सामाजिक न्यायवाद जाति उन्मूलन की जगह जाति सशक्तीकरण की लड़ाई लड़ता है!

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सामाजिक न्यायवाद जाति उन्मूलन की जगह जाति सशक्तीकरण की लड़ाई लड़ता है जिसका चरम वंश और परिवार के सशक्तीकरण पर खत्म होता है। किसी का भी सशक्त होना यानी किसी के सापेक्ष मजबूत होना होता है जो बदलते समीकरण के अनुसार शोषण और शोषित का पक्ष बदल देता है। इसी प्रकार धार्मिक पुनरुद्धानवाद या शुद्धिकरण का चरम राज्यसत्ता पर नियंत्रण कर अन्य धर्मो को बलात प्रतिबन्धित करते हुए अपने अनुयायियों को असमानता की आध्यात्मिक स्वीकार्यता दिलाना होता है। इतिहास में उत्पीड़ित उत्पीड़क की भूमिका मे बदलते रहे हैं जिसके नजदीकी उदाहरण यहूदी या अफ्रीका की हूतू जाति या भारत मे हरित क्रन्ति से सशक्त हुई जातियां है। जाति तथा धर्म का उन्मूलन किसी भी भौगालिक इकाई को दो आयामी समाजिक रचना की तरफ ले जाता है जहां से समता स्वप्न न होकर कुछ दूर पर यथार्थ मे खड़ी दिखेगी और इस प्रकार की स्पष्टदृश्यता किसी भी प्रभुत्वशाली वर्ग के लिए खतरनाक होती है। जाति तथा धर्म के भौतिक आधार समाप्त हो जाने के उपरान्त भी उनके सांस्कृतिक अवशेष सदियों तक प्रचलित रहकर इस विभाजन की नैतिक स्वीकार्यता बनाए रखने का प्रयास करते रहते हैं। संस्कृति जीवन जीने की कला है और धार्मिक और जातिवादी राजनीति का निषेध वैकल्पिक सांस्कृतिक जीवन पद्धति के विकल्प की मांग भी करता है जिसको उपरोक्त दोनो प्रकार की राजनीति का विकल्प विरोध करने वाली राजनैतिक शक्तियों ने प्रस्तुत करने का सचेतन प्रयास नही किया है इसका परिणाम यह दिखता है कि धार्मिक और जातिवादी राजनैतिक शक्तियों की निषेध करने वाली राजनीति शीघ्र ही खोखलेपन का शिकार होकर क्षरित हो जाती है। समस्या यह है कि संस्कृति को रेडिमेड नही प्रस्तुत किया जा सकता है यह सदियों का अभ्यास होता है इसलिए इस क्षेत्र में परिमार्जन ही विकल्प है।ऐसा नही है कि शेष विश्व मे इसके लिए प्रयास नही किए गए लेकिन अभी असफलता दर ज्यादा है लेकिन घबराने की जरुरत नही है हवाई जहाज ही कहां हम चन्द बार में उड़ाना सीख लिए थे।
संतोष कुमार के ब्लॉग http://nutan-vikalp.blogspot.com/ से साभार

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