सहायक श्रम कमिश्नर ले रहा सरेआम मालिकों का पक्ष

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लुधियानाः लॉकडाउन की वजह से देश की मेहनतकश आबादी जीने-मरने की जद्दोजहद में लगी हुई। सरकारी मदद भी ना के बराबर ही मिल रही है। दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना मुश्किल हो गया है। सभी सरकारी दावे और ऐलान हवा-हवाई साबित हो रहे हैं।

लुधियाना के औद्योगिक मज़दूरों की हालत दिन-ब-दिन खराब होती जा रही है। बहुत सारे मज़दूरों को अभी तक मार्च महीने का वेतन भी नहीं मिला है। इस बारे में रोज़ ही टेक्सटाइल-हौज़री कामगार यूनियन के दफ्तर पर मज़दूरों के फोन आ रहे हैं। इसी के संबंध में संगठन ने श्रम विभाग को शिकायतें भेजी थीं। विभाग की ओर से फोन आया कि मालिक पैसे देने के लिए नहीं मान रहे, हमेशा की तरह इस बार भी मालिकों ने कह दिया कि ये मज़दूर हमारे पास काम नहीं करते।

इस ओर जब हमने सहायक श्रम कमिश्नर का ध्यान दिलाया कि “लुधियाना के ज़्यादातर कारखाने गैर-कानूनी चल रहे हैं, मालिक मज़दूरों को कोई पहचान-पत्र या हाज़िरी कार्ड जारी नहीं करते” तो उसका जवाब था कि “हम सभी मालिकों को जेल में तो बंद नहीं कर सकते”। जब संगठन की ओर से उससे पूछा गया कि “सरकारी घोषणा के अनुसार, मज़दूरों को मार्च महीने के पूरे वेतन के साथ ही अप्रैल महीने के 2500 रुपए भी मिलने थे, जिसे देने से मालिक मना कर रहे हैं?” तो उसका कहना था कि “मालिक पैसे नहीं दे सकते, उनकी ऐसी हालत नहीं है।” संगठनों की ओर से मज़दूरों के बुरे हालातों की तरफ ध्यान दिलाने पर उसने इतना ही कहा कि “हम डी.सी. साहब को चिट्ठी लिखकर हालात के बारे में बता देते हैं, पर होगा तो यही कि शिकायत फिर हमारे पास ही आएगी और तारीखों के लंबे चक्कर लगेंगे, जैसे कि इस तरह के केसों में होता है!” सरकारी ऐलानों के बारे में उसने कहा कि ऊपर वाले ज़मीनी हकीकतों को नहीं जानते, बस हुक्म जारी कर देते हैं। कुल मिलाकर सहायक श्रम कमिश्नर सरेआम मालिकों का पक्ष लेता नज़र आया।

आज लगाई गई पाँच शिकायतों में से तीन की कार्रवाई के बारे में जानकारी मिली है कि एक मालिक ने मज़दूर को अपना कारीगर मानने से इन्कार कर दिया; और एक मालिक से मज़दूर ने 12 हज़ार रुपए लेने हैं, पर श्रम विभाग के फोन पर उसने झूठ बोला कि “कुल 10 हज़ार थे, 5 दे दिए थे और बाकी 5 मैं अभी नहीं दे सकता क्योंकि मैं अस्पताल में हूँ।” पर मज़दूर के अनुसार उसने कुल 14 हज़ार लेने थे, मालिक ने 2000 दे दिए और 12000 बाकी हैं, मालिक अस्पताल में नहीं बल्कि घर पर है।” इस बात पर हमें हैरानी नहीं कि श्रम विभाग वालों ने फोन और “जांच-पड़ताल” करके मालिक की बात सच मान ली। इनका मज़दूरों के प्रति हमेशा से ही यही रवैया रहता है। सहायक श्रम कमिश्नर कार्रवाई करने और माहौल खराब होने की दुहाई देता रहा। लेकिन संगठन की ओर से भी ध्यान दिलवाया गया कि अगर श्रम विभाग ऐसे समय में भी मज़दूरों की अधिकार दिलवाने में सहायता नहीं करता, तो हालात तो फिर भी खराब होंगे।

अब हालात ऐसे हैं कि मज़दूर भुखमरी से जूझ रहे हैं, और कहीं भी सुनवाई नहीं हो रही, और अगर वे सड़कों पर उतर आए तो दोषी भी उन्हें ही ठहराया जाएगा।
मुक्ति मार्ग से साभार

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