संवेदनाओं की कवयित्री डॉ. सीमा विजयवर्गीय

0
665

डॉ. कृष्णकुमार ‘नाज़’

कविता के क्षेत्र में महिला रचनाकारों पर आमतौर पर एक आरोप लगता रहा है कि वे शृंगार के अलावा अन्य किसी विषय पर रुचिकर और सार्थक नहीं लिख पातीं तथा अन्य विषय गौण हो जाते हैं। हो सकता है यह बात किसी हद तक सही हो, लेकिन हमें इस बात का भी ख़याल रखना चाहिए कि महिला रचनाकारों के साथ बहुत-सी बंदिशें भी हैं। उनके साथ मुख्य समस्या यह है कि वे सामाजिक बेड़ियों में इस प्रकार जकड़ी हैं कि स्वतंत्र रूप से कहीं आ-जा नहीं पातीं। विवाहित महिलाओं के साथ यह बंधन और भी कड़े हो जाते हैं, क्योंकि ससुराल पक्ष उन्हें आसानी से बाहर जाने की अनुमति नहीं दे पाता। लेकिन, लिखने वाले लिख रहे हैं। अपने पाँवों से लिपटी ज़ंजीर को उन्होंने पायल बना लिया है। अपने आसपास के विषाक्त वातावरण में वे अमृत तलाश रही हैं। अपने घर को ही उन्होंने माँ सरस्वती का मंदिर बना लिया है। समर्पित रचनाकारों को ये सामाजिक बंधन लिखने से नहीं रोक पाते, बल्कि ये बंधन ही उन्हें लिखने की प्रेरणा प्रदान करते रहते हैं।

अलवर (राजस्थान) निवासिनी डा. सीमा विजयवर्गीय को पढ़कर बहुत-से आरोप स्वतः निष्प्राण हो जाते हैं, क्योंकि इनके यहाँ समाज भी है, राजनीति भी है, राष्ट्र भी है, प्रकृति भी है, घर-परिवारों की टूटन भी है, रिश्ते-नातों का बिखराव भी है और प्रेम की आत्मीयता भी है। इनके दो ग़ज़ल-संग्रह- ‘ले चल अब उस पार कबीरा’ 2019 में और ‘रज़ा भी उसी की’ 2020 में प्रकाशित हुए हैं, जो साहित्यिक समाज में चर्चित होकर सराहना पा चुके हैं।

दुनिया का सबसे अनमोल और निःस्वार्थ कोई रिश्ता है, तो वह है माँ। एक ऐसा अहसास जो व्यक्ति की रगों में उम्रभर दौड़ता है। वह माँ ही है, जो इस बात का हिसाब नहीं रखती कि वह अपनी संतानों को क्या-क्या दे पाई, बल्कि इस बात का हिसाब रखती है कि वह अपनी संतानों को क्या नहीं दे पाई, और उसी की पूर्ति के लिए वह जीवनभर प्रयासरत रहती है। सीमा ने माँ की उपादेयता को बहुत निकट से समझा और आत्मसात् किया है। तभी तो वह कहती हैं-

जीवन के गुर रोज़ सिखाती माँ होती तो
जाने क्या-क्या मुझे बताती माँ होती तो
पी जाती हूँ जाने कितनी बातों को अब
दिल का इक-इक दर्द बताती माँ होती तो
+ + +
ऊन-सलाई लेकर नाज़ुक हाथों से
माँ बुनती है प्यार यूँ जीवन चलता है
+ + +
राहें जब सब बंद नज़र आतीं मुझको
फिर से राह नई मुझको दिखलाती माँ

कभी जब संयुक्त परिवार होते थे, तो कितनी बेफि़क्री होती थी। लेकिन उस समय भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए रिश्तों का क़त्ल नहीं होता था। ज़रूरतें भी सीमित होती थीं। धन कमाने की कोई प्रतिस्पर्धा नहीं होती थी, लेकिन आज वे सभी सुखद परिस्थितियाँ मानो उलट-सी गई हैं। आज धन के लिए भाई भाई का क़त्ल कर देता है, बेटा माँ-बाप को मार देता है। यानी संबंधों में अजब-सा ख़ालीपन और बिखराव आ गया है। कवयित्री ने इस बात को गहराई से महसूस किया है-

तुमने ही तो तोड़ा है अपनों का दिल
तुम ही जाकर उन्हें मनाओ तो जानें
+ + +
दूरियाँ इस क़दर हैं रिश्तों में
अब कोई सिलसिला नहीं दिखता
+ + +
अपने ही घर में अपनों के बीच यहाँ
एक परायापन सहती है बूढ़ी माँ

प्रकृति किसका मन नहीं लुभाती। ये सागर, ये नदी, ये झरने, ये ताल-तलैयाँ, ये पहाड़, ये वादियाँ, ये हरे-भरे वृक्ष, ये लहलहाती फ़स्लें, विभिन्न पक्षियों का कलरव, नदियों की कल-कल, पेड़ों से लिपटकर उन्हें चूमती और झूलती बेलें हर मन को आनंदित करती हैं। प्रकृति की हर संयमित गतिविधि मानसिक सुकून देती है। कवयित्री की दृष्टि ने इन सबका भी बारीकी से निरीक्षण किया है। इसीलिए उन्होंने ये शेर कहे हैं-

कभी इक छुअन से, कभी इक नमन से
दरख़्तों को कितना सजाती हैं बेलें
नहीं दूर होतीं दरख़्तों से पलभर
उन्हें चूमकर झूल जाती हैं बेलें
+ + +
कितना भी ढक ले कुहरा, लेकिन सूरज
आएगा फिर द्वार यूँ जीवन चलता है
+ + +
मौसम, हवा, झरने, नदी, सागर, तलैयाँ, ताल सब
ऊपर से तो दिखते वही, आधार पर बदले हुए

कवि भी चूँकि एक सामाजिक प्राणी है। उसके पास जितने भी लेखन उपकरण हैं, वे सब समाज द्वारा ही प्रदत्त हैं। इसलिए वह कभी समाज से विमुख नहीं हो सकता। यही कारण है कि प्रत्येक कवि-साहित्यकार के यहाँ समाज का चित्रण मिलता है। इसीलिए साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है। सीमा ने भी समाज की प्रत्येक गतिविधि पर पैनी दृष्टि रखी है-

पूरे के पूरे गाँव में जलती थी होली एक ही
ख़ुशियाँ अभी दिल में वही, त्योहार पर बदले हुए
पुण्यात्मा, धर्मात्मा, अब और इनको क्या कहें
सुंदर बसन, माथे तिलक, आचार पर बदले हुए
+ + +
ज़िंदगी क्यों डरी-सी बैठी है
अब कोई घर खुला नहीं दिखता
+ + +
हर सिम्त अब उदास है, रौनक़ गई कहाँ
है ज़िंदगी भी गर यही तो ज़िंदगी कहाँ
बाज़ार की हो बात कि फिर आदमी की हो
हर शय यहाँ मिलावटी, कोई खरी कहाँ
+ + +
कौन करे उपचार, सुनो इस कलयुग में
सबके सब बीमार, सुनो इस कलयुग में
बचा नहीं पाए गर घर की इज़्ज़त को
फिर पौरुष बेकार, सुनो इस कलयुग में

लेकिन वह आशान्वित भी हैं-

आने वाले कल को लेकर हैं चिंताएँ
लेकिन होगा बेहतर, फिर रौनक़ छाएगी

अपनी जन्मभूमि, अपना देश सभी को प्यारा होता है। यहाँ तक कि पशु-पक्षी भी इसका महत्व समझते हैं। फिर भारतीय संस्कृति में निमग्न व्यक्ति के लिए तो उसका धर्म और मज़हब सब कुछ उसका देश ही है, जो उसे प्राणों से भी प्यारा होता है। कवयित्री को भी भारत-भूमि पर गर्व है। वह सदैव इसके उन्नयन की कामना करती हैं-

दुनिया में इसकी गूँज हो, आकाश में परचम रहे
मेरे वतन में गंगा-जमुना का वही संगम रहे
आँगन में खिलती धूप में जुड़ते सभी थे प्यार से
खाटों पे वो पसरी हुई दोपहर भी हरदम रहे
+ + +
ये ज़मीं है प्यार और विश्वास की
सूर, मीरा, जायसी, रैदास की

प्रेम एक ऐसी पवित्र भावना है, जिसके वश में इंसान तो क्या, पशु-पक्षी और पेड़-पौधे भी होते हैं। यह सारा संसार प्रेम का ही विस्तार है। सीमा ने भी प्रेम-विषयक बहुत-से शेर कहे हैं, लेकिन उनके प्रेम में मांसलता की बू नहीं, बल्कि अध्यात्म की ऊँचाइयाँ हैं। उनके यहाँ शृंगार शरीर का नहीं, बल्कि आत्मा का है। उनके शेरों में प्रेम की सरिता आत्मा के झरोखों से होती हुई समर्पण के सागर में समा जाती है। कुछ शेर प्रस्तुत हैं-

तू ही मेरा आराधन
तू ही मेरी चौपाई
+ + +
तुम चंदन हो, तुम वंदन हो
तुम ही मेरे आराधन हो
रूप सँवारूँ जिसमें पल-पल
तुम मेरे ऐसे दरपन हो
+ + +
दौड़ रहा मेरे अंदर मीठा दरिया
फिर भी दिल को प्यासा-प्यासा देखूँ मैं
+ + +
छा जाते हो मन-आँगन में बासंती मौसम बनकर
पलभर में ही सारा मंज़र बहका-बहका लगता है
+ + +
तू साथ है तो ये जहाँ गुलदान-सा लगता मुझे
लेकिन तेरे बिन सब यहाँ वीरान-सा लगता मुझे
+ + +
देख नहीं पाई थी तुमको नज़र उठाकर
मुझ पर अपने रंग जमाने फिर आना तुम
+ + +
सुबह-शाम, दिन-रात कहूँ क्या, पल-पल महका लगता है
सच तो ये है साथ तुम्हारे हर पल अच्छा लगता है
+ + +
मेरा नाम होंठों पे लाता वही है
मुझे हर घड़ी गुनगुनाता वही है
वो बैठा है कोसों की दूरी पे लेकिन
मुझे मुश्किलों से बचाता वही है
उसे डोर जीवन की सौंपी है मैंने
उसे जो भी भाये कराता वही है
वजूद आज मेरा है केवल उसी से
मेरी हर ग़ज़ल को सजाता वही है

सीमा चूँकि अध्यापिका हैं, इसलिए उनके शेरों में कई स्थानों पर उनका शिक्षक मुखर हो जाता है और वह उपदेशक की भूमिका में आ जाती हैं। कई शेरों में युवावर्ग को आशान्वित करती हुई दिखाई देती हैं-

सागर की लहरें बनने की कोशिश कर
बैठ नहीं अब कुछ करने की कोशिश कर
इक इतिहास बनाता इंसाँ ख़ुद का भी
पहले से बेह्तर लिखने की कोशिश कर
+ + +
अब से बेह्तर ही होगा कल
हाँ, थोड़ा उल्लास बचा ले
पत्थर हो जाने से पहले
थोड़ा-सा अहसास बचा ले
+ + +
आज पतझर ले गया पत्ते सभी
कल मगर आएगी रुत मधुमास की

सीमा के शेर विचारों के समंदर में ग़ोते लगाते हुए प्रतीत होते हैं। वह किसी समस्या को उद्घाटित करती हैं, तो उसका समाधान भी बताती हैं। उनके यहाँ आशाओं की लहलहाती फ़स्लें हैं। मैंने महसूस किया है कि सीमा बहुत तेज़ी से लिखती हैं, इसलिए उनके यहाँ कभी-कभी सतही भाव भी दिखाई दे जाते हैं। लेकिन अभी उनके साहित्यिक सफ़र की शुरूआत ही है, इसलिए कहीं-कहीं लड़खड़ाहट होना स्वाभाविक है। समय के साथ-साथ अनुभव भी बढ़ेगा और विचारों में और अधिक परिपक्वता आएगी। उनके परिश्रम और लगन को देखकर मैं पूर्णरूप से आशान्वित हूँ कि एक दिन उनका शुमार देश की यशस्वी कवयित्रियों में किया जाएगा। माँ सरस्वती उन पर अपनी कृपा बनाए रखें। मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ। अंत में अपने ही एक शेर के साथ अपनी बात समाप्त करना चाहता हूं-

हो ललक जिनमें ज़रा-सी भी गगन छूने की
हौसला ऎसे परिंदों का बढ़ाते रहिए

– 9/3, लक्ष्मीविहार, हिमगिरि कालोनी,
काँठ रोड, मुरादाबाद-244001
मोबा. 99273-76877, 98083-15744
Email : kknaaz1@gmail.com

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here