सरकार का जनता के खिलाफ लंबी लड़ाई का एलान है एनआरसी

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प्रणव एन

देश के गृहमंत्री अमित शाह ने 20 नवंबर 2019 को राज्यसभा में बयान देकर साफ कर दिया कि उनकी सरकार पूरे देश में एनआरसी को लागू करेगी। यह नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने यह एलान बिना सोचे समझे किया। मामला सीएबी यानी सिटिजेंस अमेंडमेंट बिल का था जिस पर वहां बहस की जा रही थी। इसी बहस के बीच उन्होंने पूरे देश में एनआरसी लागू करने की बात कही तो जाहिर है, उनका इरादा यही था एनआरसी को सीएबी के साथ और सीएबी को एनआरसी के साथ जोड़कर देखा जाए। यूं भी सीएबी को चाहकर भी एनआरसी से अलग करके नहीं देखा जा सकता क्योंकि इसे पेश करने के पीछे एनआरसी का वह कड़वा अनुभव ही था जो असम में बीजेपी के गेमप्लान की ऐसी तैसी करने वाला साबित हुआ।

असम में (और देश के कई अन्य इलाकों में भी) विदेशी घुसपैठ का मसला उन कुछ गिने-चुने मुद्दों में शामिल है जो बीजेपी के वोट बढ़ाने के काम आते रहे हैं। अवैध घुसपैठियों का हौवा खड़ा करने से जहां ध्रुवीकरण में मदद मिलती है वहीं दो समुदायों के वोटरों में दूरी भी बढ़ती है। इससे ऐसा माहौल बनता है जो बीजेपी को अपने राजनीतिक हितों के अनुरूप लगता है। इसी वजह से बीजेपी शुरू से इस मसले पर न केवल जोर देती रही है बल्कि बिना किसी अध्ययन के घुसपैठियों की अविश्वसनीय संख्या भी बताती और इसे समय-समय पर बढ़ाती रही है। इसलिए ऐसा हुआ कि जब बीजेपी के वादों के अनुरूप और सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर असम में एनआरसी की अंतिम सूची तैयार हुई तो इसमें अपनी नागरिकता साबित न कर पाने वालों की संख्या (19 लाख) आम धारणा से काफी कम लगी। लोगों के बीच बीजेपी कार्यकर्ता करोड़ों घुसपैठियों की बात करते रहे हैं। इससे भी बड़ी बात यह कि इन 19 लाख में से 14 लाख हिंदू निकल आए। गौर करने की बात है कि असम के लोगों के लिए घुसपैठ की समस्या सांप्रदायिक प्रकृति की नहीं थी। उनका मतलब बाहर से आए लोगों से था। बीजेपी ने इसे हिंदू-मुस्लिम रूप में लिया और वह इसे इसी रूप में देश भर में पेश करती है कि बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों ने देशवासियों का जीना हराम कर रखा है।

इसीलिए 19 लाख घुसपैठियों में से 14 लाख हिंदू होने की बात बीजेपी समर्थक तबकों को पच नहीं पा रही थी और इसीलिए बीजेपी को यह लिस्ट न निगलते बन रही थी न उगलते। सो बीजेपी नेतृत्व ने यह रास्ता निकाला कि सीएबी लाकर नागरिकता कानून में संशोधन किया जाए और फिर से एनआरसी बनवाई जाए। इसीलिए अमित शाह ने सीएबी पर बहस के दौरान बताया कि असम वाली एनआरसी को हम अस्वीकार करते हैं और पूरे देश में एनआरसी लाते हुए असम में भी फिर से एनआरसी बनाई जाएगी। दोनों बातें एक साथ करने से ही लोगों के बीच यह संदेश जा सकता था कि नागरिकता साबित न कर पाने वाले हिंदुओं को चिंता करने की जरूरत नहीं है क्योंकि उन्हें सीएबी (जो अब सीएए यानी सिटिजेंस अमेंडमेंट एक्ट बन चुका है) के जरिए नागरिकता दे दी जाएगी।

यही संदेश बीजेपी देशवासियों को देना चाहती थी। दिक्कत यह हुई कि देशवासियों के दिलो-दिमाग पर सांप्रदायिकता का इतना गाढ़ा रंग नहीं चढ़ा जितना बीजेपी समझ रही थी। सो देशवासियों की ओर से इसका विरोध शुरू हो गया। बीजेपी की अगुआई वाली सरकार ने कठोर पुलिसिया कार्रवाई के रूप में इसका तोड़ निकाला। छिटपुट विरोध कई जगहों पर हो रहा था, लेकिन इसने दो मुख्य ठिकाने चुने दिल्ली का जामिया मिलिया इस्लामिया और यूपी की अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी। जमिया के मामले में तो अब पुलिस भी कह रही है कि वहां हुई हिंसा में यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स शामिल नहीं थे। लेकिन उस दिन पुलिस ने यूनिवर्सिटी में घुसकर स्टूडेंट्स पर इस कदर बल प्रयोग किया कि पूरा देश सकते में आ गया। एएमयू में तो और ज्यादा निर्ममता दिखाई गई।

सोचा यह था कि इस सख्त कार्रवाई से स्टूडेंटस का मनोबल टूट जाएगा और जो लोग इस कार्रवाई की निंदा करेंगे उन्हें टीवी चैनलों के जरिए भरपूर जवाब दिया जाएगा। कुछ वैसे ही जैसे जेएनयू में हुई कथित नारेबाजी के मामले में दिया गया था- कि ये दोनों विश्वविद्यालय आतंकियों और देशविरोधी तत्वों का गढ़ बन चुके हैं, कि सरकार ऐसे तत्वों की मनमानी कभी बर्दाश्त नहीं करेगी। मकसद यह था कि दोनों यूनिवर्सिटियों के कुछ हजार स्टूडेंट्स और उनके अभिभावक नाराज भी हुए तो क्या, बाकी पूरा देश साथ आ जाएगा, राष्ट्रवादी भावनाएं देश में उबाल मारने लगेंगी और यह धारणा भी आम वोटरों के मन में बैठ जाएगी कि सीएए और एनआरसी मूलत: मुस्लिमों का ही मुद्दा है। जो दिक्कतें होनी हैं उन्हें ही होनी हैं, सरकार हिंदुओं का तो ख्याल रख ही लेगी।

मगर जामिया के स्टूडेंट्स पुलिसिया दमन का क्रूर चेहरा देखने के बाद भी आतंकित नहीं हुए। शासन की इस अतिवादी कार्रवाई ने इसका विरोध करने के उनके संकल्प को और मजबूत किया। इतना कि लाइब्रेरी और कैंटीन में घुसकर तबाही मचाने की कार्रवाई के तुरंत बाद उन्होंने दिल्ली के आईटीओ स्थित पुलिस हेडक्वाटर्टर पहुंचकर विरोध जताने का फैसला कर लिया। टीवी चैनलों पर एक तरफ जामिया में पुलिसिया बर्बरता की खबरें चल रही थीं तो दूसरी तरफ यह भी बताया जा रहा था कि रात नौ बजे जामिया स्टूडेंट्स पुलिस मुख्यालय पर प्रदर्शन करने वाले हैं। जामिया स्टूडेंट्स के इस फैसले ने पूरा खेल पलट दिया। पुलिस बर्बरता से भौंचक लोगों के पास एक काम आ गया कि आईटीओ पहुंचकर शासन के इस काम के प्रति अपना विरोध दर्ज कराना चाहिए। नतीजा यह कि आईटीओ सिर्फ जामिया के स्टूडेंट्स नहीं पहुंचे, वहां जेएनयू के भी स्टूडेंट्स पहुंचे, डीयू के भी स्टूडेंट्स पहुंचे, बड़ी संख्या में अभिभावक भी पहुंचे। वहां एमएयू के भी स्टूडेंट्स पहुंचे। दिल्ली से बाहर के लोग भी, जो तीन-चार घंटों में वहां पहुंच सकते थे, पहुंचने लगे।

देखते-देखते आईटीओ पर हो रहे विरोध प्रदर्शन का स्वरूप और चरित्र बदल गया। वह केवल जामिया के छात्रों का या केवल छात्रों का विरोध प्रदर्शन नहीं रह गया, वह देशवासियों का विरोध प्रदर्शन बन गया कि आप हमारी यूनिवर्सिटियों के साथ, वहां पढ़ रहे हमारे बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करेंगे। मसला हिंदू-मुस्लिम का रह ही नहीं गया, इसे वैसा स्वरूप देना लगभग नामुमकिन हो गया। यहीं से सीएए और एनआरसी के खिलाफ आंदोलन भी शांतिप्रिय, लोकतांत्रिक, इंसाफपसंद और धर्मनिरपेक्ष नागरिकों के आंदोलन के रूप में फैलने लगा। कुछ जगहों पर हिंसा भी हुई और उन हिंसक घटनाओं के जरिए इस आंदोलन को समाजविरोधी व राष्ट्रविरोधी बताने की कोशिशें भी सरकार और सत्तारूढ़ संगठनों की ओर से कम नहीं हुई, लेकिन धीरे-धीरे यह भी साफ हुआ कि हिंसा उन्हीं राज्यों में हो रही है जहां बीजेपी सत्ता में है।

इन सबसे इस आंदोलन को थोड़ा जीवन मिल गया। शहरी शिक्षित मध्य वर्ग की अगुआई के चलते यह तत्काल पटरी से उतरता भी नहीं दिख रहा। 100 से ज्यादा संगठनों ने मिलकर एक ढीला-ढाला बैनर ‘वी द पीपल’ नाम से बना लिया है। अगर इस बैनर ने देश भर में हो रहे विरोध प्रदर्शनों को एकसूत्रता देने, उनमें समन्वय स्थापित करने में कामयाबी हासिल कर ली तो इस आंदोलन की उम्र थोड़ी और बढ़ सकती है। फिर भी यह सोचना तर्कसंगत नहीं होगा कि सरकार और बीजेपी व आरएसएस इतनी आसानी से हार मान लेंगे। हो सकता है व्यापक होते विरोध के दबाव में सरकार अपने कदम तात्कालिक तौर पर वापस लेती दिखे, लेकिन वह इसे अंतिम रूप से वापस नहीं लेगी। वजह यह है कि ये कदम संघ और बीजेपी के दीर्घकालिक एजेंडे का हिस्सा हैं। आज नहीं तो कल वे इसे लागू करने ही वाले हैं। इन मुद्दों पर हार मानते हुए भी वे नहीं दिखना चाहेंगे। सो संभावना यही है कि अगर रणनीति के तौर पर वे कदम पीछे लेते दिखते भी हैं तो तत्काल कुछ न कुछ ऐसा करेंगे जिससे यह स्थापित हो कि उन्होंने अपना इरादा छोड़ा नहीं है। और फिर जल्दी ही वे इन कदमों को किसी न किसी रूप में दोबारा लागू भी करेंगे ही।

ऐसे में हमें भी तात्कालिक विरोध प्रदर्शनों में पूरा ध्यान लगा देने के बजाय दीर्घकालिक रणनीति के साथ इस मसले को देखना चाहिए। और अगर गौर करें तो साफ हो जाता है कि तमाम अच्छाइयों के बावजूद अभी तक यह आंदोलन भावनाओं से संचालित और कुछ केंद्रों तक सीमित सांकेतिक विरोध प्रदर्शन ही बन पाया है। यह टीवी चैनलों की जद में आने वाले कुछ बड़े शहरों तक सीमित है। आम देशवासियों की इसमें शिरकत तो दूर, अभी यह उन तक ठीक से पहुंचा भी नहीं है। इस स्थिति का उल्लेख इसलिए जरूरी है क्योंकि अगर लागू हुआ तो समस्त देशवासी इसकी जद में आएंगे। स्वाभाविक है कि आंदोलन के समर्थक इसे आम देशवासियों तक नहीं ले जा पाए तो यह काम आंदोलन विरोधी यानी सरकार समर्थक तत्व करेंगे और जब वे इसे जनता तक ले जाएंगे तो जाहिर है, अपने ही ढंग से ले जाएंगे।

ऐसे में हमें आंदोलन के मौजूदा स्वरूप पर पूरा ध्यान केंद्रित करने के बजाय अपनी ताकत इससे जुड़े मुद्दों को सही ढंग से आम मेहनतकश जनता तक पहुंचाने और उसे इस लड़ाई के लिए तैयार करने में लगाना चाहिए। हम जानते हैं कि फिलहाल इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत उसी चीज को बताया जा रहा है जो इसकी सबसे बड़ी कमजोरी है- इसकी स्वतःस्फूर्तता, संगठनहीनता और नेतृत्वहीनता। बहुत संभव है कि पूंजीवादी मीडिया और उच्च मध्यम वर्गीय तबकों को इन्हीं वजहों से यह आंदोलन हानिरहित लगा और इसीलिए वे इसके समर्थन में आगे भी आ गए, लेकिन इसमें दो राय नहीं कि अगर आंदोलन जल्दी ही इन कमजोरियों से मुक्त नहीं हुआ तो कुछ समय में अपने आप कमजोर पड़ता हुआ खत्म हो जाएगा। इन कमजोरियों से मुक्त करने का एकमात्र उपाय यह है कि इसे अधिक से अधिक लोगों तक ले जाया जाए और अधिक से अधिक लोगों को तैयार किया जाए इसमें शामिल होने के लिए।

इसी बिंदु पर अखिल भारतीय जनसंसद ऐतिहासिक भूमिका निभा सकती है। यह एक ऐसा उपकरण हमारे हाथ में है जो न केवल इस ऐतिहासिक दौर में अपनी उपयोगिता साबित कर सकती है बल्कि आम लोगों को तत्काल संगठित होने का मजबूत आधार भी मुहैया करा सकती है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह सदस्यता आधारित संगठन नहीं है। सो, मेंबरशिप के चक्कर में पड़ने की जरूरत ही नहीं। जैसे ही किसी गांव या मोहल्ले में तीन लोग साथ बैठे, वैसे ही भारतीय जनसंसद की स्थानीय इकाई बना सकते हैं। इसके संविधान के मुताबिक किसी भी इकाई में कम से कम तीन सक्रिय सदस्य होने चाहिए। और स्थानीय इकाई बनते ही उस खास क्षेत्र में रहने वाले सभी बालिग नागरिक या कहें सभी वोटर अपने आप उसके सदस्य मान लिए जाते हैं। इस संगठन में दो तरह के सदस्य होते हैं सक्रिय और निष्क्रिय। दोनों के अधिकारों में कोई अंतर नहीं होता, पर जिम्मेदारियों में होता है। सक्रिय सदस्यों की यह जिम्मेदारी होती है कि वे क्षेत्र के अन्य तमाम लोगों के साथ मिल-बैठ कर उन्हें संगठन की गतिविधियों में शामिल करें। चूंकि यह एक बहुवर्गीय संगठन है इसलिए यह बाधा भी नहीं है कि किन पेशों से जुड़े लोगों को इसमें शामिल किया जाए और किन पेशों को छोड़ा जाए। उस खास क्षेत्र में रहने वाले सभी लोग इसके सक्रिय सदस्य हो सकते हैं। यह जरूर है कि ऐसा कोई मंच बन जाने के बाद आम मेहनतकश तबकों से जुडे लोगों के सामने यह जिम्मेदारी ज्यादा गंभीर रूप में आ जाती है कि इस संगठन या मंच को शोषक तबके न हाइजैक कर लें। इस मंच या बैनर के अंदर पूरी सतर्कता से शांतिपूर्ण वर्ग संघर्ष भी निरंतर चलाते रहना पड़ेगा ताकि संवाद और संघर्ष की दोतरफा प्रक्रिया से जहां आम नागरिक चेतना मजबूत हो वहीं मेहनतकश चेतना भी अपनी भूमिका निभाने में कमजोर न पड़े।

लेकिन ये सब आगे की बात है। फिलहाल हमारे सामने सीएए और एनआरसी का मुद्दा है और यह ऐसा मुद्दा है जो देश के हर नागरिक से जुड़ा है। यह महज दुष्प्रचार है कि इससे मुस्लिम ही परेशान होंगे। इससे देश का हर नागरिक उसी तरह प्रभावित होने वाला है, बल्कि उससे ज्यादा बुरी तरह प्रभावित होने वाला है जिस तरह नोटबंदी में प्रभावित हुआ था। इसलिए इस मुद्दे से उदासीनता सिर्फ वही दिखा सकता है जिसे इसके बारे में ठीक से पता नहीं है। जाहिर है, ऐसे उदासीन लोगों की उदासीनता दूर किए बगैर हम न तो लोगों को एकजुट कर पाएंगे और न ही सरकार के जनविरोधी कृत्यों का सही ढंग से प्रतिरोध पेश कर पाएंगे। चूंकि सरकार और सत्तारूढ़ संगठन इस मसले पर संगठित दुष्प्रचार मुहिम चला रहे हैं इसलिए और ज्यादा जरूरी हो जाता है कि हम संक्षेप में ही सही, पर इस जटिल मुद्दे पर अपनी समझ स्पष्ट कर लें।

हमें याद रखना होगा कि मूल मुद्दा है एनआरसी यानी नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस। इसे पूरे देश में लागू करने का एलान अमित शाह बार-बार संसद और संसद के बाहर कर चुके हैं। सीएए और एनपीआर उसी की तैयारी के क्रम में लाए गए हैं। चूंकि देशवासियों की तरफ से विरोध सरकार के अनुमान से कहीं ज्यादा तगड़ा हो गया, इसलिए यह कहा जाने लगा कि अभी तो कुछ हुआ ही नहीं है, अभी तो कैबिनेट में कोई बात ही नहीं हुई है। लेकिन कोई भी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी दो टूक यह नहीं कह रहे कि सरकार एनआरसी नहीं लाएगी। जाहिर है, इसे लाना तो इन्हें है ही, बस ये माहौल थोड़ा ठंडा होने का इंतजार कर रहे हैं।

और एनआरसी की बात करें तो असम देश का इकलौता ऐसा राज्य है जहां 1951 में यह रजिस्टर तैयार किया गया था। वहां भी 1951 के बाद से अभी तक इसका नवीनीकरण नहीं हुआ। हाल में नवीनीकरण की जो कवायद चलाई गई वह भी आखिरकार नाकाम रही। नवीनीकरण की इस प्रक्रिया में यह सुनिश्चित करने की कोशिश की गई थी कि 1951 में तैयार उस रजिस्टर में दर्ज लोगों और 1971 तक की मतदाता सूची में दर्ज लोगों के परिवार के सदस्यों के नाम इस नैशनल रजिस्टर में आ जाएं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो 1971 तक असम में रह रहे लोगों के बेटे-बेटियों, पोते-पोतियों को एनआरसी में दर्ज किया जाना था। यानी एनआरसी में अपना नाम दर्ज करवाने की इच्छा रखने वालों को मूलतः दो तरह के दस्तावेज देने थे। पहले तो कोई ऐसा दस्तावेज जो यह साबित करता हो कि फलां आदमी 1971 या उससे पहले असम में रहता था। इसके बाद कोई ऐसा दस्तावेज जो कि उस आदमी से एनआरसी में दर्ज होने के इच्छुक इस व्यक्ति का रिश्ता साबित करता हो।

 

अवैध घुसपैठियों को पहचानने की कवायद के नाम पर चलाई जानी वाली यह प्रक्रिया हमें यानी आम नागरिकों को किस-किस तरह से कितना नुकसान पहुचाने वाली है, इस पर बात करने से पहले एक बार फिर ये मूल बातें याद कर लेना ठीक रहेगा कि इस देश में आज भी लोकतंत्र है और हर लोकतांत्रिक व्यवस्था की तरह यहां भी संप्रभुता किसी सरकार या नेता में नहीं बल्कि देश की जनता में निहित है। आजादी के बाद से यानी पिछले करीब 70 वर्षों से आम देशवासी इस देश के मालिक की भूमिका में है। जनप्रतिनिधि खुद को जनसेवक यानी इन मतदाताओं का सेवक बताते हैं और उसी हैसियत से शासन चलाते रहे हैं। बीच में एक छोटा सा दौर आपातकाल का आया जिसमें शासन चलाने का अस्थायी अधिकार पाए लोगों ने देश के नागरिकों के कुछ अधिकार स्थगित कर दिए थे। हालांकि सत्तर के दशक के मध्य में करीब डेढ़ साल चले उस दौर में भी आम देशवासियों की हैसियत को कोई चुनौती नहीं दी गई थी। सिर्फ आपात काल का हवाला देते हुए उनके कुछ अधिकारों के इस्तेमाल पर कुछ समय के लिए रोक लगाई गई थी। बावजूद इसके, देशवासियों ने तत्कीन सरकार की यह जुर्रत बर्दाश्त नहीं की। आपात काल के ठीक बाद हुए चुनावों में आपात काल की घोषणा करने वालों को ऐसी धूल चटाई कि सभी पार्टियों को हमेशा के लिए सबक मिल गया। न केवल आपात काल लगाने वाली पार्टी कांग्रेस ने इसके लिए बार-बार माफी मांगी, बल्कि अन्य पार्टियों ने भी उसके बाद कभी देश में आपातकाल लगाने जैसे किसी कदम के बारे में सोचने तक की हिम्मत नहीं की।

अब आपात काल के उस प्रयोग के करीब चार दशक बाद ऐसी प्रवृत्तियां सिर उठाने लगीं जो आपात काल की घोषणा किए बगैर और आम देशवासियों को कुछ बताए बगैर उनके सारे अधिकार छीन लेने की महत्वाकांक्षा पाल रही हैं। आम लोगों से वोट लेकर उनके जनादेश के नाम पर तमाम शक्तियों का इस्तेमाल करते करते उन्हें यह भ्रम हो गया कि आम लोगों को शासन और राजनीति के गुर तो आते नहीं, सो उन्हें जो कुछ भी समझा दिया जाए वे समझ जाएंगे। इसी भ्रम के चलते धीरे-धीरे इस धारा से जुड़े लोग यह बात भी भूल गए कि इस देश के मालिक वे सामान्य देशवासी हैं जिनके वोटों की बदौलत वे कुछ समय के लिए संविधान के प्रावधानों के अनुरूप शासन चलाने का अधिकार मात्र पाते हैं। यही वजह है कि वे पूरे देश में एनआरसी लागू करने की घोषणा जैसा दुस्साहस कर बैठे हैं।

जैसा कि ऊपर कहा गया है, एनआरसी लागू करने के पीछे मुख्य मकसद यही है कि इस बात की पहचान की जाए कि कौन इस देश का मूल निवासी है और कौन अवैध घुसपैठिया। और अगर यह पता करने के लिए एनआरसी लागू की जाएगी तो जाहिर है असम की ही तरह पूरे देश में सभी नागरिकों को दो तरह के दस्तावेज दिखाने को कहा जाएगा। उसके लिए कोई एक कट ऑफ लाइन तय की जाएगी। उस तारीख से पहले यहां अपने किसी पुरखे के रहने का सबूत माने जा सकने वाला कोई दस्तावेज और फिर आज रह रहे व्यक्ति का उस पुरखे से रिश्ता साबित करने वाला कोई दस्तावेज। वोटर आईडी कार्ड, आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, पासपोर्ट जैसे उपलब्ध दस्तावेज सबूत इसलिए नहीं माने जा सकते क्योंकि इन्हें मान्य करते ही इस पूरी कवायद की जरूरत ही खत्म हो जाएगी।

तो अपने और अपने माता-पिता के जन्म या संपत्ति से जुड़े दस्तावेज कितने नागरिकों के पास होगा? जिनके पास नहीं हैं वे अगर हिंदू, बौद्ध वगैरह भी हुए तो खुद को इस देश का नागरिक बताते ही सीएए का लाभ पाने की उनकी पात्रता खथ्म हो जाएगी क्योंकि यह कानून पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के हिंदुओं, बौद्धों के लिए है, अपने देश के हिंदुओं बौद्धों के लिए नहीं। जाहिर है, सीएए के जरिए देश की गैर मुस्लिम आबादी को छूट दिए जाने जैसी धारणा पूरी तरह भ्रामक है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिनके पास दस्तावेज हैं भी वे आखिर किसके सामने पेश करेंगे ये कागजात? उस सरकार के तय किए हुए अफसरों कर्मचारियों के सामने जो ताकत ही इस बात से पाती है कि उसे देशवासियों ने चुना है। तो नागरिकों के सेवक के ये सेवक तय करेंगे कि उनके सामने नागरिकों द्वारा पेश किए गए दस्तावेज सही हैं या नहीं, उचित हैं या नहीं और सबूत माने जा सकने लायक हैं या नहीं।

दूसरे शब्दों में कहा जाए तो आजादी के बाद के इन सात दशकों में जो इस देश को चलाते रहे, यहां की सरकार चुनते रहे, उसकी जिम्मेदारी तय करते रहे उन तमाम लोगों के बारे में ये सरकारी कारिंदे तय करेंगे कि इनमें से कौन इस देश का नागरिक कहलाने लायक है और कौन नहीं, कौन वोट देने योग्य है और कौन नहीं।

आज तक किसी सरकार की ऐसी मजाल नहीं हुई कि इतनी बड़ी हिमाकत करने की सोच भी सके। और सच यही है कि यह सरकार भी ऐसा नहीं कर सकती। इसने अगर ऐसा सोचा है तो यह न तो इस देश को जानती है, न यहां की मिट्टी को और न यहां के मेहनतकश लोगों के जज्बे को। इसे मालूम नहीं है कि यहां के लोग किसी को प्यार करते हैं, तो उसे सिर पर बैठा लेते हैं। लेकिन अगर वह अपनी हरकतों से यह साबित कर दे कि वह इसके लायक नहीं है तो उसे वहां से नीचे पटकने में भी देर नहीं करते। 1971 में बांग्लादेश युद्ध जीतने के बाद इंदिरा गांधी की लोकप्रियता सबके सिर चढ़कर बोल रही थी। लेकिन एक कार्यकाल भी पूरा नहीं हुआ था कि जनअसंतोष की लहर दिखने लगी। इससे बचने के लिए उन्होंने आपात काल का सहारा लिया तो उन्हें ऐसा झटका दिया कि वह जिंदगी भर भूल नहीं पाईं। उसी इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उनके बेटे राजीव गांधी के साथ सहानुभूति दिखाते हुए उन्हें अभूतपूर्व बहुंमत दे दिया। लेकिन राजीव गांधी उस विश्वास की कसौटी पर खरे नहीं उतरे, बोफर्स कांड ने उनकी छवि धूमिल की तो जनता ने उन्हें दूसरा कार्यकाल देना भी गवारा नहीं किया। इसलिए अगर एक बार सत्ता में वापसी से कोई अपना दिमाग खराब करने लग जाए तो जनता को उसका दिमाग ठीक करना आता है।

साफ है कि कोई भी बहुमत, कितना भी विशाल बहुमत किसी सरकार को यह अधिकार नहीं देता कि वह इस देश के मालिक को इसी देश में भिखारी की हैसियत में ला देने की सोचने लग जाए। यह बात ही बेतुकी है और दुनिया का कोई भी तर्क इसे स्वीकार्य नहीं बना सकता। सरकार और सत्तारूढ़ दल से जुड़े रीढ़हीन लोगों की छोटी सी जमात ऐसी है जो सरकार के तर्कों को बगैर समझे-बूझे दोहराने की कोशिश कर रही है। अव्वल तो उन लोगों को नहीं पता कि ये तर्क खुद उनकी भी गरिमा के खिलाफ हैं। लेकिन उनकी नासमझी की कीमत देश के सामान्य नागरिक अपनी गरिमा पर समझौता करके नहीं चुका सकते।

सो, भारतीय जनसंसद की लोकल इकाइयां गठित करते हुए हम वहां के लोगों को बताएंगे कि हमारे पास दस्तावेज हो या न हो, किसी को यह अधिकार ही नहीं है कि हमसे हमारे पुरखों की इस मिट्टी से जुड़ा होने का सबूत मांगे। इसलिए पूरे देश के सभी नागरिक इसके खिलाफ सविनय अवज्ञा चलाएंगे। सविनय अवज्ञा यानी पूरी विनम्रता और शांति से इस बात पर अड़े रहना है कि हम कागज नहीं दिखाएंगे। सरकार जो चाहे कर ले। अगर डिटेंशन सेंटर ले जाना चाहे तो सबको ले चलो, सब वहीं चलकर रहेंगे, लेकिन हमसे हमारे होने का सबूत मांगने वाली सरकार को स्वीकार नहीं करेंगे।

 

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