सुश्री कंगना राणावत, अश्लीलता और जातिप्रथा

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कई पोस्ट देखने को मिली, जिसमें अभिनेत्री कंगना राणावत के हाफ नैकेड ग्लैमरस चित्र प्रदर्शन के साथ उनका विरोध किया गया है। ऐसे पोस्ट्स में कई एंगेल्स हैं और यदि कहीं किसी स्त्री ने ऐसे पोस्ट के साथ विरोध जताया है, तो और भी सावधानी से बात रखने की जरूरत हो जाती हैं। एक तो कंगना राणावत ने अपने को बग़ावती चरित्र का व्यक्ति बना रखा है। वह घर से विद्रोह किया। संस्था से विद्रोह किया। फ़िल्म इंडस्ट्री से भी विद्रोह किया। उनका एक विद्रोही चरित्र बन गया।
अभी कुछ दिन पहले उसने जातिप्रथा और आरक्षण पर विवादित बयान देकर अपने विरोधियों की संख्या और अधिक तैयार कर लिया। जाति और आरक्षण ऐसा मसला है जिससे दलित अधिक प्रभावित होता है इसलिए दलित साथियों के वाल पर कंगना राणावत के ऐसे चित्रों के साथ अनेक पोस्ट्स और कमेंट्स देखने में आई।
अभिनेत्री कंगना राणावत के ऐसे चित्र फ़िल्म की कहानी के पात्र चरित्र की जरूरत थी अथवा प्रोड्यूसर और डॉयरेक्टर ने दर्शकों के मसाला के लिए अभिनेत्री को फोर्स किया होगा या फिर कन्विंस किया होगा। जो भी सत्य हो लेकिन पूँजीवादी व्यवस्था में फ़िल्म भी मुनाफे का एक उद्योग है, पुरुषप्रधानता वहाँ भी हावी है। इस तरह का सीन क्रिएट करना स्त्री देह का शोषण करना तो है ही, पुरुष मानसिकता का दोहन करना अथवा पुरुष मानसिकता में स्त्री देह के ग्लैमर को फिट करना है।
किसी साथी का जाति और आरक्षण के मुद्दे पर कंगना के ग्लैमरस चित्र को प्रस्तुत करने का सीधा अर्थ यह है कि ये सवर्ण स्त्री, जिसने जाति और आरक्षण के प्रभाव को ख़ारिज किया है, ऐसे ग्लैमरस (अश्लील) पोज देकर क्षत्राणी बनने चली हैं। कहने का अर्थ एक तरफ क्षत्राणी हैं दूसरी तरह अश्लील। इन्हें दलितों पर ऐसे कमेंट से पहले अपनी सामाजिक स्थिति देखना चाहिए।
वैसे जब मैं कंगना के ग्लैमरस चित्र को अश्लील कह रहा हूँ तो मुझे इस बात का बिल्कुल भय है कि श्वेता सहित कोई भी स्त्री मुझसे यह कह दे कि आप की निगाहें अश्लील हैं, कंगना के चित्र नहीं। इस स्थिति में यह कहना जरूरी है कि यदि वह अश्लील नहीं है तो उसके और भी चित्र डाले जा सकते थे लेकिन ऐसा न करने का अर्थ उसकी इमेज के कंट्राडिक्शन को उभरना ही है। वैसे चित्र कहीं न कहीं उसके फिजिकल को लेकर ही हैं।
यहाँ स्त्री जाति को लेकर भी एक सवाल उभरता है। कंगना राणावत ने दलितों की अस्मिता के विरुद्ध बोला है, निश्चित दलित साथियों को उसके विरुद्ध बोलने का हक़ है लेकिन उसके स्त्री देह का प्रदर्शन नहीं होना चाहिए। इस तरह का प्रदर्शन स्त्री अस्मिता के विरुद्ध है।
अश्लीलता मेरे कपड़ों में नहीं तुम्हारी निग़ाहों में है
जब भी पुरुष स्त्री को उसके शौक-सिंगार, पहनने, ओढ़ने, उठने, बैठने, बोलने, चालने को लेकर नसीहत देता है अथवा नैतिकता से जोड़ता है, आधुनिक स्त्रियाँ मुँहफट होकर बोल देती हैं कि अश्लीलता मेरे कपड़ों में, पहनने-ओढ़ने में या मेरे तौर-तरीकों में नहीं है बल्कि तुम्हारी निगाहों में है, तुम्हारी मानसिकता में है और पुरुष या तो आपा खो बैठता है या फिर वार्ता बन्द कर देता है, जबकि विमर्श कभी भी बन्द नहीं किया जाना चाहिए और न विमर्श के दरवाजे ही बन्द किए जाने चाहिए। विमर्श करते वक्त कुछ सावधानियाँ वरतनी चाहिए। पारम्परिक स्त्री से बात कर रहे हैं तो उसकी परम्परा, उसकी भौतिक स्थिति तथा उसके मानसिकता का ख्याल रखिए। आधुनिक स्त्री से बात कर रहे हों तो यह देखिए कि वह नारीवादी है अथवा क्रान्तिकारी। स्वतंत्र और स्वक्छन्द स्त्री के मनोविज्ञान को भी समझिए। अलग-अलग स्तर हैं, अलग अलग दृष्टिकोण। सब को एक दृष्टि से जवाब देंगे तो गलत हो जाएगा।
सामान्य सी बात है जो स्त्री इतनी बोल्ड और आधुनिक है कि वह नारी की अर्धनग्न, नग्न, अश्लील, अंग, प्रत्यंग पोस्ट कर सकती है, तो इसका मतलब है कि वह पुरुषवादी मानसिकता को समझती है तथा पुरातन सभ्यता, संस्कृति, नीति, नैतिकता को तोड़ना चाहती है। वह जब इन चीजों पर सामान्य रह सकती है, तो पुरुष उन स्थितियों में सामान्य क्यों नहीं रहना चाहता है? इस स्थिति में आप सामान्य रहकर बात करेंगे/लिखेंगे तो स्त्री को बुरा बिल्कुल नहीं लगेगा लेकिन जब किसी स्त्री को उसके खुले अंगों की तरह इशारा कर के उसको अश्लील कहकर उसकी भर्त्सना करेंगे, तो इसका अर्थ वह यह लगाएगी कि जैसे आप जबरदस्ती उसको उसके अंगों को दिखाकर उसकी अस्मिता को ललकार रहे हैं अथवा उसी के सम्मुख उसकी बेइज्जती कर रहे हैं इसलिए एक स्त्री कह बैठती है कि हे पुरुष! इस चित्र में नहीं, तेरी आँखों में अश्लीलता है।
दरअसल, जो कुछ भी है, उसी के साथ मुद्दे पर बेबाक रहना ही न्याय है। मुद्दे पर रहते हुए हमें उसकी अनिवार्यता और निस्सारता पर तर्कपूर्ण ढंग से बात रखनी चाहिए।
यह सच है कि पुरुष दोहरे चरित्र में जीता है। एक तरफ स्त्रियों को उनके वक्ष ढकने की हिदायत देता है और दूसरी तरफ वह स्त्री के वक्ष को निहारता रहता है बल्कि वह स्त्री के लापरवाह होने की ताक में रहता है। यह बात स्त्री बखूबी जानती है। जब हम उसको नैतिक होने की सलाह देने लगते हैं तब वह समझ जाती है कि मेरे सोचने का केंद्र और इशारे की भूमि क्या है। हम नैतिक तो बनते हैं लेकिन वक्त मिलते ही हम वही करते हैं जिसको बड़ी नैतिकता के साथ हम एक स्त्री को मना करते हैं।
आज नारी पुरुष के हस्तक्षेप को उसकी प्रधानता और अपना दासत्व समझती है। आज स्त्री पुरुष के अनुसार न जीना चाहती है, न पहना चाहती है, न चलना चाहती है, न उठना-बैठना चाहती है। यहाँ तक कि वह अपने अंगों तक से स्वतंत्र रहना चाहती है। वह नहीं चाहती कि पुरुष यह कहे कि तुम बाल छोटे रखो या कि बड़े, तुम लिपिस्टिक लगाओ या कि न लगाओ, तुम साड़ी पहनो या कि सूट, तुम फुल जीन्स पहनो या कि हाफ नैकर। वह चाहे तो कोई भी गहना पहने, वह चाहे को कोई भी गहना न पहने। वह चाहे तो शर्त की बटन खोल के चले, कोई गम नहीं, कोई अश्लीलता नहीं। पुरुष बटन बन्द करने को कहोगे, तो वह बुरा मान सकती है और पुरुष पर अश्लील होने का इल्जाम लगा सकती है। वह उसकी देह है, उस देह को वह जिस तरह से रखना चाहती है, रखेगी। पुरुष का किसी भी तरह का हस्तक्षेप पुरुषप्रधानता है, अन्याय है, अश्लीलता है। स्त्री पुरुष के पहनने, ओढ़ने, बिछाने, चलने, फिरने, उठने, बैठने, निहुरने, लेटने, पलथी मारने, छींकने, थूकने, खाँसने, खखारने, हगने, मूतने, पादने में कोई आपत्ति नहीं करती है, तो पुरुष उसके किसी भी क्रिया का मापदंड क्यों तय करने लगता है? क्यों वह उसके स्वतंत्र क्रियाओं को अनुचित बताने पर उतारू हो जाता है? क्यों पुरुष स्त्री के क्रियाकलाप को अपनी इज्जत से जोड़ कर देखता है? यह सारी बातें आधुनिक स्त्रियों को बुरा लगता है इसलिए आधुनिक पुरुष को नारीवादी स्त्रियों से ठीक वैसे व्यवहार रखना और बातचीत करना चाहिए जितनी स्वतंत्र वह फील कराती और रहना चाहती है।
आरडी आनन्द

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