगता है कि जब तक पति के साथ उसके सम्बन्ध नए सिरे से नहीं गढ़े जाएंगे, तब तक वह बिना किसी भुगतान के अनिच्छित और प्रेमहीन सेक्स-वर्क करने के लिए मजबूर हैं । वी.एच. लॉरेंस और हेनरी मिलर ने साहित्यिक रचनाओं में आये यौन प्रसंगों की सत्ता समीकरणों के रूप में व्याख्या की थी । उसी प्रकार हिन्दी साहित्यके परकीया प्रेम की जाँच-पड़ताल करते हुए पूरे हिन्दी साहित्य की एक फेमिनिस्ट रीडिंग की मांग तेज हो गयी है । इसी नारीवाद के अन्तर्गत दलित नारीवाद अपने लिए एक अलग स्पेस की मांग कर रहा है । तेलगू की एक कवि ने कहा है कि दलित नारी को एक गाल पर ब्राह्मणवाद का और दूसरे पर पितृसत्ता का थप्पड़ खाना पड़ता है । ध्यातव्य है कि दलित पितृसत्ता गैर दलित समाज के साथ समतामूलकता के रेडिकल संघर्ष में उलझी हुई है । पर अपने समाज के भीतर स्त्री की समतामूलक दावेदारियों को दलित एकता में फूट का कारक मानती हैं । ओमप्रकाश वाल्मीकि कहते हैं की दलितों में तो लिंगभेद है ही नहीं तो अजय नावरिया मानते है कि पितृसत्ता का कुटेव तो दलित समाज में बाहर से घुस आया है वरना हमारे यहाँ तो चौतरफा लैंगिक जनतंत्र था । इस प्रकार दलित स्त्रियों की स्वतंत्रता को बाकायदा संहिताबद्ध बंदिशों के अधीन लाने के प्रयास चल रहे हैं । इसके विरोध में दलित समाज की स्वतंत्रचेता स्त्रियों को बाकायदा चप्पल तक उठानी पड़ी है । दलित स्त्रियों को लगता है कि नारीवादी आंदोलन पर ऊँची जाति की अंग्रेजी पढ़ी-लिखी स्त्रियों का कब्जा है, और वे अपनी जाति-अंधता को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं । नारीवादी आंदोलन का महाआख्यान भी दलित स्त्रियों की दावेदारी को उसकी नारी एकता में फूट मानती है । नारीवादी आंदोलन उस समय बुरी तरह अंतर्विरोधग्रस्त हो जाता है, जब उसे भूमंडलीकरण और बाजारवाद की संरचनाओं से दो-चार होना पड़ता है । सौंदर्य प्रतियोगिताओं, ब्यूटी-पार्लर संस्कृति और उपभोक्तावाद के खिलाफ एक्टिविज्म की प्रक्रिया उसे भूमंडलीकरण की दक्षिणपंथी आलोचना के नज़दीक ले जाती है । ज़रा सी फिसलन होती है औए इस तरह का नारीवाद स्त्री को अपनी ऐन्द्रिक इयत्ता के किसी भी तरह के प्रदर्शन से रोकने वालों के साथ खड़ा हो जाता है । मातृत्त्व का अतिशय मूल्यवर्धन परिवार की परंपरागत संरचना के आधारभूत घटकों में से एक है । मातृत्त्व स्त्री की खूबी है । पर नयी स्त्री अपनी इस नैसर्गिक विशेषता के साथ नए सिरे से संवाद स्थापित करने में लगी हुई है । वह इसे अपनी शख़्सियत की सीमा बनाने के लिए तैयार नहीं है । वह अपने बेटे को छाता थमाने के चक्कर में अपना जीवन नहीं गँवाना चाहती । वह मुर्गी की तरह केवल अंडे सेना नहीं चाहती । मातृत्त्व को नए सिरे से परिभाषित करना घरेलू आधुनिकता की पुनर्रचना करने के लिए अनिवार्य है । जहाँ तक भगिनीवाद का सवाल है, वह वर्ग और जाति के प्रश्नों के साथ सीधी मुठभेड़ किए बिना धरती पर कैसे उतारा जा सकता है । साथ ही उस पुरुष मनोविज्ञान को भी प्रश्नांकित करना होगा जिसके कारण सरेआम स्त्री का आखेट करने और उसे अपनी मर्दानगी के ठप्पे की तरह छापने-छपवाने वाले हिन्दी बुद्धिजीवी नारीवादी आक्रोश से साफ बच निकलते हैं ।
यहाँ यह कहना आवश्यक लगता है कि राजेन्द्र यादव, नामवर सिंह या रामशरण जोशी जैसे तमाम साहित्यिक बुद्धिजीवी अमेरिका के पूँजीवादी साम्राज्यवाद का तो विरोध करते हैं किन्तु रूस के समाजवादी साम्राज्यवाद को भारत के लिए बेहद मुफ़ीद मानते हैं । केवल पश्चिम के देशों की आधुनिकता ही भारत की आधुनिकता कैसे हो सकती है ! समस्त भारतीय संस्कृति के पुनर्मूल्यांकन और आयतन द्वारा भारत की आधुनिकता अपना अर्थ ग्रहण कर सकती है । अपने केंद्र में स्थित रहकर एक सचेतन प्राणी की तरह उसे आत्मसात करके ही हम उसका उचित और स्वस्थ उपयोग कर सकते हैं । आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी कहते हैं कि एक ऐसे समय में जब यूरोप और अमेरिका आदि कई साम्राज्यवादी देशों का हम पर हमला तेज हो गया है, अपनी राष्ट्रीय अस्मिता की रक्षा के लिए हमें अपने मौलिक ज्ञान-प्रतीकों और स्वाधीन कलादृष्टि पर विचार करना क्या ज़रूरी नहीं है ! क्या हम संस्कृति और साहित्य-कला आदि में भी पश्चिम के उपनिवेश बनकर जीने को तैयार हैं ! क्या किसी देश में मौलिक प्रतिभाएँ यही काम करती रही हैं ! दूसरी तरफ राजेन्द्र यादव का मानना है कि उपनिवेशवाद से मुक्ति स्त्रियों की मुक्ति नहीं थी, सिर्फ सवर्ण पुरुष व्यवस्था का स्वतंत्र होना था । और इसमें उनकी हैसियत खुद एक उपनिवेश की थी । एक ऐसा पॉवर गेम जहाँ अपनी रज़ामंदी से स्त्री कठपुतली बनकर स्वयं नाच रही है ।
राजेन्द्र यादव यह भी कहते हैं कि जिन कलावादियों ने राजनैतिक प्रदूषण से साहित्यिक शुद्धता को बचाने में ज़मीन-आसमान एक कर दिया था, उन्हें भी समझने में देर लगी कि एक बड़ी रणनीति में उनका सिर्फ उपयोग हो रहा था । गैर-राजनीतिक होने की घोषणाएँ स्वयं बड़ी राजनैतिक मोर्चाबंदी का हिस्सा थीं । नैतिक पुनर्शस्त्रीकरण और सांस्कृतिक स्वाधीनता के सारे पवित्र नारे अमेरिकन गुप्तचरों (CIA) द्वारा प्रायोजित अभियान थे । उन्हें लगता है कि विद्यानिवास मिश्र और लालकृष्ण आडवाणी इस राजनीति को आर-पार समझते ही नहीं, संचालित भी करते हैं । यहाँ नामवर सिंह का कथन याद आता है जो कहते हैं कि राजेन्द्र यादव की भाषा में अवांछित उग्रता तो है ही, सांस्कृतिक विपन्नता भी साफ-साफ परिलक्षित होती है । मध्यकालीन संत कवियों से लेकर रमेशचन्द्र शाह के लेखन तक को नखदन्तविहीन होने के कारण सत्ता के लिए उपयोगी और प्रतिरोधशून्य होने के कारण जड़ यथास्थितिवाद का उपकारक माना है । वस्तुतः स्त्री विमर्श उत्तरआधुनिकतावाद की संरचना में व्याप्त विखंडनवाद से परिस्फूर्त है । यद्यपि राजेंद्र यादव से मेरा संवाद कम, विसंवाद अधिक रहा, और स्वयं राजेन्द्र जी ने स्त्री विमर्श का स्त्रियों को अपने चंगुल में फँसाने के लिए उसी प्रकार उपयोग किया जैसे आज नारी- सशक्तीकरण के कानूनों का कई बार स्त्रियों द्वारा दुरुपयोग किया जाता है और निर्दोष पुरुषों को बेवजह प्रताड़ित किया जाता है । फिर भी राजेन्द्र यादव के विचारों में बहुत अधिक सच्चाई है । यादव जी कहते हैं कि आज साहित्य के सारे आधार बदल गए हैं । इसे पैराडाइम शिफ्ट का नाम दिया जाता है । निश्चय ही ये साहित्य से कलात्मक आनंद, आत्मा की मुक्तावस्था के दर्शन की मांग करने वालों के दुर्दिन हैं । अब यहाँ परोपजीवी श्रमचोर सुखासीनों के पासटाइम की गुंजाइश कम ही दिखाई देती है । यह साहित्य के सामंती युग का अंत है । इसे विचार, भविष्य, इतिहास मनुष्य के किसी भी अंत का सैद्धांतिक शोक प्रस्ताव माना जा सकता है । लोकतंत्र ने अतीतवादी साहित्य को भविष्योन्मुखी बना दिया है । विराट लोकजीवन अब अपनी जड़ स्थितियों को तोड़कर बेहतर भविष्य की आकांक्षाओं से आंदोलित हो रहा है । यह यातना, संघर्ष और सपनों को वाणी देने वाला युग है । विक्टोरियन नैतिकताओं और रोमांटिक वायवीयताओं के इस तरह से ध्वस्त होने से जो बुद्धिजीवी और लेखक हतप्रभ थे वे सपनीली रूमानियत के राजकुमार, राजकुमारियाँ स्वप्नभंग की इस कठोर धरती पर कैसे चलते । साफ था कि उन्हें नयी वास्तविकताओं से अपने समीकरण तय करने थे । लेकिन तभी लगे हाथ इन्हें एक शब्द ने बचा लिया और वह शब्द था ट्रांसेंडेन्स या देह से ऊपर उठने की उदात्तता । वस्तुतः यह अनेकस्तरीय आइडियलिज़्म और मैटेरियलिज़्म का पुराना द्वन्द्व था । प्रत्यक्ष को रूपक, प्रतीक और अन्योक्ति बनाकर आध्यात्मिक अर्थ देना, जैसे राधा-कृष्ण का संयोग ब्रह्म और आत्मा के सम्मिलन का प्रतीक बन जाता है । अनुभवी शासकों को सूट करता था कि वह प्रजाजनों को अमूर्तनों में उलझाकर उन्हें बौद्धिक कसरतों में फँसाए रहे ताकि उन्हें एक तरफ बौद्धिक श्रेष्ठता का भ्रम बना रहे, तो दूसरी तरफ शोषण-दमन की वास्तविकताओं का सैद्धांतिकीकरण किया जाता रहे । मुक्ति-संघर्ष से दूरी बनाए रखने की यह एक बारीक रणनीति है । इसका पर्दाफ़ाश एडवर्ड सईद ने किया था । सार्वभौमिकतावाद की रूमानी अवधारणाओं में साँस लेने वाली पुरानी पीढ़ी भावनाओं की बोल्डनेस और गोपन सुख की सांकेतिक अभिव्यक्तियों को कला और सुरुचि की स्मरणीय उपलब्धियों के रूप में देखती है । लेखन सतत खोज और शंकाओं की प्रक्रिया है । अपनी उपलब्धियों से संसार को चकित कर देने वाले समाज और साहित्य का प्रोटोकॉल नहीं निभा पाते । वर्जीनिया वुल्फ़ अपनी नितान्त भीतरी वर्जित दुनिया की चेतनप्रवाही कथाओं की आदि लेखिका भी हैं । एक घनघोर मर्दवादी सवर्ण संस्कृति के बीच रहना और हर क्षण पुरुष से अपनी रक्षा करते रहना ज़रूरी है और स्त्री पुरुष-छाते के नीचे ही पुरुष से रक्षा करने की विडम्बना की शिकार है ।गौरतलब है कि ‘हंस ‘ के रूप में राजेंद्र यादव ने स्त्री विमर्श को पुरुष-छाता ही पकड़ाया और वे नारी-अस्मिता को वेध्य बनाने वाली गलियों को साहित्य का हिस्सा मानते थे क्योंकि वे गालियाँ ज़िन्दगी का हिस्सा हैं। यह अलग बात है कि राजेंद्र यादव के विचारों की आलोचना भी उन्हें ‘गाली’ लगती थी। स्त्री का अपनी देह के साथ बेहद जटिल सम्बन्ध है । और हर क्षण यह बोध उसकी चेतना में पैबस्त है कि वह पुरुष की निगाह में कैसी लगेगी । स्त्री को एक अलग और सम्पूर्ण इकाई मानना पुरुष के लिए अपमानजनक लगता है । अपने को अखण्डित,अविभाज्य और समग्र रूप से देखे जाने का आग्रह ही उसे अशालीन, अश्लील और अनैतिक बनाता है । कितना बड़ा छद्म और आडम्बर है कि देहाचार के परिणामस्वरुप प्राप्त मातृत्त्व को स्त्री जीवन की सबसे बड़ी सार्थकता बताने वाले ही मातृत्त्व की इस वैध-अवैध प्रक्रिया को लेकर सबसे ज़्यादा हाय-तौबा मचाते हैं । गुलामी सुरक्षा तो देती है लेकिन सारे निजी स्वाधीन का अपहरण भी कर लेती है । पुरुष को समझना होगा कि स्त्री की मुक्ति ही सारे समाज की मुक्ति भी है । आज वह यह सवाल भी पूछना चाहती है कि सारे संस्कृति, धर्म और नैतिकता का बोझ उसी के कन्धों पर या शरीर को लेकर ही क्यों है ? आज हर सचेतन स्त्री अपने एक स्वतंत्र देश की राजदूत है । और नारी लेखन को ख़ूबसूरत ड्राइंग रूम से बाहर निकलकर अनेक माध्यमों से संसद से सड़क तक फैला देने की उद्यमिता आज दिखाई देने लगी है । अभिजात और लोक के द्वन्द्व में शहरी गतिहीनता और मध्यवर्ग का आत्मरक्षात्मक सत्ता-विमर्श इसमें बाधक है । जो कहते हैं कि लेखक सिर्फ लेखक होता है, वहाँ स्त्री-पुरुष का भेद करना गलत है और हम भारतीय हैं और विश्वनागरिक हैं जबकि यह सरासर झूठ है । हम जातियों, धर्मों, क्षेत्रों और वर्गों में बँटी हुई वास्तविकताएँ है जहाँ हर कोई वर्चस्व के लिए एक दूसरे को फूटी आँखों नहीं देख पा रहा है । यह नंगी सच्चाई है और बिना इन विषमताओं को हल किए हम न भारतीय बन सकते हैं न इंसान ।
          स्पष्ट है कि एक नए लोकतांत्रिक परिवार का स्थापत्य इसमें से निकलता हुआ दिखाई देता है किन्तु नितान्त भौतिकतावादी पश्चिमी दृष्टि से भारतीय सामाजिक यथार्थ को देखने की विडम्बना इसकी सीमा भी है । रोज तलाक के बढ़ रहे मामले और समलैंगिक संबंधों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा मान्यता प्रदान किया जाना प्रकृत समाज की चिंताएँ तो बढ़ाता ही है । साथ ही दलितों का अति दलितों के साथ छुआछूत और भेदभाव बरतने के समान ही स्त्री विमर्श का दलित स्त्री को स्पेस प्रदान करने में हिचक इसे अंतर्विरोध से भर देता है । कृष्ण गीता में कहते हैं कि समासों में मैं द्वन्द्व समास हूँ । स्त्री पुरुष के द्वंद्वात्मक संबंधों को इसी तरह देखा जाना चाहिए । उन्हें संयुक्ताक्षर की तरह आपस में जोड़ना है न कि तोड़ना है और प्रभा खेतान जैसों की हंस में प्रकाशित सार्वजनिक ‘आत्मस्वीकृतियाँ ‘ जो बाद में चलकर ‘मी टू’ में परिणत हो गईं , परिवार को तोड़ती ही हैं जोड़ती नहीं। स्त्री-विमर्श की एक विडंबना यह भी है कि वह ऐकान्तिक रूप से पुरुष को खलनायक के रूप में प्रस्तुत करती है और प्रकारान्तर से नारी को निर्दोष देवी के रूप में प्रतिष्ठित करती है। साथ ही देहमुक्ति के मुहावरे के रूप में बाजारवादी दौर में पुरुषों को एक ऐसा स्वर्णपिंजर उपलब्ध कराती है जिसमें पंछियों की तरह स्त्री खुद-ब-खुद आकर फंस जाती है जिसका लाभ राजेंद्र यादव जैसे लोग उठाने में सफल हो जाते हैं। स्त्री-विमर्शअनुभूति परक यथार्थ को सहानुभूति मूलक यथार्थ के सापेक्ष वरीयता प्रदान करता है, जो सही है किंतु सह अनुभूति अपेक्षाकृत अधिक व्यापक भाव-बोध है। अब समय आ गया है कि परिष्कृत अर्थों में इस विमर्श का पुनर्गठन करते हुए कलात्मक सौष्ठव और दायित्व-बोध के साथ इसे लेखन की मुख्य धारा का हिस्सा बनाया जाय।
                                      -अजित कुमार राय

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