लॉक-डाउन और बाबासाहेब

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ज भारत में लॉक डाउन के प्रथम चरण का आखिरी दिन है और आज ही बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर का जन्मदिन (14 अप्रैल 1891) भी है. वर्तमान समय में जिस प्रकार लॉक डाउन विश्व में जाना पहचाना शब्द बन गया, उसी प्रकार बाबा साहेब का नाम भी विश्व में प्रसिद्ध है. दोनों में एक प्रकार की समानता यह है कि दोनों विनाश को रोकने के लिए चर्चित हैं परन्तु आर्थिक रूप से लॉक डाउन हानिकारक है, जबकि बाबा साहेब आर्थिक क्षेत्र में भी मसीहा हैं।

24 मार्च 2020 को रात 8 बजे देश को संबोधित करते हुए प्रधानमन्त्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने रात 12 बजे से लेकर (25 मार्च – 14 अप्रैल) 21दिन तक पूरे देश में लॉक डाउन की घोषणा किए जिसके मूल में था- सोशल डिस्टेन्स अर्थात सामाजिक दूरी. यह अलग बात है कि शब्द भले ही सामाजिक दूरी की ओर संकेत कर रहा है परन्तु भाव शारीरिक दूरी (फिजिकल डिस्टेंस) का है, इसलिए कई विद्वानों ने यह बात प्रमुखता से उठाई कि सोशल डिस्टेन्स की बजाय फिजिकल डिस्टेंस शब्द प्रयोग किया जाए, क्योंकि भारत ऐसे भी सोशल डिस्टेंस का दंश लम्बे अर्से से झेलता आ रहा है। बात जब सामाजिक दूरी की हो और बाबासाहेब को याद न किया जाये, वह भी अपने देश में संभव ही नहीं है। क्योंकि उनका पूरा जीवन ही इस दूरी को खत्म करने में खपा है। बाबासाहेब स्वयं जिस परिवार व जाति में जन्म लिए वह सामाजिक दूरी अथवा छुआछूत का दंश झेल रहा था।
बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर का जन्म 14अप्रैल 1891 को महू (मध्यप्रदेश) में हुआ परन्तु उनके पिता मूल रूप से आम्बडवे (रत्नागिरी, महाराष्ट्र) के रहने वाले थे. रामजी मालोजी सकपाल और भीमाबाई की 14वीं व अंतिम संतान के रूप में भीमराव का जन्म हुआ। उनका परिवार हिन्दू महार जाति से सम्बन्धित था. महार जाति के साथ सबसे बुरा बर्ताव पेशवाओं के शासनकाल में हुआ है-
“…..मराठा क्षेत्र में महार, जो अछूत जातियों में से एक है, सड़क पर नहीं थूक सकते क्योंकि इससे उच्च जाति के हिन्दू के पैर से वह थूक छू गया तो वे अपवित्र हो जायेंगे. उन्हें अपने गले में एक मिट्टी का बर्तन लटकाकर चलना होता है, जिसमें वे थूक सकें. साथ ही उन्हें अपने पीछे झाड़ू बांधकर चलना होता है, जिससे वे जिस राह से गुजरें वह रास्ता साफ होता जाए. अगर उस राह से कोई ब्राह्मण गुजर रहा हो तो उससे दूर ही उसे लेट जाना होता है, जिससे उनकी गन्दी परछाई पवित्र ब्राह्मण पर न पड़ जाए.”1
अफ़सोस आज भी कुछ मिडिया वाले जमीन पर थूक खोजकर कैमरे को जूम करके अपने टीवी दर्शकों को दिखाने में लगे हैं क्योंकि थूक से भी नॉवेल कोरोना के फैलने की भरपूर सम्भावना है, जिसे कि विश्व स्वास्थ्य संगठन एवं तमाम देश महामारी घोषित कर चुके हैं. मुझे तो लगता है कि कोरोना महामारी के खत्म होने पर अपने देश में जातिगत छुआछूत एवं साम्प्रदायिकता को भी महामारी घोषित कर देना चाहिए. क्योंकि यह किसी भी स्वस्थ समाज के लिए महामारी से कम घातक नहीं है. कुछ लोग आज भी कुतर्क करने से बाज नहीं आते हैं उनका मानना होता है कि अछूत लोग गंदे रहते हैं इसलिए इनके साथ भेदभाव किया जाता रहा है। अब इन्हें कौन समझाये कि अम्बेडकर साहब जैसे पढ़े-लिखे लोग के साथ भी कई जगह पर भेदभाव किए गए,
“लार्ड माउन्टबेटन ने अपने कार्यकारिणी के सदस्य डॉ. बी.आर.आम्बेडकर को आमंत्रित किया और उनसे जगन्नाथ पुरी मंदिर में साथ चलने को कहा. स्थानीय पुजारी ने बहुत खुश होकर माउन्टबेटन का स्वागत किया लेकिन डॉ आम्बेडकर को मन्दिर में घुसने की अनुमति नहीं दी.”2
इतना ही नहीं एक बार वाराणसी में एक राष्ट्रीय स्तर के नेता की प्रतिमा का अनावरण बाबू जगजीवन राम ने किया. उसके बाद हिन्दू जाति के लोगों ने उस प्रतिमा को गंगाजल से धुलाई की, क्योंकि उनका मानना था कि बाबू जगजीवन राम के छूने से प्रतिमा अपवित्र हो गई थी. यह समस्या 21वीं सदी में भी कम तो हुई है पर समाप्त नहीं हुई है क्योंकि कुछ ही साल पहले बिहार के मुख्यमंत्री रहते हुए जीतनराम माझी पटना के हनुमान मन्दिर चले गए थे तो वहां के पुजारियों ने मंदिर को तुरंत धुलकर गंगा जल छिड़क कर शुद्ध किया. खैर मेरे जैसा व्यक्ति तो ऐसे किसी भी मन्दिर-मस्जिद में या धर्म स्थल पर पूजा करने जाना ही व्यर्थ समझता है इसलिए मैं जाने से परहेज़ भी करता हूँ। फिर यह शर्मनाक स्थिति देखकर सुनकर दुःख होता है जबकि बाबासाहेब एवं उनके साथियों द्वारा बनाये गये भारतीय संविधान के अनुच्छेद-17 में साफ लिखा गया है कि,
“ ‘अस्पृश्यता’ का अंत किया जाता है और उसका किसी भी रूप में आचरण निषिद्ध किया जाता है. ‘अस्पृश्यता’ से उपजी किसी निर्योग्यता को लागू करना अपराध होगा विधि के अनुसार दंडनीय होगा.”3
…खैर..
कोरोना महामारी के रोकथाम के लिए जब से लॉक डाउन देश में घोषित किया गया उसमें सर्वाधिक पीड़ित गरीब-मजदूर हैं ।उनकी पीड़ा को कम करने के लिए सरकारें और स्वयंसेवी संसथान लगे हुए हैं, फिर भी वे भुखमरी के शिकार हो रहे हैं क्योंकि वे कारखानों में फंसे हुए हैं, और कारखना बंद पड़ा हुआ है. कारखानों के ज्यादातर मालिक व ठेकेदार अपने को कोरोनटाइन कर वातानुकूलित कमरे में नाक बजा रहे हैं। बात जब कारखाना और मजदूरों की होगी तब बाबासाहेब को याद करना तो लाजमी है। आजाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरु सरकार की कैबिनेट में कानून मंत्री थे-बाबासाहेब, और श्रम मन्त्री थे– बाबू जीवन राम। तत्कालीन समय में मजदूरों की स्थिति बदतर थी, क्योंकि उनके काम का कोई निश्चित समय सीमा और मजदूरी तय नहीं थी, और न ही कोई सुख सुविधा। बल्कि उन्हें बंधुआ मजदूर की तरह खटाया जाता था। इसके रोकथाम के लिए कारखाना अधिनियम-1948 और बागान श्रमिक अधिनियम-1951 जैसे कानून बनाये गए। यह सही है कि इन कानूनों से मजदूरों की सारी समस्या समाप्त नहीं हो गई, परन्तु इतना तो तय है कि कुछ कल्याण तो जरुर ही हुआ. जबकि भारत में इससे पहले भी कारखाना अधिनियम-1881, 1891, 1911, 1922, 1934 में बन चुके थे लेकिन स्थिति सही नहीं थी. उदाहरण के तौर पर कारखाना अधिनियम-1948 को देखें तो, “कारखाना अधिनियम,1948 को केंद्र सरकार द्वारा 23 सितम्बर 1948 को पारित किया गया तथा यह कानून पहली अप्रैल 1949 से देश में लागू हुआ.”4 इसमें कारखाना, विनिर्माण प्रक्रिया, शक्ति, कलेण्डर वर्ष, श्रमिक, खतरनाक प्रक्रिया, दिन, सप्ताह, सक्षम व्यक्ति, वयस्क, कुमार, बालक एवं युवा व्यक्ति जैसे शब्द को स्पष्ट किया गया. “कारखाना अधिनयम-1948 को कुल ग्यारह अध्यायों में विभाजित किया……. अध्याय-III से लेकर अध्याय-VIII के अंतर्गत कमर्कार/श्रमिक से सम्बन्धित महत्वपूर्ण प्रावधान दिए गए हैं. अर्थात् इस कानून के अध्याय-III से अध्याय-VIII तक के प्रावधानों द्वारा कर्मकारों/श्रमिकों के कार्य की दशाओं को संचालित एवं संरक्षित किया जाता है। इन सभी अध्यायों के अंतर्गत कर्मकारों/श्रमिकों से संबंधित अनेक प्रावधान दिए गए हैं।”5 अध्याय-III के तहत मजदूरों के लिए स्वास्थ्य, अध्याय-IV में सुरक्षा, अध्याय-V में कल्याण, अध्याय-VI में वयस्कों के कार्य के घंटे, अध्याय-VII में युवा व्यक्तियों का नियोजन, अध्याय-VIII में वार्षिक सवेतन छुट्टी एवं अध्याय-X में गलती एवं दण्ड सम्बन्धित प्रावधान किये गए हैं। “1984 के भोपाल गैस कांड के बाद कारखाना अधिनियम के सुरक्षा अध्याय में अनेक संशोधन किये गए. साथ ही अध्याय-IVA इसमें जोड़ा गया जिसके अंतर्गत sec.41(A) से लेकर 41(H) तक खतरनाक कार्य से संबंधित अनेक महत्वपूर्ण प्रावधान रखे गए हैं.”6 इस अधिनियम को 2016 में मोदी सरकार में भी संशोधित किया गया है.
लॉक-डाउन में देश को सर्वाधिक क्षति अर्थव्यवस्था की है. आर्थिक क्षेत्र में भी बाबासाहेब का देश के लिए अहम योगदान रहा है. मानाजाता है कि “आम्बेडकर अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की डिग्री लेने वाले पहले भारतीय थे. उन्होंने तर्क दिया कि औद्योगिकीकरण और कृषि विकास से भारतीय अर्थव्यवस्था में बृद्धि हो सकती है.”7 आज जो हमारे देश में भारतीय रिजर्व बैंक है, उसमें बाबासाहेब का अहम योगदान रहा है. “14 अप्रैल 1923 को अम्बेडकर बम्बई आ गए. कुछ दिनों में अपनी थीसिस में सुधार का काम पूरा कर फिर से लन्दन यूनिवर्सिटी को भेज दिया. उन्हीं परीक्षकों ने उसे स्वीकार क्र लिया, इस प्रकार उनकी वर्षों की कठिन मेहनत का फल मिल गया और उन्हें डॉक्टर ऑफ़ साइंस (डी.एससी.) से सम्मानित किया गया. उनकी यह रिसर्च थीसिस ‘रूपये की समस्या’(Problem of Rupee) लन्दन के पब्लिशर्स पी.ए.किंग एंड संस लि. द्वारा 1923 में प्रकाशित किया गया.”8 अफ़सोस आज वही रुपया डॉलर की तुलना में दिनोदिन कमजोर होता जा रहा है।
लॉक-डाउन में भी गोदी मिडिया और आईटी सेल के लोग हिन्दू-मुसलमान करने से बाज नहीं आ रहें हैं। ‘पंचजन्य’ नामक एक साप्ताहिक पत्रिका है जिसमें 12 अप्रैल 2020 को ‘हिन्दुस्थान की राजनीती में हमेशा समस्याएँ पैदा करते रहेंगे मुसलमान : बाबासाहेब’ शीर्षक से लेख छपा है। इस संघी पत्रिका को मैं पहले भी देख चुका हूँ कि एक-दो लेख अम्बेडकर साहब पर छपा है परन्तु दुःख की बात यह है कि इस पत्रिका परिवार को हमेशा अम्बेडकर साहब की 400 पृष्ठों वाली ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ किताब ही दिखती है, जिसमें मुस्लिम लीग के अलग पाकिस्तान की मांग की आलोचना की गई है, और भी कई असहमतियां हैं। लेकिन इस पत्रिका को ‘The Untouchables’ (1948) एवं ‘जाति प्रथा का विनाश’ (Annihilation of Caste, 1936) जैसी किताबें क्यों नहीं दिखतीं? आखिर इन किताबों के आलोक में कोई लेख क्यों नहीं छापती यह पत्रिका? यदि कोई इस सन्दर्भ में छपा है तो कृपया कोई उस अंक की जानकारी मुहैया कराए शीघ्र पढ़ने की चेष्टा करूंगा।
लॉक-डाउन में आजकल लोग घरों में अपने परिवार के साथ रह रहे हैं, जो कि कभी कुछ लोगों द्वारा सिर्फ औरतों के लिए चहारदीवारी तय की गयी थी. 24 घंटे साथ रहने पर कई तरह के पारिवारिक कलह भी सामने आने लगे हैं जो कि पति-पत्नी के अहम व समानता का टकराव भी हो सकता है. स्त्री-पुरुष के बीच वाली असमानता की खाई को पाटने के लिए बाबासाहेब ने आजाद भारत में ‘हिन्दू कोड बिल’ लाया जिसका ज्यादातर नेताओं ने विरोध किया यहाँ तक सरदार पटेल और राजेंद्र प्रसाद ने भी खुलकर विरोध किया। बिल के कुछ अंश को ही टुकड़ों में पास किया गया। अंततः रुढ़िवादी नेताओं के सामने प्रधानमन्त्री नेहरु को भी घुटने टेकने पड़े और बाबासाहेब ने 27 सितम्बर 1951 को कानून मंत्री पद से स्तीफा दे दिया. “9 अप्रैल 1948 को समिति को सौंपा और अप्रैल 1951 तक चार वर्षों में भी हिन्दू कोड बिल पर बहस पूरी नहीं हुई और उसे मार डाला गया तब उन्होंने कहा कि इस बिल के चार वाक्यांश पास करने के बाद इसकी हत्या कर दी गई और दफना दिया गया, उस समय किसी ने दो बूंद आंसू तक नहीं बहाए और न शोक जताया.”9
अंत में मैं यही कहना चाहूँगा कि फ़िलहाल लॉक डाउन को 3 मई 2020 तक के लिए लागू कर दिया गया है इसलिए आज बाबासाहेब के जन्मदिन पर उनसे प्रेरणा लेते हुए अपने अध्ययन क्षमता का विकास करें और समय का सही सदुपयोग करें. बाबासाहेब ने बहुत सारी किताबों को पढ़ा था और समाज को करीब से देखा था जिसका परिणाम हमारे सामने है. वे अच्छे विधिवेता, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ, शिक्षाविद, दार्शनिक, लेखक, पत्रकार, समाजशास्त्री आदि रहे हैं. इसीलिए तो प्रोफेसर चौथीराम यादव कहते हैं कि भले ही 20वीं सदी गाँधी-नेहरू के नाम रहा हो लेकिन 21 वीं सदी तो अम्बेडकर के नाम ही होगा।
मैं इस महामानव को चरणों में नतमस्तक होते हुए सादर नमन करता हूँ!
सधन्यवाद!
© डॉ. दिनेश पाल
असिस्टेंट प्रोफेसर (हिन्दी)

संदर्भ-
1. मंडल कमीशन, अनुवादक सत्येन्द्र पीएस, लेफ्टवर्ड बुक्स, पृ.सं. 126
2. वही, पृ सं. 194
3. भारत का संविधान, सं. सी. पी. अरोरा, युनिवर्सल लॉ पब्लिशर्स, पृ.सं. 09
4. भारतीय श्रम कानून, डॉ. पंकज कुमार तिवारी व अंशु तिवारी, प्रतियोगिता संदर्भ पब्लिकेशन, पृ.सं. 70
5. वही, पृ.सं. 77
6. वही, पृ. सं. 85
7. विकिपीडिया
8. बाबासाहेब अम्बेडकर : लाइफ एंड मिशन, सं. डॉ. एम.एल. परिहार, बुद्धम् पब्लिशर्स, पृ.सं. 55
9. वही, पृ.सं. 317

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