संस्कृत के विद्वान और साहित्यकार श्रीधर द्विवेदी से राजीव कुमार झा की बातचीत

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आपकी पहचान मूलत: कवि के रूप में है और आप अपने काव्य लेखन के बारे में बताएँ . आपका झुकाव कविता लेखन की ओर कैसे हुआ ? कविता लिखते हुए किस तरह के आनंद की अनभुति होती रही ?
उत्तर:- लगता है कविता मुझे संस्कार में मिल गया है। बचपन में ही राम चरित मानस या कवितावली पढ़ते- पढ़ते उस लय में गुनगुनाने की आदत सी पड़ गई थी। जब हाइ स्कूल में पढ़ता था तब तुकबन्दी कर साथियों को सुनाता था। किसी- किसी दिन शिक्षक भी सुना करते थे। यही प्रवृति आगे चलकर वर्तमान के कवि रूप का जन्म दिया।
मैं प्रायः छांदस कविताएं ही लिखता हूँ। यदा- कदा वर्तमान धारा के अनुरूप अतुकांत, छन्द- मुक्त कविता भी लिखता हूँ। अपनी रचनाओं में प्रायः मैं सामयिक विषय पर या धार्मिक कथानकों पर ही कलम चलाता हूँ।
कविता लिखते समय उसमें कवि तल्लीन हो जाता है। इस तल्लीनता में जो आनन्द की अनुभूति होती है वह अनिर्वचनीय है। एक आत्मिक सुख मिलता है। यह मेरी स्वयं की अनुभूति है।
संस्कृत से भी आपका गहन अनुराग रहा है . संस्कृत के ग्रंथों से संबंधित अपने अनुवाद कार्य के बारे में बताएँ ?
उत्तर:- संस्कृत भारत की मूल भाषा है। भारत का ज्ञान, विज्ञान, दर्शन, साहित्य जो कुछ भी है वह संस्कृत में है। घर में पूजा पाठ जो भी होते देखता सब संस्कृत में था। गीता और वाल्मीकि रामायण का पाठ भी होता था। श्लोक वाचन में लालित्य था, अतः मेरे नाना मुझसे पढ़वा कर सुनते थे। तभी से संस्कृत के प्रति अनुराग बढ़ा। यद्यपि मैं संस्कृत की औपचारिक शिक्षा नहीं ली, पर स्वाध्याय चलता रहा।
श्रीमदभगवत गीता और मेघदूतम का मैं ने भावानुवाद विविध हिन्दी छन्दों में किया हूँ जो प्रगतिशील प्रकाशन दिल्ली से छपी भी है। इधर मैं ‘ गीत गोविन्दम’ के अनुवाद में प्रवृत्त हूँ और भागवत के 5 ललित गीतों-
वेणु गीत, गोपी गीत, प्रणय गीत, युगल गीत और भ्रमर गीत का अनुवाद पूरा हो गया है।
हमारे देश के आध्यात्मिक चिंतन में गीता के संदेश की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालिए-

उत्तर:- गीता एक सार्वकालिक और सार्वदेशिक ग्रन्थ है। इसकी उपादेयता सभी मनुष्यों के लिये समान है जिसमें ज्ञान और कर्म दोनों का समन्वय है। व्यक्ति कैसे अपनी समस्याओं से निजात पा सकता है, गीता हमें बताती है। द्विविधा ग्रस्त मानव मोह ( समस्या ) ग्रस्त हो सकता है, गीता हमें इस मोह से निकलने का मार्ग दिखलाती है।
आज तो लोग और भी अधिक समस्या ग्रस्त हैं। गीता में कहा गया है कि निष्ठाएं ‘द्वि विधा’ हैं जो हमें अपने लक्ष्य की सिद्धि करा सकते हैं। एक है ज्ञान और दूसरा है कर्म। आज भी हम इन्ही दो निष्ठाओं को अपना कर अपना साध्य सिद्ध कर सकते हैं। यही गीता की प्रासंगिकता भी है।
कालिदास को संस्कृत का सबसे महान कवि और नाटककार क्यों कहा जाता है ?
उत्तर:- कालिदास संस्कृत कवियों में लोकप्रियता के आधर पर सर्वोच्च स्थान पर माने जाते हैं। ये काव्य के श्रव्य और दृश्य दोनो ही विधाओं में साहित्य जगत को उत्तम काव्य दिए। इनका काव्य ‘रघुवंशम’ प्रबन्ध की परम्परा, (एक नायक की जगह) से अलग सा है। इन्होंने पूरे रघुवंश को ही काव्य का नायक बना डाला। इनके छन्द द्राक्षा फल के समान हैं जो मुख में लेते ही रस की पिचकारी छोड़ आनन्द से भर देते हैं।
नाटक में आज तक ‘अभिज्ञान शाकुंतलम’ की चारुता को कोई अन्य नहीं पा सका। काव्य कोई और ललित हो सकते हैं पर कवि! कवि तो कालिदास ही महान हैं।
आप अपने बचपन घर परिवार और पढायी लिखाई के बारे में बताएँ ?

उत्तर:- मेरा बचपन अपने ननिहाल में व्यतीत हुआ है। पैतृक गाँव- घर, जिला गोरखपुर का है किन्तु मेरा जन्म पलामू में अपने ननिहाल में ही हुआ था। जब मैं तीन साल का था तो मेरी माता जी का कैंसर से निधन हो गया था। मेरे पालन पोषण के लिये नाना- नानी अपने साथ रख लिये। तब से यहीं का हूँ। मेरी शिक्षा यहीं से हुई और मैं रांची विश्व विद्यालय से भूगोल विषय में एम.ए. किया।
वर्तमान में झारखंड राज्य सरकार के खाद्य आपूर्ति विभाग से सेवा निवृत्त हो स्थाई रुप से डालटनगंज में रह रहा हूँ।
आप लोग पलामू कैसे आये . इस वन्य अंचल और यहाँ के नैसर्गिक परिवेश और जनजीवन के बारे में बताएँ ?

उत्तर:- पलामू आने के कारण का संकेत पूर्व प्रश्न के उत्तर में दे चुका हूं। पलामू आगमन की कथा और व्यथा दोनो ही लम्बी है। मूलतः मेरे माता जी का स्वर्गवास और मेरा नाना के यहाँ का पालन ही कारण बना। अपने एकलौते पुत्र के मोह में शायद पिता जी जन्म भूमि छोड़ पलामू आ गए।
पलामू पहले एक अल्प साधन का जिला था। जंगल थे, जंगल में जंगली जानवर थे। छोटी छोटी नदियाँ थी, जिसके रेत पर हम बच्चे चिक्का कबड्डी खेलते थे। लोग भी सरल थे। किन्तु अब दृश्य बदल गया। जंगल उजड़ गए। बहुत सारी छोटी नदियाँ मर गईं, बेतला अभ्यारण्य छोड़ कहीं वन पशु नहीं दिखते। हाँ फसल के दुश्मन नीलगाये दिखती हैं। अब यहाँ से बड़े पैमाने पर पलायन भी होने लगा।
अपने प्रिय साहित्यकारों के बारे में बताएँ ?

उत्तर:- हिन्दी साहित्य के काल खण्डों के अनुसार कहें तो भक्ति काल के सूरदास रसखान और रहीम मुझे बहुत प्रिय हैं। रीति काल के बिहारी और पद्माकर को मैं बार बार पड़ता हूँ, वहीं आधुनिक कवियों में प्रसाद और निराला बहुत भाते हैं। हरिऔंध, दिनकर , मैथलीशरण और नागार्जुन को भी पढ़ना अच्छा लगता है। किन्तु बाबा तुलसी दास की न पूछिये! उनके साहित्यिक धरातल को छू ले, वैसा कोई नहीं। ये मुझे सबसे अधिक पसंद हैं।
वर्तमान हिंदी लेखन के बारे में आपकी क्या राय है ?
उत्तर:- हिन्दी में आज अनन्त धाराएं बह रहीं हैं। लेखन में अनेक विधाओं ने जन्म लिया है। आज नये- नये प्रतीकों और बिम्बों को लेकर कविताएं लिखी जा रही हैं। नव गीत के आवरण में गीत खूब लिखे जा रहे हैं। आज कल गजल की तरह हिन्दी में गीतिका लिखी जा रही हैं। जापानी विधा भी अब अपना धमक दिखा रहा है। हिन्दी का विस्तार हुआ है पर मुझे लगता है कि हिंदी कविता का संख्यात्मक विस्तार तो हुआ पर गुणात्मक विस्तार कहीं भटक सा गया है।
झारखंड के साहित्यिक परिवेश की विशिष्टता को रेखांकित कीजिए।
उत्तर:- झारखण्ड को प्रकृति ने वनों पठारों पहाड़ियों से सजाया है। यहाँ पर जैव विविधता के साथ जन और भाषिक विविधता भी है। यहाँ की एक बोली नगपुरिया में बहुत पहिले से कविताएं लिखी जा रही हैं। कथा क्षेत्र और नाटक पर भी काम हुये हैं। अनूप लुगुन आदि कुछ जन जातीय समस्याओं को उठाते हुए कविता लिख रहे हैं, जो सबका ध्यान आकृष्ट करता है। श्री हरे राम त्रिपाठी ‘ चेतन’ ने बिरसा मुंडा को काव्य नायक बना एक प्रबन्ध लिखा है, ‘ उलगुलान की आग’।
इस समय भी कई कवियत्री और कवि कविता लेखन में सक्रिय हैं।

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