समाज का पूरा ढांचा अक्सर शोषकों या चतुर मनुष्य के भले के लिए होता है!!!

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शोषित और शोषणकर्ता का मनोविज्ञान

हम शोषित हैं ,ऐसा मानने के लिए मनुष्य को अपने अंहकार से लड़ना पड़ता है । मनुष्य किसी भी कीमत पर अपने अंहकार को बचाना चाहता है । इसलिए शोषित भी शोषणकर्ता की इस बात पर हमेशा मोहर लगाता है कि वो शोषित नहीं हैं । घरों में पिटने वाले बच्चे या स्त्रीयां इसी मनोविज्ञान के चलते अपनी ही गलतियां तलाशती रहती हैं और पिटते रहते हैं , अपितु अपने शोषक को प्रसन्न करने का प्रयत्न करते रहते हैं , समाज का पूरा ढांचा अक्सर शोषकों या चतुर मनुष्य के भले के लिए होता है । मनुष्य की गुलामी के कारण रोटी , धन , रोग , कई कई हैं किन्तु असल में
मनुष्य गुलाम अज्ञानता के कारण होता है , अज्ञानता और मूर्खता पीढ़ी दर पीढ़ी सफर करती है । लोग अपनी जड़ वृति के कारण बदलने को तैयार नहीं होते अपने दिमाग का इस्तेमाल नहीं करते , पढ़ना ज्ञान अर्जित करना दुनिया का सबसे सरल कार्य है किन्तु लोग इसे करना नहीं चाहते ,कारण उन्हें मनोरंजन की बिमारी है किन्तु अध्धयन का शौक नहीं है ,वे गुरूओं मार्गदर्शक के पीछे भागकर जीवन को आसान बनाना चाहते हैं जबकि स्वाध्याय के अतिरिक्त सुख प्राप्त करने का आधुनिक समय में कोई साधन नहीं है ,सुनी सुनाई लकीर पर चलने वाले लोग अपने दुश्मन स्वयं होते हैं । वे अपने शोषकों के विचार अपने मन में ठूंस लेते हैं , उन्हें ही दिन रात घोंटते हैं , उन्हें ही जीवन आधार बना लेते हैं । इसका स्पष्ट उदाहरण है औरतों का औरतों से घृणा करना , उन्हें पुरुष से हीन समझना , प्रताड़ित करना । क्योंकि शोषित व्यक्ति स्वयं और अपने स्वजनों के प्रति हिंसक हो जाता है , वह डर से समाज में कितना भला बना रहे ,घर पहुंच कर उसका व्यवहार परिवार के लिए बदल जाता है , बहुत शरीफ कहलाने वाले पुरुष घर में अपनी पत्नी को प्रताड़ित करते हैं ।
महानता को शोषित अपना गुण समझ लेता है , त्याग को महानता कहकर उसका शोषण किया जाता है , मां के त्याग की कहानियां वास्तव में उसे अधिकार से वंचित करने को गढ़ी जाती हैं , और तो और उसे दुख में रोने का नैतिक अधिकार भी छीन लिया जाता है ।
शोषक कहता है कि आपको दुख में रोना नहीं है सब्र करना है आलौकिक न्याय पर भरोसा करना है , जबकि सच यह है कि दुःख में रोना मानवीय गुण हैं । शोषित को समझना चाहिए उसे महान होने की आवश्यकता नहीं है उसका संतुलित मनुष्य होना जरूरी है , छोटी छोटी तनख्वाह पाने वाले मजदूर मालिक के कई काम मुफ्त में कर देते हैं , ऐसे त्याग करके वे अच्छा और भला होना चाहते हैं , उन्हें अहसास भी नहीं होता कि ऐसा करके वे अपने परिवार के हित का त्याग कर रहे हैं , अपने बीवी बच्चों को सुविधाओं से वंचित कर रहे हैं । त्याग की भावना तो बड़े और सफल व्यक्ति के मन में होनी चाहिए ।
शोषित अपने जैसे शोषितों पर रौब झाड़ता है , अपने से कमजोर को सताता है , अपने से ताकतवर की चमचागिरी करता है ।
भेड़ों के झुंड का नेतृत्व करते हुए जब कोई स्त्री कहती हैं कि वो शेरनी है फिर उत्सवधर्मिता और बाजारवाद के घालमेल के लिए अपने हितों से खिलवाड़ कर लेती है तो मुझे लगता है वाकई इंसान होने की समझ उसमें नहीं है वरना शेर को पिंजरे में रखने वाला मनुष्य अधिक ताकतवर और बुद्धिमान है ।
वो ऐसे तमाम काम करती है जो उसे आत्मग्लानि में रखें । बदलने की शुरुआत समाज नहीं व्यक्ति से होती है । भावनाएं जरूरी होती हैं मौलिक होती हैं ,वे नकल द्वारा उत्पन्न नहीं होती । लेकिन उन्हें परम्पराओं से जोड़ना उनमें मिलावट करना है ,डर द्वारा उनहें नियंत्रित करना है ।
शोषकों का काम होता है , शोषित में हीन भावना उत्पन्न करना । अपने और अपनों के प्रति नफ़रत की हद तक इसे उपजाना, बढ़ाते चले जाना । अपनों और अपने जैसों को हीन मानने वाला व्यक्ति मानसिक रूप से गुलाम तो होता ही है ,वह नेगेटिव फीडबैक देकर अपने साथियों को आगे बढ़ने से भी रोकता है । ईर्ष्या और परस्पर द्वेष की भावना हीन भावना से उपजती है ।
इससे शोषक का काम आसान हो जाता है , उसे शोषण के लिए मात्र यह करना पड़ता है कि शोषित के नायकों को अपमानित करना, उन्हें शोषितों की नज़र में गिरा देना और धीरे धीरे उन्हें परिदृश्य से गायब करके अपने नायकों को स्थापित करना , यहां तक कि शोषित को हमेशा उनकी वजह से इतनी ग्लानि में रखना कि वह उनसे घृणा करने लगे और शोषणकर्ता को ही अपना नायक मान लें ।
शोषित एक ग़लत समाज में लज्जा से घिरा रहता है जैसे बलात्कार की शिकार स्त्री समाज से डरती है और बलात्कारी उस घटना को नकारने में जुट जाता है , जिसे अपराध बोध से मर जाना चाहिए वह चालाकी के कारण धूर्त बना रहता है और जिसका कोई दोष नहीं वह लज्जा से घिरा रहता है । दलित शोषित हैं लेकिन अपनी जाति बताने से यूं डरता है जैसे यह उसका अपराध हो ।
शोषक में लज्जा का भाव नहीं होता , लिजलिजा पन होता है , बेशर्मी होती है । कुतर्क करके अपने शोषण को जायज ठहराने की ज़िद होती है । शोषित को ग़लत ठहराने की कोशिश होती है । और वो शोषक तब तक रह पाता है जब तक वो अपना ढीठपन जिंदा रख पाता है या शोषित जब तक खुद पर शर्मिंदा रहता है ।
और शोषण के खेल की सबसे मजेदार बात यह कि शोषणकर्ता शोषक को यह विश्वास दिलाने में कामयाब हो जाता है कि उसका इंसाफ ऊपर वाला करेगा , लेकिन वह खुद गलत काम करता रहता है , उसे कभी ऊपर वाले से डर नहीं लगता ।
लोग कहते हैं मजलूमों की बद्दुआएं बहुत फलती हैं ,पर ऐसा होते देखा नहीं है , होता भी है तो इससे जिसके साथ अन्याय हुआ उसका क्या भला हुआ ? मजलूम वे लोग रह जाते हैं जो इंसाफ अपने हाथ में नहीं लेते जो अपने लिए नहीं लड़ पाते , एक ईमानदारी, एक विश्वास ,एक निष्ठा उन्हें रोक लेती है , लेकिन सच यह है कि दूसरों को कर्मों का फल मिलने का इंतजार करने की जगह अपने इंसाफ के लिए कुछ कर्म किए जाएं । शराफ़त गुनाह नहीं है लेकिन जब अपनी इज्जत और न्याय पर बन आए तो इसे छोड़ देना बेहतर है ।
हो सकता है जिसे आप बाहर तलाश रहे हैं कि वो आपका इंसाफ करेगा ,वो आपके भीतर चीख रहा हो, छटपटा रहा हो कि लड़ो मैं साथ हूं ।
मधुमक्खी मधु बनाती है , धरती का सबसे जरूरी जीव है जो जैव विविधता को बचाता है फिर भी डंक भी मारती है , अपनी सुरक्षा के लिए प्रकृति ने प्रत्येक मनुष्य , प्रत्येक जीव को सक्षम बनाया है । और स्वयं की सुरक्षा स्वार्थ नहीं है बल्कि प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है ।
शांति तब कायरता है जब सामने वाला आपसे मजबूत हो , क्षमा कमजोर की कायरता है और वीर का जेवर । महानता आत्मरक्षा में भी है । स्वयं के हितों का त्याग महानता नहीं है मानसिक गुलामी है और वो भी तब जब डर से ऐसा किया जाए ।
शोषित कोई भी व्यक्ति किसी भी कारण से हो उसे महानता का आवरण उतारकर यह स्वीकार करना होगा कि वह शोषण का शिकार है , उसके साथ गलत व्यवहार हुआ है , दुनिया उससे घृणा करती है इसका अर्थ यह नहीं कि वो भी खुद से घृणा करने लगे । उसे आत्मसम्मान और आत्मस्वाभिमान को वापस लाने का प्रयत्न करना चाहिए । और स्वयं से प्रेम करना चाहिए , जो व्यक्ति स्वयं से प्रेम करता है वह ही अपना भला बुरा सोच पाता है ,सही निर्णय ले पाता है , समाज का भला सोच पाता है । जो अपने लिए न्याय हासिल नहीं कर सकता ऐसा व्यक्ति समाज का भी भला नहीं कर सकता ।
शेली किरण

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